Saturday, June 14, 2008

मेरा दर्द न जाने कोय

byline
संजय कुमार
जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पायी हैं बांग्लादेश में रह रहे बिहारी मुसलिम समुदाय पर यह बात अक्षरश: उच्चरित होती हैं भारत -पाकिस्तान के बीच जब बंटवारा हो रहा था, तो भारत के उर्दू भाषी सभी बिहारी मुसलिम अपनी अिस्मता, धार्मिक पहचान व Çहदू कौम से अलग धार्मिक देश पाकिस्तान की सरजमÈ पर रहने की अपनी मंशा से पूवÊ पाकिस्तान का रुख कर गयेण् लेकिन आज स्थिति यह है कि न तो उनकी पहचान ारतीय के रूप में की जाती है, न ही पाकिस्तान उन्हें स्वीकार कर रहा है और न ही बांग्लादेश उनको ा रहा हैण् यहां तक कि उन्हें शरणाथÊ ी नहÈ माना जाता है, क्योंकि वे इसके लिए अंतरराष्टीय मानकों पर खरे नहÈ उतरतेण् आजादी के 37 वर्ष बाद वहां के हाईकोर्ट ने यह निर्णय दिया है कि नयी पीढ़ी को बांग्लादेश की नागरिकता मिल पायेगी, वही उन्हें मतदान करने के अलावा वे सी सुविधाएं मुहैया होगी, जो आम नागरिकों को दी जाती हैण् बिहारी मुसलिम समुदाय आखिर इतने वषो± तक अपनी पहचान की लड़ाई लड़ने की जद्दोजहद क्यों कर रहे हैं, इसके लिए बंटवारे के इतिहास को याद करना जरूरी हैण्
यह कहानी शुरू होती है ारत-पाकिस्तान बंटवारे के साथण् वर्ष 1947 में औपनिवेशिक ारत का जब बंटवारा हो रहा था, तब तकरीबन 10 लाख उर्दू ाषी मुसलिम (वर्तमान बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश तथा राजस्थान के इलाकों से, जिन्हें वहां बाद में बिहारी मुसलिम से संबोधित किया जाने लगाण्) पूर्वी पाकिस्तान की ओर पलायन करने लगेण् पूवÊ पाकिस्तान आगे चलकर बांग्लादेश बनाण् पूवÊ पाकिस्तान की रुख करने की कई वजहें थÈण् एक सांप्रदायिक खून-खराबे से बचना, दूसरा इसलामिक संरक्षण प्राप्त करना तथा तीसरा वे इसे एक ऐसे मौके के तौर पर देख रहे थे, जिससे वे Çहदू बहुल समुदाय से दूर हो सकते थेण् उर्दू लहजे में पलायन करने की इस प्रवृित्त को हिजरत कहा जाता हैण् लेकिन इस कदम से उनका मकसद अधूरा ही रहाण् रीति-रिवाज, परंपराओं, रहन-सहन व ाषाई स्तर पर उनकी िéताएं उनके लिए दुखदाई बन गयीण् हालांकि पकिस्तान की आधिकारिक ाषा `उर्दू´ ही थी, लेकिन पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली ाषी समुदाय बहुसंख्य थे, इसलिए वे अल्पसंख्यक के तौर पर ही चििन्हत हुएण्
पाकिस्तान सरकार की ओर से उनके हितों का ख्याल रखने का पूरा आश्वासन दिया गया थाण् बंगाली समुदाय जहां पारंपरिक —षि कार्य में लगे थे, तो बिहारी मुसलिम औद्योगिक क्षेत्र, लघु उद्योग, व्यापार तथा वाणिज्य में लगे थेण्
यह कहना मौजूं होगा कि शुरू से ही स्थानीय लोगों के साथ इन बिहारी मुसलिमों का छत्तीस का आंकड़ा रहाण् वे एक-दूसरे को हिकारत की नजर से देखते थेण् आधिकारिक ाषा के रूप में उर्दू को शामिल करने के मुद्दे पर उनका पूरा समर्थन था, जबकि इस क्षेत्र में बहुसंख्य की ाषा बंगाली थीण् वर्ष 1952 में बंगालियों द्वारा छेड़े गये आंदोलन का उन्होंने पूरा विरोध कियाण् साथ ही वर्ष 1970 में हुए राष्टीय तथा प्रांतीय चुनाव में यूनाइटेड पाकिस्तान के मुद्दे पर वे सरकार के साथ रहेण् जब 1971 में बांग्लादेश स्वतंत्र होने की लड़ाई लड़ रहा था, वे एकजुट होकर पाकिस्तानी सरकार के पक्ष में लामबंद हो रहे थेण् जब बांग्लादेश आजाद हुआ, तब वे लोग पूवÊ पाकिस्तान में ही बसना चाहते थे, लेकिन बंटवारे की जटिल प्रकिया के बीच उनके सारे मंसूबों पर पानी फिर गयाण् पाकिस्तान की ओर से किया गया वादा वादा ही रह गयाण् उन वादों पर आज तक अमल नहÈ हो पायाण् आज स्थिति यह है कि पाकिस्तान इनसे कोई सरोकार नहÈ रखना चाहता हैण्
एक रिपोर्ट के अनुसार तीन लाख लोग अी तक अपनी पहचान को लेकर संघर्षरत हैण् बिहारी मुसलिम समुदाय बांग्लादेश के वििé इलाकों में 66 से ी ज्यादा शिविरों में रह रहे हैंण् तीन दशक से नारकीय Çजदगी जीने को मजबूर हैण् वे शरणाथÊ शिविरों में तो रह रहे हैं, लेकिन यूनाइटेड नेशंस हाईकमिशनर फॉर रियूजी यानी यूएनएचसीआर के मानदंडों को पूरा नहÈ कर पाने के कारण शरणाथÊ कहलाने से वंचित है, साथ ही शरणाथÊ के नाम पर मिलनेवाली सुविधाओं से ी वंचित हैण् अब जबकि बांग्लादेश के हाइकोर्ट ने यह निर्णय दिया है कि 37 वर्ष पहले पाकिस्तान के बंटवारे के समय बांग्लादेश में छूट गये लोगों के बच्चे देश की नागरिकता पाने के हकदार है, तो एक उम्मीद तो बंधी ही हैण् प्रमुख अधिवक्ता हाफीजुर रहमान खान के मुताबिक वे आनेवाले चुनाव में वोट देने के अधिकार ी रखेंगेण्
तीन लाख की आबादीवाले इस समुदाय की आधी जनसंख्या जो अपनी स्वीकार्यता को लेकर अबतक पाकिस्तान के रुख का बांट जोह रहे थे, कानूनी तौर पर अब बांंग्लादेश का नागरिक बन सकेंगेण् बांग्लादेश में जन्मे 1,40,000 बिहारी मुसलिम अब सी नागरिक सुविधाओं का ला उठा पायेंगेण् इस समुदाय की एक बड़ी आबादी अब ी पाकिस्तान की सरजमÈ पर बसने की इच्छा रखते हैं, उन्हें आज ी इस देश से उम्मीद हैण्