Wednesday, October 15, 2008

पत्रकारिता और मै

वर्ष २००१ के आखिरी महीने की बात है मुजफ्फरपुर से दिल्ली आया था शिक्षा के नए आयाम की तलाश में । पता नहीं था आखिरी दौर में पत्रकारिता को ही मंजिल बनाऊंगा । गाँव और शहर के बिच पला मेट्रो शहर की चकाचौंध से दूर इस अनजाने शहर में आ तो आ गया लेकिन क्या करना है क्या नहीं करना है इसकी कोई खास जानकारी नहीं थी फ़िलहाल तो इस बेहद खर्चीले शहर में आर्थिक विपन्नता से उबरने का ही ध्येय था । बडे भाई के साथ जिस फ्लैट में ठहरा था उसी कुछ लोग और भी थे जो ए थे मेरी ही तरह किसी मंजिल की तलाश में लेकिन वे लोग इस विपन्नता से उबरन सिख चुके थेमेरे लिए अछि बात थी की उनका संपर्क था उन्ही के दिखाए मार्ग पर चला ८०० रुपये की तनख्वाह पर टूशन पकड़ी । इस पेशे में भी कई समस्याएँ थी सुंदर चेहरा आकर्षक परिधान साथ ही दिल्ली की स्थानीय भाषा का सही सही उच्चारण जैसे किसी मोडेलिंग कंपनी के मातहत रैंप पर उतरने जा रहे हो चुक हुई तो शिष्यों की हंसी का पात्र बनिए इनसे बच निकले तो मन सम्मान के साथ मनचाहे कीमत भी ऊपर वाले ने चेहरा तो ख़राब नहीं दिया इतना कुछ तो जानकारी थी की बच्चो को अपनी ज्ञान की शेखी बघार उन्हें बारगल सकू यहाँ इस पेशे का एक कायदा है आप कुछ भी पढाये अंक अच्छे आने चाहिए यहाँ चालाकी यही है स्तुन्देंट्स असे खोजे जो खुद ही इतने काबिल हो की अच्छे अंक ले आये मेरी किस्मत यहाँ साथ थी सरे स्टुडेंट उच्चबुद्धि वाले थे इसीतरह महीने की ढाई से तिन हज़ार का जुगार हो गया अब आगे उस रह को तलासने की बरी थी जिसे संजोये में दिल्ली आया था