संजय कुमार, रांची
जश्न। जश्न। जश्न। हर तरफ जश्न। सड़कों पर ऐसा रेला। मानो मेला। आसमान में आतिशबाजी जैसे वर्षों बाद आई दीवाली। एक-दूसरे को बधाई देते ऐसे चिपटे, जैसे आज ही ईद हो। शायद क्रिकेट ही ऐसा खेल है, जिसका पल-पल रग-रग में देशभक्ति का जुनून पैदा करता है। 26 जनवरी या 15 अगस्त दो ऐसे मौके होते हैं, जब पूरा देश एक साथ जश्न मनाता है। लेकिन, इतिहास में दो बार एक 1983 में दूसरा 2011 में ऐसे मौके आए, जब पूरा देश जश्न मना रहा था। जश्न के अपने-अपने तरीके थे। कोई खुशी से आंसू बहा रहा था। तो कोई सड़क पर दौड़ लगा रहा था। सभी को पता था कि टीम इंडिया जीत गई। पर एक-दूसरे को यूं बता रहे थे जैसे उन्हें पता नहीं, केवल वही इसके चश्मदीद गवाह हो। तरह-तरह के दावे। मैं कह रहा था ना, इंडिया जीतेगा। कोई चीख रहा था- इंडिया आई लव यू। धौनी तेरा जवाब नहीं। गंभीर ने भी क्या खूब दिखाया। सचिन का सपना हुआ पूरा। इसे कहते हैं युवराज। कोहली को भी मत भूलो। कुछ ने तो पहले से ही तैयारी कर ली थी। हजारों रुपये खर्च कर जमकर आतिशबाजी की।
सचमुच मैच का रोमांच ऐसा था कि सबकी सांसे पल-पल के बदलाव पर अटकी थी। मैच के दौरान मनोभाव व दिल की बातों को फेसबुक जैसे नेटवर्किंग साइट्स पर रखनेवालों की भी कमी नहीं थी। एक तरफ टीवी पर बदलते हालात का जायजा, दूसरी तरफ फेसबुक पर अपना कमेंट। लंदन के बर्मिघम से आशा किरण सहवाग व सचिन के जाने के बाद अफसोस जताती है, तो रांची में उसका भाई आनंद लिखता है, अभी इंतजार बाकी है। जीत के बाद आशा लिखती है-आखिर हमने दिखा ही दिया। टीम इंडिया के साथ सभी देशवासियों को मेरी ओर से बधाई। वहीं न्यूयार्क से मुस्कान लिखती है-अभी अपने देश में रहती, तो दोस्तों के साथ मौज मनाती । पूनम लिखती है- चक दिया इंडिया नी। सौरव लिखते हैं-धौनी आज अमर हो गया। धौनी के परफॉर्मेंस पर राहुल लिखते हैं-रांची के छोरा कमाल कर देलस हो। विदिशा थापा लिखती है- पागलपंथी इसी को कहते हैं। आरती लिखती है- जियो खिलाड़ी वाहे वाहे। यह विश्वकप सचिन के लिए। आज धौनी ने कप्तानी पारी खेली। संदीप लिखते हैं- सोचो इतने जंगी तैयारी के बाद भारत हार जाता तो क्या होता। टीम इंडिया की तस्वीर के साथ राजेश लिखते हैं- हमलोग वल्र्ड चैंपियन बन गए हैं। अपने भारतीय होने पर गर्व करें। संदीप झा लिखते हैं-आज हम भी उन लोगों में शामिल हो गए, जिन्होंने अपनी टीम को वल्र्ड कप जीतते देखा है। थैंक्स धौनी। आलोक की टिप्पणी है-मेरा भी यही हाल है। 83 याद नहीं, 87 में उतना लगन नहीं था, 92 से शुरू हुआ सफर लगा कल पूरा हो गया। जाहिद अब्बास लिखते हैं- बड़ी मुद्दत के बाद और काफी शिद्दत के बाद यह मौका हाथ लगा है। इस जश्न में सबने ली डुबकी, किसी ने मुस्कुराकर, किसी ने ताली बजा कर, किसी ने चीख- चिल्ला कर तो किसी आंसू बहाकर। चक दे इंडिया।
शइम खान ने टीम इंडिया पर पूरी कविता ही लिख डाली।
एक लड़की थी दीवानी सी
सचिन पर वो मरती थी
चोरी-चोरी, चुपके-चुपके
हरभजन को चि_ियां लिखा करती थी...
नजरे झुका के शरमा के
गंभीर से बातें करती थी
कभी-कभी जुल्फें बिखरा के
सहवाग की गलियों से गुजरा करती थी..
कुछ कहना था शायद उसको रैना से
पर धौनी से वह डरती थी...
जब भी मिलती थी युवराज से
बस यही पूछा करती थी
वल्र्ड कप कब जिताओगे...