अपनी तकदीर हम खुद ही संवार लेंगे, तेरे सहारे का एक इशारा ही काफी है। प्राकृतिक छटाओं व धरोहरों से परिपूर्ण शहर में वह सबकुछ है, जो किसी की आंखों को सुकून दे सकता है। आंखों को अगर चुभता है, तो गांवों की गरीबी, उनकी लाचारी, जो सबकुछ होते हुए भी उन्हें दूर करता है अपने गांव से। अपने शहर से। रोजगार की तलाश में अन्य प्रदेशों में चक्कर काटते हैं। बहु-बेटियां इस उम्मीद के साथ कि बेहतर रोजी-रोटी का जरिया मिलेगा, दलालों के चंगुल में फंस बेच दी जाती है। ऐसे में अपने पुराने पेशे खेतीबाड़ी व जंगल की सुरक्षा को अपनाते हुए आय का जरिया मिल जाए तो उनके भविष्य को संवरने से भला कौन रोक सकता है। एक रिपोर्ट रिपोर्ट।
रांची से 16 किलोमीटर द र तुपुदाना-नामकुम मार्ग पर घने जंगल के बीच बन रहा है बायो-डायवर्सिटी पार्क। यहां पहुंचने के लिए शहर से पहले तुपुदाना चौक पहुंचना होगा। इस रास्ते नामकूम की ओर जानेवाली सड़क पर करीब चार किमी की दूरी के बाद आता है लाल खटंगा गांव। बाइक से जाने पर तकरीबन 20 मिनट। हालांकि, फोर लेन सड़क पूरी तरह बन जाने पर यह समय और कम हो जाएगा। लाल खटंगा पंचायत सचिवालय भवन के पास से एक छोटी कच्ची सड़क। भवन के पास खड़े एक व्यक्ति से पूछा, बायोडायर्विटी पार्क यहां से कितनी दूर पड़ेगा। सीधे चले जाएं। थोड़ी दूर पर गेट दिखाई पड़ेगा। उबड़-खाबड़ रास्ते। पार्क बनाने से पहले सड़क बनानी चाहिए थी। तभी बड़ा सुंदर सा गेट दिखाई पड़ता है। अंदर जाने का रास्ता किधर से है। पास के खेत में काम कर रहे मजदूर ने बताया, साइड से चले जाए। अंदर पहुंचे। कहां से आए हैं? दैनिक जागरण से है। अच्छा बैठिए। आपका नाम। अजय। आप यहां क्या करते हैं? देखरेख करता हूं। हमें जरा पार्क घूमना है। ठीक है देख लीजिए।
आगे बढ़ते ही खूबसूरत झरना दिखता है। कुछ मजदूर झरने के करीब पार्क के चारों ओर लोहे का जालीदार घेरा बना रहे हैं। कुछ तेज धूप के बीच सुस्ता रहे हैं।
आपका नाम? बिरसा लिंडा। कहां के रहनेवाले हैं? जी, हुडवा के। यहां कब से काम कर रहे हैं? पांच महीने हो गए। पहले क्या करते थे? कुछ भी कर लेते थे। खेतीबाड़ी करते थे। इससे कमाई कितनी होती थी? कमाई क्या होगी। खाने भर अनाज निकल जाता था। अन्य खर्च के लिए? डोरंडा व बिरसा चौक पर जाते थे। ठेकेदारी में काम मिल जाता था। यहां कितना मिलता है? प्रतिदिन 111 रुपये के हिसाब से मिलता है। यहां काम करने से कुछ फायदा है? फायदा तो है ही। पहले बाहर भटकना पड़ता था। अब यही नौकरी मिल गई है। पत्नी भी काम करती है। पांच बच्चे हैं। बड़ा लड़का है। योग्दा कॉलेज में पढ़ता है। बाकी स्कूल में पढ़ते हैं।
आपका नाम? काली कल्याण लकड़ा। पास के गांव में रहता हूं। घर में कौन-कौन है? पत्नी है। बड़ी बेटी नमिता है। उससे छोटा दो लड़का है। बेटी पढ़ती है? हां पढ़ती है। दसवीं में पढ़ रही है। कितने दिन से मजदूरी कर रहे हैं यहां? चार महीने हो गए। समय पर पैसा देता है न? हां, पैसा तो समय पर ही मिल जाता था। लेकिन, इस बार लेट हो गया है। पता नहीं कब देंगे। 111 रुपये कम नहीं है? बोले तो हैं कि 134 रुपये मिलेंगे। कब से मिलेंगे यह नही बताया। यहां काम करने से कुछ फायदा नजर आ रहा है? फायदा तो है। घर के नजदीक काम है। जरूरत पड़ता है, तो घर चले जाते हैं। एकमुश्त समय पर पैसा मिलता है।
आगे बढ़ते हैं। पार्क में लगे औषधीय पौधों की घेराबंदी करता युवक। आप यहां क्या काम करते हैं। जी, यहां घेराबंदी कर रहा हूं। क्या नाम है आपका? जी सैमुएल लिंडा। कितने बजे से यहां काम कर रहे हैं? सुबह नौ बजे से। कबतक? पांच बजे तक। इससे पहले क्या करते थे? यहां ठेकेदार के अंदर में मजदूरी का काम कर लेते थे। खेतीबाड़ी के समय में खेत में काम करते थे। दूसरे राज्य में भी गए है काम करने कभी? खेतीबाड़ी के बाद तो कभी पंजाब तो कभी असम चला जाता था। एक बार तो तमिलनाडु भी गया था काम करने। यहां काम करने के बाद कभी गए है बाहर? नहीं। यहां प्रतिदिन काम मिलता है। सरकारी काम है। आगे चल कर फायदा ही होगा। बच्चे हैं? जी, चार बच्चे हैं। बड़ी बेटी है, डोरंडा कॉलेज में पढ़ती है।
आगे करीब आधा किलोमीटर की दूरी सामने बड़ा पहाड़ नजर आता है। चारों तरफ जंगलों से घिरा। इनके बीच से पथरीली सड़क। आप हाथ में लाठी क्यों लिये है? जी, मैं यहां चौकीदारी करता हूं। क्या नाम है आपका? शुक्रा मुंडा। घुमने आए हैं, जवाब के साथ सवाल भी पूछते हैं। जी, हम अखबारवाले हैं। अच्छा।
आपका घर कहां है? यहीं लाल खटंगा गांव में। सुना है आपकी जमीन भी है इस पार्क में? हां। जंगल भी है। पहले क्या करते थे? खेतीबाड़ी करते थे। यही सामने जो खेत दिख रहा है। जंगल से भी लकड़ी का काम कर लेते थे। बाहर कभी नौकरी की है? नहीं। पैसा की जरूरत पड़ी तो? बेटियों की शादी में जरूरत पड़ी थी। कई बार जमीन बेची है। अब खेतीबाड़ी करने देते हैं? हां, अभी तो करने देते हैं। जंगल से लकड़ी भी लेने देते हैं। यहां काम करने से कुछ फायदा है? नौकरी मिली हुई है। लेकिन डर लगता है। कहीं जमीन छीन तो नहीं लेंगे।
करीब आधे किलोमीटर जंगल के बीच रास्ते को पार कर अंदर पहुंचते हैं। बड़े-बड़े पेड़। तभी साइकिल पर सवार एक युवक सामने आता दिखता है। सर पर टोपी, हाथ में पतली सी लकड़ी। इशारा करते ही साइकिल रोक खड़ा हो जाता है। हाथ में क्या है? यह गुगुल है। क्या होता है इससे? स्थानीय भाषा में बताते हैं, नजर नहीं लगती। भूत-प्रेत आसपास नहीं फटकते। मन से डर निकल जाता है। हमें भी देंगे क्या? लीजिए। क्या नाम है आपका? लच्छू मुंडा। यहां क्या करते हैं? मिस्त्री का काम करता हूं। कितना मिलता है? दो सौ रुपये। कहां के रहनेवाले हैं? डुंगरी के। और कितने लोग आते हैं? वहां से सिर्फ मैं ही हूं।
चलते-चलते पार्क के दायरे से कब बाहर आ गए पता ही नहीं चला। सामने बड़ा सा आम का पेड़। करीब दस बच्चे नीचे खेलते हुए। गाड़ी की आवाज सुन एक बच्चा पास आता है। मुस्कुराते हुए कहता है, आगे रास्ता नहीं है। यह कौन सी जगह है? जरा टोली, बच्चा बोला। पार्क कहां तक है? वो देखिए जो लोग काम कर रहे हैं न, वही तक। रास्ते में एक बुजुर्ग मिलता है। हाथ में मोटी सी लाठी लिये हुए। आप यहां क्या कर रहे हैं? बैल घुस गया है, उसी को ढूंढऩे जा रहे हैं। तभी पास खड़े एक युवक ने कहा, यहां अक्सर पशु घुस जाते हैं। अभी घेराबंदी नहीं हुई है न इसलिए। घेराबंदी कब तक हो जाएगी? कुछ कहा नहीं जा सकता। अपना नाम बताएंगे? हुल्ला मुंडा। आपका घर कहां है? घरखटंगा। पार्क बनने से आपलोगों को बहुत फायदा होगा? अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। रोजगार तो मिला है न? हां। हमारे गांव में 95 से भी अधिक घर हैं। करीब 75 लोग यहां काम करते हैं।
पीछे की तरफ लौटते है। पार्क के दूसरे रास्ते से आगे बढ़ते हैं। खाली पड़ी जमीन पर कुछ बच्चे कुदाल से खुदाई कर रहे हैं। आवाज देने पर एक बच्चा पास आता है। क्या नाम है? अनिल तोपनो। कितना उम्र है? 15 साल। पढ़ाई नहीं करते। नहीं। कब से काम कर रहे हो। अभी पांच दिन हुए हैं।
प्रकृति पर टिकी पार्क की पूरी संरचना
बता दें कि लालखटंगा और घरखटंगा के बीच बन रहे इस जैव-विविधता पार्क की संरचना प्रकृति पर ही टिकी है। यहां 105 से अधिक देशज प्रजातियां हैं। इसके अलावा कई दुर्लभ पौधे भी हैं, जो बाहर से लगाए गए हैं। कई छोटे-छोटे पार्क हैं, जहां औषधीय पौधे लगाए जा रहे हैं। इन सबके बीच तकरीबन दो सौ से भी अधिक मजदूर यहां काम कर रहे हैं। लाल खटंगा व घर खटंगा से करीब 90 फीसदी घरों के युवक यहां काम कर रहे हैं। निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे अजय बताते हैं, इन दो गांवों के अलावा बहुपीढी, भुसूर, जराटोली, हुडवा, रायटोली, बेड़टोली, कोचगम आदि गांवों से भी लोग यहां काम कर रहे हैं।
Sunday, June 12, 2011
Sunday, April 3, 2011
कहीं ईद तो कहीं दीवाली
संजय कुमार, रांची
जश्न। जश्न। जश्न। हर तरफ जश्न। सड़कों पर ऐसा रेला। मानो मेला। आसमान में आतिशबाजी जैसे वर्षों बाद आई दीवाली। एक-दूसरे को बधाई देते ऐसे चिपटे, जैसे आज ही ईद हो। शायद क्रिकेट ही ऐसा खेल है, जिसका पल-पल रग-रग में देशभक्ति का जुनून पैदा करता है। 26 जनवरी या 15 अगस्त दो ऐसे मौके होते हैं, जब पूरा देश एक साथ जश्न मनाता है। लेकिन, इतिहास में दो बार एक 1983 में दूसरा 2011 में ऐसे मौके आए, जब पूरा देश जश्न मना रहा था। जश्न के अपने-अपने तरीके थे। कोई खुशी से आंसू बहा रहा था। तो कोई सड़क पर दौड़ लगा रहा था। सभी को पता था कि टीम इंडिया जीत गई। पर एक-दूसरे को यूं बता रहे थे जैसे उन्हें पता नहीं, केवल वही इसके चश्मदीद गवाह हो। तरह-तरह के दावे। मैं कह रहा था ना, इंडिया जीतेगा। कोई चीख रहा था- इंडिया आई लव यू। धौनी तेरा जवाब नहीं। गंभीर ने भी क्या खूब दिखाया। सचिन का सपना हुआ पूरा। इसे कहते हैं युवराज। कोहली को भी मत भूलो। कुछ ने तो पहले से ही तैयारी कर ली थी। हजारों रुपये खर्च कर जमकर आतिशबाजी की।
सचमुच मैच का रोमांच ऐसा था कि सबकी सांसे पल-पल के बदलाव पर अटकी थी। मैच के दौरान मनोभाव व दिल की बातों को फेसबुक जैसे नेटवर्किंग साइट्स पर रखनेवालों की भी कमी नहीं थी। एक तरफ टीवी पर बदलते हालात का जायजा, दूसरी तरफ फेसबुक पर अपना कमेंट। लंदन के बर्मिघम से आशा किरण सहवाग व सचिन के जाने के बाद अफसोस जताती है, तो रांची में उसका भाई आनंद लिखता है, अभी इंतजार बाकी है। जीत के बाद आशा लिखती है-आखिर हमने दिखा ही दिया। टीम इंडिया के साथ सभी देशवासियों को मेरी ओर से बधाई। वहीं न्यूयार्क से मुस्कान लिखती है-अभी अपने देश में रहती, तो दोस्तों के साथ मौज मनाती । पूनम लिखती है- चक दिया इंडिया नी। सौरव लिखते हैं-धौनी आज अमर हो गया। धौनी के परफॉर्मेंस पर राहुल लिखते हैं-रांची के छोरा कमाल कर देलस हो। विदिशा थापा लिखती है- पागलपंथी इसी को कहते हैं। आरती लिखती है- जियो खिलाड़ी वाहे वाहे। यह विश्वकप सचिन के लिए। आज धौनी ने कप्तानी पारी खेली। संदीप लिखते हैं- सोचो इतने जंगी तैयारी के बाद भारत हार जाता तो क्या होता। टीम इंडिया की तस्वीर के साथ राजेश लिखते हैं- हमलोग वल्र्ड चैंपियन बन गए हैं। अपने भारतीय होने पर गर्व करें। संदीप झा लिखते हैं-आज हम भी उन लोगों में शामिल हो गए, जिन्होंने अपनी टीम को वल्र्ड कप जीतते देखा है। थैंक्स धौनी। आलोक की टिप्पणी है-मेरा भी यही हाल है। 83 याद नहीं, 87 में उतना लगन नहीं था, 92 से शुरू हुआ सफर लगा कल पूरा हो गया। जाहिद अब्बास लिखते हैं- बड़ी मुद्दत के बाद और काफी शिद्दत के बाद यह मौका हाथ लगा है। इस जश्न में सबने ली डुबकी, किसी ने मुस्कुराकर, किसी ने ताली बजा कर, किसी ने चीख- चिल्ला कर तो किसी आंसू बहाकर। चक दे इंडिया।
शइम खान ने टीम इंडिया पर पूरी कविता ही लिख डाली।
एक लड़की थी दीवानी सी
सचिन पर वो मरती थी
चोरी-चोरी, चुपके-चुपके
हरभजन को चि_ियां लिखा करती थी...
नजरे झुका के शरमा के
गंभीर से बातें करती थी
कभी-कभी जुल्फें बिखरा के
सहवाग की गलियों से गुजरा करती थी..
कुछ कहना था शायद उसको रैना से
पर धौनी से वह डरती थी...
जब भी मिलती थी युवराज से
बस यही पूछा करती थी
वल्र्ड कप कब जिताओगे...
जश्न। जश्न। जश्न। हर तरफ जश्न। सड़कों पर ऐसा रेला। मानो मेला। आसमान में आतिशबाजी जैसे वर्षों बाद आई दीवाली। एक-दूसरे को बधाई देते ऐसे चिपटे, जैसे आज ही ईद हो। शायद क्रिकेट ही ऐसा खेल है, जिसका पल-पल रग-रग में देशभक्ति का जुनून पैदा करता है। 26 जनवरी या 15 अगस्त दो ऐसे मौके होते हैं, जब पूरा देश एक साथ जश्न मनाता है। लेकिन, इतिहास में दो बार एक 1983 में दूसरा 2011 में ऐसे मौके आए, जब पूरा देश जश्न मना रहा था। जश्न के अपने-अपने तरीके थे। कोई खुशी से आंसू बहा रहा था। तो कोई सड़क पर दौड़ लगा रहा था। सभी को पता था कि टीम इंडिया जीत गई। पर एक-दूसरे को यूं बता रहे थे जैसे उन्हें पता नहीं, केवल वही इसके चश्मदीद गवाह हो। तरह-तरह के दावे। मैं कह रहा था ना, इंडिया जीतेगा। कोई चीख रहा था- इंडिया आई लव यू। धौनी तेरा जवाब नहीं। गंभीर ने भी क्या खूब दिखाया। सचिन का सपना हुआ पूरा। इसे कहते हैं युवराज। कोहली को भी मत भूलो। कुछ ने तो पहले से ही तैयारी कर ली थी। हजारों रुपये खर्च कर जमकर आतिशबाजी की।
सचमुच मैच का रोमांच ऐसा था कि सबकी सांसे पल-पल के बदलाव पर अटकी थी। मैच के दौरान मनोभाव व दिल की बातों को फेसबुक जैसे नेटवर्किंग साइट्स पर रखनेवालों की भी कमी नहीं थी। एक तरफ टीवी पर बदलते हालात का जायजा, दूसरी तरफ फेसबुक पर अपना कमेंट। लंदन के बर्मिघम से आशा किरण सहवाग व सचिन के जाने के बाद अफसोस जताती है, तो रांची में उसका भाई आनंद लिखता है, अभी इंतजार बाकी है। जीत के बाद आशा लिखती है-आखिर हमने दिखा ही दिया। टीम इंडिया के साथ सभी देशवासियों को मेरी ओर से बधाई। वहीं न्यूयार्क से मुस्कान लिखती है-अभी अपने देश में रहती, तो दोस्तों के साथ मौज मनाती । पूनम लिखती है- चक दिया इंडिया नी। सौरव लिखते हैं-धौनी आज अमर हो गया। धौनी के परफॉर्मेंस पर राहुल लिखते हैं-रांची के छोरा कमाल कर देलस हो। विदिशा थापा लिखती है- पागलपंथी इसी को कहते हैं। आरती लिखती है- जियो खिलाड़ी वाहे वाहे। यह विश्वकप सचिन के लिए। आज धौनी ने कप्तानी पारी खेली। संदीप लिखते हैं- सोचो इतने जंगी तैयारी के बाद भारत हार जाता तो क्या होता। टीम इंडिया की तस्वीर के साथ राजेश लिखते हैं- हमलोग वल्र्ड चैंपियन बन गए हैं। अपने भारतीय होने पर गर्व करें। संदीप झा लिखते हैं-आज हम भी उन लोगों में शामिल हो गए, जिन्होंने अपनी टीम को वल्र्ड कप जीतते देखा है। थैंक्स धौनी। आलोक की टिप्पणी है-मेरा भी यही हाल है। 83 याद नहीं, 87 में उतना लगन नहीं था, 92 से शुरू हुआ सफर लगा कल पूरा हो गया। जाहिद अब्बास लिखते हैं- बड़ी मुद्दत के बाद और काफी शिद्दत के बाद यह मौका हाथ लगा है। इस जश्न में सबने ली डुबकी, किसी ने मुस्कुराकर, किसी ने ताली बजा कर, किसी ने चीख- चिल्ला कर तो किसी आंसू बहाकर। चक दे इंडिया।
शइम खान ने टीम इंडिया पर पूरी कविता ही लिख डाली।
एक लड़की थी दीवानी सी
सचिन पर वो मरती थी
चोरी-चोरी, चुपके-चुपके
हरभजन को चि_ियां लिखा करती थी...
नजरे झुका के शरमा के
गंभीर से बातें करती थी
कभी-कभी जुल्फें बिखरा के
सहवाग की गलियों से गुजरा करती थी..
कुछ कहना था शायद उसको रैना से
पर धौनी से वह डरती थी...
जब भी मिलती थी युवराज से
बस यही पूछा करती थी
वल्र्ड कप कब जिताओगे...
Saturday, March 26, 2011
बदल रहा बिहार
बिहार व बिहारी की अवधारणा व सोच के मायने वे लोग अधिक जानते होंगे, जो अपने प्रदेश को छोड़ अन्य प्रदेशों में जा बसे हैं। लंबे समय तक अपने प्रदेश को छोड़ बाहर रहते हुए हम आपस में चर्चा करते हैं, कब बिहार व बिहारी अवधारणा में बदलाव आयेगा। कब हम व्यावहारिक सोच के साथ अपने गांव लौटने की इच्छा रखेंगे। ऐसी चर्चाएं पहले भी करते थे, पर एक निराशा के साथ। लेकिन, आज जब हम चर्चा करते हैं, तो लगता है वह दिन अब वास्तव में करीब है।
इसे रोकना होगा
कुछ दिनों पहले लातेहार के चंदवा में बाल विवाह का मामला सामने आया। कितने दुख की बात है अब भी झारखंड अपने सामाजिक पिछड़ेपन के त्रास से निकल पाने में अक्षम है। यह भी सुनने में आया है कि नक्सली खौफ के कारण लोग बाल विवाह को प्रेरित होते हैं। बाल मन में जब ऊंचाई छूने, कुछ दिखाने का जज्बा होता है, वहां गृहस्थी की सोच जबरन लादना अच्छी बात नहीं। इस लकीर को हटाना होगा, अन्यथा गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
बदल रहा बिहार
बिहार व बिहारी की अवधारणा व सोच के मायने वे लोग अधिक जानते होंगे, जो अपने प्रदेश को छोड़ अन्य प्रदेशों में जा बसे हैं। लंबे समय तक अपने प्रदेश को छोड़ बाहर रहते हुए हम आपस में चर्चा करते हैं, कब बिहार व बिहारी अवधारणा में बदलाव आयेगा। कब हम व्यावहारिक सोच के साथ अपने गांव लौटने की इच्छा रखेंगे। ऐसी चर्चाएं पहले भी करते थे, पर एक निराशा के साथ। लेकिन, आज जब हम चर्चा करते हैं, तो लगता है वह दिन अब वास्तव में करीब है।
Wednesday, March 16, 2011
खौफ के कारण नहीं बज रही शहनाई
नक्सली आतंक
-वधू पक्ष शादी से पहले रखने लगे हैं शर्त
-शादी के बाद वधू के साथ रहे जिला से बाहर
संजय कुमार, रांची
इन दिनों लातेहार जिले में प्रतिबंधित नक्सली संगठनों का खौफ सिर चढ़कर बोल रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि क्षेत्र में बढ़े नक्सलियों के प्रभाव के कारण क्षेत्र में युवाओं के अभिवावकों को शादी-विवाह में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। भले ही लड़का किसी अच्छे पद पर क्यों न कार्यरत हो, अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र होने कारण कोई अपनी बेटी की सगाई इस क्षेत्र में नहीं करना चाहता। लड़के वालों (वरपक्ष) के विपरीत अब यहां (वधू पक्ष) लड़की वाले ही शादी से पहले शर्त रखने लगे हैं। शर्त यह है कि शादी के बाद बेटी-दामाद को दूसरे जिले या प्रदेशों में रखेंगे, तब ही सहमति बन सकती है। कई रिश्ते वर पक्ष के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में रहने या फिर नौकरी करने के कारण टूट चुकी है। कुछ लोगों ने रांची में लाखों रुपये के फ्लैट तक खरीद चुके हैं। मगर इस मामले सबसे खास बात यह है कि इस सबंध में लड़की वालों (वधू पक्ष) को अब तक कोई परेशानी नहीं हुई हैं, क्योंकि वर पक्ष के लोग लड़की (वधू) ले जाने में संकोच नहीं करते हैं। इस वर्ष जिले में जितनी शादियां हुई हैं, उसमें 70 प्रतिशत सिर्फ लड़कियों की ही शादी हुई है, क्योंकि उग्रवाद प्रभावित जिले से लड़की को दुल्हन के रूप में स्वीकारने में परहेज नहीं होता। जिले के नक्सलियों की सबसे सुरक्षित शरणस्थली बालूमाथ प्रखंड को आज के दौर में नक्सलियों की राजधानी की संज्ञा देना गलत नहीं होगा, क्योंकि यहां गांवा, देहातो से लेकर प्रखंड मुख्यालय में भी नक्सलियों का खौफ आम जनता के सिर चढ़ कर बोल रहा है। कमोवेश यही स्थिति पूरे जिले की है। आलम यह है कि दूसरे जिले व प्रदेशों के लोग यहां के युवकों से अपनी पूत्री का विवाह नहीं करना चाहते।
-वधू पक्ष शादी से पहले रखने लगे हैं शर्त
-शादी के बाद वधू के साथ रहे जिला से बाहर
संजय कुमार, रांची
इन दिनों लातेहार जिले में प्रतिबंधित नक्सली संगठनों का खौफ सिर चढ़कर बोल रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि क्षेत्र में बढ़े नक्सलियों के प्रभाव के कारण क्षेत्र में युवाओं के अभिवावकों को शादी-विवाह में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। भले ही लड़का किसी अच्छे पद पर क्यों न कार्यरत हो, अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र होने कारण कोई अपनी बेटी की सगाई इस क्षेत्र में नहीं करना चाहता। लड़के वालों (वरपक्ष) के विपरीत अब यहां (वधू पक्ष) लड़की वाले ही शादी से पहले शर्त रखने लगे हैं। शर्त यह है कि शादी के बाद बेटी-दामाद को दूसरे जिले या प्रदेशों में रखेंगे, तब ही सहमति बन सकती है। कई रिश्ते वर पक्ष के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में रहने या फिर नौकरी करने के कारण टूट चुकी है। कुछ लोगों ने रांची में लाखों रुपये के फ्लैट तक खरीद चुके हैं। मगर इस मामले सबसे खास बात यह है कि इस सबंध में लड़की वालों (वधू पक्ष) को अब तक कोई परेशानी नहीं हुई हैं, क्योंकि वर पक्ष के लोग लड़की (वधू) ले जाने में संकोच नहीं करते हैं। इस वर्ष जिले में जितनी शादियां हुई हैं, उसमें 70 प्रतिशत सिर्फ लड़कियों की ही शादी हुई है, क्योंकि उग्रवाद प्रभावित जिले से लड़की को दुल्हन के रूप में स्वीकारने में परहेज नहीं होता। जिले के नक्सलियों की सबसे सुरक्षित शरणस्थली बालूमाथ प्रखंड को आज के दौर में नक्सलियों की राजधानी की संज्ञा देना गलत नहीं होगा, क्योंकि यहां गांवा, देहातो से लेकर प्रखंड मुख्यालय में भी नक्सलियों का खौफ आम जनता के सिर चढ़ कर बोल रहा है। कमोवेश यही स्थिति पूरे जिले की है। आलम यह है कि दूसरे जिले व प्रदेशों के लोग यहां के युवकों से अपनी पूत्री का विवाह नहीं करना चाहते।
Sunday, February 6, 2011
कैसे हुई वॉलीबॉल खेल की शुरुआत
वॉलीबॉल की शुरुआत 1885 में विलियम जी मॉर्गन द्वारा बॉस्केबॉल के प्रारंभ के चार साल बाद की गई। तब इसे मिंटोनेट्टे के नाम से जाना जाता था। मॉर्गन वाइएमसीए के स्प्रिंगफील्ड कॉलेज के स्नातक थे। उन्होंने बॉस्केटबॉल, बेस बॉल, टेनिस व हैंड बॉल को एक साथ मिलाकर इस खेल के प्रारूप को तैयार किया। वॉलीबॉल का नेट टेनिस से लिया गया। इसकी ऊंचाई छह फुट छह इंच थी। दरअसल, उस समय अमेरिकियों की औसत लंबाई कम थी। 1916 में फिलिपिंस को इस खेल को थोड़ा और विस्तार दिया गया। उस दौरान खेल के लिए एक स्पष्ट नियम की जरूरत महसूस हुई। इसको लेकर वर्ष 1928 में यूनाईटेड स्टेट्स वॉलीबॉल एसोसिएशन का गठन किया गया। इसके दो साल बाद दो-मैन बीच वॉलीबॉल खेल खेला गया। 1983 में पेशेवर खिलाडिय़ों ने इसे अपनाया। 1984 में लॉस एंजिल्स ओलंपिक के इनडोर वॉलीबॉल प्रतिस्पद्र्धा में अमेरिकी महिला व पुरुष ने सिल्वर व गोल्ड जीता। बाद के दिनों में इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। फिलवक्त पूरे विश्व में 800 मिलियन वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं। टाइमलाइन1900 : खेल के लिए विशेष बॉल का डिजाइन किया गया।1916 : फिलिपिंस में खेल के कई नियम जुड़े।1917 : 21 से 15 प्वाइंट पर खेल में बदलाव किया गया।1922: न्यूयॉर्क के ब्रूकलीन में पहला वाइएमसीए नेशनल चैंपियनशिप का आयोजन हुआ। इसमें 11 स्टेट्स की 27 टीमों ने भाग लिया।1928 : टूर्नामेंट व नियमों की आवश्यकता को देखते हुए यूनाइटेड स्टेट्स वॉलीबॉल एसोसिएशन का गठन किया गया। इसी समय पहले यूएस ओपेन का खाका तैयार किया गया।1923 : पहले दो-मैन बीच गेम की शुरुआत हुई।1964 : टोकियो में आयोजित ओलंपिक गेम्स में वॉलीबॉल को शामिल किया गया। 1974: मेक्सिको मे वल्र्ड चैंपियनशिप का जापान में प्रसारण किया गया।1983: एसोसिएशन ऑफ वॉलीबॉल प्रोफेशनल्स का गठन किया गया।1984 : लॉस एंजिल्स में आयोजित ओलंपिक में अमेरिका ने पहला मेडल जीता।1988 : कोरिया में आयोजित ओलंपिक में महिला वर्ग में अमेरिका ने फिर मेडल पर कब्जा जमाया।1990 : वल्र्ड लीग का गठन किया गया।
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