अलग-अलग स्तरों पर चीजों के दाम अलग-अलग होते हैं। सब्जियों के दाम होलसेलर के लिए अलग होते हैं। होलसेलर से खरीदने वाले रिटेलर के लिए दाम अलग होते हैं और रिटेलर से आप जिस कीमत पर सब्जी खरीदते हैं उसमें रिटेलर का मुनाफा भी जुड़ा रहता है। चढ़ती-उतरती कीमतों को नापने के लिए एक निश्चित इंडेक्स की जरूरत होती है। भारत में महंगाई को मापने के लिए वैसे तो कई इंडेक्स हैं मगर सरकारी तौर पर इसका आकलन थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआई) से किया जाता है। यानी जिस दाम पर चीजें थोक में बिकती हैं, उसके आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है।
महंगाई दर हर हफ्ते नापी जाती है। डब्लूपीआई, कमोडिटी इंडेक्स है जिसमें 5 बड़े ग्रुप होते हैं- प्राइमरी आर्टिकल, फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स और मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट। इन्हें फिर छोटे सब-ग्रुप में बांटा जाता है। मसलन, प्राइमरी आर्टिकल ग्रुप में फूड आर्टिकल, नॉन फूड आर्टिकल और मिनरल्स शामिल हैं। सभी सब-ग्रुप में कई कमोडिटी होती हैं।
अभी डब्लूपीआई में 435 कमोडिटी हैं जिनके थोक मूल्यों के आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है। इनमें 98 प्राइमरी आर्टिकल हैं, 19 फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स ग्रुप में आते हैं जबकि 318 मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट्स ग्रुप के अंतर्गत हैं।
डब्लूपीआई मुख्य शहरों और राज्यों की राजधानियों से जमा किए डेटा के आधार पर केलकुलेट करते हैं। रिस्पॉन्डेंट का इंटरव्यू लेकर सीधे डेटा लिया जाता है। ये रिस्पॉन्डेंट ऐसी कंपनियों के होते हैं जो कमर्शल कमोडिटी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी तरह सभी कमोडिटी का प्राइस लिया जाता है।
अगर हम कहें कि 22 मार्च को खत्म हुए हफ्ते में महंगाई दर 7 फीसदी रही तो इसका मतलब हुआ कि उससे पिछले साल इसी हफ्ते की तुलना में इस अवधि में चीजें इतनी महंगी हुईं।
डब्ल्यूपीआई के आधार पर महंगाई नापने की कोशिश की आलोचना होती रही है। वजह यह है कि आम कंस्यूमर को जिस महंगाई का सामना करना पड़ता है, वह थोक नहीं, रिटेल मूल्यों की है। इसी लिए कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स ज्यादा सटीक माना जाता है, जो आम तौर पर थोक मूल्य सूचकांक से कई फीसदी ज्यादा रहता है। भारत में सीपीआई है, लेकिन वह सही तरीके से विकसित नहीं हो सका है।
महंगाई को डिमांड और सप्लाई में गड़बड़ी के तौर पर देखा जाता है और इसकी कई वजहें हो सकती हैं। सरकार इसके खिलाफ वित्तीय और प्रशासकीय कदम उठाती है। लेकिन इसे देखने का एक नजरिया मौद्रिक भी है। इसके तहत महंगाई को इनफ्लेशन यानी पैसे का फैलाव कहा जाता है। यानी जब लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आता है, तो डिमांड बढ़ती है और इससे चीजें महंगी होने लगती हैं। रिजर्व बैंक यही नजरिया अपनाता है और इसलिए पैसे का फैलाव रोकने के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ा देता है। इस कदम का नुकसान यह है कि पैसा महंगा हो जाता है, जिसका असर इकनॉमिक ग्रोथ पर पड़ता है। यानी महंगाई पर काबू पाने की कोशिश में सरकार को यह भी देखना होता है कि वह ग्रोथ से कितनी छेड़छाड़ करे। जाहिर है, यह एक मुश्किल चुनाव है, इसलिए ज्यादातर लोग चाहते हैं कि वित्तीय और प्रशासकीय कदमों से ही महंगाई पर काबू पाया जाए।
Saturday, May 31, 2008
महंगाई
धर्मकीर्ति जोशी
प्रिसिंपल इकनॉमिस्ट क्रिसिल
22 मार्च का सप्ताह बीतते-बीतते महंगाई के स्तर में आए 7 फीसदी के तेज उछाल ने सबको चौंका दिया है। भारत और विश्व में तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर महंगाई में बढ़ोतरी तो संभावित थी लेकिन 3 ही हफ्तों में यह 5 से बढ़कर 7 फीसदी तक आ जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। सूरजमुखी और सरसों के तेल जैसी बेसिक जरूरत की चीजों में 21 से 33 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। इंपोर्टेड ऑयल की महंगाई तो 47 फीसदी के आंकड़े को छू रही है। ज्यादा महंगाई का मतलब यह है कि रिजर्व बैंक फिलहाल तो इंटरेस्ट रेट घटाने से रहा।
महंगाई इस समय एक ग्लोबल समस्या है। चीन में महंगाई दर अपने ग्यारह सालों के उच्चतम स्तर 8.7 फीसदी पर है। वियतनाम में यह आंकड़ा 16 फीसदी है। एशिया के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अनाज की कीमतों में आई तेजी से निपटना ही फिलहाल एशियाई देशों के लिए बड़ी चुनौती है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी एशिया की सरकारों के लिए खाद्यान्न और ईधन की कीमतों का सामना करना अमेरिका की आर्थिक तंगी और ग्लोबल मंदी जैसी चुनौतियों से कहीं अधिक भारी पड़ रहा है।
भारत अब तक खुद को ग्लोबल महंगाई के असर से अलग रखने में लगभग कामयाब रहा है। तेल की कीमतों में हुई ग्लोबल बढ़त का असर यहां कंस्यूमर तक नहीं पहुंचने दिया गया। अनाज की कीमतों में भी यहां दुनिया की औसत दर के मुकाबले कहीं कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। रुपये के मूल्य में सुधार ने भी हमें वैश्विक मुद्रास्फीति से बचाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन अब यहां भी हालात चिंताजनक हो गए हैं। इस तरह की अचानक बढ़ी महंगाई का सबब क्या है और आगे हालात का रुख क्या होगा, किसी को नहीं मालूम।
महंगाई के मौजूदा दौर के लिए 3 चीजें सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, पहला तेल (पेट्रोलियम) की कीमतों में उछाल, दूसरा स्टील और अन्य मेटल के मूल्यों में तेजी और तीसरा कृषि क्षेत्र में उत्पादन और कीमतों के बदतर हालात। दुनिया के स्तर पर तेल की कीमत पिछले कुछ महीनों में बहुत बढ़ी हैं। दूसरी ओर बढ़ती मांग के दबाव में कोयले और आयरन ओर की कीमत में इजाफे के कारण मेटल और खास तौर से स्टील का मूल्य भी चढ़ता रहा। वर्तमान में मुद्रास्फीति की भागती रफ्तार में सबसे अहम भूमिका भारत और विश्व की खस्ताहाल कृषि के कारण अनाज की कीमतों पर लगातार बढ़ते दबाव की है। यह खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया, चीन और यूरोप के देशों में अनाज से बायो फ्यूल बनाने और खराब मौसम की वजह से हो रहा है। नतीजतन दुनिया का फूड स्टॉक आज 2 दशकों के न्यूनतम स्तर पर है, जिसके कारण दूसरे कृषि उत्पादों के मूल्य भी आसमान छूने लगे हैं। हमारी घरेलू खेती भी इस लिहाज से कुछ अच्छा नहीं कर सकी है। जिसकी वजह से इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ गई है।
खाने की चीजों में आई तेजी की वजह से अनेक देशों के अलग-अलग वर्गों के लोग विभिन्न तरीकों से आहत हुए हैं। अमेरिका जैसे आधुनिक अर्थतंत्र में कुल व्यय का 10 फीसदी हिस्सा खाने की चीजों पर जाता है। जैसे-जैसे हम आर्थिक रूप से कमजोर देशों की ओर जाएंगे, यह बढ़ता जाएगा। चीनी व्यक्ति की कुल आय का 30 फीसदी और भारतीय का 40 फीसदी खाने की चीजों में जाता है। अगर खाद्यान्न के मूल्यों में इजाफे का सिलसिला रोका न गया तो गरीब देशों के हालात क्या होंगे, सोचा जा सकता है। यदि किसी देश में अनाज के लिए मारामारी और हिंसा की खबरें आने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
दूसरी सरकारों की ही तरह भारत ने भी मुद्रास्फीति कम करने के लिए कई नीतियां घोषित की हैं। इसमें खाद्य तेलों पर शुल्क में कटौती और निर्यात पर लगाम लगाना अहम बातें हैं। सरकार सीमेंट और स्टील कंपनियों से भी कीमत घटाने को कह चुकी है। लेकिन महंगाई पर लगाम कसने के लिए इतना ही काफी नहीं है। कंपनियों पर कीमत घटाने का दबाव भविष्य में मूल्य नियंत्रण के लिहाज से बुरा ही साबित होगा क्योंकि यह आर्थिक विकास के अहम जरिए को हतोत्साहित करने जैसा है। खाद्यान्न मूल्यों में तेजी की स्थिति आगे भी बनी रहने वाली है, इसलिए सिर्फ इंपोर्ट पर निर्भरता अच्छी नहीं है। इस समस्या से निजात का स्थाई तरीका यही हो सकता है कि घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके इस लिहाज से आत्मनिर्भरता पाई जाए। खेती में उत्पादकता बढ़ाने की नीतियां लागू की जानी चाहिए। जब तक आत्म निर्भरता हासिल नहीं होती, हमें खाद्यान्न के लोकल और ग्लोबल सिनेरियो पर करीबी निगाह रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर संकट से काफी पहले आयात कर लेना होगा।
प्रिसिंपल इकनॉमिस्ट क्रिसिल
22 मार्च का सप्ताह बीतते-बीतते महंगाई के स्तर में आए 7 फीसदी के तेज उछाल ने सबको चौंका दिया है। भारत और विश्व में तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर महंगाई में बढ़ोतरी तो संभावित थी लेकिन 3 ही हफ्तों में यह 5 से बढ़कर 7 फीसदी तक आ जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। सूरजमुखी और सरसों के तेल जैसी बेसिक जरूरत की चीजों में 21 से 33 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। इंपोर्टेड ऑयल की महंगाई तो 47 फीसदी के आंकड़े को छू रही है। ज्यादा महंगाई का मतलब यह है कि रिजर्व बैंक फिलहाल तो इंटरेस्ट रेट घटाने से रहा।
महंगाई इस समय एक ग्लोबल समस्या है। चीन में महंगाई दर अपने ग्यारह सालों के उच्चतम स्तर 8.7 फीसदी पर है। वियतनाम में यह आंकड़ा 16 फीसदी है। एशिया के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अनाज की कीमतों में आई तेजी से निपटना ही फिलहाल एशियाई देशों के लिए बड़ी चुनौती है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी एशिया की सरकारों के लिए खाद्यान्न और ईधन की कीमतों का सामना करना अमेरिका की आर्थिक तंगी और ग्लोबल मंदी जैसी चुनौतियों से कहीं अधिक भारी पड़ रहा है।
भारत अब तक खुद को ग्लोबल महंगाई के असर से अलग रखने में लगभग कामयाब रहा है। तेल की कीमतों में हुई ग्लोबल बढ़त का असर यहां कंस्यूमर तक नहीं पहुंचने दिया गया। अनाज की कीमतों में भी यहां दुनिया की औसत दर के मुकाबले कहीं कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। रुपये के मूल्य में सुधार ने भी हमें वैश्विक मुद्रास्फीति से बचाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन अब यहां भी हालात चिंताजनक हो गए हैं। इस तरह की अचानक बढ़ी महंगाई का सबब क्या है और आगे हालात का रुख क्या होगा, किसी को नहीं मालूम।
महंगाई के मौजूदा दौर के लिए 3 चीजें सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, पहला तेल (पेट्रोलियम) की कीमतों में उछाल, दूसरा स्टील और अन्य मेटल के मूल्यों में तेजी और तीसरा कृषि क्षेत्र में उत्पादन और कीमतों के बदतर हालात। दुनिया के स्तर पर तेल की कीमत पिछले कुछ महीनों में बहुत बढ़ी हैं। दूसरी ओर बढ़ती मांग के दबाव में कोयले और आयरन ओर की कीमत में इजाफे के कारण मेटल और खास तौर से स्टील का मूल्य भी चढ़ता रहा। वर्तमान में मुद्रास्फीति की भागती रफ्तार में सबसे अहम भूमिका भारत और विश्व की खस्ताहाल कृषि के कारण अनाज की कीमतों पर लगातार बढ़ते दबाव की है। यह खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया, चीन और यूरोप के देशों में अनाज से बायो फ्यूल बनाने और खराब मौसम की वजह से हो रहा है। नतीजतन दुनिया का फूड स्टॉक आज 2 दशकों के न्यूनतम स्तर पर है, जिसके कारण दूसरे कृषि उत्पादों के मूल्य भी आसमान छूने लगे हैं। हमारी घरेलू खेती भी इस लिहाज से कुछ अच्छा नहीं कर सकी है। जिसकी वजह से इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ गई है।
खाने की चीजों में आई तेजी की वजह से अनेक देशों के अलग-अलग वर्गों के लोग विभिन्न तरीकों से आहत हुए हैं। अमेरिका जैसे आधुनिक अर्थतंत्र में कुल व्यय का 10 फीसदी हिस्सा खाने की चीजों पर जाता है। जैसे-जैसे हम आर्थिक रूप से कमजोर देशों की ओर जाएंगे, यह बढ़ता जाएगा। चीनी व्यक्ति की कुल आय का 30 फीसदी और भारतीय का 40 फीसदी खाने की चीजों में जाता है। अगर खाद्यान्न के मूल्यों में इजाफे का सिलसिला रोका न गया तो गरीब देशों के हालात क्या होंगे, सोचा जा सकता है। यदि किसी देश में अनाज के लिए मारामारी और हिंसा की खबरें आने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
दूसरी सरकारों की ही तरह भारत ने भी मुद्रास्फीति कम करने के लिए कई नीतियां घोषित की हैं। इसमें खाद्य तेलों पर शुल्क में कटौती और निर्यात पर लगाम लगाना अहम बातें हैं। सरकार सीमेंट और स्टील कंपनियों से भी कीमत घटाने को कह चुकी है। लेकिन महंगाई पर लगाम कसने के लिए इतना ही काफी नहीं है। कंपनियों पर कीमत घटाने का दबाव भविष्य में मूल्य नियंत्रण के लिहाज से बुरा ही साबित होगा क्योंकि यह आर्थिक विकास के अहम जरिए को हतोत्साहित करने जैसा है। खाद्यान्न मूल्यों में तेजी की स्थिति आगे भी बनी रहने वाली है, इसलिए सिर्फ इंपोर्ट पर निर्भरता अच्छी नहीं है। इस समस्या से निजात का स्थाई तरीका यही हो सकता है कि घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके इस लिहाज से आत्मनिर्भरता पाई जाए। खेती में उत्पादकता बढ़ाने की नीतियां लागू की जानी चाहिए। जब तक आत्म निर्भरता हासिल नहीं होती, हमें खाद्यान्न के लोकल और ग्लोबल सिनेरियो पर करीबी निगाह रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर संकट से काफी पहले आयात कर लेना होगा।
महंगाई और चुनाव-1
राजनाथ सिंह
बीजेपी, राष्ट्रीय अध्यक्ष
कांग्रेस के शासन काल में हर मोर्चे पर तबाही ही तबाही दिख रही है। मैं समझता हूं अब तक कांग्रेस का वह गरूर जरूर टूट गया होगा कि सिर्फ उसे ही शासन करना आता है। बल्कि यह साबित हो गया है कि उसे शासन करना कतई नहीं आता। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन देश को जिस मुकाम पर ले आई है, आम लोगों को यह कसक जरूर हो रही होगी कि वर्ष 2004 में उन्होंने एनडीए सरकार को हटाकर भारी भूल की। आम आदमी का नारा देकर शासन में आई यूपीए सरकार ने उसे तबाह करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जानेमाने अर्थशास्त्री हैं लेकिन आसमान छूती महंगाई के सामने उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।
अब यूपीए की सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई हक नहीं है। देश के लोग अब बीजेपी को आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। उन्हें एनडीए के शासन के उस जमाने की याद सता रही है, जब महंगाई पूरी तरह सरकार के काबू में थी। यूपीए गठबंधन कोई सरकार नहीं बल्कि आम आदमी के खिलाफ एक षडयंत्र नजर आ रहा है।
तमाम दावों के बावजूद महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है। अब जबकि महंगाई की दर 7.4 तक पहुंच गई है तो कांग्रेस को यह मान लेना चाहिए कि आम लोगों को महंगाई की मार से बचाने का माद्दा उसमें नहीं बचा। कांग्रेस जितने दिनों तक सत्ता में बनी रहेगी, देश का बेड़ा गर्क होता रहेगा। स्थिति और भी बदतर होने वाली है। कांग्रेस पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का तर्क देकर अपनी विफलता नहीं छिपा सकती है। दुनिया के किसी भी देश में महंगाई की यह स्थिति नहीं है। सच यह है कि मौजूदा महंगाई यूपीए सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का नतीजा है।
आम आदमी के साथ कांग्रेस ने छल किया है, जिसका खामियाजा उसे आगामी लोकसभा चुनाव में भुगतना ही पड़ेगा। महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस की पोल खोलने के लिए बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने कमर कस ली है। बीजेपी महंगाई को आगामी चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बनाने जा रही है। यह महंगाई कांग्रेस को आगामी चुनावों में बड़ी महंगी पड़ने वाली है। संसद के भीतर और बाहर हम कांग्रेस को चैन से नहीं रहने देंगे। अब पानी सिर के बहुत ऊपर आ चुका है। यूपीए सरकार जल्द से जल्द महंगाई पर श्वेत पत्र जारी करे और आम जनता के सामने अपना 'जुर्म' स्वीकार करे।
देश के सबसे बड़े उत्पादक एवं उपभोक्ता किसानों की दुर्दशा के लिए भी कांग्रेस पूरी तरह से दोषी है। किसान यूपीए के पिछले 4 साल के शासन में जितने तबाह हुए हैं, उतने पहले कभी नहीं हुए थे। बजट में किसानों की कर्ज माफी की तथाकथित महत्वाकांक्षी स्कीम के बाद सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों का मनोबल इस कदर टूट चुका है कि उन्हें आत्महत्या करने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। कर्ज माफी की योजना भी किसानों के प्रति कांग्रेस का छल ही साबित हुई है।
लोकसभा चुनाव के बाद हम सत्ता में आए तो हम दिखा देंगे कि किसानों की समस्याएं कैसे हल की जाती हैं। किसानों के स्वाभिमान को फिर बहाल करने का पूरा ब्लूप्रिंट हमने तैयार कर रखा है। किसानों की बढ़ती समस्याओं के लिए हम सरकार को बहुत पहले से आगाह करते आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।
कांग्रेस अपनी कोई भी ऐसी उपलब्धि बता दे जिस पर उसे नाज हो। महंगाई का सवाल हो, किसानों का सवाल हो या फिर आतंकवाद से जंग करने का सवाल हो, हर मोर्चे पर कांग्रेस नीत सरकार विफल ही साबित हुई है। अब कांग्रेस के पास कुतर्क देने के सिवा और कुछ भी नहीं बचा है। एनडीए की पूर्व की सरकार ने देश में आर्थिक विकास का जो दौर शुरू किया था, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने उसे भी जाया कर दिया। देश की अर्थव्यवस्था मंदी के भंवर में फंसने ही वाली है। कांग्रेस अपने पूरे शासन काल में बस एक ही काम करती रही। वह है वोट बैंक की राजनीति। पिछले 4 सालों में एक खास समुदाय के तुष्टीकरण के जरिए कांग्रेस समाज की समरसता में जहर घोलने का काम करती रही।
आतंकवाद जैसे अहम मसले को भी उसने वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देश की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। आतंकवाद को काबू में करने के लिए जहां कड़े से कड़े कानून की जरूरत थी, कांग्रेस ने पहले से बने पोटा कानून को रद्द कर दिया। आतंकवाद के प्रति कांग्रेस के सॉफ्ट रुख का ही नतीजा है कि उसकी जड़ें वहां भी फैल गई हैं, जहां आतंकवाद का नामों निशान नहीं था।
महंगाई और चुनाव
महेश रंगराजन
राजनीतिक विश्लेषक
सत्तारूढ़ यूपीए सरकार को महंगाई के प्रेत ने परेशान कर डाला है। महंगाई की दर ने 22 मार्च के सप्ताह के बीतते बीतते 7 फीसदी का आंकड़ा पार कर लिया और अब वह 7.41 फीसदी तक पहुंच गई है, जो कि पिछले तीन सालों में महंगाई का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इस तरह सत्तारूढ़ गठबंधन और खासतौर पर कांग्रेस के लिए जो चीज मुश्किल का सबसे बड़ा सबब बनने जा रही है, वह इस साल देश के कई राज्यों में होने वाले चुनाव हैं, जहां मतदाता महंगाई को लेकर बेहद संवेदनशील हैं।
कोई हैरत की बात नहीं कि कांग्रेस पर इस वक्त राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दोनों छोरों से हमले हो रहे हैं। एल. के. आडवाणी ने साफ तौर पर यह जाहिर कर दिया कि इस बार चुनाव का मुख्य मुद्दा महंगाई ही होगी। कोयंबटूर में हुए हालिया कॉन्फ्रेंस के बाद से सीपीएम भी इस मुद्दे को लेकर सड़क पर आने को उतारू है। बीजेपी का रुख मनमोहन सरकार के गठन के बाद से अब तक लगातार आक्रामक ही रहा है।
व्यापक स्तर पर चीजें सचमुच बहुत खराब दिख रही हैं। महंगाई बढ़ने और चुनावी नतीजे के इतिहास पर नजर यह समझने में मदद कर सकती है कि क्यों आशंकाएं वास्तविक दिखाई दे रही हैं। 1971 में इंदिरा गांधी ने बहुत बड़ी जीत हासिल की। लेकिन 1974 तक सारी चीजें उलट-पुलट हो गईं। इसकी एक बड़ी वजह महंगाई थी। 1971-73 का सूखा और बांग्लादेश के युद्ध ने कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया था। 1973-74 के दौरान औद्योगिक श्रम के लिए कमोडिटी प्राइस इंडेक्स में 21 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई थी और जैसे ही तेल की कीमत में इजाफा हुआ, उसके बाद अगले ही वर्ष महंगाई में भी काफी बढ़ोतरी हो गई।
हम कहेंगे कि ये सब बीते सालों की बातें हैं। 1965-73 के दौरान भारत की विकास दर 3 फीसदी से भी कम थी। लेकिन 2003 के बाद से अब तक भारत अभूतपूर्व रफ्तार से विकास यात्रा कर रहा है। भारत पहले की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा अमीर मुल्क है।
लेकिन एक परेशान करने वाली बात है। पी.बी. नरसिंह राव का नेताओं, व्यवसायियों और उद्योगपतियों के बीच एक समय काफी अच्छा प्रभाव था। लेकिन 1994 के वर्षांत तक आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के एसेंबली चुनावों के नतीजे पार्टी के फिर से उठने की किसी भी संभावना पर भारी पड़ गए। इसका भी अहम कारण चावल की कीमत में आया उछाल ही था। 1998 से लगातार कांग्रेस नरसिंह राव का नाम लेने से बचती रही है। 2006 की गर्मियों में केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के राज्य में, करुणानिधि के नेतृत्व वाले गठबंधन ने गरीब परिवारों को प्रतिमाह 10 किलो चावल मुफ्त देकर अपने लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। मार्च 2007 में अकाली दल के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शहरी गरीबों के वोट की बदौलत मैदान मार लिया। यहां भी सस्ती दाल और आटे के वादे ने ही असर दिखाया।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 1991 से लेकर आज तक प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता में 13 फीसदी की कमी आई है और दालों के संदर्भ में यह आंकड़ा 33 फीसदी का है। आज खाद्य चीजों की कीमत पिछले छह महीने के स्तर से भी काफी अधिक है। दाल और खाद्य तेलों के मूल्य देखकर तो यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है।
भारत के विकास की रफ्तार भले ही बहुत तेज हो, लेकिन इस विकास में हर किसी की हिस्सेदारी बराबर नहीं है। भूमिहीन मजदूरों और गरीब किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक के अनेक तबके फिर भी संघर्ष करने को बाध्य हैं। मंडी में खाद्य चीजों की कीमत में जारी लगातार इजाफा आय के नजरिए से भी किसानों को कोई खास फायदा नहीं दे पा रहा। हमारी श्रम शक्ति का आधा हिस्सा आज भी कृषि कामों में लगा हुआ है। इसलिए सिंचाई की पम्पिंग मशीनों के लिए डीजल और कृषि उत्पादों को नजदीकी सड़क अथवा रेल तक पहुंचाना भी महंगा और इसलिए काफी भारी साबित हो रहा है।
किसानों और गरीबों पर शिकंजे की तरह कसती महंगाई ने सत्तारूढ़ गठबंधन की रातों की नींद हराम कर रखी है। प्याज की कीमत को लेकर पार्टी द्वारा कभी मचाया गया हो हल्ला भी कौन भूल सकता है? पहले इसने 1980 की लोकसभा में इंदिरा गांधी की मदद की, फिर 1998 में सोनिया गांधी ने इसका सहारा लिया।
फूड क्राइसिस है, लेकिन डर किस बात का
भारत डोगरा
युनाइटेड नेशंस के सेक्रेटरी जनरल बान की मून ने हाल ही में चेतावनी दी कि दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और भूख तथा कुपोषण की समस्या विकट हो रही है। मार्च महीने के अपने संदेश में उन्होंने कहा कि गेहूं, चावल और मक्का की कीमतें महज 6 महीने में 50 फीसदी या उससे अधिक बढ़कर रेकॉर्ड बना रही हैं, जबकि खाद्य भंडार बहुत नीचे गिर गए हैं। इसके बाद यह खबर आई कि दुनिया में अन्न का भंडार सिर्फ 12 हफ्तों के लिए बचा है। जाहिर है, हम भोजन के एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया दुनिया में खाद्यान्न के सबसे बड़े उत्पादक हैं। लेकिन इस बार वहां खेती पर मौसम की मार पड़ी है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी डिमांड और सप्लाई का संतुलन गड़बड़ा गया है। कमी की एक वजह यह भी है कि महंगे क्रूड ऑयल से घबराकर अमेरिका ने मक्का की फसल को बडे़ पैमाने पर जैव ईंधन तैयार करने में झोंक दिया है। दुनिया के कई देश इस गलती में उसके साथी हैं। इस नए खाद्य संकट की दस्तक भारत में भी चढ़ती कीमतों और सरकार के खाली होते गोदामों के रूप में नजर आ रही है। बहुत दिन नहीं हुए जब अर्थशास्त्री ज्यां ड्रेज ने अंदाजा लगाया था कि फूड कॉरपोरेशन के गोदामों में पडे़ अनाज के बोरों को एक के ऊपर एक रख दिया जाए, तो वे चांद तक पहुंच जाएंगे।
जून 2002 में एफसीआई के गोदामों में 647 लाख टन अनाज (गेहूं और चावल) था, जबकि जरूरत लगभग 230 लाख टन की ही थी। अगले 4 साल में ही हालत यह हो गई कि अक्टूबर 2006 में गोदामों में सिर्फ 124 लाख टन अनाज था, जबकि उस वक्त जरूरत 162 लाख टन की थी। 2006-07 में 55 लाख टन गेहूं इम्पोर्ट किया गया। 2007-08 में भी 18 लाख टन गेहूं इम्पोर्ट करने के ऑर्डर दिए गए। तब जाकर यह हालत थी कि इस वर्ष के शुरू में 192 लाख टन अनाज गोदामों में था, जबकि जनवरी में इसकी मात्रा 200 लाख टन होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, लाखों टन के इम्पोर्ट के बावजूद एफसीआई के गोदामों में अनाज जरूरत से कम ही रहा।
लोगों को यह जानने का हक है कि 5-6 बरसों के भीतर ऐसा कैसे हो गया? जानना तो लोग यह भी चाहते हैं कि सस्ते में एक्सपोर्ट और महंगे में इम्पोर्ट क्यों किए गए? सपोर्ट प्राइस बढ़ाकर किसानों से ज्यादा अनाज हासिल करने के बजाय महंगा इम्पोर्ट क्यों किया गया? अगर खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी खाद्यान्न जुटाने में दिक्कत आ रही थी तो अनाज की खरीद में प्राइवेट कंपनियों को इतनी तेजी से क्यों आगे आने दिया गया? ऐसे सब मामलों पर पारदर्शिता की बहुत जरूरत है।
फिलहाल इस बात से इनकार नहीं कि हम संकट में पड़ गए हैं, लेकिन इसके बावजूद यह जोर देकर कहना जरूरी है कि घबराने की कोई वजह नहीं है और न ही जल्दबाजी में कोई कदम उठाना चाहिए। 1960 के दशक में खाद्य संकट को इस तरह पेश किया गया जैसे कि प्रलय आ गया हो। घबराहट के उस माहौल में ऐसी महंगी तकनीकों को पास करवा लिया गया जो बाहरी बीजों, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर आधारित हैं। उनके कारण हमारी मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन नष्ट होता गया और किसान महंगी खेती के जाल में फंसकर कर्जग्रस्त होते गए। इन दिनों भी खाद्य संकट की दुहाई देकर स्वास्थ्य, पर्यावरण और किसानी के लिए खतरनाक जीएमओ जैसी तकनीकों की पैरवी की जा रही है।
जरूरत तो इस बात की है कि पर्यावरण की रक्षा और छोटे किसान की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए खाद्य उत्पादन बढ़ाने की सस्ती, टिकाऊ और आत्मनिर्भर तकनीकों का प्रसार किया जाए, जिनमें गांवों में और उनके आसपास उपलब्ध संसाधनों का बेहतर से बेहतर उपयोग हो सके। इसमें गांववासियों के परंपरागत ज्ञान का अधिकतम फायदा उठाना चाहिए। विख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर. एच. रिछारिया ने 60 के दशक में इस आधार पर देश में उपलब्ध धान की जैव विविधता का लाभ उठाते हुए चावल का उत्पादन बढ़ाने का एक बेहद उपयोगी प्रोग्राम तैयार किया था। लेकिन उन्हीं दिनों रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर आधारित विदेशी किस्मों के प्रसार की आंधी ऐसी चली कि उसके आगे डॉ. रिछारिया के सब सपने ढह गए। बाद में उन्होंने चावल की 17,000 से ज्यादा किस्मों और उप किस्मों को इकट्ठा किया, जिनमें सबसे बढ़िया किस्में आदिवासी किसानों से हासिल हुईं। लेकिन जब उन्होंने किसानों के इस खजाने पर बाहरी शिकंजा कसने का विरोध किया तो उन्हें गुमनामी के अंधेरे में खोने के लिए मजबूर कर दिया गया। बाद में इंदिरा गांधी के कार्यालय ने उन्हें चावल उत्पादन बढ़ाने का प्रोग्राम तैयार करने को कहा, लेकिन इंदिरा की हत्या के बाद यह शुरुआत भी ठप हो गई।
इस त्रासद कहानी का सबक यह है कि भारतीय खेती की सही संभावनाओं को हासिल करने में कोई न कोई अड़चन आती रही और किसानों की भलाई के साथ खाद्य सुरक्षा मजबूत करने का मकसद पीछे छूटता गया। नतीजा यह है कि वर्ष 1990-2007 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन की सालाना बढ़ोतरी सिर्फ 1.2 फीसदी पर सिमट गई, जो जनसंख्या में इजाफे की 1.9 फीसदी की दर से भी कम थी। अनाज की प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1990 में 468 ग्राम थी, जो घटकर 2005-06 में 412 ग्राम रह गई। दालों की उपलब्धता इस दौरान 42 ग्राम से गिरकर 33 ग्राम पर पहुंच गई।
वर्ष 2007-08 के इकनॉमिक सर्वे में स्वीकार किया गया है कि रासायनिक खादों के जरूरत से ज्यादा और गलत इस्तेमाल से मिट्टी के उपजाऊपन और फसलों की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ा है। सर्वे मानता है कि खेती में सार्वजनिक निवेश कम हुआ है। 1989-90 से 2005-06 के बीच खाद्यान्न उत्पादन का एरिया घटता रहा। सिंचाई क्षमता में बढ़ोतरी 1950-51 से 1989-90 के दौरान 3 फीसदी सालाना थी। लेकिन इसके बाद के 15 बरसों में यह दर आधी रह गई। सिंचाई की उपलब्ध क्षमता का इस्तेमाल भी चिंताजनक बना रहा।
इन बढ़ती परेशानियों का सबक यही है कि अब नीतियों को सुधारने का वक्त आ गया है। भारतीय किसानों ने कई बार दिखा दिया है कि सही मौका मिले तो वे हर चुनौती को स्वीकार करने को तैयार हैं। अब भी यह करिश्मा हो सकता है।
संसाधनों के पर्याप्त दोहन की जरूरत
शेलोम सिमखोन
पिछले दिनों मुझे भारत को देखने का मौका मिला। मैं यहां पहली बार आया था। यह एक सद्भाव यात्रा थी, जो कृषि मंत्री शरद पवार की इस्त्राइल यात्रा के जवाब में आयोजित की गई थी। अपनी इस यात्रा के दौरान मैंने यहां के कुछ राज्यों और वहां हो रही खेती को देखा। यहां पुल प्राकृतिक संसाधन देख कर मैं मुग्ध रह गया। यह देश विश्व की एक बहुत बड़ी ताकत बन सकता है, लेकिन यहां के संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। अपनी इस यात्रा के दौरान हमने महसूस किया कि दोनों देशों की अनेक समस्याएं समान हैं। हम मिल कर बहुत कुछ कर सकते हैं। हमने इस्त्राइल में तकनीक पर काफी काम किया है।
वर्ष 1948 में इस्त्राइल की राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। यह लगभग वही समय है जब भारत भी आजाद हुआ था। तब इसाइल की अर्थव्यवस्था का वास्तविक आधार भी खेती ही थी। वहां पारंपरिक ढंग की खेती हुआ करती थी और कुछ पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं। उस समय हम नींबू प्रजाति के कुछ फल निर्यात किया करते थे। लेकिन बाद के सालों में हमने इसमें बहुत सारे बदलाव किए हैं। आज हमारे सामने पूरा विश्व एक खुला बाजार है और हम अनेक प्रकार के खाद्य उत्पादों की विश्व भर में बिक्री करते हैं। अब हम सेब और केले जैसे फलों का भी भरपूर उत्पादन करने लगे हैं जिन्हें पानी और सर्द मौसम वाले इलाकों की फसल माना जाता है।
हालांकि इस्त्राइल एक छोटा सा देश है, लेकिन भारत की ही तरह यहां भी कई तरह के मौसम हैं और खेती के लिहाज से अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और मिजाज भी अलग-अलग है। हमने उन्हें ध्यान में रख कर नई कृषि तकनीक और उसके उपकरण विकसित किए हैं। इसका हमें प्रत्यक्ष लाभ मिला है। इसे एक उदाहरण से समझाया जा सकता है। जैसे इसाइल ने ऐसी ग्रीनहाउस तकनीकों का विकास किया है, जो खासतौर से गर्म मौसम वाले इलाकों के लिए हैं। इस ग्रीनहाउस सिस्टम में कुछ विशेष प्रकार की प्लास्टिक फिल्में, हीटिंग और वेंटिलेशन की तरकीबें इस्तेमाल की जाती हैं। इनसे इसाइली किसानों को हर सीजन में 35-40 लाख गुलाब प्रति हेक्टेयर उगाने में मदद मिलती है। इससे औसतन प्रति हेक्टेयर 400 टन टमाटर उगाया जाता है। खुले खेतों में होने वाली फसल के मुकाबले यह पैदावार चार गुनी है।
भारत के पश्चिमी राज्यों में पानी की भारी कमी है। राजस्थान का एक बड़ा इलाका रेगिस्तानी है। गुजरात और महाराष्ट्र के भी कुछ इलाके सूखे हैं। हमारे इस्त्राइल की भी यही स्थिति है। रेगिस्तान से सटे होने के अलावा हमारा देश बेहद छोटा भी है। इसाइल की कुल भूमि का क्षेत्रफल 21 हजार वर्ग किलोमीटर है। इसमें सिर्फ 4.4 लाख हेक्टेयर यानी 20 फीसदी भूमि ही कृषि योग्य है। असल में तो खेती लायक जमीन 3.6 लाख हेक्टेयर भूमि ही है, शेष 1.8 लाख हेक्टेयर भूमि को हमने सिंचाई द्वारा खेती के लायक बनाया है। यह सिंचाई पद्धति सिर्फ जमीन पर पानी डाल देने की पारंपरिक पद्धति नहीं है। इसमें पानी में ही घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है और खाद तथा पानी दोनों की मात्रा मौसम, मिट्टी और पौधे की जरूरत के मुताबिक नियंत्रित की जाती है।
इस्त्राइल की आधी से ज्यादा भूमि बंजर है। इस देश में मौसम की कठिन परिस्थतियों और जल की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए सिंचाई की तकनीक पर यहां काफी काम किया गया है। यह देखा गया कि भूतल पर सिंचाई के बजाय दबावीकृत सिंचाई में जल का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी है। फिर सिंचाई तरह-तरह की तकनीकें और उपकरण विकसित किए गए-जैसे ड्रिप इरिगेशन ऑटोमैटिक वॉल्व्स और कंट्रोलर्स, लो डिस्चार्ज स्प्रेयर्स और मिनी स्प्रिंक्लर्स आदि। फर्टिगेशन (सिंचाई के साथ खाद का इस्तेमाल) आम है। खाद उत्पादकों ने अत्यंत घुलनशील और दव रूप वाली खाद का विकास किया है, जो इस तकनीक के लिए काम आती हैं।
देश भर में कृषि मौसम स्टेशनों का नेटवर्क है, जो मौसम के बारे में किसानों को तात्कालिक आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। इन आंकड़ों के जरिए सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह विकसित कम्प्यूटर नियंत्रित ड्रिप्स सिंचाई प्रणाली बड़ी मात्रा में पानी बचाती है और सिंचाई के जरिए ही खाद की सप्लाई को संभव बनाती है। सोचिए, इस तकनीक और अनुभव का लाभ उठा कर हम भारत के पश्चिमी प्रदेश को कितना हराभरा और उपजाऊ बना सकते हैं। यह खुशी की बात है कि दोनों देशों की सरकारों का ध्यान इस ओर गया है और वे गंभीरता से इस पर काम कर रही हैं। अगले 5 सालों में शायद राजस्थान खुद जैतून के तेल का उत्पादन करने लगेगा।
अपने मौसम की प्रतिकूलता को देखते हुए हमने 50 के दशक से ही खेती और सिंचाई पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया था। इसके अंतर्गत गैर-अनुभवी किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे कृषि की आधुनिक विधियों का इस्तेमाल सीमित संसाधनों के बीच अपनी क्षमता के अनुसार कर सकें। साल बीतते गए और कृषि का तेजी से विकास हुआ, क्योंकि शोध में मिली जरूरी सूचनाएं तेजी से खेतों और किसानों तक पहुंचीं। देश में इस दिशा में काम करने वाले टीमों की स्थापना की गई, जिन्होंने देश भर में कुशल और सक्षम प्रशिक्षण दिया। बाजार में प्रतियोगिता का दौर होने के बावजूद कृषि के पेशेवर विकास में प्रशिक्षण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही और इससे गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा मिला। यह अनुभव और शोध का एक ऐसा मिलाजुला क्षेत्र है जिसमें भारत और इस्त्राइल काफी कुछ एक-दूसरे के साथ बांट सकते हैं।
पशुओं और बीजों की उन्नत प्रजातियां विकसित करने के अलावा कंट्रोल्ड रिलीज फर्टिलाइजर्स जैसी तकनीक के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। इनसे भूमिगत जल का प्रदूषण भी कम होता है। जिन नए तरीकों का आविष्कार किया गया है उनमें सिंचाई की क्रांतिकारी तकनीक, भूमि को उपजाऊ बनाना और रेगिस्तान के उपयोग के लिए खारे पानी का इस्तेमाल बढ़ाना शामिल है। शोधकर्ताओं, किसानों और कृषि पर आधारित उद्योगों के बीच करीबी सहयोग से बाजारोन्मुखी कृषि व्यापार को मजबूती मिली है, जो अपनी कृषि तकनीक का निर्यात पूरे विश्व को कर रहा है।
कृषि बाजारों में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे उत्पाद जो कीटों, रोगाणुओं और कीटनाशकों से मुक्त हों। इसाइल में फसल कटाई के बाद की स्थितियों पर भी काफी काम हुआ है, ताकि इस प्रकार के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मार्केटिंग हो सके। कैसे भंडारण किया जाए, किस तरह की पैकेजिंग की जाए, दुकानों की शेल्फ पर किस तरह से अपने कृषि उत्पादों को ज्यादा से ज्यादा समय तक ताजा रखा जा सके -इस पर भी इस्त्राइल में काफी काम हुआ है। भारत में कृषि उत्पाद की अकूत क्षमता है, वह विश्व बाजार में अपनी धाक जमा सकता है। हम भारत के साथ अपने अनुभव बांटने के लिए बहुत ही उत्सुक हैं।
( लेखक इस्त्राइल के कृषि मंत्री हैं)
पिछले दिनों मुझे भारत को देखने का मौका मिला। मैं यहां पहली बार आया था। यह एक सद्भाव यात्रा थी, जो कृषि मंत्री शरद पवार की इस्त्राइल यात्रा के जवाब में आयोजित की गई थी। अपनी इस यात्रा के दौरान मैंने यहां के कुछ राज्यों और वहां हो रही खेती को देखा। यहां पुल प्राकृतिक संसाधन देख कर मैं मुग्ध रह गया। यह देश विश्व की एक बहुत बड़ी ताकत बन सकता है, लेकिन यहां के संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। अपनी इस यात्रा के दौरान हमने महसूस किया कि दोनों देशों की अनेक समस्याएं समान हैं। हम मिल कर बहुत कुछ कर सकते हैं। हमने इस्त्राइल में तकनीक पर काफी काम किया है।
वर्ष 1948 में इस्त्राइल की राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। यह लगभग वही समय है जब भारत भी आजाद हुआ था। तब इसाइल की अर्थव्यवस्था का वास्तविक आधार भी खेती ही थी। वहां पारंपरिक ढंग की खेती हुआ करती थी और कुछ पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं। उस समय हम नींबू प्रजाति के कुछ फल निर्यात किया करते थे। लेकिन बाद के सालों में हमने इसमें बहुत सारे बदलाव किए हैं। आज हमारे सामने पूरा विश्व एक खुला बाजार है और हम अनेक प्रकार के खाद्य उत्पादों की विश्व भर में बिक्री करते हैं। अब हम सेब और केले जैसे फलों का भी भरपूर उत्पादन करने लगे हैं जिन्हें पानी और सर्द मौसम वाले इलाकों की फसल माना जाता है।
हालांकि इस्त्राइल एक छोटा सा देश है, लेकिन भारत की ही तरह यहां भी कई तरह के मौसम हैं और खेती के लिहाज से अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और मिजाज भी अलग-अलग है। हमने उन्हें ध्यान में रख कर नई कृषि तकनीक और उसके उपकरण विकसित किए हैं। इसका हमें प्रत्यक्ष लाभ मिला है। इसे एक उदाहरण से समझाया जा सकता है। जैसे इसाइल ने ऐसी ग्रीनहाउस तकनीकों का विकास किया है, जो खासतौर से गर्म मौसम वाले इलाकों के लिए हैं। इस ग्रीनहाउस सिस्टम में कुछ विशेष प्रकार की प्लास्टिक फिल्में, हीटिंग और वेंटिलेशन की तरकीबें इस्तेमाल की जाती हैं। इनसे इसाइली किसानों को हर सीजन में 35-40 लाख गुलाब प्रति हेक्टेयर उगाने में मदद मिलती है। इससे औसतन प्रति हेक्टेयर 400 टन टमाटर उगाया जाता है। खुले खेतों में होने वाली फसल के मुकाबले यह पैदावार चार गुनी है।
भारत के पश्चिमी राज्यों में पानी की भारी कमी है। राजस्थान का एक बड़ा इलाका रेगिस्तानी है। गुजरात और महाराष्ट्र के भी कुछ इलाके सूखे हैं। हमारे इस्त्राइल की भी यही स्थिति है। रेगिस्तान से सटे होने के अलावा हमारा देश बेहद छोटा भी है। इसाइल की कुल भूमि का क्षेत्रफल 21 हजार वर्ग किलोमीटर है। इसमें सिर्फ 4.4 लाख हेक्टेयर यानी 20 फीसदी भूमि ही कृषि योग्य है। असल में तो खेती लायक जमीन 3.6 लाख हेक्टेयर भूमि ही है, शेष 1.8 लाख हेक्टेयर भूमि को हमने सिंचाई द्वारा खेती के लायक बनाया है। यह सिंचाई पद्धति सिर्फ जमीन पर पानी डाल देने की पारंपरिक पद्धति नहीं है। इसमें पानी में ही घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है और खाद तथा पानी दोनों की मात्रा मौसम, मिट्टी और पौधे की जरूरत के मुताबिक नियंत्रित की जाती है।
इस्त्राइल की आधी से ज्यादा भूमि बंजर है। इस देश में मौसम की कठिन परिस्थतियों और जल की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए सिंचाई की तकनीक पर यहां काफी काम किया गया है। यह देखा गया कि भूतल पर सिंचाई के बजाय दबावीकृत सिंचाई में जल का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी है। फिर सिंचाई तरह-तरह की तकनीकें और उपकरण विकसित किए गए-जैसे ड्रिप इरिगेशन ऑटोमैटिक वॉल्व्स और कंट्रोलर्स, लो डिस्चार्ज स्प्रेयर्स और मिनी स्प्रिंक्लर्स आदि। फर्टिगेशन (सिंचाई के साथ खाद का इस्तेमाल) आम है। खाद उत्पादकों ने अत्यंत घुलनशील और दव रूप वाली खाद का विकास किया है, जो इस तकनीक के लिए काम आती हैं।
देश भर में कृषि मौसम स्टेशनों का नेटवर्क है, जो मौसम के बारे में किसानों को तात्कालिक आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। इन आंकड़ों के जरिए सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह विकसित कम्प्यूटर नियंत्रित ड्रिप्स सिंचाई प्रणाली बड़ी मात्रा में पानी बचाती है और सिंचाई के जरिए ही खाद की सप्लाई को संभव बनाती है। सोचिए, इस तकनीक और अनुभव का लाभ उठा कर हम भारत के पश्चिमी प्रदेश को कितना हराभरा और उपजाऊ बना सकते हैं। यह खुशी की बात है कि दोनों देशों की सरकारों का ध्यान इस ओर गया है और वे गंभीरता से इस पर काम कर रही हैं। अगले 5 सालों में शायद राजस्थान खुद जैतून के तेल का उत्पादन करने लगेगा।
अपने मौसम की प्रतिकूलता को देखते हुए हमने 50 के दशक से ही खेती और सिंचाई पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया था। इसके अंतर्गत गैर-अनुभवी किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे कृषि की आधुनिक विधियों का इस्तेमाल सीमित संसाधनों के बीच अपनी क्षमता के अनुसार कर सकें। साल बीतते गए और कृषि का तेजी से विकास हुआ, क्योंकि शोध में मिली जरूरी सूचनाएं तेजी से खेतों और किसानों तक पहुंचीं। देश में इस दिशा में काम करने वाले टीमों की स्थापना की गई, जिन्होंने देश भर में कुशल और सक्षम प्रशिक्षण दिया। बाजार में प्रतियोगिता का दौर होने के बावजूद कृषि के पेशेवर विकास में प्रशिक्षण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही और इससे गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा मिला। यह अनुभव और शोध का एक ऐसा मिलाजुला क्षेत्र है जिसमें भारत और इस्त्राइल काफी कुछ एक-दूसरे के साथ बांट सकते हैं।
पशुओं और बीजों की उन्नत प्रजातियां विकसित करने के अलावा कंट्रोल्ड रिलीज फर्टिलाइजर्स जैसी तकनीक के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। इनसे भूमिगत जल का प्रदूषण भी कम होता है। जिन नए तरीकों का आविष्कार किया गया है उनमें सिंचाई की क्रांतिकारी तकनीक, भूमि को उपजाऊ बनाना और रेगिस्तान के उपयोग के लिए खारे पानी का इस्तेमाल बढ़ाना शामिल है। शोधकर्ताओं, किसानों और कृषि पर आधारित उद्योगों के बीच करीबी सहयोग से बाजारोन्मुखी कृषि व्यापार को मजबूती मिली है, जो अपनी कृषि तकनीक का निर्यात पूरे विश्व को कर रहा है।
कृषि बाजारों में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे उत्पाद जो कीटों, रोगाणुओं और कीटनाशकों से मुक्त हों। इसाइल में फसल कटाई के बाद की स्थितियों पर भी काफी काम हुआ है, ताकि इस प्रकार के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मार्केटिंग हो सके। कैसे भंडारण किया जाए, किस तरह की पैकेजिंग की जाए, दुकानों की शेल्फ पर किस तरह से अपने कृषि उत्पादों को ज्यादा से ज्यादा समय तक ताजा रखा जा सके -इस पर भी इस्त्राइल में काफी काम हुआ है। भारत में कृषि उत्पाद की अकूत क्षमता है, वह विश्व बाजार में अपनी धाक जमा सकता है। हम भारत के साथ अपने अनुभव बांटने के लिए बहुत ही उत्सुक हैं।
( लेखक इस्त्राइल के कृषि मंत्री हैं)
महंगाई के नाम पर
राजेंद्र शर्मा
बेलगाम हुई महंगाई से यूपीए सरकार के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें पड़ गई हैं। बेशक ऐसा न होता तो हैरानी की बात होती। खुद प्रधानमंत्री ने फिक्की की सालाना बैठक के अपने उद्घाटन भाषण में यह स्वीकार किया था कि गरीबी की मार आम आदमी पर ही ज्यादा पड़ती है, जिसकी कोई भी अनदेखी नहीं कर सकता। इलेक्शन के साल में तो हर्गिज नहीं। याद रहे कि प्रधानमंत्री की यह चेतावनी यूपीए सरकार का अंतिम मुकम्मल बजट पेश करने के फौरन बाद महंगाई के खतरनाक तरीके से तेजी पकड़ना शुरू करने से पहले ही आ चुकी थी। इसके बावजूद पी. चिदंबरम के बजट प्रस्तावों से महंगाई की आग पर ठंडे पानी के छींटे पड़ने के बजाय कीमतें उछलती चली गईं। मौजूदा महंगाई के राजनीतिक मतलबों को अगर हम कुछ देर के लिए एक तरफ रख दें, तब भी कोई पूछ सकता है कि क्या यह वित्त मंत्री की विफलता का भी मामला नहीं है? असल में पूछा यह भी जा सकता है कि क्या यह पूरी सरकार की भी विफलता का मामला नहीं है?
कथित खुलेपन की नीतियों के दौर में जिम्मेदारी का सवाल उठाया जाना ही सबसे पहले नापसंद किया जाता है! यह सवाल उठाना तो जैसे अपराध ही हो गया है कि आखिरकार यह किन या किस तरह की नीतियों की नाकामी है! जाहिर है, जब जिम्मेदार नीतियों की पहचान नहीं की जा सकती है, तो उस नाकामी की खाई से बाहर निकलने के लिए कुछ करना ही कहां संभव है! इसीलिए हम यह अनोखा तमाशा देख रहे हैं कि यह जानते हुए भी कि इसकी बहुत भारी सियासी कीमत चुकानी पड़ सकती है, पूरी की पूरी सरकार लाचार बनकर महंगाई का तमाशा देख रही है। उसने अगर कोई कोशिश की है तो महंगाई पर अंकुश लगाने की नहीं बल्कि पब्लिक को सिर्फ यह समझाने की कि महंगाई चूंकि बाहर से आई है, इसलिए सरकार उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वित्त मंत्री ने पिछले ही दिनों केरल में कांग्रेस की एक चिंतन बैठक में ऐलान किया कि 'हम महंगाई इम्पोर्ट कर रहे हैं।' आप जानते हैं कि इम्पोर्टेड चीज का आदर करना हमारी परंपरा है।
लेकिन यह किस्सा सिर्फ इतना नहीं है कि महंगाई हो या खाद्य सुरक्षा, पब्लिक पर सीधे मार करने वाले बुनियादी आर्थिक मसलों को भी बाढ़, सूखे या भूकंप की तरह प्राकृतिक आपदा बनाया जा रहा है, जिसके आने-जाने में सरकार का कोई दखल नहीं होता। इससे आगे बढ़कर संकट के असली कारणों पर पर्दा डालने की हड़बड़ी में ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो संकट को और गहरा ही कर सकते हैं। एक छोटी सी मिसाल पेश है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि महंगाई के मौजूदा चक्र को सबसे बढ़कर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल ने भड़काया है। लेकिन चूंकि पिछले दो साल में हमारे देश में खाद्यान्न पैदावार में किसी तरह की गिरावट न होकर बढ़ोतरी ही हुई है, कीमतों में इस उछाल के कारण संकटग्रस्त खेती से बाहर ही होने चाहिए। अब तो सरकार भी न चाहते हुए यह मानने पर मजबूर है कि खेती की पैदावार में फॉरवर्ड ट्रेडिंग के नाम पर सट्टेबाजी ही कीमतों में इस उछाल के पीछे है। और यह सट्टेबाजी मुमकिन हुई है खेती की पैदावारों की खरीद का मैदान देशी-विदेशी बड़े व्यापारियों के लिए खोल दिए जाने से। इसने पीडीएस यानी आम आदमी की इकलौती रक्षा छतरी को जिस तरह तबाह किया है, वह जगजाहिर है। इसने पिछले दो वर्षों में लगातार बढ़ते दाम पर गेहूं का आयात करने, यानी महंगाई के आयात की जो मजबूरी पैदा की थी, वह भी किसी से छुपी नहीं है।
इस समस्या से निपटने के लिए यूपीए सरकार क्या कर रही है? क्या वह कृषि उत्पादों में सट्टेबाजी पर रोक लगा रही है, जिसकी मांग वामपंथी पार्टियों ने ही नहीं, बल्कि संसदीय समिति ने भी की है? जी नहीं। क्या वह उपजों की खरीद में निजी क्षेत्र के दखल पर अंकुश लगा रही है, ताकि भारतीय खाद्य निगम के जरिए सरकार के हाथों में ज्यादा पैदावार पहुंचे और वह पीडीएस के रास्ते आम लोगों को महंगाई से बचा सके? नहीं। वह तो इस मामले में सारी जिम्मेदारी से अपनी जान छुड़ाने की ही कोशिश कर रही है। तभी तो कृषि राज्य मंत्री ने लोकसभा को यह जानकारी दी कि चार राज्यों को मार्च से मई तक अपनी मर्जी के मुताबिक गेहूं के आयात की इजाजत दे दी गई है। ये चार राज्य हैं- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। मंत्री महोदय ने बताया कि आंध्र और केरल से भी आयात पर विचार करने के लिए कहा गया है। यूपीए सरकार के हिसाब से इन आयातों के जरिए ये राज्य, पीडीएस और दूसरे कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए खाद्यान्न की अपनी जरूरत के करीब आधे की भरपाई करेंगे। मंत्री महोदय ने माना कि 2007 में केंद्रीय पूल में कम गेहूं पहुंचने और ज्यादा मांग आने के चलते यह कदम उठाना जरूरी हो गया था।
यह तो साफ ही है कि इस तरह यूपीए सरकार आम आदमी को न्यूनतम भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी और जवाबदेही, दोनों से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन असल में इस उलटी चाल के नतीजे दूर तक जाते हैं। राज्यों को अपनी जरूरत के लिए खाद्यान्न का आयात करने के भरोसे छोड़े जाने का मतलब यह भी है कि इन राज्यों को इंटरनैशनल मंडी में आपस में ही होड़ के लिए धकेला जा रहा होगा। इससे आयात तो अपेक्षाकृत महंगे पड़ ही रहे होंगे, केंद्र के साथ और आपस में भी राज्यों के संबंधों पर इसका जो असर पड़ेगा, उसका आसानी से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बड़े निवेश और ऋणों के मामले में राज्यों के बीच होड़ ने उन्हें जिस तरह ज्यादा से ज्यादा रियायतें देने पर मजबूर किया है, वह सबके सामने है। जाहिर है, यह रास्ता सिस्टम को ही कमजोर किए जाने की ओर जाता है। इसके जरिए खाद्य सुरक्षा तक के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी नियोजित प्रयास को नामुमकिन बनाया जा रहा होगा। लेकिन आम आदमी के हितों के मामले में शासन को ज्यादा से ज्यादा लाचार बनाया जाना तो उदारीकरण की बुनियादी विशेषता ही है। किसने सोचा होगा कि राज्य के धीरे-धीरे खत्म हो जाने का मार्क्सवादी विचार इस तरह सच होगा!
बेलगाम हुई महंगाई से यूपीए सरकार के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें पड़ गई हैं। बेशक ऐसा न होता तो हैरानी की बात होती। खुद प्रधानमंत्री ने फिक्की की सालाना बैठक के अपने उद्घाटन भाषण में यह स्वीकार किया था कि गरीबी की मार आम आदमी पर ही ज्यादा पड़ती है, जिसकी कोई भी अनदेखी नहीं कर सकता। इलेक्शन के साल में तो हर्गिज नहीं। याद रहे कि प्रधानमंत्री की यह चेतावनी यूपीए सरकार का अंतिम मुकम्मल बजट पेश करने के फौरन बाद महंगाई के खतरनाक तरीके से तेजी पकड़ना शुरू करने से पहले ही आ चुकी थी। इसके बावजूद पी. चिदंबरम के बजट प्रस्तावों से महंगाई की आग पर ठंडे पानी के छींटे पड़ने के बजाय कीमतें उछलती चली गईं। मौजूदा महंगाई के राजनीतिक मतलबों को अगर हम कुछ देर के लिए एक तरफ रख दें, तब भी कोई पूछ सकता है कि क्या यह वित्त मंत्री की विफलता का भी मामला नहीं है? असल में पूछा यह भी जा सकता है कि क्या यह पूरी सरकार की भी विफलता का मामला नहीं है?
कथित खुलेपन की नीतियों के दौर में जिम्मेदारी का सवाल उठाया जाना ही सबसे पहले नापसंद किया जाता है! यह सवाल उठाना तो जैसे अपराध ही हो गया है कि आखिरकार यह किन या किस तरह की नीतियों की नाकामी है! जाहिर है, जब जिम्मेदार नीतियों की पहचान नहीं की जा सकती है, तो उस नाकामी की खाई से बाहर निकलने के लिए कुछ करना ही कहां संभव है! इसीलिए हम यह अनोखा तमाशा देख रहे हैं कि यह जानते हुए भी कि इसकी बहुत भारी सियासी कीमत चुकानी पड़ सकती है, पूरी की पूरी सरकार लाचार बनकर महंगाई का तमाशा देख रही है। उसने अगर कोई कोशिश की है तो महंगाई पर अंकुश लगाने की नहीं बल्कि पब्लिक को सिर्फ यह समझाने की कि महंगाई चूंकि बाहर से आई है, इसलिए सरकार उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वित्त मंत्री ने पिछले ही दिनों केरल में कांग्रेस की एक चिंतन बैठक में ऐलान किया कि 'हम महंगाई इम्पोर्ट कर रहे हैं।' आप जानते हैं कि इम्पोर्टेड चीज का आदर करना हमारी परंपरा है।
लेकिन यह किस्सा सिर्फ इतना नहीं है कि महंगाई हो या खाद्य सुरक्षा, पब्लिक पर सीधे मार करने वाले बुनियादी आर्थिक मसलों को भी बाढ़, सूखे या भूकंप की तरह प्राकृतिक आपदा बनाया जा रहा है, जिसके आने-जाने में सरकार का कोई दखल नहीं होता। इससे आगे बढ़कर संकट के असली कारणों पर पर्दा डालने की हड़बड़ी में ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो संकट को और गहरा ही कर सकते हैं। एक छोटी सी मिसाल पेश है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि महंगाई के मौजूदा चक्र को सबसे बढ़कर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल ने भड़काया है। लेकिन चूंकि पिछले दो साल में हमारे देश में खाद्यान्न पैदावार में किसी तरह की गिरावट न होकर बढ़ोतरी ही हुई है, कीमतों में इस उछाल के कारण संकटग्रस्त खेती से बाहर ही होने चाहिए। अब तो सरकार भी न चाहते हुए यह मानने पर मजबूर है कि खेती की पैदावार में फॉरवर्ड ट्रेडिंग के नाम पर सट्टेबाजी ही कीमतों में इस उछाल के पीछे है। और यह सट्टेबाजी मुमकिन हुई है खेती की पैदावारों की खरीद का मैदान देशी-विदेशी बड़े व्यापारियों के लिए खोल दिए जाने से। इसने पीडीएस यानी आम आदमी की इकलौती रक्षा छतरी को जिस तरह तबाह किया है, वह जगजाहिर है। इसने पिछले दो वर्षों में लगातार बढ़ते दाम पर गेहूं का आयात करने, यानी महंगाई के आयात की जो मजबूरी पैदा की थी, वह भी किसी से छुपी नहीं है।
इस समस्या से निपटने के लिए यूपीए सरकार क्या कर रही है? क्या वह कृषि उत्पादों में सट्टेबाजी पर रोक लगा रही है, जिसकी मांग वामपंथी पार्टियों ने ही नहीं, बल्कि संसदीय समिति ने भी की है? जी नहीं। क्या वह उपजों की खरीद में निजी क्षेत्र के दखल पर अंकुश लगा रही है, ताकि भारतीय खाद्य निगम के जरिए सरकार के हाथों में ज्यादा पैदावार पहुंचे और वह पीडीएस के रास्ते आम लोगों को महंगाई से बचा सके? नहीं। वह तो इस मामले में सारी जिम्मेदारी से अपनी जान छुड़ाने की ही कोशिश कर रही है। तभी तो कृषि राज्य मंत्री ने लोकसभा को यह जानकारी दी कि चार राज्यों को मार्च से मई तक अपनी मर्जी के मुताबिक गेहूं के आयात की इजाजत दे दी गई है। ये चार राज्य हैं- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। मंत्री महोदय ने बताया कि आंध्र और केरल से भी आयात पर विचार करने के लिए कहा गया है। यूपीए सरकार के हिसाब से इन आयातों के जरिए ये राज्य, पीडीएस और दूसरे कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए खाद्यान्न की अपनी जरूरत के करीब आधे की भरपाई करेंगे। मंत्री महोदय ने माना कि 2007 में केंद्रीय पूल में कम गेहूं पहुंचने और ज्यादा मांग आने के चलते यह कदम उठाना जरूरी हो गया था।
यह तो साफ ही है कि इस तरह यूपीए सरकार आम आदमी को न्यूनतम भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी और जवाबदेही, दोनों से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन असल में इस उलटी चाल के नतीजे दूर तक जाते हैं। राज्यों को अपनी जरूरत के लिए खाद्यान्न का आयात करने के भरोसे छोड़े जाने का मतलब यह भी है कि इन राज्यों को इंटरनैशनल मंडी में आपस में ही होड़ के लिए धकेला जा रहा होगा। इससे आयात तो अपेक्षाकृत महंगे पड़ ही रहे होंगे, केंद्र के साथ और आपस में भी राज्यों के संबंधों पर इसका जो असर पड़ेगा, उसका आसानी से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बड़े निवेश और ऋणों के मामले में राज्यों के बीच होड़ ने उन्हें जिस तरह ज्यादा से ज्यादा रियायतें देने पर मजबूर किया है, वह सबके सामने है। जाहिर है, यह रास्ता सिस्टम को ही कमजोर किए जाने की ओर जाता है। इसके जरिए खाद्य सुरक्षा तक के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी नियोजित प्रयास को नामुमकिन बनाया जा रहा होगा। लेकिन आम आदमी के हितों के मामले में शासन को ज्यादा से ज्यादा लाचार बनाया जाना तो उदारीकरण की बुनियादी विशेषता ही है। किसने सोचा होगा कि राज्य के धीरे-धीरे खत्म हो जाने का मार्क्सवादी विचार इस तरह सच होगा!
अमेरिकी मंदी से डरना कैसा?
भरत झुनझुनवाला
अमेरिका में मंदी गहराती जा रही है। वहां के बैंकों को लगातार घाटा हो रहा है। मंदी से छुटकारा पाने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में भारी कटौती की है। लेकिन इकॉनमी डूबती ही जा रही है। सवाल यह है कि क्या भारत भी उसकी चपेट में आएगा? पहली नजर में तो ऐसा होता लग रहा है। हमारे निर्यातकों को दिक्कत हो रही है और शेयर बाजार से अमेरिकी पूंजी निकल रही है। लेकिन दूसरे तमाम मामलों में यह रिश्ता टूटता दिखता है। र्वल्ड प्रेस डॉटकॉम पर प्रीयरडू प्लेसेस अमेरिकी मंदी की चार वजहें बताते हैं- होड़ लेने की ताकत का अभाव, तेल के दाम, हाउसिंग बुलबुले का फूटना और उपभोक्ता में भरोसे की कमी। देखना चाहिए कि ये कारण भारत में कितने मौजूद हैं। इससे संकेत मिल जाएगा कि भारत मंदी की चपेट में आएगा या नहीं।
अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का मुख्य कारण उस देश के ऊंचे वेतन हैं। किसी अर्धकुशल श्रमिक, जैसे टैक्सी ड्राइवर की दैनिक आय अमेरिका में लगभग दस हजार रुपये है। तुलना में भारत में टैक्सी ड्राइवर की आय महज 250 रुपये है। ऊंचे वेतन होने से अमेरिकी उद्योग ग्लोबल होड़ में टिक नहीं पा रहे। इसका साफ संकेत कॉल सेन्टर से मिलता है। अमेरिकी कंपनियों के लिए अमेरिकी श्रमिक से इस सेवा को लेना महंगा पड़ता है, जबकि भारतीय श्रमिक से सस्ता। इसलिए अमेरिका के कॉल सेन्टर बंद हो रहे हैं और भारत में खुल रहे हैं। मतलब यह हुआ कि अमेरिका में होड़ की क्षमता का टूटना और भारत में इस क्षमता का सृजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए अमेरिकी मंदी का गहराना हमारे लिए शुभ होगा। वहां से रोजगार का पलायन तेजी से भारत की ओर होगा। हां, हमें बांग्लादेश और वियतनाम से होड़ करनी होगी। फिर भी हम पर असर सकारात्मक ही पड़ेगा।
अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का कारण तकनीकी विकास में ठहराव भी है। पिछले सौ बरसों के प्रमुख आविष्कार अमेरिका में ही हुए। लेकिन पिछले दस बरसों से इस सिलसिले में ठहराव सा आ गया है। इस क्षेत्र में भी भारत का सूरज उगता दिखता है। मसलन नैनो बनाकर भारत ने ग्लोबल ऑटो इंडस्ट्री के सामने नई चुनौती पेश की है।
अमेरिकी मंदी का दूसरा कारण तेल के बढ़ते दाम हैं। कार को अमेरिकी कल्चर का प्रतीक कहा जा सकता है। वीकएंड पर पूरा देश कार में बैठकर सैर को निकल पड़ता है। बड़ी कारों का भी उन्हें शौक है। इसलिए अमेरिका पर तेल के बढ़ते मूल्यों का गहरा असर पड़ना ही है। भारत पर यह असर आंशिक रूप से ही पड़ेगा, क्योंकि कार की संस्कृति अभी हम पर पूरी तरह से हावी नहीं हुई है। इसके अलावा तेल की ऊंची कीमत अदा करने से हुए नुकसान की कुछ भरपाई भारत को हो जाएगी। तेल से पश्चिम एशिया, रूस और वेनेजुएला को भारी आय हो रही है। ये देश अपने विकास के लिए बड़े प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं।। इन प्रोजेक्ट के लिए भारत से श्रमिकों और माल की मांग बढ़ रही है। इस तरह तेल पर खर्च हुआ कुछ पैसा वापस भी लौट रहा है।
तेल उत्पादक देशों के सामने समस्या है कि अपनी कमाई का निवेश कहां करें। अतीत में यह निवेश अमेरिका में किया जा रहा था। सत्तर और अस्सी के दशक में तेल के दाम उछले थे और तेल उत्पादक देशों को भारी आय हुई थी। इस आय के बड़े हिस्से का निवेश उन्होंने अमेरिका में किया था। सऊदी अरब के राजकुमारों ने मैनहटन में प्रॉपर्टी खरीदी। इस रकम को पेट्रो डॉलर कहा गया था।
अमेरिका द्वारा तेल के लिए अदा की गई रकम घूमकर वापस आ गई। लेकिन अब यह सूचक्र टूट गया है। अमेरिकी डॉलर टूटने से सऊदी राजकुमारों के लिए अमेरिका में पेट्रो डॉलर का निवेश फायदेमंद नहीं रह गया है। यानी समस्या तेल की ऊंची कीमत से नहीं बल्कि डॉलर के टूटने से पैदा हुई है। भारत की स्थिति बिल्कुल उलट है। रुपया चढ़ रहा है। सऊदी राजकुमारों के लिए नरीमन पॉइंट का आकर्षण बढ़ रहा है। इसलिए पेट्रो डॉलर का बहाव भारत की तरफ आने की पूरी गुंजाइश है। तेल के बुरे असर की कुछ भरपाई इस प्रवाह से हो जाएगी। यानी हम उस बीमारी से पीड़ित नहीं हैं, जिससे अमेरिका है।
अमेरिकी मंदी की तीसरी वजह हाउसिंग बुलबुले का फूटना है। दरअसल अमेरिका में मंदी ने 2002 में डॉटकॉम बुलबुले के फूटने के साथ ही पैर पसार लिए थे, लेकिन उस समय यह दिखी नहीं थी। अमेरिकी केन्द्रीय बैंक के प्रमुख एलन ग्रीनस्पैन ने हालत को भांप लिया। मंदी से निजात दिलाने के लिए उन्होंने हाउसिंग लोन सस्ते कर दिए, जबकि सरकारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर बढ़ा दी। हाउसिंग लोन सस्ता होने से अमेरिकी नागरिकों ने मकान खरीदे। इससे हाउसिंग सेक्टर में सीमेंट, स्टील और ग्लास आदि की मांग पैदा हुई। साथ ही सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर ऊंची होने से पूंजी का प्रवाह अमेरिका की तरफ बना रहा। ग्रीनस्पैन ने चार्वाक की 'कर्ज लेकर घी पीओ' की नीति अपनाई। जब तक कर्ज मिलता रहा, पार्टी चलती रही। लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती? जल्द ही निवेशकों को समझ आने लग गया कि अमेरिकी इकॉनमी अंदर से खोखली होती जा रही है। उन्हें दिखने लगा कि डॉलर टूटेगा। उन्होंने अमेरिकी टेजरी बॉन्ड खरीदने से हाथ खींच लिया। अमेरिका को आसान पूंजी मिलना बन्द हो गया और हाउसिंग बबल फूट गया। साथ ही अमेरिका की होड़ लेने की क्षमता घटने से नागरिकों के रोजगार संकट में पड़ गए। वे हाउसिंग लोन की अदायगी नहीं कर सके। मतलब यह है कि अमेरिका का हाउसिंग संकट उसकी गलत नीतियों की देन है। इसका भारत से कुछ भी लेना-देना नहीं।
अमेरिकी मंदी का चौथा कारण कंस्यूमर में भरोसे की कमी है। आज अमेरिकी उपभोक्ता उसी तरह मायूस है जैसे लॉटरी खेलने वाला न जीतने पर हो जाता है। इसके उलट भारत में शॉपिंग मॉल्स का फैलता कल्चर बताता है कि कंस्यूमर के हौसले बुलंद हैं।
मेरी समझ अमेरिकी मंदी के चारों कारण भारत पर लागू नहीं होते। हमारे निर्यातकों को परेशानी होगी और शेयर बाजार भी कुछ टूटेगा। लेकिन भारतीय इकॉनमी की बुनियाद मजबूत ही बनी रहेगी। हमें इन तात्कालिक समस्याओं से विचलित नहीं होना चाहिए।
अमेरिका में मंदी गहराती जा रही है। वहां के बैंकों को लगातार घाटा हो रहा है। मंदी से छुटकारा पाने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में भारी कटौती की है। लेकिन इकॉनमी डूबती ही जा रही है। सवाल यह है कि क्या भारत भी उसकी चपेट में आएगा? पहली नजर में तो ऐसा होता लग रहा है। हमारे निर्यातकों को दिक्कत हो रही है और शेयर बाजार से अमेरिकी पूंजी निकल रही है। लेकिन दूसरे तमाम मामलों में यह रिश्ता टूटता दिखता है। र्वल्ड प्रेस डॉटकॉम पर प्रीयरडू प्लेसेस अमेरिकी मंदी की चार वजहें बताते हैं- होड़ लेने की ताकत का अभाव, तेल के दाम, हाउसिंग बुलबुले का फूटना और उपभोक्ता में भरोसे की कमी। देखना चाहिए कि ये कारण भारत में कितने मौजूद हैं। इससे संकेत मिल जाएगा कि भारत मंदी की चपेट में आएगा या नहीं।
अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का मुख्य कारण उस देश के ऊंचे वेतन हैं। किसी अर्धकुशल श्रमिक, जैसे टैक्सी ड्राइवर की दैनिक आय अमेरिका में लगभग दस हजार रुपये है। तुलना में भारत में टैक्सी ड्राइवर की आय महज 250 रुपये है। ऊंचे वेतन होने से अमेरिकी उद्योग ग्लोबल होड़ में टिक नहीं पा रहे। इसका साफ संकेत कॉल सेन्टर से मिलता है। अमेरिकी कंपनियों के लिए अमेरिकी श्रमिक से इस सेवा को लेना महंगा पड़ता है, जबकि भारतीय श्रमिक से सस्ता। इसलिए अमेरिका के कॉल सेन्टर बंद हो रहे हैं और भारत में खुल रहे हैं। मतलब यह हुआ कि अमेरिका में होड़ की क्षमता का टूटना और भारत में इस क्षमता का सृजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए अमेरिकी मंदी का गहराना हमारे लिए शुभ होगा। वहां से रोजगार का पलायन तेजी से भारत की ओर होगा। हां, हमें बांग्लादेश और वियतनाम से होड़ करनी होगी। फिर भी हम पर असर सकारात्मक ही पड़ेगा।
अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का कारण तकनीकी विकास में ठहराव भी है। पिछले सौ बरसों के प्रमुख आविष्कार अमेरिका में ही हुए। लेकिन पिछले दस बरसों से इस सिलसिले में ठहराव सा आ गया है। इस क्षेत्र में भी भारत का सूरज उगता दिखता है। मसलन नैनो बनाकर भारत ने ग्लोबल ऑटो इंडस्ट्री के सामने नई चुनौती पेश की है।
अमेरिकी मंदी का दूसरा कारण तेल के बढ़ते दाम हैं। कार को अमेरिकी कल्चर का प्रतीक कहा जा सकता है। वीकएंड पर पूरा देश कार में बैठकर सैर को निकल पड़ता है। बड़ी कारों का भी उन्हें शौक है। इसलिए अमेरिका पर तेल के बढ़ते मूल्यों का गहरा असर पड़ना ही है। भारत पर यह असर आंशिक रूप से ही पड़ेगा, क्योंकि कार की संस्कृति अभी हम पर पूरी तरह से हावी नहीं हुई है। इसके अलावा तेल की ऊंची कीमत अदा करने से हुए नुकसान की कुछ भरपाई भारत को हो जाएगी। तेल से पश्चिम एशिया, रूस और वेनेजुएला को भारी आय हो रही है। ये देश अपने विकास के लिए बड़े प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं।। इन प्रोजेक्ट के लिए भारत से श्रमिकों और माल की मांग बढ़ रही है। इस तरह तेल पर खर्च हुआ कुछ पैसा वापस भी लौट रहा है।
तेल उत्पादक देशों के सामने समस्या है कि अपनी कमाई का निवेश कहां करें। अतीत में यह निवेश अमेरिका में किया जा रहा था। सत्तर और अस्सी के दशक में तेल के दाम उछले थे और तेल उत्पादक देशों को भारी आय हुई थी। इस आय के बड़े हिस्से का निवेश उन्होंने अमेरिका में किया था। सऊदी अरब के राजकुमारों ने मैनहटन में प्रॉपर्टी खरीदी। इस रकम को पेट्रो डॉलर कहा गया था।
अमेरिका द्वारा तेल के लिए अदा की गई रकम घूमकर वापस आ गई। लेकिन अब यह सूचक्र टूट गया है। अमेरिकी डॉलर टूटने से सऊदी राजकुमारों के लिए अमेरिका में पेट्रो डॉलर का निवेश फायदेमंद नहीं रह गया है। यानी समस्या तेल की ऊंची कीमत से नहीं बल्कि डॉलर के टूटने से पैदा हुई है। भारत की स्थिति बिल्कुल उलट है। रुपया चढ़ रहा है। सऊदी राजकुमारों के लिए नरीमन पॉइंट का आकर्षण बढ़ रहा है। इसलिए पेट्रो डॉलर का बहाव भारत की तरफ आने की पूरी गुंजाइश है। तेल के बुरे असर की कुछ भरपाई इस प्रवाह से हो जाएगी। यानी हम उस बीमारी से पीड़ित नहीं हैं, जिससे अमेरिका है।
अमेरिकी मंदी की तीसरी वजह हाउसिंग बुलबुले का फूटना है। दरअसल अमेरिका में मंदी ने 2002 में डॉटकॉम बुलबुले के फूटने के साथ ही पैर पसार लिए थे, लेकिन उस समय यह दिखी नहीं थी। अमेरिकी केन्द्रीय बैंक के प्रमुख एलन ग्रीनस्पैन ने हालत को भांप लिया। मंदी से निजात दिलाने के लिए उन्होंने हाउसिंग लोन सस्ते कर दिए, जबकि सरकारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर बढ़ा दी। हाउसिंग लोन सस्ता होने से अमेरिकी नागरिकों ने मकान खरीदे। इससे हाउसिंग सेक्टर में सीमेंट, स्टील और ग्लास आदि की मांग पैदा हुई। साथ ही सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर ऊंची होने से पूंजी का प्रवाह अमेरिका की तरफ बना रहा। ग्रीनस्पैन ने चार्वाक की 'कर्ज लेकर घी पीओ' की नीति अपनाई। जब तक कर्ज मिलता रहा, पार्टी चलती रही। लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती? जल्द ही निवेशकों को समझ आने लग गया कि अमेरिकी इकॉनमी अंदर से खोखली होती जा रही है। उन्हें दिखने लगा कि डॉलर टूटेगा। उन्होंने अमेरिकी टेजरी बॉन्ड खरीदने से हाथ खींच लिया। अमेरिका को आसान पूंजी मिलना बन्द हो गया और हाउसिंग बबल फूट गया। साथ ही अमेरिका की होड़ लेने की क्षमता घटने से नागरिकों के रोजगार संकट में पड़ गए। वे हाउसिंग लोन की अदायगी नहीं कर सके। मतलब यह है कि अमेरिका का हाउसिंग संकट उसकी गलत नीतियों की देन है। इसका भारत से कुछ भी लेना-देना नहीं।
अमेरिकी मंदी का चौथा कारण कंस्यूमर में भरोसे की कमी है। आज अमेरिकी उपभोक्ता उसी तरह मायूस है जैसे लॉटरी खेलने वाला न जीतने पर हो जाता है। इसके उलट भारत में शॉपिंग मॉल्स का फैलता कल्चर बताता है कि कंस्यूमर के हौसले बुलंद हैं।
मेरी समझ अमेरिकी मंदी के चारों कारण भारत पर लागू नहीं होते। हमारे निर्यातकों को परेशानी होगी और शेयर बाजार भी कुछ टूटेगा। लेकिन भारतीय इकॉनमी की बुनियाद मजबूत ही बनी रहेगी। हमें इन तात्कालिक समस्याओं से विचलित नहीं होना चाहिए।
महंगाई नहीं रोक पाएगी सरकार
भरत झुनझुनवाला
इस वक्त महंगाई का जो आलम है, उसकी पहली वजह यह है कि खाद्य पदार्थों का भारी मात्रा में उपयोग बायोडीजल बनाने के लिए हो रहा है, खास तौर से अमेरिका में मक्के और ब्राजील में गन्ने का। दुनिया के खाद्य उत्पादन में से यह मात्रा निकल जाने के कारण दूसरे खाद्य पदार्थों पर दबाव पड़ रहा है। महंगाई की दूसरी वजह भारत और चीन में तेज आर्थिक विकास है। ये देश बुनियादी ढांचे में भारी मात्रा में निवेश कर रहे हैं। जिससे स्टील आदि की मांग और दाम बढ़ रहे हैं। पिछले दिनों तेल के दाम में हुई भारी बढ़ोतरी भी इसी क्रम में है। भारत में बायोडीजल के उत्पादन के लिए खाद्यान्नों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। लेकिन विश्व स्तर पर ऐसे उपयोग का असर हम पर पड़ रहा है।
सामान्य हालात में अमेरिकी इकॉनमी में गहराती मंदी को महंगाई रोकने में मददगार होना चाहिए था। अगर चीन में तेजी के कारण स्टील की मांग ज्यादा है तो अमेरिका में मंदी के कारण मांग कम है। लेकिन अमेरिकी मंदी के बावजूद स्टील और गेहूं के वैश्विक मूल्यों के बढ़ने से पता लगता है कि अमेरिकी मांग में हो रही कटौती की तुलना में भारत और चीन में मांग में बढ़ोतरी ज्यादा हो रही है। यह इस बात का सबूत है कि भारत-चीन तथा अमेरिका की इकॉनमी में अलगाव हो चुका है।
इसके अलावा चीजों की भी भिन्नता है। अमेरिकी मांग में कपड़े, खिलौने, कार आदि का हिस्सा ज्यादा था। अमेरिका के मंद पड़ने से इन माल के दाम घट रहे हैं। खबर है कि भारतीय कपड़ा मिलों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उनके ऑर्डर कैंसल हो रहे हैं और गारर्मेन्ट्स के दाम घट रहे हैं। लेकिन भारत के बाजार में इन वस्तुओं का महत्व कम है इसलिए इस मूल्य कटौती का असर नहीं दिख रहा है। हमारी इकॉनमी में स्टील, सीमेंट और दूसरे कन्स्ट्रक्शन मटीरियल का हिस्सा ज्यादा है। इनके दाम बढ़ रहे हैं।
लेकिन शेयर बाजारों में पिछले दो माह में आई गिरावट इस अलगाव पर सवालिया निशान खड़ा करती है। अमेरिकी मंदी के गहराने के साथ-साथ भारत के शेयर बाजार टूट रहे हैं। मेंरा मानना है कि यह अल्पकालीन असर है। अमेरिकी संकट के हमारे शेयर बाजार पर दो असर पड़ते हैं। तत्काल हमारे यहां बिकवाली होती है। अमेरिकी बैकों को अमेरिका में हुए घाटे की भरपाई के लिए यहां पर अपनी होल्डिंग की बिक्री करनी पड़ रही है। लेकिन दूसरा असर उल्टी दिशा में होता है। दुनिया के निवेशकों को सदा निवेश के अवसरों की खोज रहती है। मसलन सऊदी अरब के राजघराने को तेल के ऊंचे दामों से भारी फायदा हो रहा है।
पहले वह इस आय के बड़े हिस्से का निवेश अमेरिका में कर रहा था, लेकिन अब वहां निवेश करना आकर्षक नहीं रह गया है। अमेरिका में मंदी के गहराने के साथ अमेरिकी डॉलर का मूल्य गिर रहा है जिससे निवेशकों को भारी घाटा लगता है। लिहाजा दुनिया के तमाम निवेशकों को खोज है ऐसी मुद्रा की जिसके मूल्य में बढ़ोतरी होने की गुंजाइश हो। हमारा रुपया ऐसी स्थिति में है। इसलिए दुनिया भर के निवेशकों का रुख भारत की तरफ हो रहा है। पिछले चार माह में सीधा विदेशी निवेश रेकॉर्ड 10 अरब डॉलर के स्तर पर रहा है, जो कि इस प्रवाह का संकेत देता है। इस प्रवाह से भारत और चीन में महंगाई की दर भी बढ़ रही है। इसलिए अमेरिकी मंदी का महंगाई पर असर नहीं दिख रहा।
इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार द्वारा महंगाई पर नियंत्रण करने की कोशिशों का मूल्यांकन करना चाहिए। सरकार ने कई वस्तुओं पर आयात शुल्क घटा दिया है, जैसे स्टील और खाद्य तेल पर। दूसरी वस्तुओं के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, जैसे चावल। यह कदम सही दिशा में होने के बावजूद ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है। मूल समस्या विश्व बाजार में स्टील और सीमेंट की ज्यादा मांग होने से इनके वैश्विक मूल्यों में तेजी है। जब रूस, हांगकांग और दुबई में स्टील का दाम बढ़ रहा है तो इस पर आयात कर घटाने से मामूली अंतर ही पड़ेगा। इसके अलावा आयात शुल्क शून्य कर देने के बाद यह नुस्खा फेल हो जाता है। यही स्थिति चावल के निर्यात पर पाबंदी की है।
मान लिया कि पाबंदी लगाने से चावल के बाहरी मूल्यों से हमारा बाजार प्रभावित नहीं होगा। लेकिन हम दूसरे खाद्य पदार्थों का आयात कर रहे हैं जैसे गेहूं का। गेहूं का वैश्विक मूल्य बढ़ने से गेहूं के घरेलू मूल्य बढ़ेंगे और सहानुभूति में चावल के दाम भी बढ़ जाएंगे। आयातित पाम ऑयल के महंगा होने के कारण घरेलू मूंगफली और नारियल के तेल भी महंगे हो जाएंगे। सरकार द्वारा दूसरा कदम कैश रिजर्व रेशो को बढ़ाना है। इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए रकम कम बचेगी। कर्ज कम मिलने से फैक्ट्रियां कम लगेंगी और स्टील तथा सीमेंट की मांग कम होगी। यह कदम सही दिशा में होते हुए भी बेअसर होगा, क्योंकि मांग में बढ़ोतरी के दूसरे दरवाजे खुले हैं।
सरकार को दूसरी स्ट्रैटिजी अपनानी चाहिए। महंगाई का मूल कारण विदेशी निवेश का भारी मात्रा में आगमन है। सीधे इस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। जब विदेशी पूंजी कम आएगी तो महंगाई अपने आप काबू में आएगी। खाद्य पदार्थों का मामला ज्यादा पेचीदा है। गेहूं, चावल और तेल के दाम बढ़ने से हमारे किसान फायदे में रहते हैं। इनकी मूल्य बढ़ोतरी से किसानों को आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की भी प्रेरणा मिलती है। खाद्य पदार्थों के मूल्य पिछले 20 बरसों में औद्योगिक माल की तुलना में कम ही बढ़े हैं।
इनमें मूल्य बढ़ोतरी देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी हितकारी है। इसलिए खाद्य पदार्थों की मूल्य बढ़ोतरी रोकने के स्थान पर आम आदमी को महंगे खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए सक्षम बनाना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि श्रम की मांग बढ़े और श्रमिक की दिहाड़ी वर्तमान 120 रुपये से बढ़कर 200 रुपये हो जाए। तब गरीब के लिए महंगे खाद्यान्न खरीदना मुमकिन होगा। खाद्य सुरक्षा हासिल होगी, किसान खुशहाल होगा और गरीब भी महंगाई की मार से बच जाएगा।
इस वक्त महंगाई का जो आलम है, उसकी पहली वजह यह है कि खाद्य पदार्थों का भारी मात्रा में उपयोग बायोडीजल बनाने के लिए हो रहा है, खास तौर से अमेरिका में मक्के और ब्राजील में गन्ने का। दुनिया के खाद्य उत्पादन में से यह मात्रा निकल जाने के कारण दूसरे खाद्य पदार्थों पर दबाव पड़ रहा है। महंगाई की दूसरी वजह भारत और चीन में तेज आर्थिक विकास है। ये देश बुनियादी ढांचे में भारी मात्रा में निवेश कर रहे हैं। जिससे स्टील आदि की मांग और दाम बढ़ रहे हैं। पिछले दिनों तेल के दाम में हुई भारी बढ़ोतरी भी इसी क्रम में है। भारत में बायोडीजल के उत्पादन के लिए खाद्यान्नों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। लेकिन विश्व स्तर पर ऐसे उपयोग का असर हम पर पड़ रहा है।
सामान्य हालात में अमेरिकी इकॉनमी में गहराती मंदी को महंगाई रोकने में मददगार होना चाहिए था। अगर चीन में तेजी के कारण स्टील की मांग ज्यादा है तो अमेरिका में मंदी के कारण मांग कम है। लेकिन अमेरिकी मंदी के बावजूद स्टील और गेहूं के वैश्विक मूल्यों के बढ़ने से पता लगता है कि अमेरिकी मांग में हो रही कटौती की तुलना में भारत और चीन में मांग में बढ़ोतरी ज्यादा हो रही है। यह इस बात का सबूत है कि भारत-चीन तथा अमेरिका की इकॉनमी में अलगाव हो चुका है।
इसके अलावा चीजों की भी भिन्नता है। अमेरिकी मांग में कपड़े, खिलौने, कार आदि का हिस्सा ज्यादा था। अमेरिका के मंद पड़ने से इन माल के दाम घट रहे हैं। खबर है कि भारतीय कपड़ा मिलों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उनके ऑर्डर कैंसल हो रहे हैं और गारर्मेन्ट्स के दाम घट रहे हैं। लेकिन भारत के बाजार में इन वस्तुओं का महत्व कम है इसलिए इस मूल्य कटौती का असर नहीं दिख रहा है। हमारी इकॉनमी में स्टील, सीमेंट और दूसरे कन्स्ट्रक्शन मटीरियल का हिस्सा ज्यादा है। इनके दाम बढ़ रहे हैं।
लेकिन शेयर बाजारों में पिछले दो माह में आई गिरावट इस अलगाव पर सवालिया निशान खड़ा करती है। अमेरिकी मंदी के गहराने के साथ-साथ भारत के शेयर बाजार टूट रहे हैं। मेंरा मानना है कि यह अल्पकालीन असर है। अमेरिकी संकट के हमारे शेयर बाजार पर दो असर पड़ते हैं। तत्काल हमारे यहां बिकवाली होती है। अमेरिकी बैकों को अमेरिका में हुए घाटे की भरपाई के लिए यहां पर अपनी होल्डिंग की बिक्री करनी पड़ रही है। लेकिन दूसरा असर उल्टी दिशा में होता है। दुनिया के निवेशकों को सदा निवेश के अवसरों की खोज रहती है। मसलन सऊदी अरब के राजघराने को तेल के ऊंचे दामों से भारी फायदा हो रहा है।
पहले वह इस आय के बड़े हिस्से का निवेश अमेरिका में कर रहा था, लेकिन अब वहां निवेश करना आकर्षक नहीं रह गया है। अमेरिका में मंदी के गहराने के साथ अमेरिकी डॉलर का मूल्य गिर रहा है जिससे निवेशकों को भारी घाटा लगता है। लिहाजा दुनिया के तमाम निवेशकों को खोज है ऐसी मुद्रा की जिसके मूल्य में बढ़ोतरी होने की गुंजाइश हो। हमारा रुपया ऐसी स्थिति में है। इसलिए दुनिया भर के निवेशकों का रुख भारत की तरफ हो रहा है। पिछले चार माह में सीधा विदेशी निवेश रेकॉर्ड 10 अरब डॉलर के स्तर पर रहा है, जो कि इस प्रवाह का संकेत देता है। इस प्रवाह से भारत और चीन में महंगाई की दर भी बढ़ रही है। इसलिए अमेरिकी मंदी का महंगाई पर असर नहीं दिख रहा।
इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार द्वारा महंगाई पर नियंत्रण करने की कोशिशों का मूल्यांकन करना चाहिए। सरकार ने कई वस्तुओं पर आयात शुल्क घटा दिया है, जैसे स्टील और खाद्य तेल पर। दूसरी वस्तुओं के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, जैसे चावल। यह कदम सही दिशा में होने के बावजूद ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है। मूल समस्या विश्व बाजार में स्टील और सीमेंट की ज्यादा मांग होने से इनके वैश्विक मूल्यों में तेजी है। जब रूस, हांगकांग और दुबई में स्टील का दाम बढ़ रहा है तो इस पर आयात कर घटाने से मामूली अंतर ही पड़ेगा। इसके अलावा आयात शुल्क शून्य कर देने के बाद यह नुस्खा फेल हो जाता है। यही स्थिति चावल के निर्यात पर पाबंदी की है।
मान लिया कि पाबंदी लगाने से चावल के बाहरी मूल्यों से हमारा बाजार प्रभावित नहीं होगा। लेकिन हम दूसरे खाद्य पदार्थों का आयात कर रहे हैं जैसे गेहूं का। गेहूं का वैश्विक मूल्य बढ़ने से गेहूं के घरेलू मूल्य बढ़ेंगे और सहानुभूति में चावल के दाम भी बढ़ जाएंगे। आयातित पाम ऑयल के महंगा होने के कारण घरेलू मूंगफली और नारियल के तेल भी महंगे हो जाएंगे। सरकार द्वारा दूसरा कदम कैश रिजर्व रेशो को बढ़ाना है। इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए रकम कम बचेगी। कर्ज कम मिलने से फैक्ट्रियां कम लगेंगी और स्टील तथा सीमेंट की मांग कम होगी। यह कदम सही दिशा में होते हुए भी बेअसर होगा, क्योंकि मांग में बढ़ोतरी के दूसरे दरवाजे खुले हैं।
सरकार को दूसरी स्ट्रैटिजी अपनानी चाहिए। महंगाई का मूल कारण विदेशी निवेश का भारी मात्रा में आगमन है। सीधे इस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। जब विदेशी पूंजी कम आएगी तो महंगाई अपने आप काबू में आएगी। खाद्य पदार्थों का मामला ज्यादा पेचीदा है। गेहूं, चावल और तेल के दाम बढ़ने से हमारे किसान फायदे में रहते हैं। इनकी मूल्य बढ़ोतरी से किसानों को आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की भी प्रेरणा मिलती है। खाद्य पदार्थों के मूल्य पिछले 20 बरसों में औद्योगिक माल की तुलना में कम ही बढ़े हैं।
इनमें मूल्य बढ़ोतरी देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी हितकारी है। इसलिए खाद्य पदार्थों की मूल्य बढ़ोतरी रोकने के स्थान पर आम आदमी को महंगे खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए सक्षम बनाना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि श्रम की मांग बढ़े और श्रमिक की दिहाड़ी वर्तमान 120 रुपये से बढ़कर 200 रुपये हो जाए। तब गरीब के लिए महंगे खाद्यान्न खरीदना मुमकिन होगा। खाद्य सुरक्षा हासिल होगी, किसान खुशहाल होगा और गरीब भी महंगाई की मार से बच जाएगा।
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