Saturday, May 31, 2008

महंगाई का हिसाब-किताब

अलग-अलग स्तरों पर चीजों के दाम अलग-अलग होते हैं। सब्जियों के दाम होलसेलर के लिए अलग होते हैं। होलसेलर से खरीदने वाले रिटेलर के लिए दाम अलग होते हैं और रिटेलर से आप जिस कीमत पर सब्जी खरीदते हैं उसमें रिटेलर का मुनाफा भी जुड़ा रहता है। चढ़ती-उतरती कीमतों को नापने के लिए एक निश्चित इंडेक्स की जरूरत होती है। भारत में महंगाई को मापने के लिए वैसे तो कई इंडेक्स हैं मगर सरकारी तौर पर इसका आकलन थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआई) से किया जाता है। यानी जिस दाम पर चीजें थोक में बिकती हैं, उसके आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है।

महंगाई दर हर हफ्ते नापी जाती है। डब्लूपीआई, कमोडिटी इंडेक्स है जिसमें 5 बड़े ग्रुप होते हैं- प्राइमरी आर्टिकल, फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स और मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट। इन्हें फिर छोटे सब-ग्रुप में बांटा जाता है। मसलन, प्राइमरी आर्टिकल ग्रुप में फूड आर्टिकल, नॉन फूड आर्टिकल और मिनरल्स शामिल हैं। सभी सब-ग्रुप में कई कमोडिटी होती हैं।

अभी डब्लूपीआई में 435 कमोडिटी हैं जिनके थोक मूल्यों के आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है। इनमें 98 प्राइमरी आर्टिकल हैं, 19 फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स ग्रुप में आते हैं जबकि 318 मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट्स ग्रुप के अंतर्गत हैं।

डब्लूपीआई मुख्य शहरों और राज्यों की राजधानियों से जमा किए डेटा के आधार पर केलकुलेट करते हैं। रिस्पॉन्डेंट का इंटरव्यू लेकर सीधे डेटा लिया जाता है। ये रिस्पॉन्डेंट ऐसी कंपनियों के होते हैं जो कमर्शल कमोडिटी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी तरह सभी कमोडिटी का प्राइस लिया जाता है।

अगर हम कहें कि 22 मार्च को खत्म हुए हफ्ते में महंगाई दर 7 फीसदी रही तो इसका मतलब हुआ कि उससे पिछले साल इसी हफ्ते की तुलना में इस अवधि में चीजें इतनी महंगी हुईं।

डब्ल्यूपीआई के आधार पर महंगाई नापने की कोशिश की आलोचना होती रही है। वजह यह है कि आम कंस्यूमर को जिस महंगाई का सामना करना पड़ता है, वह थोक नहीं, रिटेल मूल्यों की है। इसी लिए कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स ज्यादा सटीक माना जाता है, जो आम तौर पर थोक मूल्य सूचकांक से कई फीसदी ज्यादा रहता है। भारत में सीपीआई है, लेकिन वह सही तरीके से विकसित नहीं हो सका है।

महंगाई को डिमांड और सप्लाई में गड़बड़ी के तौर पर देखा जाता है और इसकी कई वजहें हो सकती हैं। सरकार इसके खिलाफ वित्तीय और प्रशासकीय कदम उठाती है। लेकिन इसे देखने का एक नजरिया मौद्रिक भी है। इसके तहत महंगाई को इनफ्लेशन यानी पैसे का फैलाव कहा जाता है। यानी जब लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आता है, तो डिमांड बढ़ती है और इससे चीजें महंगी होने लगती हैं। रिजर्व बैंक यही नजरिया अपनाता है और इसलिए पैसे का फैलाव रोकने के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ा देता है। इस कदम का नुकसान यह है कि पैसा महंगा हो जाता है, जिसका असर इकनॉमिक ग्रोथ पर पड़ता है। यानी महंगाई पर काबू पाने की कोशिश में सरकार को यह भी देखना होता है कि वह ग्रोथ से कितनी छेड़छाड़ करे। जाहिर है, यह एक मुश्किल चुनाव है, इसलिए ज्यादातर लोग चाहते हैं कि वित्तीय और प्रशासकीय कदमों से ही महंगाई पर काबू पाया जाए।

महंगाई

धर्मकीर्ति जोशी
प्रिसिंपल इकनॉमिस्ट क्रिसिल


22 मार्च का सप्ताह बीतते-बीतते महंगाई के स्तर में आए 7 फीसदी के तेज उछाल ने सबको चौंका दिया है। भारत और विश्व में तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर महंगाई में बढ़ोतरी तो संभावित थी लेकिन 3 ही हफ्तों में यह 5 से बढ़कर 7 फीसदी तक आ जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। सूरजमुखी और सरसों के तेल जैसी बेसिक जरूरत की चीजों में 21 से 33 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। इंपोर्टेड ऑयल की महंगाई तो 47 फीसदी के आंकड़े को छू रही है। ज्यादा महंगाई का मतलब यह है कि रिजर्व बैंक फिलहाल तो इंटरेस्ट रेट घटाने से रहा।

महंगाई इस समय एक ग्लोबल समस्या है। चीन में महंगाई दर अपने ग्यारह सालों के उच्चतम स्तर 8.7 फीसदी पर है। वियतनाम में यह आंकड़ा 16 फीसदी है। एशिया के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अनाज की कीमतों में आई तेजी से निपटना ही फिलहाल एशियाई देशों के लिए बड़ी चुनौती है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी एशिया की सरकारों के लिए खाद्यान्न और ईधन की कीमतों का सामना करना अमेरिका की आर्थिक तंगी और ग्लोबल मंदी जैसी चुनौतियों से कहीं अधिक भारी पड़ रहा है।

भारत अब तक खुद को ग्लोबल महंगाई के असर से अलग रखने में लगभग कामयाब रहा है। तेल की कीमतों में हुई ग्लोबल बढ़त का असर यहां कंस्यूमर तक नहीं पहुंचने दिया गया। अनाज की कीमतों में भी यहां दुनिया की औसत दर के मुकाबले कहीं कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। रुपये के मूल्य में सुधार ने भी हमें वैश्विक मुद्रास्फीति से बचाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन अब यहां भी हालात चिंताजनक हो गए हैं। इस तरह की अचानक बढ़ी महंगाई का सबब क्या है और आगे हालात का रुख क्या होगा, किसी को नहीं मालूम।

महंगाई के मौजूदा दौर के लिए 3 चीजें सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, पहला तेल (पेट्रोलियम) की कीमतों में उछाल, दूसरा स्टील और अन्य मेटल के मूल्यों में तेजी और तीसरा कृषि क्षेत्र में उत्पादन और कीमतों के बदतर हालात। दुनिया के स्तर पर तेल की कीमत पिछले कुछ महीनों में बहुत बढ़ी हैं। दूसरी ओर बढ़ती मांग के दबाव में कोयले और आयरन ओर की कीमत में इजाफे के कारण मेटल और खास तौर से स्टील का मूल्य भी चढ़ता रहा। वर्तमान में मुद्रास्फीति की भागती रफ्तार में सबसे अहम भूमिका भारत और विश्व की खस्ताहाल कृषि के कारण अनाज की कीमतों पर लगातार बढ़ते दबाव की है। यह खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया, चीन और यूरोप के देशों में अनाज से बायो फ्यूल बनाने और खराब मौसम की वजह से हो रहा है। नतीजतन दुनिया का फूड स्टॉक आज 2 दशकों के न्यूनतम स्तर पर है, जिसके कारण दूसरे कृषि उत्पादों के मूल्य भी आसमान छूने लगे हैं। हमारी घरेलू खेती भी इस लिहाज से कुछ अच्छा नहीं कर सकी है। जिसकी वजह से इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ गई है।

खाने की चीजों में आई तेजी की वजह से अनेक देशों के अलग-अलग वर्गों के लोग विभिन्न तरीकों से आहत हुए हैं। अमेरिका जैसे आधुनिक अर्थतंत्र में कुल व्यय का 10 फीसदी हिस्सा खाने की चीजों पर जाता है। जैसे-जैसे हम आर्थिक रूप से कमजोर देशों की ओर जाएंगे, यह बढ़ता जाएगा। चीनी व्यक्ति की कुल आय का 30 फीसदी और भारतीय का 40 फीसदी खाने की चीजों में जाता है। अगर खाद्यान्न के मूल्यों में इजाफे का सिलसिला रोका न गया तो गरीब देशों के हालात क्या होंगे, सोचा जा सकता है। यदि किसी देश में अनाज के लिए मारामारी और हिंसा की खबरें आने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दूसरी सरकारों की ही तरह भारत ने भी मुद्रास्फीति कम करने के लिए कई नीतियां घोषित की हैं। इसमें खाद्य तेलों पर शुल्क में कटौती और निर्यात पर लगाम लगाना अहम बातें हैं। सरकार सीमेंट और स्टील कंपनियों से भी कीमत घटाने को कह चुकी है। लेकिन महंगाई पर लगाम कसने के लिए इतना ही काफी नहीं है। कंपनियों पर कीमत घटाने का दबाव भविष्य में मूल्य नियंत्रण के लिहाज से बुरा ही साबित होगा क्योंकि यह आर्थिक विकास के अहम जरिए को हतोत्साहित करने जैसा है। खाद्यान्न मूल्यों में तेजी की स्थिति आगे भी बनी रहने वाली है, इसलिए सिर्फ इंपोर्ट पर निर्भरता अच्छी नहीं है। इस समस्या से निजात का स्थाई तरीका यही हो सकता है कि घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके इस लिहाज से आत्मनिर्भरता पाई जाए। खेती में उत्पादकता बढ़ाने की नीतियां लागू की जानी चाहिए। जब तक आत्म निर्भरता हासिल नहीं होती, हमें खाद्यान्न के लोकल और ग्लोबल सिनेरियो पर करीबी निगाह रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर संकट से काफी पहले आयात कर लेना होगा।

महंगाई और चुनाव-1


राजनाथ सिंह
बीजेपी, राष्ट्रीय अध्यक्ष



कांग्रेस के शासन काल में हर मोर्चे पर तबाही ही तबाही दिख रही है। मैं समझता हूं अब तक कांग्रेस का वह गरूर जरूर टूट गया होगा कि सिर्फ उसे ही शासन करना आता है। बल्कि यह साबित हो गया है कि उसे शासन करना कतई नहीं आता। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन देश को जिस मुकाम पर ले आई है, आम लोगों को यह कसक जरूर हो रही होगी कि वर्ष 2004 में उन्होंने एनडीए सरकार को हटाकर भारी भूल की। आम आदमी का नारा देकर शासन में आई यूपीए सरकार ने उसे तबाह करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जानेमाने अर्थशास्त्री हैं लेकिन आसमान छूती महंगाई के सामने उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।

अब यूपीए की सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई हक नहीं है। देश के लोग अब बीजेपी को आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। उन्हें एनडीए के शासन के उस जमाने की याद सता रही है, जब महंगाई पूरी तरह सरकार के काबू में थी। यूपीए गठबंधन कोई सरकार नहीं बल्कि आम आदमी के खिलाफ एक षडयंत्र नजर आ रहा है।

तमाम दावों के बावजूद महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है। अब जबकि महंगाई की दर 7.4 तक पहुंच गई है तो कांग्रेस को यह मान लेना चाहिए कि आम लोगों को महंगाई की मार से बचाने का माद्दा उसमें नहीं बचा। कांग्रेस जितने दिनों तक सत्ता में बनी रहेगी, देश का बेड़ा गर्क होता रहेगा। स्थिति और भी बदतर होने वाली है। कांग्रेस पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का तर्क देकर अपनी विफलता नहीं छिपा सकती है। दुनिया के किसी भी देश में महंगाई की यह स्थिति नहीं है। सच यह है कि मौजूदा महंगाई यूपीए सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का नतीजा है।

आम आदमी के साथ कांग्रेस ने छल किया है, जिसका खामियाजा उसे आगामी लोकसभा चुनाव में भुगतना ही पड़ेगा। महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस की पोल खोलने के लिए बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने कमर कस ली है। बीजेपी महंगाई को आगामी चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बनाने जा रही है। यह महंगाई कांग्रेस को आगामी चुनावों में बड़ी महंगी पड़ने वाली है। संसद के भीतर और बाहर हम कांग्रेस को चैन से नहीं रहने देंगे। अब पानी सिर के बहुत ऊपर आ चुका है। यूपीए सरकार जल्द से जल्द महंगाई पर श्वेत पत्र जारी करे और आम जनता के सामने अपना 'जुर्म' स्वीकार करे।

देश के सबसे बड़े उत्पादक एवं उपभोक्ता किसानों की दुर्दशा के लिए भी कांग्रेस पूरी तरह से दोषी है। किसान यूपीए के पिछले 4 साल के शासन में जितने तबाह हुए हैं, उतने पहले कभी नहीं हुए थे। बजट में किसानों की कर्ज माफी की तथाकथित महत्वाकांक्षी स्कीम के बाद सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों का मनोबल इस कदर टूट चुका है कि उन्हें आत्महत्या करने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। कर्ज माफी की योजना भी किसानों के प्रति कांग्रेस का छल ही साबित हुई है।

लोकसभा चुनाव के बाद हम सत्ता में आए तो हम दिखा देंगे कि किसानों की समस्याएं कैसे हल की जाती हैं। किसानों के स्वाभिमान को फिर बहाल करने का पूरा ब्लूप्रिंट हमने तैयार कर रखा है। किसानों की बढ़ती समस्याओं के लिए हम सरकार को बहुत पहले से आगाह करते आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

कांग्रेस अपनी कोई भी ऐसी उपलब्धि बता दे जिस पर उसे नाज हो। महंगाई का सवाल हो, किसानों का सवाल हो या फिर आतंकवाद से जंग करने का सवाल हो, हर मोर्चे पर कांग्रेस नीत सरकार विफल ही साबित हुई है। अब कांग्रेस के पास कुतर्क देने के सिवा और कुछ भी नहीं बचा है। एनडीए की पूर्व की सरकार ने देश में आर्थिक विकास का जो दौर शुरू किया था, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने उसे भी जाया कर दिया। देश की अर्थव्यवस्था मंदी के भंवर में फंसने ही वाली है। कांग्रेस अपने पूरे शासन काल में बस एक ही काम करती रही। वह है वोट बैंक की राजनीति। पिछले 4 सालों में एक खास समुदाय के तुष्टीकरण के जरिए कांग्रेस समाज की समरसता में जहर घोलने का काम करती रही।

आतंकवाद जैसे अहम मसले को भी उसने वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देश की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। आतंकवाद को काबू में करने के लिए जहां कड़े से कड़े कानून की जरूरत थी, कांग्रेस ने पहले से बने पोटा कानून को रद्द कर दिया। आतंकवाद के प्रति कांग्रेस के सॉफ्ट रुख का ही नतीजा है कि उसकी जड़ें वहां भी फैल गई हैं, जहां आतंकवाद का नामों निशान नहीं था।

महंगाई और चुनाव


महेश रंगराजन
राजनीतिक विश्लेषक

सत्तारूढ़ यूपीए सरकार को महंगाई के प्रेत ने परेशान कर डाला है। महंगाई की दर ने 22 मार्च के सप्ताह के बीतते बीतते 7 फीसदी का आंकड़ा पार कर लिया और अब वह 7.41 फीसदी तक पहुंच गई है, जो कि पिछले तीन सालों में महंगाई का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इस तरह सत्तारूढ़ गठबंधन और खासतौर पर कांग्रेस के लिए जो चीज मुश्किल का सबसे बड़ा सबब बनने जा रही है, वह इस साल देश के कई राज्यों में होने वाले चुनाव हैं, जहां मतदाता महंगाई को लेकर बेहद संवेदनशील हैं।

कोई हैरत की बात नहीं कि कांग्रेस पर इस वक्त राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दोनों छोरों से हमले हो रहे हैं। एल. के. आडवाणी ने साफ तौर पर यह जाहिर कर दिया कि इस बार चुनाव का मुख्य मुद्दा महंगाई ही होगी। कोयंबटूर में हुए हालिया कॉन्फ्रेंस के बाद से सीपीएम भी इस मुद्दे को लेकर सड़क पर आने को उतारू है। बीजेपी का रुख मनमोहन सरकार के गठन के बाद से अब तक लगातार आक्रामक ही रहा है।

व्यापक स्तर पर चीजें सचमुच बहुत खराब दिख रही हैं। महंगाई बढ़ने और चुनावी नतीजे के इतिहास पर नजर यह समझने में मदद कर सकती है कि क्यों आशंकाएं वास्तविक दिखाई दे रही हैं। 1971 में इंदिरा गांधी ने बहुत बड़ी जीत हासिल की। लेकिन 1974 तक सारी चीजें उलट-पुलट हो गईं। इसकी एक बड़ी वजह महंगाई थी। 1971-73 का सूखा और बांग्लादेश के युद्ध ने कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया था। 1973-74 के दौरान औद्योगिक श्रम के लिए कमोडिटी प्राइस इंडेक्स में 21 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई थी और जैसे ही तेल की कीमत में इजाफा हुआ, उसके बाद अगले ही वर्ष महंगाई में भी काफी बढ़ोतरी हो गई।

हम कहेंगे कि ये सब बीते सालों की बातें हैं। 1965-73 के दौरान भारत की विकास दर 3 फीसदी से भी कम थी। लेकिन 2003 के बाद से अब तक भारत अभूतपूर्व रफ्तार से विकास यात्रा कर रहा है। भारत पहले की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा अमीर मुल्क है।

लेकिन एक परेशान करने वाली बात है। पी.बी. नरसिंह राव का नेताओं, व्यवसायियों और उद्योगपतियों के बीच एक समय काफी अच्छा प्रभाव था। लेकिन 1994 के वर्षांत तक आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के एसेंबली चुनावों के नतीजे पार्टी के फिर से उठने की किसी भी संभावना पर भारी पड़ गए। इसका भी अहम कारण चावल की कीमत में आया उछाल ही था। 1998 से लगातार कांग्रेस नरसिंह राव का नाम लेने से बचती रही है। 2006 की गर्मियों में केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के राज्य में, करुणानिधि के नेतृत्व वाले गठबंधन ने गरीब परिवारों को प्रतिमाह 10 किलो चावल मुफ्त देकर अपने लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। मार्च 2007 में अकाली दल के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शहरी गरीबों के वोट की बदौलत मैदान मार लिया। यहां भी सस्ती दाल और आटे के वादे ने ही असर दिखाया।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 1991 से लेकर आज तक प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता में 13 फीसदी की कमी आई है और दालों के संदर्भ में यह आंकड़ा 33 फीसदी का है। आज खाद्य चीजों की कीमत पिछले छह महीने के स्तर से भी काफी अधिक है। दाल और खाद्य तेलों के मूल्य देखकर तो यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है।

भारत के विकास की रफ्तार भले ही बहुत तेज हो, लेकिन इस विकास में हर किसी की हिस्सेदारी बराबर नहीं है। भूमिहीन मजदूरों और गरीब किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक के अनेक तबके फिर भी संघर्ष करने को बाध्य हैं। मंडी में खाद्य चीजों की कीमत में जारी लगातार इजाफा आय के नजरिए से भी किसानों को कोई खास फायदा नहीं दे पा रहा। हमारी श्रम शक्ति का आधा हिस्सा आज भी कृषि कामों में लगा हुआ है। इसलिए सिंचाई की पम्पिंग मशीनों के लिए डीजल और कृषि उत्पादों को नजदीकी सड़क अथवा रेल तक पहुंचाना भी महंगा और इसलिए काफी भारी साबित हो रहा है।

किसानों और गरीबों पर शिकंजे की तरह कसती महंगाई ने सत्तारूढ़ गठबंधन की रातों की नींद हराम कर रखी है। प्याज की कीमत को लेकर पार्टी द्वारा कभी मचाया गया हो हल्ला भी कौन भूल सकता है? पहले इसने 1980 की लोकसभा में इंदिरा गांधी की मदद की, फिर 1998 में सोनिया गांधी ने इसका सहारा लिया।

फूड क्राइसिस है, लेकिन डर किस बात का


भारत डोगरा


युनाइटेड नेशंस के सेक्रेटरी जनरल बान की मून ने हाल ही में चेतावनी दी कि दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और भूख तथा कुपोषण की समस्या विकट हो रही है। मार्च महीने के अपने संदेश में उन्होंने कहा कि गेहूं, चावल और मक्का की कीमतें महज 6 महीने में 50 फीसदी या उससे अधिक बढ़कर रेकॉर्ड बना रही हैं, जबकि खाद्य भंडार बहुत नीचे गिर गए हैं। इसके बाद यह खबर आई कि दुनिया में अन्न का भंडार सिर्फ 12 हफ्तों के लिए बचा है। जाहिर है, हम भोजन के एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया दुनिया में खाद्यान्न के सबसे बड़े उत्पादक हैं। लेकिन इस बार वहां खेती पर मौसम की मार पड़ी है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी डिमांड और सप्लाई का संतुलन गड़बड़ा गया है। कमी की एक वजह यह भी है कि महंगे क्रूड ऑयल से घबराकर अमेरिका ने मक्का की फसल को बडे़ पैमाने पर जैव ईंधन तैयार करने में झोंक दिया है। दुनिया के कई देश इस गलती में उसके साथी हैं। इस नए खाद्य संकट की दस्तक भारत में भी चढ़ती कीमतों और सरकार के खाली होते गोदामों के रूप में नजर आ रही है। बहुत दिन नहीं हुए जब अर्थशास्त्री ज्यां ड्रेज ने अंदाजा लगाया था कि फूड कॉरपोरेशन के गोदामों में पडे़ अनाज के बोरों को एक के ऊपर एक रख दिया जाए, तो वे चांद तक पहुंच जाएंगे।

जून 2002 में एफसीआई के गोदामों में 647 लाख टन अनाज (गेहूं और चावल) था, जबकि जरूरत लगभग 230 लाख टन की ही थी। अगले 4 साल में ही हालत यह हो गई कि अक्टूबर 2006 में गोदामों में सिर्फ 124 लाख टन अनाज था, जबकि उस वक्त जरूरत 162 लाख टन की थी। 2006-07 में 55 लाख टन गेहूं इम्पोर्ट किया गया। 2007-08 में भी 18 लाख टन गेहूं इम्पोर्ट करने के ऑर्डर दिए गए। तब जाकर यह हालत थी कि इस वर्ष के शुरू में 192 लाख टन अनाज गोदामों में था, जबकि जनवरी में इसकी मात्रा 200 लाख टन होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, लाखों टन के इम्पोर्ट के बावजूद एफसीआई के गोदामों में अनाज जरूरत से कम ही रहा।

लोगों को यह जानने का हक है कि 5-6 बरसों के भीतर ऐसा कैसे हो गया? जानना तो लोग यह भी चाहते हैं कि सस्ते में एक्सपोर्ट और महंगे में इम्पोर्ट क्यों किए गए? सपोर्ट प्राइस बढ़ाकर किसानों से ज्यादा अनाज हासिल करने के बजाय महंगा इम्पोर्ट क्यों किया गया? अगर खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी खाद्यान्न जुटाने में दिक्कत आ रही थी तो अनाज की खरीद में प्राइवेट कंपनियों को इतनी तेजी से क्यों आगे आने दिया गया? ऐसे सब मामलों पर पारदर्शिता की बहुत जरूरत है।

फिलहाल इस बात से इनकार नहीं कि हम संकट में पड़ गए हैं, लेकिन इसके बावजूद यह जोर देकर कहना जरूरी है कि घबराने की कोई वजह नहीं है और न ही जल्दबाजी में कोई कदम उठाना चाहिए। 1960 के दशक में खाद्य संकट को इस तरह पेश किया गया जैसे कि प्रलय आ गया हो। घबराहट के उस माहौल में ऐसी महंगी तकनीकों को पास करवा लिया गया जो बाहरी बीजों, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर आधारित हैं। उनके कारण हमारी मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन नष्ट होता गया और किसान महंगी खेती के जाल में फंसकर कर्जग्रस्त होते गए। इन दिनों भी खाद्य संकट की दुहाई देकर स्वास्थ्य, पर्यावरण और किसानी के लिए खतरनाक जीएमओ जैसी तकनीकों की पैरवी की जा रही है।

जरूरत तो इस बात की है कि पर्यावरण की रक्षा और छोटे किसान की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए खाद्य उत्पादन बढ़ाने की सस्ती, टिकाऊ और आत्मनिर्भर तकनीकों का प्रसार किया जाए, जिनमें गांवों में और उनके आसपास उपलब्ध संसाधनों का बेहतर से बेहतर उपयोग हो सके। इसमें गांववासियों के परंपरागत ज्ञान का अधिकतम फायदा उठाना चाहिए। विख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर. एच. रिछारिया ने 60 के दशक में इस आधार पर देश में उपलब्ध धान की जैव विविधता का लाभ उठाते हुए चावल का उत्पादन बढ़ाने का एक बेहद उपयोगी प्रोग्राम तैयार किया था। लेकिन उन्हीं दिनों रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर आधारित विदेशी किस्मों के प्रसार की आंधी ऐसी चली कि उसके आगे डॉ. रिछारिया के सब सपने ढह गए। बाद में उन्होंने चावल की 17,000 से ज्यादा किस्मों और उप किस्मों को इकट्ठा किया, जिनमें सबसे बढ़िया किस्में आदिवासी किसानों से हासिल हुईं। लेकिन जब उन्होंने किसानों के इस खजाने पर बाहरी शिकंजा कसने का विरोध किया तो उन्हें गुमनामी के अंधेरे में खोने के लिए मजबूर कर दिया गया। बाद में इंदिरा गांधी के कार्यालय ने उन्हें चावल उत्पादन बढ़ाने का प्रोग्राम तैयार करने को कहा, लेकिन इंदिरा की हत्या के बाद यह शुरुआत भी ठप हो गई।

इस त्रासद कहानी का सबक यह है कि भारतीय खेती की सही संभावनाओं को हासिल करने में कोई न कोई अड़चन आती रही और किसानों की भलाई के साथ खाद्य सुरक्षा मजबूत करने का मकसद पीछे छूटता गया। नतीजा यह है कि वर्ष 1990-2007 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन की सालाना बढ़ोतरी सिर्फ 1.2 फीसदी पर सिमट गई, जो जनसंख्या में इजाफे की 1.9 फीसदी की दर से भी कम थी। अनाज की प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1990 में 468 ग्राम थी, जो घटकर 2005-06 में 412 ग्राम रह गई। दालों की उपलब्धता इस दौरान 42 ग्राम से गिरकर 33 ग्राम पर पहुंच गई।

वर्ष 2007-08 के इकनॉमिक सर्वे में स्वीकार किया गया है कि रासायनिक खादों के जरूरत से ज्यादा और गलत इस्तेमाल से मिट्टी के उपजाऊपन और फसलों की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ा है। सर्वे मानता है कि खेती में सार्वजनिक निवेश कम हुआ है। 1989-90 से 2005-06 के बीच खाद्यान्न उत्पादन का एरिया घटता रहा। सिंचाई क्षमता में बढ़ोतरी 1950-51 से 1989-90 के दौरान 3 फीसदी सालाना थी। लेकिन इसके बाद के 15 बरसों में यह दर आधी रह गई। सिंचाई की उपलब्ध क्षमता का इस्तेमाल भी चिंताजनक बना रहा।

इन बढ़ती परेशानियों का सबक यही है कि अब नीतियों को सुधारने का वक्त आ गया है। भारतीय किसानों ने कई बार दिखा दिया है कि सही मौका मिले तो वे हर चुनौती को स्वीकार करने को तैयार हैं। अब भी यह करिश्मा हो सकता है।

संसाधनों के पर्याप्त दोहन की जरूरत

शेलोम सिमखोन

पिछले दिनों मुझे भारत को देखने का मौका मिला। मैं यहां पहली बार आया था। यह एक सद्भाव यात्रा थी, जो कृषि मंत्री शरद पवार की इस्त्राइल यात्रा के जवाब में आयोजित की गई थी। अपनी इस यात्रा के दौरान मैंने यहां के कुछ राज्यों और वहां हो रही खेती को देखा। यहां पुल प्राकृतिक संसाधन देख कर मैं मुग्ध रह गया। यह देश विश्व की एक बहुत बड़ी ताकत बन सकता है, लेकिन यहां के संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। अपनी इस यात्रा के दौरान हमने महसूस किया कि दोनों देशों की अनेक समस्याएं समान हैं। हम मिल कर बहुत कुछ कर सकते हैं। हमने इस्त्राइल में तकनीक पर काफी काम किया है।

वर्ष 1948 में इस्त्राइल की राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। यह लगभग वही समय है जब भारत भी आजाद हुआ था। तब इसाइल की अर्थव्यवस्था का वास्तविक आधार भी खेती ही थी। वहां पारंपरिक ढंग की खेती हुआ करती थी और कुछ पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं। उस समय हम नींबू प्रजाति के कुछ फल निर्यात किया करते थे। लेकिन बाद के सालों में हमने इसमें बहुत सारे बदलाव किए हैं। आज हमारे सामने पूरा विश्व एक खुला बाजार है और हम अनेक प्रकार के खाद्य उत्पादों की विश्व भर में बिक्री करते हैं। अब हम सेब और केले जैसे फलों का भी भरपूर उत्पादन करने लगे हैं जिन्हें पानी और सर्द मौसम वाले इलाकों की फसल माना जाता है।

हालांकि इस्त्राइल एक छोटा सा देश है, लेकिन भारत की ही तरह यहां भी कई तरह के मौसम हैं और खेती के लिहाज से अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और मिजाज भी अलग-अलग है। हमने उन्हें ध्यान में रख कर नई कृषि तकनीक और उसके उपकरण विकसित किए हैं। इसका हमें प्रत्यक्ष लाभ मिला है। इसे एक उदाहरण से समझाया जा सकता है। जैसे इसाइल ने ऐसी ग्रीनहाउस तकनीकों का विकास किया है, जो खासतौर से गर्म मौसम वाले इलाकों के लिए हैं। इस ग्रीनहाउस सिस्टम में कुछ विशेष प्रकार की प्लास्टिक फिल्में, हीटिंग और वेंटिलेशन की तरकीबें इस्तेमाल की जाती हैं। इनसे इसाइली किसानों को हर सीजन में 35-40 लाख गुलाब प्रति हेक्टेयर उगाने में मदद मिलती है। इससे औसतन प्रति हेक्टेयर 400 टन टमाटर उगाया जाता है। खुले खेतों में होने वाली फसल के मुकाबले यह पैदावार चार गुनी है।

भारत के पश्चिमी राज्यों में पानी की भारी कमी है। राजस्थान का एक बड़ा इलाका रेगिस्तानी है। गुजरात और महाराष्ट्र के भी कुछ इलाके सूखे हैं। हमारे इस्त्राइल की भी यही स्थिति है। रेगिस्तान से सटे होने के अलावा हमारा देश बेहद छोटा भी है। इसाइल की कुल भूमि का क्षेत्रफल 21 हजार वर्ग किलोमीटर है। इसमें सिर्फ 4.4 लाख हेक्टेयर यानी 20 फीसदी भूमि ही कृषि योग्य है। असल में तो खेती लायक जमीन 3.6 लाख हेक्टेयर भूमि ही है, शेष 1.8 लाख हेक्टेयर भूमि को हमने सिंचाई द्वारा खेती के लायक बनाया है। यह सिंचाई पद्धति सिर्फ जमीन पर पानी डाल देने की पारंपरिक पद्धति नहीं है। इसमें पानी में ही घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है और खाद तथा पानी दोनों की मात्रा मौसम, मिट्टी और पौधे की जरूरत के मुताबिक नियंत्रित की जाती है।

इस्त्राइल की आधी से ज्यादा भूमि बंजर है। इस देश में मौसम की कठिन परिस्थतियों और जल की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए सिंचाई की तकनीक पर यहां काफी काम किया गया है। यह देखा गया कि भूतल पर सिंचाई के बजाय दबावीकृत सिंचाई में जल का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी है। फिर सिंचाई तरह-तरह की तकनीकें और उपकरण विकसित किए गए-जैसे ड्रिप इरिगेशन ऑटोमैटिक वॉल्व्स और कंट्रोलर्स, लो डिस्चार्ज स्प्रेयर्स और मिनी स्प्रिंक्लर्स आदि। फर्टिगेशन (सिंचाई के साथ खाद का इस्तेमाल) आम है। खाद उत्पादकों ने अत्यंत घुलनशील और दव रूप वाली खाद का विकास किया है, जो इस तकनीक के लिए काम आती हैं।

देश भर में कृषि मौसम स्टेशनों का नेटवर्क है, जो मौसम के बारे में किसानों को तात्कालिक आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। इन आंकड़ों के जरिए सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह विकसित कम्प्यूटर नियंत्रित ड्रिप्स सिंचाई प्रणाली बड़ी मात्रा में पानी बचाती है और सिंचाई के जरिए ही खाद की सप्लाई को संभव बनाती है। सोचिए, इस तकनीक और अनुभव का लाभ उठा कर हम भारत के पश्चिमी प्रदेश को कितना हराभरा और उपजाऊ बना सकते हैं। यह खुशी की बात है कि दोनों देशों की सरकारों का ध्यान इस ओर गया है और वे गंभीरता से इस पर काम कर रही हैं। अगले 5 सालों में शायद राजस्थान खुद जैतून के तेल का उत्पादन करने लगेगा।

अपने मौसम की प्रतिकूलता को देखते हुए हमने 50 के दशक से ही खेती और सिंचाई पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया था। इसके अंतर्गत गैर-अनुभवी किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे कृषि की आधुनिक विधियों का इस्तेमाल सीमित संसाधनों के बीच अपनी क्षमता के अनुसार कर सकें। साल बीतते गए और कृषि का तेजी से विकास हुआ, क्योंकि शोध में मिली जरूरी सूचनाएं तेजी से खेतों और किसानों तक पहुंचीं। देश में इस दिशा में काम करने वाले टीमों की स्थापना की गई, जिन्होंने देश भर में कुशल और सक्षम प्रशिक्षण दिया। बाजार में प्रतियोगिता का दौर होने के बावजूद कृषि के पेशेवर विकास में प्रशिक्षण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही और इससे गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा मिला। यह अनुभव और शोध का एक ऐसा मिलाजुला क्षेत्र है जिसमें भारत और इस्त्राइल काफी कुछ एक-दूसरे के साथ बांट सकते हैं।

पशुओं और बीजों की उन्नत प्रजातियां विकसित करने के अलावा कंट्रोल्ड रिलीज फर्टिलाइजर्स जैसी तकनीक के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। इनसे भूमिगत जल का प्रदूषण भी कम होता है। जिन नए तरीकों का आविष्कार किया गया है उनमें सिंचाई की क्रांतिकारी तकनीक, भूमि को उपजाऊ बनाना और रेगिस्तान के उपयोग के लिए खारे पानी का इस्तेमाल बढ़ाना शामिल है। शोधकर्ताओं, किसानों और कृषि पर आधारित उद्योगों के बीच करीबी सहयोग से बाजारोन्मुखी कृषि व्यापार को मजबूती मिली है, जो अपनी कृषि तकनीक का निर्यात पूरे विश्व को कर रहा है।

कृषि बाजारों में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे उत्पाद जो कीटों, रोगाणुओं और कीटनाशकों से मुक्त हों। इसाइल में फसल कटाई के बाद की स्थितियों पर भी काफी काम हुआ है, ताकि इस प्रकार के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मार्केटिंग हो सके। कैसे भंडारण किया जाए, किस तरह की पैकेजिंग की जाए, दुकानों की शेल्फ पर किस तरह से अपने कृषि उत्पादों को ज्यादा से ज्यादा समय तक ताजा रखा जा सके -इस पर भी इस्त्राइल में काफी काम हुआ है। भारत में कृषि उत्पाद की अकूत क्षमता है, वह विश्व बाजार में अपनी धाक जमा सकता है। हम भारत के साथ अपने अनुभव बांटने के लिए बहुत ही उत्सुक हैं।
( लेखक इस्त्राइल के कृषि मंत्री हैं)

महंगाई के नाम पर

 राजेंद्र शर्मा
बेलगाम हुई महंगाई से यूपीए सरकार के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें पड़ गई हैं। बेशक ऐसा न होता तो हैरानी की बात होती। खुद प्रधानमंत्री ने फिक्की की सालाना बैठक के अपने उद्घाटन भाषण में यह स्वीकार किया था कि गरीबी की मार आम आदमी पर ही ज्यादा पड़ती है, जिसकी कोई भी अनदेखी नहीं कर सकता। इलेक्शन के साल में तो हर्गिज नहीं। याद रहे कि प्रधानमंत्री की यह चेतावनी यूपीए सरकार का अंतिम मुकम्मल बजट पेश करने के फौरन बाद महंगाई के खतरनाक तरीके से तेजी पकड़ना शुरू करने से पहले ही आ चुकी थी। इसके बावजूद पी. चिदंबरम के बजट प्रस्तावों से महंगाई की आग पर ठंडे पानी के छींटे पड़ने के बजाय कीमतें उछलती चली गईं। मौजूदा महंगाई के राजनीतिक मतलबों को अगर हम कुछ देर के लिए एक तरफ रख दें, तब भी कोई पूछ सकता है कि क्या यह वित्त मंत्री की विफलता का भी मामला नहीं है? असल में पूछा यह भी जा सकता है कि क्या यह पूरी सरकार की भी विफलता का मामला नहीं है?

कथित खुलेपन की नीतियों के दौर में जिम्मेदारी का सवाल उठाया जाना ही सबसे पहले नापसंद किया जाता है! यह सवाल उठाना तो जैसे अपराध ही हो गया है कि आखिरकार यह किन या किस तरह की नीतियों की नाकामी है! जाहिर है, जब जिम्मेदार नीतियों की पहचान नहीं की जा सकती है, तो उस नाकामी की खाई से बाहर निकलने के लिए कुछ करना ही कहां संभव है! इसीलिए हम यह अनोखा तमाशा देख रहे हैं कि यह जानते हुए भी कि इसकी बहुत भारी सियासी कीमत चुकानी पड़ सकती है, पूरी की पूरी सरकार लाचार बनकर महंगाई का तमाशा देख रही है। उसने अगर कोई कोशिश की है तो महंगाई पर अंकुश लगाने की नहीं बल्कि पब्लिक को सिर्फ यह समझाने की कि महंगाई चूंकि बाहर से आई है, इसलिए सरकार उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वित्त मंत्री ने पिछले ही दिनों केरल में कांग्रेस की एक चिंतन बैठक में ऐलान किया कि 'हम महंगाई इम्पोर्ट कर रहे हैं।' आप जानते हैं कि इम्पोर्टेड चीज का आदर करना हमारी परंपरा है।

लेकिन यह किस्सा सिर्फ इतना नहीं है कि महंगाई हो या खाद्य सुरक्षा, पब्लिक पर सीधे मार करने वाले बुनियादी आर्थिक मसलों को भी बाढ़, सूखे या भूकंप की तरह प्राकृतिक आपदा बनाया जा रहा है, जिसके आने-जाने में सरकार का कोई दखल नहीं होता। इससे आगे बढ़कर संकट के असली कारणों पर पर्दा डालने की हड़बड़ी में ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो संकट को और गहरा ही कर सकते हैं। एक छोटी सी मिसाल पेश है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि महंगाई के मौजूदा चक्र को सबसे बढ़कर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल ने भड़काया है। लेकिन चूंकि पिछले दो साल में हमारे देश में खाद्यान्न पैदावार में किसी तरह की गिरावट न होकर बढ़ोतरी ही हुई है, कीमतों में इस उछाल के कारण संकटग्रस्त खेती से बाहर ही होने चाहिए। अब तो सरकार भी न चाहते हुए यह मानने पर मजबूर है कि खेती की पैदावार में फॉरवर्ड ट्रेडिंग के नाम पर सट्टेबाजी ही कीमतों में इस उछाल के पीछे है। और यह सट्टेबाजी मुमकिन हुई है खेती की पैदावारों की खरीद का मैदान देशी-विदेशी बड़े व्यापारियों के लिए खोल दिए जाने से। इसने पीडीएस यानी आम आदमी की इकलौती रक्षा छतरी को जिस तरह तबाह किया है, वह जगजाहिर है। इसने पिछले दो वर्षों में लगातार बढ़ते दाम पर गेहूं का आयात करने, यानी महंगाई के आयात की जो मजबूरी पैदा की थी, वह भी किसी से छुपी नहीं है।

इस समस्या से निपटने के लिए यूपीए सरकार क्या कर रही है? क्या वह कृषि उत्पादों में सट्टेबाजी पर रोक लगा रही है, जिसकी मांग वामपंथी पार्टियों ने ही नहीं, बल्कि संसदीय समिति ने भी की है? जी नहीं। क्या वह उपजों की खरीद में निजी क्षेत्र के दखल पर अंकुश लगा रही है, ताकि भारतीय खाद्य निगम के जरिए सरकार के हाथों में ज्यादा पैदावार पहुंचे और वह पीडीएस के रास्ते आम लोगों को महंगाई से बचा सके? नहीं। वह तो इस मामले में सारी जिम्मेदारी से अपनी जान छुड़ाने की ही कोशिश कर रही है। तभी तो कृषि राज्य मंत्री ने लोकसभा को यह जानकारी दी कि चार राज्यों को मार्च से मई तक अपनी मर्जी के मुताबिक गेहूं के आयात की इजाजत दे दी गई है। ये चार राज्य हैं- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। मंत्री महोदय ने बताया कि आंध्र और केरल से भी आयात पर विचार करने के लिए कहा गया है। यूपीए सरकार के हिसाब से इन आयातों के जरिए ये राज्य, पीडीएस और दूसरे कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए खाद्यान्न की अपनी जरूरत के करीब आधे की भरपाई करेंगे। मंत्री महोदय ने माना कि 2007 में केंद्रीय पूल में कम गेहूं पहुंचने और ज्यादा मांग आने के चलते यह कदम उठाना जरूरी हो गया था।

यह तो साफ ही है कि इस तरह यूपीए सरकार आम आदमी को न्यूनतम भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी और जवाबदेही, दोनों से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन असल में इस उलटी चाल के नतीजे दूर तक जाते हैं। राज्यों को अपनी जरूरत के लिए खाद्यान्न का आयात करने के भरोसे छोड़े जाने का मतलब यह भी है कि इन राज्यों को इंटरनैशनल मंडी में आपस में ही होड़ के लिए धकेला जा रहा होगा। इससे आयात तो अपेक्षाकृत महंगे पड़ ही रहे होंगे, केंद्र के साथ और आपस में भी राज्यों के संबंधों पर इसका जो असर पड़ेगा, उसका आसानी से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बड़े निवेश और ऋणों के मामले में राज्यों के बीच होड़ ने उन्हें जिस तरह ज्यादा से ज्यादा रियायतें देने पर मजबूर किया है, वह सबके सामने है। जाहिर है, यह रास्ता सिस्टम को ही कमजोर किए जाने की ओर जाता है। इसके जरिए खाद्य सुरक्षा तक के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी नियोजित प्रयास को नामुमकिन बनाया जा रहा होगा। लेकिन आम आदमी के हितों के मामले में शासन को ज्यादा से ज्यादा लाचार बनाया जाना तो उदारीकरण की बुनियादी विशेषता ही है। किसने सोचा होगा कि राज्य के धीरे-धीरे खत्म हो जाने का मार्क्सवादी विचार इस तरह सच होगा!

अमेरिकी मंदी से डरना कैसा?

भरत झुनझुनवाला

अमेरिका में मंदी गहराती जा रही है। वहां के बैंकों को लगातार घाटा हो रहा है। मंदी से छुटकारा पाने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में भारी कटौती की है। लेकिन इकॉनमी डूबती ही जा रही है। सवाल यह है कि क्या भारत भी उसकी चपेट में आएगा? पहली नजर में तो ऐसा होता लग रहा है। हमारे निर्यातकों को दिक्कत हो रही है और शेयर बाजार से अमेरिकी पूंजी निकल रही है। लेकिन दूसरे तमाम मामलों में यह रिश्ता टूटता दिखता है। र्वल्ड प्रेस डॉटकॉम पर प्रीयरडू प्लेसेस अमेरिकी मंदी की चार वजहें बताते हैं- होड़ लेने की ताकत का अभाव, तेल के दाम, हाउसिंग बुलबुले का फूटना और उपभोक्ता में भरोसे की कमी। देखना चाहिए कि ये कारण भारत में कितने मौजूद हैं। इससे संकेत मिल जाएगा कि भारत मंदी की चपेट में आएगा या नहीं।

अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का मुख्य कारण उस देश के ऊंचे वेतन हैं। किसी अर्धकुशल श्रमिक, जैसे टैक्सी ड्राइवर की दैनिक आय अमेरिका में लगभग दस हजार रुपये है। तुलना में भारत में टैक्सी ड्राइवर की आय महज 250 रुपये है। ऊंचे वेतन होने से अमेरिकी उद्योग ग्लोबल होड़ में टिक नहीं पा रहे। इसका साफ संकेत कॉल सेन्टर से मिलता है। अमेरिकी कंपनियों के लिए अमेरिकी श्रमिक से इस सेवा को लेना महंगा पड़ता है, जबकि भारतीय श्रमिक से सस्ता। इसलिए अमेरिका के कॉल सेन्टर बंद हो रहे हैं और भारत में खुल रहे हैं। मतलब यह हुआ कि अमेरिका में होड़ की क्षमता का टूटना और भारत में इस क्षमता का सृजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए अमेरिकी मंदी का गहराना हमारे लिए शुभ होगा। वहां से रोजगार का पलायन तेजी से भारत की ओर होगा। हां, हमें बांग्लादेश और वियतनाम से होड़ करनी होगी। फिर भी हम पर असर सकारात्मक ही पड़ेगा।

अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का कारण तकनीकी विकास में ठहराव भी है। पिछले सौ बरसों के प्रमुख आविष्कार अमेरिका में ही हुए। लेकिन पिछले दस बरसों से इस सिलसिले में ठहराव सा आ गया है। इस क्षेत्र में भी भारत का सूरज उगता दिखता है। मसलन नैनो बनाकर भारत ने ग्लोबल ऑटो इंडस्ट्री के सामने नई चुनौती पेश की है।

अमेरिकी मंदी का दूसरा कारण तेल के बढ़ते दाम हैं। कार को अमेरिकी कल्चर का प्रतीक कहा जा सकता है। वीकएंड पर पूरा देश कार में बैठकर सैर को निकल पड़ता है। बड़ी कारों का भी उन्हें शौक है। इसलिए अमेरिका पर तेल के बढ़ते मूल्यों का गहरा असर पड़ना ही है। भारत पर यह असर आंशिक रूप से ही पड़ेगा, क्योंकि कार की संस्कृति अभी हम पर पूरी तरह से हावी नहीं हुई है। इसके अलावा तेल की ऊंची कीमत अदा करने से हुए नुकसान की कुछ भरपाई भारत को हो जाएगी। तेल से पश्चिम एशिया, रूस और वेनेजुएला को भारी आय हो रही है। ये देश अपने विकास के लिए बड़े प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं।। इन प्रोजेक्ट के लिए भारत से श्रमिकों और माल की मांग बढ़ रही है। इस तरह तेल पर खर्च हुआ कुछ पैसा वापस भी लौट रहा है।

तेल उत्पादक देशों के सामने समस्या है कि अपनी कमाई का निवेश कहां करें। अतीत में यह निवेश अमेरिका में किया जा रहा था। सत्तर और अस्सी के दशक में तेल के दाम उछले थे और तेल उत्पादक देशों को भारी आय हुई थी। इस आय के बड़े हिस्से का निवेश उन्होंने अमेरिका में किया था। सऊदी अरब के राजकुमारों ने मैनहटन में प्रॉपर्टी खरीदी। इस रकम को पेट्रो डॉलर कहा गया था।

अमेरिका द्वारा तेल के लिए अदा की गई रकम घूमकर वापस आ गई। लेकिन अब यह सूचक्र टूट गया है। अमेरिकी डॉलर टूटने से सऊदी राजकुमारों के लिए अमेरिका में पेट्रो डॉलर का निवेश फायदेमंद नहीं रह गया है। यानी समस्या तेल की ऊंची कीमत से नहीं बल्कि डॉलर के टूटने से पैदा हुई है। भारत की स्थिति बिल्कुल उलट है। रुपया चढ़ रहा है। सऊदी राजकुमारों के लिए नरीमन पॉइंट का आकर्षण बढ़ रहा है। इसलिए पेट्रो डॉलर का बहाव भारत की तरफ आने की पूरी गुंजाइश है। तेल के बुरे असर की कुछ भरपाई इस प्रवाह से हो जाएगी। यानी हम उस बीमारी से पीड़ित नहीं हैं, जिससे अमेरिका है।

अमेरिकी मंदी की तीसरी वजह हाउसिंग बुलबुले का फूटना है। दरअसल अमेरिका में मंदी ने 2002 में डॉटकॉम बुलबुले के फूटने के साथ ही पैर पसार लिए थे, लेकिन उस समय यह दिखी नहीं थी। अमेरिकी केन्द्रीय बैंक के प्रमुख एलन ग्रीनस्पैन ने हालत को भांप लिया। मंदी से निजात दिलाने के लिए उन्होंने हाउसिंग लोन सस्ते कर दिए, जबकि सरकारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर बढ़ा दी। हाउसिंग लोन सस्ता होने से अमेरिकी नागरिकों ने मकान खरीदे। इससे हाउसिंग सेक्टर में सीमेंट, स्टील और ग्लास आदि की मांग पैदा हुई। साथ ही सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर ऊंची होने से पूंजी का प्रवाह अमेरिका की तरफ बना रहा। ग्रीनस्पैन ने चार्वाक की 'कर्ज लेकर घी पीओ' की नीति अपनाई। जब तक कर्ज मिलता रहा, पार्टी चलती रही। लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती? जल्द ही निवेशकों को समझ आने लग गया कि अमेरिकी इकॉनमी अंदर से खोखली होती जा रही है। उन्हें दिखने लगा कि डॉलर टूटेगा। उन्होंने अमेरिकी टेजरी बॉन्ड खरीदने से हाथ खींच लिया। अमेरिका को आसान पूंजी मिलना बन्द हो गया और हाउसिंग बबल फूट गया। साथ ही अमेरिका की होड़ लेने की क्षमता घटने से नागरिकों के रोजगार संकट में पड़ गए। वे हाउसिंग लोन की अदायगी नहीं कर सके। मतलब यह है कि अमेरिका का हाउसिंग संकट उसकी गलत नीतियों की देन है। इसका भारत से कुछ भी लेना-देना नहीं।

अमेरिकी मंदी का चौथा कारण कंस्यूमर में भरोसे की कमी है। आज अमेरिकी उपभोक्ता उसी तरह मायूस है जैसे लॉटरी खेलने वाला न जीतने पर हो जाता है। इसके उलट भारत में शॉपिंग मॉल्स का फैलता कल्चर बताता है कि कंस्यूमर के हौसले बुलंद हैं।

मेरी समझ अमेरिकी मंदी के चारों कारण भारत पर लागू नहीं होते। हमारे निर्यातकों को परेशानी होगी और शेयर बाजार भी कुछ टूटेगा। लेकिन भारतीय इकॉनमी की बुनियाद मजबूत ही बनी रहेगी। हमें इन तात्कालिक समस्याओं से विचलित नहीं होना चाहिए।

महंगाई नहीं रोक पाएगी सरकार

भरत झुनझुनवाला

इस वक्त महंगाई का जो आलम है, उसकी पहली वजह यह है कि खाद्य पदार्थों का भारी मात्रा में उपयोग बायोडीजल बनाने के लिए हो रहा है, खास तौर से अमेरिका में मक्के और ब्राजील में गन्ने का। दुनिया के खाद्य उत्पादन में से यह मात्रा निकल जाने के कारण दूसरे खाद्य पदार्थों पर दबाव पड़ रहा है। महंगाई की दूसरी वजह भारत और चीन में तेज आर्थिक विकास है। ये देश बुनियादी ढांचे में भारी मात्रा में निवेश कर रहे हैं। जिससे स्टील आदि की मांग और दाम बढ़ रहे हैं। पिछले दिनों तेल के दाम में हुई भारी बढ़ोतरी भी इसी क्रम में है। भारत में बायोडीजल के उत्पादन के लिए खाद्यान्नों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। लेकिन विश्व स्तर पर ऐसे उपयोग का असर हम पर पड़ रहा है।

सामान्य हालात में अमेरिकी इकॉनमी में गहराती मंदी को महंगाई रोकने में मददगार होना चाहिए था। अगर चीन में तेजी के कारण स्टील की मांग ज्यादा है तो अमेरिका में मंदी के कारण मांग कम है। लेकिन अमेरिकी मंदी के बावजूद स्टील और गेहूं के वैश्विक मूल्यों के बढ़ने से पता लगता है कि अमेरिकी मांग में हो रही कटौती की तुलना में भारत और चीन में मांग में बढ़ोतरी ज्यादा हो रही है। यह इस बात का सबूत है कि भारत-चीन तथा अमेरिका की इकॉनमी में अलगाव हो चुका है।

इसके अलावा चीजों की भी भिन्नता है। अमेरिकी मांग में कपड़े, खिलौने, कार आदि का हिस्सा ज्यादा था। अमेरिका के मंद पड़ने से इन माल के दाम घट रहे हैं। खबर है कि भारतीय कपड़ा मिलों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उनके ऑर्डर कैंसल हो रहे हैं और गारर्मेन्ट्स के दाम घट रहे हैं। लेकिन भारत के बाजार में इन वस्तुओं का महत्व कम है इसलिए इस मूल्य कटौती का असर नहीं दिख रहा है। हमारी इकॉनमी में स्टील, सीमेंट और दूसरे कन्स्ट्रक्शन मटीरियल का हिस्सा ज्यादा है। इनके दाम बढ़ रहे हैं।

लेकिन शेयर बाजारों में पिछले दो माह में आई गिरावट इस अलगाव पर सवालिया निशान खड़ा करती है। अमेरिकी मंदी के गहराने के साथ-साथ भारत के शेयर बाजार टूट रहे हैं। मेंरा मानना है कि यह अल्पकालीन असर है। अमेरिकी संकट के हमारे शेयर बाजार पर दो असर पड़ते हैं। तत्काल हमारे यहां बिकवाली होती है। अमेरिकी बैकों को अमेरिका में हुए घाटे की भरपाई के लिए यहां पर अपनी होल्डिंग की बिक्री करनी पड़ रही है। लेकिन दूसरा असर उल्टी दिशा में होता है। दुनिया के निवेशकों को सदा निवेश के अवसरों की खोज रहती है। मसलन सऊदी अरब के राजघराने को तेल के ऊंचे दामों से भारी फायदा हो रहा है।

पहले वह इस आय के बड़े हिस्से का निवेश अमेरिका में कर रहा था, लेकिन अब वहां निवेश करना आकर्षक नहीं रह गया है। अमेरिका में मंदी के गहराने के साथ अमेरिकी डॉलर का मूल्य गिर रहा है जिससे निवेशकों को भारी घाटा लगता है। लिहाजा दुनिया के तमाम निवेशकों को खोज है ऐसी मुद्रा की जिसके मूल्य में बढ़ोतरी होने की गुंजाइश हो। हमारा रुपया ऐसी स्थिति में है। इसलिए दुनिया भर के निवेशकों का रुख भारत की तरफ हो रहा है। पिछले चार माह में सीधा विदेशी निवेश रेकॉर्ड 10 अरब डॉलर के स्तर पर रहा है, जो कि इस प्रवाह का संकेत देता है। इस प्रवाह से भारत और चीन में महंगाई की दर भी बढ़ रही है। इसलिए अमेरिकी मंदी का महंगाई पर असर नहीं दिख रहा।

इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार द्वारा महंगाई पर नियंत्रण करने की कोशिशों का मूल्यांकन करना चाहिए। सरकार ने कई वस्तुओं पर आयात शुल्क घटा दिया है, जैसे स्टील और खाद्य तेल पर। दूसरी वस्तुओं के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, जैसे चावल। यह कदम सही दिशा में होने के बावजूद ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है। मूल समस्या विश्व बाजार में स्टील और सीमेंट की ज्यादा मांग होने से इनके वैश्विक मूल्यों में तेजी है। जब रूस, हांगकांग और दुबई में स्टील का दाम बढ़ रहा है तो इस पर आयात कर घटाने से मामूली अंतर ही पड़ेगा। इसके अलावा आयात शुल्क शून्य कर देने के बाद यह नुस्खा फेल हो जाता है। यही स्थिति चावल के निर्यात पर पाबंदी की है।

मान लिया कि पाबंदी लगाने से चावल के बाहरी मूल्यों से हमारा बाजार प्रभावित नहीं होगा। लेकिन हम दूसरे खाद्य पदार्थों का आयात कर रहे हैं जैसे गेहूं का। गेहूं का वैश्विक मूल्य बढ़ने से गेहूं के घरेलू मूल्य बढ़ेंगे और सहानुभूति में चावल के दाम भी बढ़ जाएंगे। आयातित पाम ऑयल के महंगा होने के कारण घरेलू मूंगफली और नारियल के तेल भी महंगे हो जाएंगे। सरकार द्वारा दूसरा कदम कैश रिजर्व रेशो को बढ़ाना है। इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए रकम कम बचेगी। कर्ज कम मिलने से फैक्ट्रियां कम लगेंगी और स्टील तथा सीमेंट की मांग कम होगी। यह कदम सही दिशा में होते हुए भी बेअसर होगा, क्योंकि मांग में बढ़ोतरी के दूसरे दरवाजे खुले हैं।

सरकार को दूसरी स्ट्रैटिजी अपनानी चाहिए। महंगाई का मूल कारण विदेशी निवेश का भारी मात्रा में आगमन है। सीधे इस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। जब विदेशी पूंजी कम आएगी तो महंगाई अपने आप काबू में आएगी। खाद्य पदार्थों का मामला ज्यादा पेचीदा है। गेहूं, चावल और तेल के दाम बढ़ने से हमारे किसान फायदे में रहते हैं। इनकी मूल्य बढ़ोतरी से किसानों को आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की भी प्रेरणा मिलती है। खाद्य पदार्थों के मूल्य पिछले 20 बरसों में औद्योगिक माल की तुलना में कम ही बढ़े हैं।

इनमें मूल्य बढ़ोतरी देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी हितकारी है। इसलिए खाद्य पदार्थों की मूल्य बढ़ोतरी रोकने के स्थान पर आम आदमी को महंगे खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए सक्षम बनाना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि श्रम की मांग बढ़े और श्रमिक की दिहाड़ी वर्तमान 120 रुपये से बढ़कर 200 रुपये हो जाए। तब गरीब के लिए महंगे खाद्यान्न खरीदना मुमकिन होगा। खाद्य सुरक्षा हासिल होगी, किसान खुशहाल होगा और गरीब भी महंगाई की मार से बच जाएगा।

Friday, May 30, 2008

मुद्रा स्फीति (en:inflation)

मुद्रा स्फीति (en:inflation) एक गणितीय युक्ति (तरकीब) है जिससे बाज़ार में मुद्रा का फैलाव व चीजों की कीमतों में वृद्धि को नापा जाता है। उदाहरण के लिएः 1990 में एक सौ रुपए में जितना सामान आता था, अगर 2000 में उसे ख़रीदने के लिए दो सौ रुपए की ज़रूरत पड़ती है तो ये कहा जाएगा कि मुद्रा स्फीति में शत-प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

चीज़ों की क़ीमतों में बढ़ोतरी और मुद्रा की क़ीमत में कमी को वैज्ञानिक ढंग से सूचीबद्ध करना मुद्रा स्फीति का काम होता है। इससे ब्याज दरें भी तय होती हैं।

मुद्रा स्फीति समस्त अर्थशास्त्रीय शब्दों में संभवतः सर्वाधिक लोकप्रिय है। किंतु इसे पारिभाषित करना एक कठिन कार्य है। विभिन्न विद्वानों ने इसकी भिन्न-भिन्न परीभाषा दी है :
बहुत कम माल के लिए बहुत अधिक धन की आपूर्ति हो जाने से इसका जन्म हो जाता है
माल या सेवा की आपूर्ति की तुलना में मांग अधिक हो जाने पर भी इसका जन्म ही जाता हैं
आपूर्ति में दोष, गत्यावरोध तथा ढांचागत असंतुलन के चलते भी मुद्रा स्फीति पनपती हैं

सामान्य रूप से इसका अर्थ ये होगा की ये बिना रुके बढ़ती दर से किसी दिए गए काल खंड में मूल्य स्तर की वृद्धि हैं जो भविष्य में और अधिक वृद्धि की संभावना को बढ़ाती है।अनुक्रम [छुपाएँ]
१ मुद्रा स्फीति के कारण
१.१ मांग कारक
१.२ मूल्य वृद्धि कारक
२ मुद्रा स्फीति के प्रभाव

मुद्रा स्फीति के कारण

कारणात्मक रूप से मुद्रा स्फीति के कई कारण हो सकते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागो में बाँट सकते हैं:
मांग कारक (demand pull)
मूल्य वृद्धि कारक (cost push)

मांग कारक माल सेवा की मांग में वृद्धि से पैदा होते हैं जबकि मूल्य वृद्धि कारक स्पष्टतः मूल्य वृद्धि अथवा माल सेवा की आपूर्ति में कमी से उत्पन्न होते हैं।

मांग कारक
बढ़ता सरकारी व्यय - जो की विगत कई सालों से बढ़ रहा हो जिस से सामान्य जनता के हाथों में अधिक धन आ जाता हैं जो उनकी खरीद क्षमता को बढाता है। यह मुख्य रूप से गैर योजना व्यय (Unplanned expenditure) है जो की अनुत्पादक प्रकृति का होता है तथा केवल क्रय क्षमता में तथा मांग में वृद्धि करता है।
घाटे की पूर्ति तथा मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि से बढ़ते सरकारी व्यय की पूर्ति, घाटे के बजट (Deficit Budget) से तथा नई मुद्रा छाप कर की जाती हैं जो मुद्रा स्फीति तथा आपूर्ति दोनों में वृद्धि कर देते हैं।
काला धन मांग उपभोग में अदृश्य रूप से वृद्धि करता है।
बढ़ती जनसंख्या भी मांग तथा मूल्य में वृद्धि करती है।

मूल्य वृद्धि कारक
उत्पादन-आपूर्ति में उतार चढ़ाव: जब कभी उत्पादन में अत्याधिक उतार चढ़ाव आता हैं या प्राप्त उत्पादन को मुनाफाखोर जमा कर लेते हैं।
उत्पादकता से अधिक वेतन वृद्धि लागत मूल्य को बढ़ाते हैं जो नतीजतन मूल्य में वृद्धि कर देते हैं, साथ ही मांग तथा क्रय क्षमता में भी वृद्धि होती हैं जो पहले वाले शीर्षक के अंतर्गत वृद्धि कर देती हैं।
अप्रत्यक्ष कर भी लागत मूल्य बढ़ा कर सामग्री के मूल्य में वृद्धि के कारक बनते हैं।
ढांचागत विकास में कमी या दोष से प्रति इकाई लागत मूल्य बढ़ता हैं जो कि सामान्य कीमत में वृद्धि कर देता हैं।
प्रशासित मूल्य में वृद्धि जैसे खाद्यान्न के न्यूनतम समर्थन मूल्य या पेट्रोल तथा अन्य उत्पादों के मूल्य जिन्हें सरकार स्वेच्छा से निर्धारित करती हैं क्योंकि वे आम आदमी के बजट का एक बड़ा भाग होते हैं।
आयात मूल्य में वृद्धि घरेलू मूल्य में वृद्धि कर देती हैं जिसे आयात मूल्य वृद्धि मुद्रा स्फीति कहते हैं।
किसी भी समय मुद्रा स्फीति उपरोक्त दोनों प्रकार के कारकों के मिलेजुले प्रभाव से पैदा होती है।
मुद्रा स्फीति के प्रभाव
उत्पादन में अनिश्चितता के परिणामस्वरूप उत्पाद की माँग अनिश्चित हो जाती है व संसाधनों का वितरण असंगत हो जाता है। पूँजी संसाधन दीर्घ कालीन रुप में नहीं वरन् लघु कालीन प्रयोग में आने लगते हैं तथा उत्पादकों का झुकाव ज़रूरी से गैर जरूरी उत्पाद की ओर हो जाता है क्योंकि गैर ज़रूरी उत्पाद की कीमत बढ़ जाने पर उनमें निवेश लाभप्रद हो जाता है।
मुद्रा स्फीती से अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में मंदी आ जाती है जैसे भारत में कपड़ा उत्पाद मूल्य बढ़ जाने पर इन उत्पादों की मांग में गिरावट आ जाती है, लोग केवल बेहद ज़रूरी माल ही खरीदते हैं। इससे उद्योग ठप्प पड़ जाते हैं।
देश में आयवितरण गड़बड़ा जाता है। मुनाफाखोरों को लाभ होने लगता है और नौकरीपेशा संकट में पड़ जाते हैं। भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और सट्टेबाजी बढ़ती है। कठोर श्रम की इच्छा शक्ति में भी कमी आ जाती है।
भारत में मुद्रा स्फीती का नापन थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) तथा औद्योगिक श्रमिक हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (en:Consumer_Price_Index Consumer Price Index) से होता है।

Monday, May 26, 2008

बिहार का भारत के प्राचीन परम्परा से लेकर आजतक का योगदान

क्या कभी आपने सोचा है कि बेरोजगारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, सुखार और लोगों का जत्थे से जत्थे में हो रहे पलायन, इत्यादि समस्यायों से घिरे राज्य बिहार का भारत के प्राचीन परम्परा से लेकर आजतक क्या योगदान रहा है। जनक, जरासंध, कर्ण, सीता, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, मनु, याज्ञबल्कय, मण्डन मिश्र, भारती, मैत्रेयी, कात्यानी, अशोक, बिन्कुसार, बिम्बिसार, से लेकर बाबू कुंवर सिंह, बिरसा मुण्डा, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, रामधारी दिन्कर, नार्गाजून और न जाने कितने महान एवं तेजस्वी पुत्र एवं पुत्रियों को अपने मिट्टी में जन्म देकर भारत को वि के सांस्कृतिक पटल पर अग्रणी बनाने में बिहार का सर्वाधिक स्थान रहा है।
सांस्कृतिक भौगोलिक क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए इस प्रदेश को निम्नलिखित पॉकेटों मे रखकर समझा जा सकता है :

(क) मगध

(ख) मिथिला एवं वैसाली

(ग) अंग

(ध) भोजपुर

सत्य की खोज करते एवं सच्चे ज्ञान की आकांक्षा में भटकते सिद्धार्थ को कोइ भी ज्ञान-वान बनाने में समर्थ न हो सका परन्तु गया के नजदिक एक बृक्ष के नीचे जब एक अनपढ़ भीलनी ने यह गीत गाया :

बीणा के तार को इतना मत खींचो

कि तार ही टूट जाये,

बीणा के तार को इतना ढीला भी न छोड़ो

कि आबाज ही न निकले

एकाएक वे समझ गये कि मध्यम-मार्ग ही सही मार्ग है। और उसी दिन से सिद्धार्थ गौतम बुद्ध हो गये। अब जरा एक-एक सांस्कृतिक क्षेत्र को समझने का प्रयास करें।

(क) मगध

मगध का भारतीय संस्कृति के निर्माण में जो योगदान है, उसे कौन भुला सकता है?

वैदिक साहित्य के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में बिहार तीन भागों में विभाजित था - मगध, अंग और विदेह (या मिथिला)।

वैदिक साहित्य के प्राचीन अंग ॠगवेद सारिता में कीटक नाम से जिस प्रदेश की निन्दित चर्चा मिलती है, उसका बहुत कुछ संकेत मगध से ही माना जाता है। बहुत संभव है, उस समय तक यह प्रदेश आर्येतर जातियां का निवास स्थान रहा हो और मध्य एशिया से आगत आर्य जाति की सभ्यता का आलोक वहाँ न पहुँचा हो। मगध में व्यवस्थित रुप से राज्य की स्थापना का उल्लेख वाल्मीकिरामायण के 32 वें अध्याय में मिलता है। इस राज्य के प्रथम संस्थापक आर्यवसु थे। जिनके बाद चन्द्रगुप्त और महान अशोक जैसे सम्राटों की समृद्ध परम्परा में यह शासित होता रहा । सभ्यता और सांस्कृतिक गरिमा की दृष्टि से भारतीय इतिहास में मग्ध का अत्यधिक महत्त्व रहा है।

छठी शताब्दी ई. पूर्व में मगध राज्य वर्तमान पटना एवं गया जिलों में के स्थान पर स्थित था । मगध की राजधानी गिरिव्रज थी जो अपने वैभव के लिए प्रसिद्ध थी। मगध में सर्वप्रथम राजवंश की स्थापना व्रहद्रथ ने की थी। कालान्तर में वह अत्यन्त शक्तिशाली राज्य बना था तथा समीपवर्ती समस्त राज्यों पर मगध का अधिकार हो गया।

महात्त्मा बुद्ध के समकालीन मगध के शासक क्रमशः विम्बिसार एवं उसका पुत्र अजातशत्रु थे। महात्त्मा बुद्ध के समय में चार प्रमुख राजतन्त्रः मगध, कौशल, वत्स और अवन्ति थे। उल्लेखनीय है कि इन चारों राजतन्त्रों में से मगध-साम्राज्य का ही विकास हो सका, क्योंकि वीर, प्रतापी एवं योग्य शासकों के अतिरिक्त मगध के एक साम्राजवादी शक्ति के रुप में उभरने में अनेक परिस्थितियों ने भी सहायता की।

मगध पर शासन करने वाला प्राचीनतम ज्ञात राजवंश वृहद्रथ-वंश है। महाभारत व पुराणों से ज्ञात होता है कि प्राग्-ऐतिहासिक काल में चेदिराज वसु के पुत्र बृहदर्थ ने गिरिव्रज को राजधानी बनाकर मगध में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया था। दक्षिणी बिहार के गया और पटना जनपदों के स्थान पर तत्कालीनमगध - साम्राज्य था । इसके उत्तर में गंगानदी, पश्चिम में सोननदी, पूर्व में चम्पा नदी तथा दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वतमाला थी। बृहद्रथ के द्वारा स्थापित राजवंश को बृहद्रथ-वंश कहा गया। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक था, जो बृहद्रथ का पुत्र था। जरासंध अत्यन्त पराक्रमी एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण से ज्ञात होता है कि उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांन्धार के राजाओं को परास्त किया। इसी कारण पुराणों में जरासंध को महाबाहु, महाबली और देवेन्द्र के समान तेज वाला कहा गया है। बृहद्रथवंश का अन्तिम शासक रिपुंजय था, जिसकी हत्या उसके मन्त्री पुलिक ने कर दी तथा अपने पुत्र बालक को मगध का शासक नियुक्त किया। इस प्रकार बृहद्रथवंश का पतन हो गया। कुछ समय पश्चात् महिय नामक एक सामन्त ने बालक की हत्या करके अपने पुत्र बिम्बिसार (544-492 ई.पू.) को मगध की राजगद्दी पर बैठाया।


वास्तविक अर्थों में मगध साम्राज्य का उत्कर्ष बिम्बिसार के समय ही प्रारम्भ हुआ। बिम्बिसार हर्यक-कुल का शासक था। उसने एक ओर वैवाहिक-सम्बन्ध के द्वारा काशी को और दूसरी ओर विजय द्वारा अंग को मगध में विलीन कर, मगध को साम्राज्य निर्माण के पथ पर अग्रसर कर दिया।

बिम्बिसार के विशाल साम्राज्य की राजधानी गिरिव्रज थी। ह्मवेनसांग के अनुसार गिरिव्रज में बहुधा अग्निकाण्ड की घटनाएं होती रहती थीं, अतः बिम्बिसार ने एक नवीन नगर की स्थापना की जिसे राजगृह कहा गया। हलांकि, पार्टयान राजगृह की स्थापना का श्रेय अजातशत्रु को देता है।

राज्य की सम्पूर्ण शक्ति स्वयं में निहित होने के पश्चात् भी बिम्बिसार निरंकुश शासक नहीं था। राजकीय समस्याओं का निराकरण वह प्रमुख अधिकारियों के अतिरिक्त गांव के प्रमुखों (ग्रामिकों) की सलाह लेने के पश्चात् ही करता था।

बिम्बिसार के पश्चात् उसका पुत्र अजातशत्रु ( 492 ई० पूर्व - 462 ई० पूर्व ) मगध के राजसिंहासन पर आसीन हुआ। वह बड़ा ही सशक्त शासक प्रमाणित हुआ। अजातशत्रु का शासन हर्यक वंश का चरमोत्कर्ष काल था । उसने कोशल, वैशाली, अवन्ति राज्यों को वहाँ के राजा को पराजित कर मगध साम्राज्य में मिला। 462 ई० पूर्व में अजातशत्रु की मृत्यु हो गयी।

अजातशत्रु के पश्चात् उसका पुत्र उदयन राजगद्दी पर बैठा। उदयन ने मगध राज्य के केन्द्र में स्थित पाटलिगांव में नई राजधानी का निर्माण कराया जो पुष्पपुर अथवा पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) के नाम से प्रसिद्ध हुई। उदयन षड़यन्त्र के द्वारा मारा गया। उदयन के उतराधिकारी अयोग्य एवं दुर्बल शासक थे। इनके शासन से जनता त्रस्त थी, अतः जनता ने क्रोधवश पूरे राजपरिवार को निष्कासित कर नागदशक के योग्य आमात्य शिशुनाग को मगध के सिहांसन पर आरुढ़ किया।

इस प्रकार मगध में हर्यक कुल का पतन हो गया तथा शिशुनाग-वंश ( 414 ई० पूर्व - 346 ई० पूर्व ) की स्थापना हुई।

शिशुनाग के राज्यकाल में मगध-साम्राज्य अत्यन्त विशाल हो गया। शिशुनाग के पश्चात् उसका पुत्र कालोशोक ( 396 ई० पूर्व - 368 ई० पूर्व ) अथवा काकवर्ण शासक बना। कालाशोक के पश्चात् उसके दस पूत्रों - भद्रसेन, कोरण्डवर्ण, मुंगर, सवर्ंजट, जालिक, उभक, संजय, नन्दिवर्धन तथा पंचमक - ने 22 वर्षों तक शासन किया तत्पश्चात् महापद्म ने शिशुनाग वंश को समाप्त कर मगध में नन्द-वंश की सथापना की।

मगध में नन्द-वंश की सथापना से एक नवीन युग का आर्विभाव हुआ। इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य को लांघ गईं। उसी समय से भारतीय इतिहास में क्षत्रिय रक्त पर अभिमान करने वाले राजवंशों की अखण्ड परम्परा का अन्त हो गया क्योंकि नन्दवंशीय शासक उच्च कुल के न थे।

महापद्म अत्यन्त शक्तिशाली शासक था। अपनी शक्ति के द्वारा ही उसने मगध-साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। पुराणें के अनुसार वह ‘अनुल्लंघित’ शासन वाला था, जिसने दिग्विज्य से एकछत्र राज्य की स्थापना की थी। उसने अनेक क्षत्रिय राजवंशों का उन्मूलन किया था। इसी कारण उसे ‘अखिलक्षत्रान्तकारी’ और ‘क्षत्रविनाशकृता’ कहा गया। उसके आठ पुत्र थे। इस प्रकार नौ नन्द राजाओं का उल्लेख बौद्ध साहित्य में मिलता है जिनके नाम इस प्रकार हैं - उग्रसेन (महापद्म नन्द), पण्डुक, पण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपात, गौविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त और धननन्द। महापद्म के इन आठों पुत्रों ने 322 ई० पूर्व तक राज्य किया। इनमें नन्द-वंश का अन्तिम शासक धननन्द सबसे प्रतापी सिद्ध हुआ।

सिकन्दर लौटने के पश्चात मगध की स्थिति चरमरा गई। उसी समय चन्द्रगुप्त मौर्य ( 322 ई० पूर्व ) का आविर्भाव हुआ। भारत के राजनीतिक व्योम पर चन्द्रगुप्त मौर्य के रुप में एक उदीयमान प्रकाशपूर्ण नक्षत्र का उदय हुआ जिसने भारतीयों का नेता व राजा बनकर उत्तर - पश्चिमी भारत से सिकन्दर के युनानी सैनिक - गढ़ों और पवन - क्षत्रयों को नष्ट-भ्रष्ट कर भारत के उस भू-भाग को वैदेशिक परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त किया तथा ‘अधार्मिक’ नन्द-वंश के राजा को उन्मूलित कर मगध में अपने नए राजवंश की प्रतिस्थापना की, जो भारतिय इतिहास में मौर्य-वंश ( 322 ई० पूर्व - 184 ई० पूर्व ) के नाम से सुविख्यात है। मौर्यों का आगमन इतिहासकारों के लिए अन्धकार से प्रकाश की ओर का मार्ग प्रशस्त करता है, कालक्रम की सहसा निश्चित एवं स्पष्ट होने लगता है तथा भारत के छोटे-छोटे टुकड़ों को मिलाकर एक विशाल साम्राज्य का उदय होता है।

चन्द्रगुप्त मौर्य एक कुशल सेनानायक व वीर योद्धा था। चन्द्रगुप्त और चाणक्य दोनों का ही प्रमुख उद्देश्य नन्द-वंश का विनाश कर मगध के राजसिंहासन पर अधिकार करना था। उसने अपने 24 वर्ष के शासनकाल में जितनी सफलताएं प्राप्त की उतनी उपलब्धियां इतने अल्पकाल में किसी अन्य भारतीय शासक ने प्राप्त नहीं की। वह ऐसा प्रथम व्यक्ति था जिसने न केवल यूनानी व वैदेशिक आक्रमणों को विफल किया वरन् भारत के बड़े भू-भाग को युनानी अधिपतय से मुक्त कराया। चन्द्रगुप्त ने सर्वप्रथम भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की। हेमचन्द्र राय चौधरी ने लिखा है : ‘चन्द्रगुप्त की राजनैतिक और सैनिक सफलताएं काफी उदान्त हैं, पर इनसे उसकी सफलताओ की इतिश्री नहीं हो जाती है। इस महायोद्धा ने एक ओर जहाँ एक कुख्यात राजवंश के शासन से देश के एक भाग को मुक्त किया वहीं दूसरी ओर देश के दूसरे भू-भाग को विदेशी दासता से मुक्त कराया। वह एक ऐसे साम्राज्य का निर्माता था जिसमें सम्पूर्ण भारत तो नहीं उसका अधिकांश भाग आ गया था। वह युद्ध में जितना स्फूर्तिवान था, शान्ति की कला में भी उतना ही कर्मठ था। वह भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट है।

चन्द्रगुप्त के पश्चात् 298 ई० पूर्व में उसका पुत्र बिन्दुसार ( 298 ई० पूर्व - 273 ई० पूर्व ) मगध के राजसिहांसन पर आसीन हुआ।

जैन-ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि बिन्दुसारके माता का नाम दुर्धरा था। परिशिष्टपर्वन ्नामक ग्रन्थ उसके जन्म के विष्य में एक रोचक प्रसंग आया है। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को विष का अभ्यास डालने के उद्देश्य से उसको भोजन में अल्पमात्रा में विष देना आरम्भ किया था। इसका उद्देश्य यह था कि यदि कोई शत्रु विष अथवा विषकन्या द्वारा चन्द्रगुप्त की हत्या करना चाहे तो वह सफल न हो सके। एक दिन चन्द्रगुप्त की पत्नी दुर्धरा ने भी चन्द्रगुप्त के साथ भोजन किया, किन्तु विष के प्रभाव से उसकी मृत्यु हो गई। उस समय रानी दुर्धरा गर्भवती थी। चाणक्य ने शीध्र ही उसके उदर को चिरवाकर बच्चे को निकलवा दिया। इस बालक के मस्तक पर विष की एक बूंद लगी थी, अतः उसका नाम बिन्दुसार रक्खा गया।

बिन्दुसार एक शक्तिशाली एवं योग्य शासक था उसके शासनकाल में मौर्य - साम्राज्य ने अत्यधिक उन्नति की। उसे प्रौढ़, धृष्ट, प्रगल्भ, प्रियवादी व संवृन्त कहा गया है। बिन्दुसार की मृत्यु 273 ई० पूर्व में हुई।

बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अशोक ( 269 ई० पूर्व - 232 ई० पूर्व ) शासक बना। अशोक का शासनकाल भारतीय इतिहास का अत्यन्त गौरवमयी काल था क्योंकि उस समय में अशोक ने अपनी असाधारण क्षमताओंसे भारत को सर्वोन्मुखी उन्नति प्रदान की। यही कारण है कि अशोक को न केवल भारत के वरन् विश्व के महानतम शासकों में से एक माना जाता है। साम्राज्य विस्तार, प्रशासनिक व्व्यवस्था, धर्म-संरक्षण, हृदय की उदारता, कला के विकास एवं प्रजा-वत्सलता, आदि प्रत्येक दृष्टिकोण से अशोक का स्थान सर्वोच्च है। उसने अपने सुविशाल साम्राज्यके प्रशासन को पूर्ण बनाने तथा अपनी प्रजा को सुखी बनाने के लिये जो बिड़ा उठाया था, इसके लिए वह कोई कोशिश बाकी नहीं छोड़ी।

अशोक ने कलिंग पर आक्रमण 261 ई० पूर्व किया। कलिंग के निवासियों ने अत्यन्त वीरतापूर्वक मौर्य-सेना का सामना किया। अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए वहाँ की स्रियों व पुरुषों ने प्राणों की बाजी लगा दी। अतः यह युद्ध अत्यधिक रक्तरंजित हुआ। इस युद्ध का वर्णन अशोक के तेहरवें शिलालेख में मिलता है। इस अभिलेख के अनुसार, “राज्याभिषेक के आठ वर्ष पश्चात् देवताओं के प्रिय सम्राट प्रियदर्शी (अशोक) ने कलिंग पर विजय प्राप्त की। इस युद्ध मे 1,50,000 व्यक्ति व पशु बन्दी बनाकर कलिंग से लाए गए व 1,00,000 व्यक्ति युद्ध भूमि में मारेे गए तथा उनके कई गुणा अन्य कारणों से नष्ट हो गए। युद्ध के पश्चात् महामना सम्राट ने दया के धर्म की शरण ली, इस धर्म से अनुराग किया और इसका सम्पूर्ण साम्राज्य में प्रचार किया। इस विनाश की ताण्डव लीला ने, जो कि कलिंग राज्य को जीतने में हुआ, सम्राट के हृदय को द्रवित कर दिया व पश्चाताप से भर दिया।” यह इस प्रकार अशोक ने युद्ध की नीति सदैव के लिए त्याग दिया तथा दिग्विजय के स्थान पर ‘धम्म-विजय’ को अपनाया।

अशोक के मृत्यु के पश्चात् उसके किसी भी उत्तराधिकारी के उसके समान योग्य न होने के कारण, शीध्र ही मौर्य-साम्राज्य का पतन हो गया। अशोक के मृत्यु के बाद उसका पुत्र कुणाल शासक बना। कुणाल के पश्चात् दशरथ शासक बना। दशरथ के पश्चात् सम्प्रति, शालिशुक, देववर्मन व शतधनुष शासक हुए। उनके पश्चात् बृहद्रथ के सेनापति पुष्पमित्र शुंग ने उसकी दुर्बलता का लाभ उठाकर 184 ई० पूर्व में उसकी हत्या कर दी तथा राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार 184 ई० पूर्व में मौर्य-साम्राज्य का पतन हो गया।

36 वर्ष तक शासन करने पश्चात् 148 ई० पूर्व में पुष्पमित्र की मृत्यु हो गई, किन्तु इन 36 वर्षों में अनेक उपलब्धियां प्राप्त कर उसने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान अर्जित किया। पुष्पमित्र एक महान सेनानी, कुशल संगठनकर्त्ता तथा दूरदर्शी शासक था। वह एक वीर साम्राज्यवादी व योग्य शासक ही नहीं वरन् महान साहित्य एवं कलाप्रेमी भी था। पुश्पमित्र ने ब्राह्मणधर्म के विलुप्त हो रहे वैभव को पुनः गौरव के उच्च शिखर तक पहुँचाया तथा भारत में पुनः वैदिक संस्कृति को सशक्त बनाया। पुष्पमित्र ने वैदिक-धर्म को राजधर्म घोषित किया तथा पाली के स्थान पर संस्कृत को राजभाषाका रुप प्रदान किया। इस प्रोत्साहन के परिणामस्वरुप पातंजलि का महाभाष्य तथा मनु की मनुस्मृति की रचना हुई। इस प्रकार राजनैतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में उसने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की। पुष्पमित्र शुंग की मृत्यु 148 ई० पूर्व में हुई।

शुंग-वंश के शासकों ने 112 वर्ष तक राज्य किया।शुंग-वंश के शासकों में अग्निमित्र, वसुज्येष्ठ, तत्पश्चात् अग्निमित्र का पुत्र वसुमित्र शासक बना। वसुमित्र के पश्चात् क्रमशः आंध्रक, पुलिण्डक, घोष, वज्रमित्र, भाग तथा देवभूति ने शासन किया। देवभूति शुंग-वंश का अन्तिम शासक था। देवभूति की हत्या उसके मंत्री वासुदेव कण्व ने कर दी तथा कण्व-वंश की स्थापना की । इस प्रकार शुंग-वंश की समाप्ति 72 ई० पूर्व हुई।

कण्व-वंश में चार शासक वसुमित्र, भूमिमित्र, नारायण मित्र व सुशर्मा हुए जिन्होने क्रमश 9, 14, 12 व 10 वर्ष शासन किया। इस प्रकार कण्व-वंश ने कुल 45 वर्ष तक ( 72 ई० पूर्व - 27 ई० पूर्व ) शासन किया। कण्व-वंश के शासक भी ब्राह्मण थे, अतः उन्होने भी सम्भवतः ब्राह्मण- धर्म के पुरुत्थान के लिये प्रयतेन किया होगा।

27 ई० पूर्व में कण्व-वंश के पतन के पश्चात् सातवाहन-वंश का प्रादुर्भाव हुआ।

हर्ष की मृत्यु के पश्चात् उसके राज्य के विधटन में मगध की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। मगध में इस समय उत्तरवर्ती गुप्त शासक शासन कर रहे। हर्ष के शासन काल में मगध हर्ष के साम्राज्य का ही एक भाग था, जिसकी पुष्टि चीनी-साहित्य एवं बाणकृत हर्षचरित्र से होती है।

हर्ष की मृत्यु के बाद भारत में व्याप्त अराजकता से लाभ उठाते हुए मगध के तत्कालीन गुप्त शासक आदित्यसेन, जो अत्यन्त पराक्रमी एवं वीर था, ने उत्तरी भारत के विस्तृत भू-भाग पर अधिकार कर लिया।

कहा जाता है कि गुप्तवंश का भी मगध एवं पाटलिपुत्र से गहरा सम्बन्ध था। पुराणों में एक श्लोक मिलता है जिसके आधार पर कतिपय विद्वान गंगा-यमुना के दोआब तथा मध्यदेश को गुप्तों का मूल निवास-स्थान मानते हैं। श्लोक कुछ प्रकार है :

अनुगंगा प्रयागं च साकेतं मगधांस्तथा।

एतन् जनपदान् सर्वान् मोक्षन्ते गुप्त वंशजः ।।

अर्थात् गुप्त-वंश के लोग गंगा नदी के किनारे स्थित साकेत (कोसल), प्रयाग एवं मगध, आदि जनपदों का उपभोग करेंगे। पुराणों के अनुसार प्रारम्भिक गुप्त शासकों का उत्तर-प्रदेश व मगध पर एकाधिकार था। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तों का आदि निवास-स्थान पूर्वी उत्तर-प्रदेश व पश्चिमी मगध का कुछ भू-भाग था। गुप्त-वंश के संस्थापक का नाम “गुप्त” ही था। श्रीगुप्ते ने लगभग 275 ई० से 300 ई० तक राज्य किया।

श्री गुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र घटोत्कच ( 300-319 ई० ) शासक बना। घटोत्कच के पश्चात् उसका पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम शासक बना। चन्द्रगुप्त के समय की प्रमुख घटना अपने राज्यारोहन के समय उसके द्वारा एक नवीन सम्वत् की स्थापना करनी थी जो गुप्त-सम्वत् के नाम से जाना जाता है। चन्द्रगुप्त ने इस सम्नत् की स्थापना 319-20 ई० में की थी।

चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त (325 ई० - 375 ई०) शासक बना। समुद्रगुप्त भारत के महानतम सम्राटों में से एक था तथा वह अपनी उपल्बिधियों के कारण विश्व-इतिहास में अविस्मरणीय है। आर० सी० मजुमदार समुद्रगुप्त का जीक करते हुए कहते हैं : “उसके (समुद्रगुप्त) सिक्कों और अभिलेखों के अध्ययन से हमारे समक्ष एक ऐसे वज्रदेह शक्तिशाली सम्राट की मूर्ति आ खड़ी होती है जिसकी शारीरिक ओज के अनुरुप बौद्धिक एवं सांस्कृतिक सम्पन्नता ने उस नवयुग का सूत्रपात्र किया जिसमें आर्यावर्त ने, नवीन, राजनैतिक चेतना और राष्ट्रीय एकात्त्मता पांच सदियों के राजनीतिक विघटन और परकीय आधिप्तय के बाद, पुनः उपलब्ध की और नैतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और भौतिक समृद्धि की वह उच्चता अधिगत की जिसने इसे भारत का स्वर्णयुग बना दिया - ऐसा स्वर्णयुग जिसकी ओर अगणित भावी पीढियां मार्ग-दर्शन और प्रेरणा के लिए सदा देखने वाली थीं।

समुद्रगुप्त के मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र रामगुप्त शासक बना। रामगुप्त ने चार-पांच वर्ष तक शासन किया।

रामगुप्त के असामयिक निधन के बाद उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय ( 380 ई० - 412 ई० ) शासक बना। वह अपने महान पिता का महान पुत्र साबित हुआ। शासन और समर दोनों में चन्द्रगुप्त द्वितीय की ख्याति और कीर्ति उसके पिता समुद्रगुप्त की भांति ही सुप्रसिद्ध एवं सुचर्चित है। गुप्त सम्राटों में समुद्रगुप्त की तरह स्वभुज बल-विक्रम द्वारा समस्त शत्रुओं को उन्मूलित कर सर्वराजोच्छेता की उपाधि ग्रहण करने वाला वही दूसरा सम्राट हुआ है। चन्द्रगुप्त द्वितीय एक महान् विजेता, अतुल पराक्रमी, और धर्मनिष्ठ शासक था, यह निर्विवाद है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त (413 ई० - 455 ई०) सिंहासनारुढ़ हुआ। उसने साम्राज्य विस्तार की ओर ध्यान न देकर अपने शासनकाल के प्रारम्भ में साम्राज्य के साधनों का प्रयोग सार्वजनिक एवं धार्मिक कृत्यों में किया। कुमारगुप्त के साम्राज्य में चतुर्दिक सुख एवं शान्ति का वातावरण विद्यमान है

कुमारगुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका प्रतापी पुत्र स्कन्दगुप्त सिंहासनारुढ़ हुआ। स्कन्दगुप्त गुप्तवंश का अन्तिम प्रतापी शासक था। स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारी उसकी मृत्यु ( 465 ई० ) के पश्चात् एक शताब्दी तक भी शासन न कर सके व 500 ई० के लगभग शक्तिशाली गुप्त-साम्राज्य का अन्त हो गया।

गुप्त वंश के पतन के पश्चात् जिन कतिपय राजवंशों का प्रादुर्भाव हुआ, उसमें परवर्ती गुप्त-वंश भी था। गुप्तशासकों के पश्चात् शासन करने के कारण इसे उत्तरकालीन गुप्त-वंश तथा मगध में शासन करने के कारण इस वंश को मगध गुप्त-वंश के नाम से भी जाना जाता है। मगध ही इस वंश का मूल स्थान प्रतीत होता है। अभिलेखों में इस वंश के निम्नलिखित आठ शासकों के नाम उल्लेख है: (1 ) कृष्णगुप्त; (2 ) हर्षगुप्त; (3 ) जीवितगुप्त; (4 ) कुमारगुप्त; (5 ) दामोदरगुप्त; (6 ) महासेनगुप्त; (7 ) माधवगुप्त; (8 ) आदित्यसेन।

कन्नोज के राजा यशोधर्मा ने परवर्ती गुप्त-वंश के अन्तिम शासक जीवितगुप्त पर आक्रमण किया तथा उसे परास्त कर गुप्त-वंश का अन्त कर दिया। इस प्रकार शक्तिशाली परवर्ती गुप्त-राजवंश का आठवीं शताब्दी में पतन हो गया।

लोक विद्या के क्षेत्र में भी मगध का अपना स्थान रहा है। इस सन्दर्भ में दो गीत मगही लोकगीतों का वर्णन अनिवार्य हो जाता है। प्रथम लोकगीत में नायक-नायिका का प्रकृति-प्रांगण में स्वच्छंद विलास को दर्शाया गया है। कथा वस्तु यह है कि किसी रम्य नदी के किनारे गूलर का बगीचा है ! साजनी पके-पके मनोहरी गूलर को तोड़ता है, सजनी खाती है। उन्माद का वातावरण है ! नायक नेत्र-संकेत से गोरी के हृदय का हाल पूछता है। गौरी के हृदय में कम्पन के साथ लज्जा होती है। नायिका का यौवन भी तो अनोखा है। उसमें वैसी ही चिकनाहट है, जैसी पीपल के कोमल पत्ते में और घी। फिर नाय लुब्ध क्यों न हो।

दूसरा लोकगीत सन्दर्भ एक विरहिणी नायिका की प्रेम-परीक्षा है। वर्णन कुछ यो है: परदेश बाबा गयेथे, तो द्वार पर चन्दन के वृक्ष में सुखद हिंडोला लगा कर गये थे। प्रियतम परदेश गया है, तो सदा लिये दु:ख वारिधि में डुबो कर। वह छाती में वज्र-किवाड़ लगा गया है और उस पर भी सांकल चढ़ा गया है। आम और महुआ के सघन बाग में विरहिणी सुन्दरी खड़ी है। उसके सुकोमल कपोलों पर अश्रु की बूँदें ढ़٠??क रही हैं। द्रवित-बटोही ने पूछा- सुन्दरी तुम्हारी आंखें मोती क्यों बरसा रही हैं? अश्रुसिक्त सुन्दरी ने कहा - तुम्हारे ही जैसा कृशांग मेरा कान्त है। उसने परदेश जाकर मुझे विसरा दिया है। पथिक की आँखें चमक उठीं। उसने कहा - अपने ब्याहता (पति) की आशा छोड़ दो। लो डाला-भर सोना ! मोतियों ॠंगार करो ! सतवन्ती गौरा ने कहा - तुम्हारे सोने में आग लग जाये। मोतियों पर वज्र गिरे। अपने प्रियतम की प्रतीक्षा मैं अनन्त काल तक करुँगी। मेरा जी कहता है वह व्यापार से लौटेगा और सोने से हमरा और घर का ॠंगार करेगा।

Sunday, May 25, 2008

परमाणु समझौता -3

परमाणु करार खत्म करने का मतलब
अरुंधति घोष
आलेख. अक्टूबर माह की 12 तारीख को हमारे संस्कारवान, मृदुभाषी और जहीन प्रधानमंत्री ने न सिर्फ मीडिया बल्कि रणनीतिकारों की बिरादरी में भी एक और तूफान खड़ा कर दिया। कई हफ्तों से वामदलों के प्रवक्ता अमेरिका के संबंध में भारत की विदेश नीति में कथित ‘भटकाव’ को लेकर अशुभ और धमकीभरा शोर मचा रहे थे।

साथ ही परमाणु समझौते को खत्म करने की कसमें भी खा रहे थे, भले ही इसका मतलब देश में अस्थिरता पैदा करना और देश को मध्यावधि चुनाव में धकेलना ही क्यों न हो। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने इस आशय की बात कही कि समझौते को स्थगित किया जा सकता है और इस देरी से होने वाले नुकसान को भी होने दिया जा सकता है। समझौते की मुखालफत करने वालों के खैमे में इससे जहां खुशी की लहर दौड़ गई वहीं समर्थकों के बीच निराशा व चिंता नजर आई।

अब यह बात साफ हो चुकी है कि बहस समझौते की रहस्यपूर्णता को लेकर नहीं बची है। वामदलों द्वारा समस्यापूर्ण माने गए अधिकांश मुद्दों का 123 समझौते में संतोषजनक ढंग से ध्यान रखा गया है; दरअसल सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि सारी दुनिया का मानना है कि भारत को एक बेहतरीन सौदा मिला है जो उसकी पहुंच अत्याधुनिक अंतरराष्ट्रीय टेक्नोलॉजी और परमाणु ऊर्जा बाजार तक बनाता है, वह भी अपनी किसी भी धारणा पर समझौता किए बगैर।

सोमवार को संपन्न यूपीए-वामदलों की बैठक में विभिन्न पक्षों के रवैये में कोई बदलाव नजर नहीं दिखा, सिवाय इसके कि यूपीए अब भी प्रक्रिया के अगले चरणों की तरफ बढ़ने की इच्छा रखे नजर आया। पूरा मामला 16 नवंबर तक के लिए टल गया है। यह देखना बाकी है कि उस तारीख तक किसी दल के रवैये में कोई बदलाव आता है या नहीं। कुछ ने तो कम से कम इस सरकार के कार्यकाल के बाकी महीनों तक के लिए ‘सौदे’ को खारिज मान लिया है।

समझौता मामले का हल आखिरकार चाहे जो हो, इस घटनाक्रम का असर भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर होगा ही। वार्ताकार के रूप में भारत की विश्वसनीयता और घरेलू स्तर पर कड़ा फैसला करने की क्षमता की प्रतिछाया जरूरी तौर पर इस बात पर पड़ेगी कि मुल्क की अंतरराष्ट्रीय वचनबद्धताओं का आकलन अन्य देश किस तरह करेंगे।

अगर समझौता नाकाम रहता है, तो भी निश्चित तौर पर सब कुछ खत्म नहीं हो जाएगा, मगर भारत अपनी आवाज खो चुका होगा। माना जाएगा कि भले ही भारत महत्वाकांक्षी हो, खंडित सियासत के चलते अपने समझौतों को लागू करने की इच्छाशक्ति या काबिलियत उसमें नहीं है। अपने वादों को पूरा करने के संकल्प और साझा वार्ताकार के रूप में भारत की गंभीरता पर सवालिया निशान लग जाएंगे।

द्विपक्षीय संबंधों के परिणामों पर पूर्वानुमान मुश्किल हैं फिर भी अमेरिका में नकारात्मक प्रतिक्रिया निश्चित है। जैसी कि अटकलें लगाई जा रही हैं अमेरिका का अगला राष्ट्रपति डेमोक्रेट और कांग्रेस डेमोक्रेटिक होगी।

यदि ऐसा होता है तो भारत फिर से अपने खिलाफ माहौल की उम्मीद कर सकता है। परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), विखंडन सामग्री कटौती संधि (एफएमसीटी) और परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव इनमें शामिल हैं।

हम जहां से शुरू हुए थे वापस उसी मुकाम पर और भी बुरी स्थिति में पहुंच जाएंगे। हो सकता है इससे भारत में वामदल खुश हो जाएं, मगर उनकी यह खुशफहमी जारी नहीं रह सकेगी, क्योंकि दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यावसायिक रिश्ते तथा नागरिकों के आपसी संबंध मजबूत होने ही हैं।

परमाणु ऊर्जा के लिए विश्व बाजार खुलने से व्यावसायिक रूप से लाभ में आने वाले रूस और फ्रांस जैसे अन्य बड़े मुल्कों में निश्चित तौर पर भारत के लिए आदर में कमी आएगी। चीन का रुख जानना शायद सबसे दिलचस्प होगा, जो हमें चीन-भारत-रूस बैठक के दौरान देखने को मिलेगा। जैसी कि वामदल बेसब्री से उम्मीद करते नजर आते हैं, क्या गुट निरपेक्ष देश भारत को अपना नेता स्वीकार करेंगे?

इन नकारात्मक पहलुओं और समझौता लागू होने में लगने वाली देर के बावजूद, कुछ कदम जो उठाए जा चुके हैं वापस नहीं लिए जा सकते। अमेरिका के साथ सहयोग का एक व्यापक आधार आकार ले रहा है और 123 समझौते की पहल हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय ताप नाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र (आईटीईआर ) का भारत एक सदस्य है।

मगर परमाणु ऊर्जा रेजीम में पूरी तरह भागीदारी के बिना यह सदस्यता जारी रहेगी या नहीं यह एक बहस के योग्य मुद्दा है। भारत को छूट देने वाला अमेरिकी कानून पास हो चुका है और परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) के कई मुल्क भारत के साथ असैन्य परमाणु सहयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास करने में दिलचस्पी रखते हैं। मगर वैश्विक स्तर पर अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी नकारी जाती रहेगी और भारत के लिए अवसरों की खिड़की दिखलाई पड़ रहे भविष्य तक बंद हो चुकी होगी।

-लेखक संयुक्त राष्ट्र में भारत की राजदूत रह चुकी हैं।

परमाणु समझौता-2

 
दोनो पक्षों ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया है इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी ने भी इसे एक अच्छा कदम बताया है। आइये देखते है दोनो पक्ष अपने अपने नजरिये से इस समझौते को कैसे देखते हैं:

भारत का नजरिया
भारत इस सौदे को अभूतपूर्व और ऐतिहासिक मानता है क्योंकि
इस से भारत साउथ एशिया मे अमरीका का सबसे बड़ा सहयोगी बन जायेगा।
भारत को परमाणु सम्पन्न देश का दर्जा मिल जायेगा।
भारत को अपनी शर्तों पर परमाणु ईधन और साजो-सामान मिलेगा
बिना परमाणु अप्रसार संधि किए ये समझौता हो रहा है।
अमरीका का सामरिक सहयोगी होने से रुतबा बढेगा।
अमरीका का निकट सहयोगी बनने से सुरक्षा परिषद मे स्थायी सीट मिलने का रास्ता साफ हो जायेगा।
पाकिस्तान पर दबाव बढेगा।

अमरीका का नजरिया
एशिया मे शक्ति संतुलन।
चीन पर परोक्ष रुप से दबाव
ईरान मसले पर सहयोग की आकांक्षा।
भारत की यूरेनियम संवर्द्वन की तकनीक पाने की उम्मीद

मेरे विचार
मै इसे अभूतपूर्व नही मानता, क्योंकि अमरीका पहले भी परमाणु ईधन का वादा करके मुकर चुका है।रही बात शक्ति संतुलन की, तो अमरीका को एक मोहरा चाहिये और भारत इस जाल मे फ़ंस रहा है।रही बात सुरक्षा परिषद की सीट की, वो तो अमरीका अभी नही देने वाला, अलबत्ता ईरान मसले पर भारत अमरीका के पक्ष मे झुकता दिखता है।कुल मिलाकर, भारत सिर्फ और सिर्फ आश्वासन पर अपने स्टैन्ड को बदल रहा है, कंही दीर्घ काल मे उसे यह मंहगा ना पड़ जाय।सामने से देखने पर ये समझौता भारत के पक्ष मे दिखता है, लेकिन क्या बन्द कमरों मे बैठकर हमने अमरीका से कुछ गुपचुप वादे किये हैं? ये देखने वाली बात होगी।

भारत को यदि महाशक्ति बनना है, तो उसे सबसे पहले अपने पड़ोसियों से सम्बंध सुधारने पड़ेंगे, फिर अर्थव्यवस्था को और मजबूत करना पड़ेगा, विकास दर सही रखनी पड़ेगी, और सबसे बड़ी बात, बुनियादी सुविधाओं को और बढाना होगा। उसके बाद ही हम भारत को महाशक्ति के रुप मे देखने की सोच सकते है।

परमाणु समझौता

सन १९४७ मे भारत की आजादी के बाद, बढती ऊर्जा जरुरतो को देखते हुए, परमाणु ऊर्जा संयत्रों की जरुरत महसूस की जाने लगी थी।
१९५० :अमरीका ने भारत को तारापुर परमाणु संयंत्र बनाने मदद की और ईधन मुहैया कराने को तैयार हो गया। शर्त सिर्फ़ यही थी, परमाणु उर्जा का इस्तेमाल शान्ति के कार्यों मे किया जायेगा।
चीनी हमले के बाद,चीन ने अपना परमाणु परीक्षण किया तभी भारतीय हुक्मरानों को परमाणु शक्ति सम्पन्न होने की जरुरत महसूस होने लगी।भारतीय नेताओ ने अमरीका से परमाणु बम तक की मांग की थी, जिसे अमरीका ने ठुकरा दी थी और ताना मारकर कहा था, चाहो तो अपने आप बना लो (अमरीका जानता था कि भारत के पास तकनीक नही है।) भारतीय वैज्ञानिकों ने खून पसीना एक करके परमाणु शस्त्र तकनीक पर काम शुरु किया। इधर अमरीका के दिमाग मे खलबली मच गयी।
१९६८ : अमरीका ने भारत पर परमाणु अप्रसार संधि स्वीकार करने का दबाव डाला। जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया।
१९७४ : भारत ने प्रथम परमाणु परीक्षण किया।अमरीका ने सहयोग करना बन्द कर दिया और प्रतिबन्ध लगा दिये। भारत ने तब तक रूस का दामन थाम लिया था, ये भारत अमरीका के खराब सम्बंधो का दौर था जो कई दशक चला।शीत युद्द का समय था, इसी समय एक और नाटक चला जिसे लोग गुट निरपेक्ष आन्दोलन कहते है, मुझे आज तक समझ नही आया, रूस के साथ रहते रहते भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का मुखिया कैसे रहा। खैर हम पथ से नही भटकते,इस मसले पर फिर कभी बात करेंगे।

पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अमरीका दामन थाम लिया, फलस्वरुप अमरीका से हमारे सम्बंध कभी नरम तो कभी गरम रहे।
१९९८ : अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बावजूद परमाणु परीक्षण किया।

समय बदला, भारत के तकनीकी ज्ञान ने विश्व मे पहचान बनाई।लेकिन उससे बड़ी बात भारत एक बहुत ही बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर उभरा और अर्थव्यवस्था भी सही रास्ते पर चल पडी है। इसलिये अमरीका को भी अपना रुख लचीला करना पड़ा।
२००० : अमरीका ने भारत के साथ सामरिक साझेदारी बनाने की ओर कदम बढाये।
१८ जुलाई, २००५ : अमरीका और भारत, परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण प्रयोग के सहयोग रजामन्द हुए और एक करार पर हस्ताक्षर हुए।

मार्च २००६ : इस परमाणु समझौते पर सहमति। इस समझौते के तहत, भारत अपने २२ मे से १४ परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को अंतर्राष्ट्रीय निगरानी मे रखने को तैयार हो गया, जिसके बदले मे उसे परमाणु ऊर्जा मिलेगी और सारे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध हटा लिये जायेंगे।अभी इस समझौते को अमरीकी संसद की मंजूरी मिलनी बाकी है।

लेकिन अमरीका क्या चाहता है?
निश्चय ही अमरीका यहाँ पर चैरिटी करने तो नही आया। परमाणु समझौता वो भी भारत की शर्तों पर, बात कुछ हजम नही होती। अमरीका का थिंक टैंक बहुत ही दूरगामी सोच रहा है। शीतयुद्द के समाप्त होने के बाद अमरीका को रूस से इतना खतरा नही है, जितना उसे चीन की बढती हुई ताकत से है। निसंदेह चीन सबसे ज्यादा तेजी से आगे आ रहा है, आर्थिक और सामरिक रुप से भी। आने वाले वर्षों मे चीन की अर्थव्यवस्था दिन दूनी और रात चौगुनी की प्रगति करेगी, इससे चीन पर लगाम कसना और मुश्किल होता जायेगा।इसीलिये अमरीका जो स्वयंभू विश्वविधाता है, उसे एक एशिया मे एक विश्वसनीय साथी चाहिये, इसमे भारत काफी सही तरीके से फिट बैठता है।

दूसरे अमरीका को भारत की परमाणु ईधन के पुन:प्रयोग की तकनीक भी चाहिये, ताकि वो तेल पर अपनी निर्भरता घटा सके। और आखिरी बात, उसे एशिया प्रशान्त क्षेत्र मे सतर्क पहरेदार चाहिये, जो भारत के रुप मे उसे मिल गया है। अमरीका का इतिहास है, जब तक जरुरत होती है, वो सबको माईबाप बना लेता है, जरुरत पूरी होते ही, कैसा व्यवहार करता है, बताने की जरुरत नही।

लेकिन इस समझौते के कई पहलू है, इन्ही पर नजर डालेंगे, अगली पोस्ट मे… इन्तजार कीजिये।

आप क्या सोचते है इस समझौते के बारे मे, अपने विचार अपने चिट्ठे अथवा टिप्पणी मे अवश्य लिखियेगा।

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आरक्षण-व्यवस्था

संविधान में आरक्षण-व्यवस्था बहुत सोच-समझ कर की गई थी। सदियों की जड़ जाति-व्यवस्था के अन्यायों को दूर करना और घोर विषम समाज को समतामूलक समाज में बदलना इसका लक्ष्य था। भारतीय नवजागरण के प्रणेता स्वामी दयानंद सरस्वती, ज्योतिबा फुले, महादेव गोविंद रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, जानकीनाथ घोषाल आदि से लेकर महात्मा गांधी, डा. भीमराव अंबेडकर और डा. राममनोहर लोहिया तक के नेताओं के विचारों तथा संघर्ष ने इसका स्वरूप निश्चित किया था। लेकिन नेहरू सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक किसी ने भी इसे समझने और ठीक प्रकार से लागू कने की कोशिश नहीं की। इसके विपरीत इसमें एक के बाद एक गांठे डालकर इसे उलझाया जाता रहा।
आरक्षण संबंधी समस्याएं इसलिए अब तक बनी हुई हैं क्योंकि हमने संविधान की आरक्षण व्यवस्था को लागू करने के लिए शुरू से ही वैज्ञानिक प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया। इस व्यवस्था को सही ढंग से लागू करने के लिए जरूरी था कि जातियों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति के आंकड़ें जमा किए जाएं और उनके आधार पर जातियों का अगड़े, पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदि श्रेणियों में वर्गीकरण किया जाए। प्रत्येक जनगणना के साथ ये आंकड़ें जमा किए जाएं और हर दस साल बाद आंकड़ों के विश्लेषण से पता लगाया जाए कि किन जातियों को संविधान के अनुच्छेत 16(4) के अनुसार नौकरियों आदि में ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ मिल गया है और जिन्हें मिल गया हो उन्हें आरक्षण की परिधि से बाहर किया जाए। इस प्रकार उत्तरोत्तर निचली जातियों को आरक्षण की सुविधा मिलती जाती। कालांतर में सभी जातियों को ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ मिल जाता तथा आरक्षण व्यवस्था स्वत: समाप्त हो जाती।
लेकिन हमारी सरकारें नेहरू सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक जातियों के वैज्ञानिक आंकड़े जमा करने से घबराती रहीं, इसलिए कि ये आंकड़े सामने आए तो जातिगत शोषण की नंगी तस्वीर सामने आ जाएगी। इससे पता चलेगा कि जिन जातियों का कुल जनसंख्या में अनुपात 15-16 प्रतिशत हैं, वे 90-95 प्रतिशत पदों पर कब्जा जमाए बैठी हैं। अंतिम बार जातियों के आंकड़े 1931 की जनगणना में इकट्ठे किए गए थे। उसके बाद ये आंकड़े जान-बूझ कर जमा नहीं किए गए और बिना वैज्ञानिक आंकड़ों के जातियों की शिनाख्त करने, उनका श्रेणीकरण करने तथा आरक्षण कोटा निर्धारित करने के सारे काम अनाप-शनाप ढंग से हुए।
हमें यह मानकर चलना पड़ेगा कि भारतीय समाज का गठन वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत हुआ है और इस तथ्य को हम नजरों से आ॓झल नहीं कर सकते कि जो जातियां द्विज वर्णों में यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में नहीं आतीं वे या तो पिछड़े वर्गों में आती हैं या फिर अनुसूचित जातियों और जनजातियों में। जनगणना में इस आधार पर वर्गीकरण हो जाने के बाद ही ‘क्रीमी लेयर’ की कसौटी (संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ की कसौटी) लागू हो तथा आरक्षण की परिधि से निकाले गए नागरिक वर्गों को अगड़ों में शामिल माना जाए। जनगणना के आंकड़ों से पहले क्रीमी लेयर लागू करना अवैज्ञानिक होगा और इसके लिए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण या किसी और प्रकार के सर्वेक्षण के आंकड़े भी अधूरे ही होंगे। जनगणना कार्यालय के अभिलेखों को छोड़ कर शेष सभी सरकारी और गैर सरकारी दस्तावेजों में जातिबोधक नामों का उल्लेख प्रतिबंधित कर दिया जाए तथा प्रमाणपत्रों आदि में चार या पांच श्रेणियों या उनकी क्रम संख्या का ही उल्लेख किया जाए।
चूंकि जाति सभी राजनीतिक पार्टियों का निहित स्वार्थ बन गई हैं, कोई भी सरकार यह काम करने को तैयार नहीं होगी। अत: उच्चतम न्यायालय को ही इसका स्पष्ट निर्देश देना पड़ेगा। जैसे अमेरिका में रंग-भेद को समाप्त करने का काम वहां के उच्चतम न्यायालय को मुख्य न्यायाधीश अर्ल वारेन के प्रसिद्ध निर्णय के द्वारा करना पड़ा। वैसे ही हमारे उच्चतम न्यायालय को करना पड़ेगा।
1857 की क्रांति में हिस्सा लेने वाली सभी जातियों को अभी तक न्याय नहीं मिला है। प्रथम स्वाधीनता आंदोलन की 150 वीं जयंती पर भी हमारा ध्यान इस आ॓र नहीं गया है। समस्याओं का अंत तभी होगा जब संविधान की आरक्षण व्यवस्था को पीछे कहे गए अनुसार वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाएगा और उच्चतम न्यायालय को आरक्षणों की 50 प्रतिशत सीमा को भी हटाना पड़ेगा और यह सीमा अद्विज जातियों की जनसंख्या को देखते हुए ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित करनी पडे़गी।

म्यूचल फंड का फंडा

पिछले लेख मे मैने आपको म्यूचल फंड से सम्बंधित प्राथमिक जानकारी दी थी, लेकिन कई सवाल अनुत्तरित रह गए थे। आइए आज उन कुछ अनुत्तरित सवालों के बारे मे बात करते है।

लेकिन म्यूचल फंड के क्या फायदे है और ये शेयरों से किस तरह से अलग है?

म्यूचल फंड के कई फायदे है, अव्वल तो इसमे आपको कम पूँजी, कम समय और काफी कम तकनीकी जानकारी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा इसमे जोखिम भी (अपेक्षाकृत शेयर बाजार के) कम रहता है। म्यूचल फंड के फायदों को संक्षेप मे इस तरह से बताया जा सकता है:
म्यूचल फंड महंगे शेयरों मे निवेश करने का सस्ता तरीका है।
म्यूचल फंड मे जोखिम कम होता है क्योंकि आपका पैसा किसी एक शेयर मे ना लगाकर, कई शेयरों मे एक साथ लगाया जाता है।
म्यूचल फंड पेशेवर फंड व्यस्थापकों (Fund Managers) द्वारा चलाए जाते है, जिनको शेयर बाजार की काफी अच्छी जानकारी होती है। इनको किसी भी शेयर मे प्रवेश करने और बाहर निकलने के अवसरों का बेहतर ज्ञान रहता है।
म्यूचल फंड हाउस (AMCs) के पास अपनी रिसर्च टीम होती है, इनके पास शेयरों के सम्बंध मे तकनीकी जानकारी और विश्लेषण मौजूद रहता है। कुल मिलाकर इनकी रिसर्च टीम किसी भी निवेशक के मुकाबले शेयर बाजार की अधिक जानकारी रखती है।
छोटे निवेशक का समय और श्रम बचता है।
म्यूचल फंड की गतिविधियों पर सेबी की कड़ी नजर रहती है, इस तरह से छोटे निवेशकों के हितों को अनदेखा नही किया जाता।
म्यूचल फंड मे आप निश्चित अवधि मे आटोमेटिक तरीके से (SIP) से निवेश अथवा निकासी (SWP) कर सकते है।
चूँकि म्यूचल फंड बड़े स्तर पर खरीदारी करते है इसलिए उनको ब्रोकरेज और अन्य खर्चों पर भी बचत होती है।
म्यूचल फंड के निवेश मे काफी ज्यादा पारदर्शिता होती है।
निवेशक को किसी भी प्रकार का निवेश खाता (Demat Account) नही खोलना पड़ता।
निवेशक सही समय पर किसी भी एक स्कीम से दूसरी स्कीम मे जा सकता है।

म्यूचल फंड के नुकसान

दुनिया मे कोई ऐसी चीज नही जिसके फायदे हों और उसके नुकसान ना हो। म्यूचल फंड मे भी कुछ नुकसान हो सकते है, उदाहरण के लिए:
म्यूचल फंड हाउस के खर्चों पर निवेशक का नियंत्रण नही रहता।
निवेशक को अपनी पसन्द के शेयर खरीदने(Customized Portfolio) का आप्शन नही रहता। निवेशको को म्यूचल फंड की किसी स्कीम को ही चुनना होता है।
म्यूचल फंड की सही स्कीम का चुनाव करना भी एक टेढी खीर है।

म्यूचल फंड किस तरह से बाजार मे पैसा लगाते है।

म्यूचल फंड, अपने निवेशको द्वारा प्रदान किए गए पैसों को एक जगह एकत्रित करते है और उस फंड से शेयर बाजार मे खरीद फरोख्त करते है। चूँकि फंड हाउस काफी बड़े स्तर पर खरीद फरोख्त करते है इसलिए इनको बाजार के उतार चढावों का अच्छा ज्ञान होता है। सही समय पर शेयरों मे खरीद बिक्री की जाती है और आने वाले नफ़े-नुकसान को उसी एकत्रित फंड मे रखा जाता है। म्यूचल फंड कम्पनिया अपने खर्चो को इसी फंड से निकालती है। म्यूचल फंड के निवेश को सार्वजनिक किया जाता है और प्रतिदिन फंड को अपनी नैट एसैट वैल्यू (NAV) अर्थात हर यूनिट का खरीद और बिक्री मूल्य प्रकाशित करना होता है। इसी मूल्य पर निवेशक, म्यूचल फंड मे अपना निवेश और निकासी कर सकते है। नैट एसैट वैल्यू से किसी भी फंड के स्वास्थ्य की जाँच की जा सकती है। निवेशक को यह अधिकार है कि वह किसी भी समय अपना पैसा लेकर फंड से बाहर निकल सकता है।

क्या सेबी ने म्यूचल फंड हाउस पर कुछ नियमावली जारी की है?

अच्छा सवाल। एक निवेशको को यह सवाल जरुर पूछना चाहिए। सेबी सभी फंडो पर नज़र रखता है और समय समय पर नए दिशा निर्देश भी जारी करता है।सेबी ने फंड हाउस के लिए निम्नलिखित नियमावाली जारी की है।
सभी म्यूचल फंड हाउस की स्थापना भारतीय ट्रस्ट एक्ट के अंतर्गत होगी और इन फंड कम्पनियों को पेशेवर लोगों द्वारा चलाया जाएगा।
इन फंड हाउस का निर्दॆशकों का एक बोर्ड होगा।
प्रत्येक फंड हाउस की न्यूनतम पूँजी 5 करोड़ (Five Crores) होनी चाहिए।
फंड हाउस के ट्रस्टी और चलाने वाले अलग अलग व्यक्ति (संस्था) होने चाहिए।
प्रत्येक फंड हाउस को सेबी से अनुमति लेना आवश्यक है।
फंड हाउस को अपनी हर योजना को सेबी के पास पंजीकृत कराना अनिवार्य है।
फंड हाउस अपने लाभ का कम से कम 90% अपने निवेशकों मे बाँटना आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त समय समय पर सेबी द्वारा प्रदान की जाने वाले दिशा निर्देशों का पालन अनिवार्य है।

म्यूचल फंड की योजनाए किस प्रकार की होती है?

म्यूचल फंड की योजनाए मुख्यत: दो प्रकार की होती है।

असीमित अवधि वाले फंड (Open Ended Funds)

इस प्रकार के फंड सभी के लिए खुले हुए होते है। निवेशक जब चाहे फंड मे निवेश अथवा विनिवेश(निकासी) कर सकते है। म्यूचल फंड निवेश के लिए प्रवेश शुल्क (Entry Load) लेती है और कभी कभी विनिवेश के लिए निकासी शुल्क(Exit Load) लेती है।

सीमित अवधि वाले फंड (Closed Ended Funds)

इस प्रकार के फंड मे निवेश की सीमा की अवधि तक निवेशक को इस फंड मे बने रहना होता है। निश्चित अवधि के उपरान्त ही निवेशक अपना पैसा इस फंड से निकाल सकता है।
म्यूचल फंड कितने प्रकार के होते है?
म्यूचल फंड के खर्चे किस प्रकार के होते है?
एक निवेशको को म्यूचल फंड मे निवेश करते समय क्या क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
म्यूचल फंड की किसी भी स्कीम का चुनाव कैसे करें?
किस तरह के फंड मे निवेश करें?

क्या होता है शेयर, सरकारी प्रतिभूतिया बांड और म्यूचल फंड

शेयर (Shares)

जैसा कि आपको पता है किसी भी व्यापार को चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। यदि व्यापार छोटा है तो निजी,पारिवारिक अथवा मित्रों के स्तर पर पूँजी की व्यवस्था की जाती है अथवा कंही ऋण लिया जाता है। लेकिन यदि व्यापार काफी बड़े स्तर पर हो, पूँजी की व्यवस्था सार्वजनिक रुप से की जाती है। ऐसे मे पूँजी को छोटे छोटे हिस्सों मे बाँट दिया जाता है जिन्हे शेयर कहा जाता है और इस शेयर को पब्लिक को खरीदने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसका मतलब है कि यदि आपने किसी कम्पनी के शेयरधारक है तो आप उस कम्पनी मे पूँजी के उतने हिस्से के हकदार है। कम्पनियां अपना मुनाफ़ा इन शेयरधारकों के बीच बाँटती है जिसे डिवीडेंड कहते है। इन कम्पनियों के शेयर, शेयर बाजार मे भी बिक्री खरीद के लिए उपलब्ध होते है। यदि कोई कम्पनी पहली बार अपने शेयर बाजार मे लाती है तो उसको इनीश्यल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) कहते है। ये तो रही शेयर की बात, आइए अब बात करते है डिबेंचर की।

डिबेंचर (Debenture)

डिबेंचर भी शेयर की तरह होता है, बस फर्क इतना होता है कि यह पूँजी का हिस्सा ना होकर, कम्पनी द्वारा पब्लिक से मांगा गया ऋण होता है। इस डिबेंचर पर कम्पनिया प्रतिवर्ष, डिवीडेंड की जगह ब्याज देती है। कई कम्पनियां डिबेंचर को शेयर मे स्थानांतरित करने का भी प्रावधान रखती है। आजकल डिबेंचर का प्रचलन कम हो गया है।

सरकारी प्रतिभूतिया (Government Bonds)

जिस तरह व्यापारियों को व्यापार चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है उसी प्रकार सरकारों को भी काम-काज चलाने के लिए पूँजी की जरुरत होती है। वैसे तो यह पूँजी सरकार टैक्स लगाकर इकट्ठा करती है, लेकिन कभी कभी किसी प्रोजेक्ट विशेष के लिए सरकार बॉन्ड भी जारी करती है। इसी तरह विभिन्न पूँजीगत संस्थाएं (Financial Institutions) भी बॉंड जारी करती है। सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज थोड़ा कम मिलता है लेकिन इसमे पूँजी की गारंटी सरकार देती है, इसलिए यह एक सेफ इंवेस्टमेंट की तरह माना जाता है।

म्यूचल फंड ( Mutual Fund)

आइए अब बात करते है म्यूचल फंड की। जैसा कि आपको पता है कि शेयर बाजार मे निवेश करने के लिए आपको काफी समय, जानकारी और कुछ हद तक (अच्छी खासी) पूँजी की आवश्यकता होती है। अब बड़े निवेशक तो शेयर मार्केट के होने वाले उतार-चढावों पर नजर रखने के लिए समय निकालते है, लेकिन कई ऐसे छोटे निवेशक भी होते है जिनके पास समय और पूँजी की कमी होती है। उदाहरण के लिए मान लीजिए आप और आपके पाँच मित्रों के पास 50,000 रुपए (प्रति व्यक्ति) है जिनको आप शेयर बाजार मे लगाना चाहते है, लेकिन आपको शेयर बाजार के झंझटों के बारे मे कोई जानकारी नही है और ना ही इतना समय है कि आप अपने व्यापार/नौकरी से समय निकालकर इस निवेश पर नजर रख सकें। तो आपके पास विकल्प क्या है:
आप किसी पहचान वाले बन्दे को पकड़े जो शेयर बाजार मे निवेश करता हो।
किसी संस्था को पैसा दे दो, जो आपकी तरफ़ से शेयर बाजार मे निवेश करे।
आप सभी अपना अपना पैसा मिलाकर एक साथ, एक जगह निवेश करें और किसी भी एक व्यक्ति जो इस बारे मे जानकारी रखता हो, उस पर निवेश की देखरेख करने के जिम्मेदारी लगा दें।

अब मान लीजिए आप लोग पाँच नही, बल्कि पूरे 5000 लोग है, तो ऐसे मे आपके पास विकल्प म्यूचल फंड का ही है। इसमे आप अपना निवेश म्यूचल फंड मैनेजमेन्ट कम्पनी (Asset Management Company) को दे देते है। आपके पैसे की देखभाल पेशेवर फंड मैनेजर करते है जो शेयर बाजार की बारीकियों को अच्छी तरह से समझते है। बदले मे ये म्यूचल फंड कम्पनिया आपसे कुछ हिस्सा अपने खर्चों सरकार अपनी नीतियो द्वारा इन म्यूचल फंड कम्पनियों पर निगरानी रखती है। इस पूरी प्रक्रिया मे म्यूचल फंड कम्पनिया अनेक प्रकार की स्कीम लाती है, हर स्कीम मे लगाए जाने वाली पूँजी को छोटे छोटे, बराबर के हिस्सों मे (शेयरों की तरह) बाँट दिया जाता है। निवेशक अपने अपने हिस्से के हकदार होते है जिन्हे यूनिट (Unit) कहा जाता है। इस तरह छोटे निवेशक भी शेयर बाजार मे अप्रत्यक्ष रुप से हिस्सा ले सकते है।

लेकिन म्यूचल फंड के क्या फायदे है और ये शेयरों से किस तरह से अलग है?

काफी अच्छा सवाल। लेख थोड़ा लम्बा हो रहा है इसलिए इस सवाल का जवाब इस लेख के अगले हिस्से मे समेटते है। आशा है इस लेख से आपकी म्यूचल फंड की जानकारी मे कुछ वृद्दि जरुर हुई होगी। म्यूचल फंड किसी भी सवाल के लिए टिप्पणी द्वारा सम्पर्क किया जा सकता है।

आगे भी जारी है……

Tuesday, May 6, 2008

विदेशों में हिन्दी

आज दुनिया का कौन-सा कोना है, जहां भारतीय न हों । अनिवासी भारतीय सपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं । दुनिया के डेढ सॊ से अधिक देशों में दो करोड़ से अधिक भारतीयों का बोलबाला है। अधिकांश प्रवासी भारतीय आर्थिक रूप से समृध्द हैं । 1999 में मशीन ट्रांसलेशन शिखर बैठक में में टोकियो विश्वद्यालय के प्रो. होजुमि तनाका ने जो भाषाई आंकड़े प्रस्तुत किए थे, उनके अनुसार विश्व में चीनी भाषा बोलने वालों का स्थान प्रथम और हिन्दी का द्वितीय तथा अंग्रेजी का तृतीय है ।
हिन्दी विश्व के सर्वाधिक आबादी वाले दूसरे देश भारत की प्रमुख भाषा है तथा फारसी लिपि में लिखी जाने वाली भाषा उर्दू हिन्दी की ही एक अन्य शैली है । लिखने की बात छोड़ दें तो हिन्दी और उर्दू में कोई विशेष अंतर नहीं रह जाता सिवाय इसके कि उर्दू में अरबी, फारसी, तुर्की आदि शब्दों का बहुलता से इस्तेमाल होता है। एक ही भाषा के दो रूपों को हिन्दी और उर्दू, अलग-अलग नाम देना अंग्रेजों की कूटनीति का एक हिस्सा था ।
विदेशों में चालीस से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढाई जा रही हैं । भारत से बाहर जिन देशों में हिन्दी का बोलने, लिखने-पढने तथा अध्ययन और अध्यापक की दृष्टि से प्रयोग होता है, उन्हें हम इन वर्गों में बांट सकते हैं - 1. जहां भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या में रहते हैं, जैसे - पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव आदि । 2. भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश, जैसे- इंडोनेशिया, मलेशया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान आदि । 3. जहां हिन्दी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढाया जाता है अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप क देश। 4. अरब और अन्य इस्लामी देश, जैसे- संयुक्त अरब अमरीरात (दुबई) अफगानिस्तान, कतर, मिस्र, उजबेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि ।

मॉरिशस
यहां भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या कुल आबादी की आधे से अधिक है । मॉरिशस की राजभाषा अंग्रेजी है और फ्रेंच की लोकाप्रेम है । फ्रेंच के बाद हिन्दी ही एक ऐसी महत्वपूर्ण एवं सशक्त भाषा है जिसमें पत्र-पत्रिकाओं तथा साहित्य का प्रकाशन होता है । मॉरिशस में भारतीय प्रवासियों का विधिवत आगमन चीनी उद्योग के बचाव तथा उसके विकास हेतु 1834 में शुरू हुआ था । यूरोप में चीनी की बढती मांग को ध्यान में रखकर तत्कालीन प्रशासकों ने भारतीयों को सशर्त यहां लाकर स्थायी रूप से बसने का प्रावधान किया । मॉरिशस में भारतीय प्रवासी वर्ष 1834 से बंधुआ मजूदरों के रूप में आने लगे थे । ये लोग अधिकांशत: भारत के बिहार प्रदेश के छपरा, आरा और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, गोंडा आदि जिलों के थे । भारतीय श्रमिकों ने विकट परिस्थितियों से गुजरते हुए भी अपनी संस्कृति एवं भाषा का परित्याग नहीं किया । अपने प्रवासकाल में महात्मा गांधी जब 1901 में मॉरिशस आए तो उन्होंने भारतीयों को शिक्षा तथा राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय भाग लेने के लिए प्रेरित किया । हिन्दी प्रचार कार्य में हिंदुस्तानी पत्र का योगदान महत्वपूर्ण है।
धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं के उदय होने से यहां हिन्दी को व्यापक बल मिला । वर्ष 1935 में भारतीय आगमन शताब्दी समारोह मनाया गया । उस समय यहां से हिन्दी के कई समाचारपत्र प्रकाशित होते थे, जिनमें आर्यवीर, जागृति आदि उल्लेखनीय है । वर्ष 1941 में हिन्दी प्रचारिणी सभा ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा हिन्दी पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया । 1943 में हिन्दू महायज्ञ का सफल आयोजन किया गया। 1948 में जनता के प्रकाशन के माध्यम से दर्जनों नवोदित हिन्दी लेखक साहित्य सृजन क्षेत्र में आए ।
वर्ष 1950 में यहां हिन्दी अध्यापकों का प्रशिक्षण प्रारंभ हुआ और 1954 से भारतीय भाषाओं की विधिवत पढाई शुरू हुई। मॉरिशस सरकार ने स्कूलों में छठी कक्षा तक हिन्दी पढाने की व्यवस्था की । वर्ष 1961 में मॉरिशस हिन्दी लेखक संघ की स्थापना हुई। यह संघ प्रतिवर्ष साहित्यिक प्रतियोगिताओं, कवि सम्मेलनों, साहित्यकारों की जयंतियां आदि का आयोजन करता है। मॉरिशस में हिन्दी भाषा का स्तर ऊंचा उठाने में हिन्दी प्रचारिणी सभा का योगदान अतुलनीय है। यह संस्था हिन्दी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) की परीक्षाओं का प्रमुख केन्द्र है। औपनिवेशिक शोषण और संकट के समय 1914 में हिन्दुस्तानी, 1920 में टाइम्स और 1924 में मॉरिशस मित्र दैनिक पत्र थे । आज मॉरिशस में वसंत, रिमझिम, पंकज, आक्रोश, इन्द्रधनुष, जनवाणी एवं आर्योदय हिन्दी में प्रकाशित होते हैं। वर्ष 2001 में विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना भी मॉरिशस में हो चुकी है।

फिजी
फिजी दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित 322 द्वीपों का समूह है । यहा के मूल निवासी काईबीती है । देश की आबादी लगभग 8 लाख है । इसमें 50 प्रतिशत काईबीती, 44 प्रतिशत भारतीय तथा 6 प्रतिशत अन्य समुदाय के हैं। 5 मई 1871 में प्रथम जहाज लिओनीदास ने 471 भारतीयों को लेकर फिजी में प्रवेश किया था । गिरमिट प्रथा के अंतर्गत आए प्रवासी भारतीयों ने फिजी देश को जहां अपना खून-पसीना बहाकर आबाद किया वहीं हिन्दी भाषा की ज्योति भी प्रज्जवलित की जो आज भी फिजी में अपना प्रकाश फैला रही है।
फिजी की संस्कृति एक सामासिक संस्कृति है, जिसमें काईबीती, भारतीय, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड के निवासी है। इनकी भाषा काईबीती (फीजियन) हिन्दी तथा अंग्रेजी है। फिजी का भारतीय समुदाय हिन्दी में कहानी, कविताएं लिखता है। हिन्दी प्रेमी लेखकों ने हिन्दी समिति तथा हिन्दी केन्द्र बनाए हैं जो वहां के प्रतिष्ठित लेखकों के निर्देशन में गोष्ठियां, सभा तथा प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं। इनमें हिन्दी कार्यक्रम होते हैं कवि और लेखक अपनी रचनाएं सुनाते हैं ।
फिजी में औपचारिक एवं मानक हिन्दी का प्रयोग पाठशाला के अलावा शादी, पूजन, सभा आदि के अवसरों पर होता है। शिक्षा विभाग द्वारा संचालित सभी बाह्य परीक्षाओं में हिन्दी एक विषय के रूप में पढाई जाती है । फिजी के संविधान में हिन्दी भाषा को मान्यता प्राप्त है। कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज,अदालत तथा संसद में भी हिन्दी भाषा का प्रयोग कर सकता है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं तथा रेडियो कारगर माध्यम हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में फिजी हिन्दी साहित्य समिति वर्ष 1957 से बहुमूल्य योगदान दे रही है। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य है हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति को बढावा देना । फिजी में हिन्दी प्रगति के पथ पर है तथा इसका भविष्य उज्ज्वल है।

नेपाल
भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टि से भारत और नेपाल संप्रभु राष्ट्र है, दोनों देशों के बीच पौराणिक काल से संबंध चला आ रहा है, खुली सीमाएं, तीज-ज्यौहार, धार्मिक पर्व-समारोह तथा इन्हें मानाने की शैली और पध्दति की समानता के अतिरिक्त नेपाल में हिन्दी-प्रेम हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए काफी है। नेपाली भाषा हिन्दी भाषी पाठकों लिए सुबोध है। यदि इसमें कोई अंतर है तो लिप्यांतरण का है।
प्रचीन काल में नेपाली में संस्कृत की प्रधानता थी। हिन्दी और नेपाली दोनों भाषाओं में संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्दों की प्रचुरता और इनके उदार प्रयोग के अतिरिक्त नेपाली भाषा में अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी एवं कई अन्य विदेशी शब्दों का हिन्दी के समान ही प्रयोग हिन्दी और नेपाली भाषी जनता को एक दूसरे की भाषा समझने में सहायक रहा है। प्रारंभिक दिनों में नेपाल के तराई क्षेत्रों में स्कूलों में तो शिक्षा का माध्यम हिन्दी बना । काठमांडू से हिन्दी में पत्र-पत्रिका का प्रकाशन हाता है। प्रख्यात नेपाली लेखक, कहानीकार एवं उपन्यासकार डा. भवानी भिक्षु ने तो अपने लेखन कार्य का श्रीगणेश हिन्दी से ही किया। गिरीश वल्लभ जोशी, रूद्रराज पांडे, मोहन बहादुर मल्ल, हृदयचंद्र सिंह प्रधान आदि की एक न एक कृति हिन्दी में ही है।

श्रीलंका
श्रीलंका में भारतीय रस्म-रिवाज, धार्मिक कहानियां जैसे जातक कथा का भंडार आज भी सुरक्षित है । श्रीलंका की संस्कृति वही है जो भारत की है। वहां हिन्दी का प्रचार अत्यंत सुचारू एवं सुव्यवस्थित ढंग से होता रहता है । फिल्म प्रदर्शन, भाषण विचार गोष्ठी आदि का आयोजन होता रहता है। भारत से आई पत्र-पत्रिकाओं जैसे बाल भारती, चंदा मामा, सरिता आदि श्रीलंका में बड़े चाव से पढी ज़ाती हैं। श्रीलंका रेडियो पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। वहां विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाI जा रही है।

यू.ए.ई.
संयुक्त अरब अमीरात देश की पहचान सिटी ऑफ गोल्ड दुबई से है। यूएई में एफ. एम. रेडियो के कम से कम तीन ऐसे चैनल हैं, जहां आप चौबीसों घंटे नए अथवा पुराने हिन्दी फिल्मों के गीत सुन सकते हैं। दुबई में पिछले अनेक वर्षों से इंडो-पाक मुशायरे का आयोजन होता रहा है, जिसमें हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चुनिंदा कवि और शायर भाग लेते रहे हैं। हिन्दी के क्षेत्र में खाड़ी देशों की एक बड़ी उपलब्धि है, दो हिन्दी (नेट) पत्रिकाएं जो विश्व में प्रतिमाह 6,000 से अधिक लोगों द्वारा 120 देशों में पढी ज़ाती हैं। अभिव्यक्ति व अनुभूति www.abhivykti-hindi.org तथा www.anubhuti-hindi.org के पते पर विश्वजाल (इंटरनेट) पर मुफ्त उपलब्ध हैं। इन पत्रिकाओं की संरचना सही अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय है क्योंकि इनका प्रकाशन और संपादन संयुक्त अरब अमीरात से, टंकण कुवैत से, साहित्य संयोजन इलाहाबाद से और योजना व प्रबंधन कनाडा से होता है।
ब्रिटेनवासियों ने हिन्दी के प्रति बहुत पहले से रुचि लेनी आरंभ कर दी थी । गिलक्राइस्ट, फोवर्स-प्लेट्स, मोनियर विलियम्स, केलाग होर्ली, शोलबर्ग ग्राहमवेली तथा ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिन्दीकोष व्याकरण और भाषिक विवेचन के ग्रंथ लिखे हैं। लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क विश्वविद्यालयों में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है। यहां से प्रवासिनी, अमरदीप तथा भारत भवन जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। बीबीसी से हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित होते हैं ।
संयुक्त राज्य अमेरिका में येन विश्वविद्यालय में 1815 से ही हिन्दी की व्यवस्था है। वहां आज 30 से अधिक विश्वविद्यालयों तथा अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा हिन्दी में पाठ्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 1875 में कैलाग ने हिन्दी भाषा का व्याकरण तैयार किया था। अमरीका से हिन्दी जगत प्रकाशित होती है ।
रूस में हिन्दी पुस्तकों का जितना अनुवाद हुआ है, उतना शायद ही विश्व में किसी भाषा का हुआ हो। वारान्निकोव ने तुलसी के रामचरितमानस का अनुवाद किया था। त्रिनीडाड एवं टोबेगो में भारतीय मूल की आबादी 45 प्रतिशत से अधिक है। युनिवर्सिटी ऑफ वेस्टइंडीज में हिन्दी पीठ स्थापित की गई है। यहां से हिन्दी निधि स्वर पत्रिका का प्रकाशन होता है। गुयाना में 51 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय मूल के हैं। यहां विश्वविद्यालयों में बी.ए. स्तर पर हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की गई है। पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू है, जो हिन्दी का ही एक रूप है । मात्र लिपि में ही अंतर दिखाई देता है। मालदीव की भाषा दीवेही भारोपीय परिवार की भाषा है । यह हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा है। फ्रांस, इटली, स्वीडन, आस्ट्रिया, नार्वे, डेनमार्क तथा स्विटजरलैंड, जर्मन, रोमानिया, बल्गारिया और हंगरी के विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है ।
इस प्रकार हिन्दी आज भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के विराट फलक पर अपने अस्तित्व को आकार दे रही है। आज हिन्दी विश्व भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। अब तक भारत और भारत के बाहर सात विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं। पिछले सात सम्मेलन क्रमश: नागपुर (1975), मॉरीशस (1976), नई दिल्ली (1983), मॉरीशस (1993), त्रिनिडाड एंड टोबेगो (1996), लंदन (1999), सूरीनाम (2003) में हुए थे। अगला विश्व हिन्दी सम्मेलन 2007 में न्यूयार्क में होगा। इसके अतिरिक्त विदेश मंत्रालय क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन का भी आयोजन करता रहा है। अभी तक ये सम्मेलन ऑस्ट्रेलिया और अबूधाबी में फरवरी, 2006 तथा तोक्यो में जुलाई 2006 में किए गए थे। अभी हाल ही में शुक्रवार, 18 अगस्त, 2006 को विदेश मंत्रालय ने हिन्दी वेबसाइट का शुभारंभ किया है। यह वेबसाइट माइक्रोसॉपऊट विंडोज प्रोग्राम और यूनीकोड पर आधारित है । इसे देखने के लिए कोई फॉन्ट डाउनलोड करने की आवश्यकता नहीं है। वेबवाइट का पता है : www.mea.gov.in ।
वर्तमान में आर्थिक उदारीकरण के युग में बहुराष्ट्रीय देशों की कंपनियों ने अपने देशों (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन आदि) के शासकों पर दबाव बढाना शुरू कर दिया है ताकि वहां हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार तेजी से बढे ऒर हिन्दी जानने वाले एशियाई देशों में वे अपना व्यापार उनकी भाषा में सुगमता से कर सकें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की प्रगति यदि इसी प्रकार होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ में एक अधिकारिक रूप हासिल कर लेगी।
राकेश शर्मा निशीथ

सायबर अपराध

भारत में पहली इंटरनेट सेवा की शुरुआत वी.एस.एन.एल. द्वारा 14 अगस्त, 1995 को हुई। लेकिन इंटरनेट पर होने वाले अपराधों को रोकने का पहला क़ानून (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000) 17 अक्तूबर, 2000 को लागू हुआ और देश में पहले सायबर पुलिस थाने की स्थापना बंगलोर में 4 सितम्बर, 2001 को हुई और पहले सायबर अपराधी आरिफ़ आज़िम की गिरफ्तारी 24 जुलाई, 2002 को हो पाई।

ज़ुर्म की शुरुआत उससे संबंधित क़ानूनों के बनने से पहले हो जाती है। नए क़ानून बनाने या पुराने क़ानूनों में संशोधन की जरूरत तब महसूस होती है जब किसी ज़ुर्म को पुराने क़ानूनों की मदद से रोकना असंभव हो जाता है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि क़ानून की मौजूदगी भी ज़ुर्म को होने से नहीं रोक पाती। ज़ुर्म करने वाले या तो क़ानूनों से अनजान होते हैं या फिर उनकी परवाह नहीं करते। क़ानून ज़ुर्म करने वाले के पीछे चलता है और अपराधी को पकड़ पाना तभी संभव हो पाता है जब क़ानून के कारिंदे अपराधी से अधिक तेज रफ्तार में उसका पीछा करते हैं। सायबर अपराधों के मामले में स्थिति कुछ और विचित्र है। यहां अपराधी अपने ठिकाने पर बैठे-बैठे ज़ुर्म को अंजाम देते हैं और सफेदपोश बनकर पुलिस की नजरों से ओझल रहते हैं। जब कोई अपराध करके भाग रहा हो तो पुलिस के लिए उसके मूवमेंट पर लगातार नज़र रखते हुए पकड़ लेना अपेक्षाकृत आसान रहता है, लेकिन जब अपराधी भाग नहीं रहा हो तो उसे पकड़ पाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती होती है।

सायबर अपराधियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलाने के मामले में एक बड़ी दिक्कत तो यह है कि न तो पुलिस इंटरनेट टेक्नोलॉजी में पर्याप्त प्रशिक्षित है, न वकील और न ही जज। वे क़ानून तो अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन टेक्नोलॉजी को नहीं। जबकि सायबर अपराधी टेक्नोलॉजी के मामले में अक्सर बेहतर प्रशिक्षित होते हैं। और, टेक्नोलॉजी इतनी तेज रफ्तार से आगे भागती है कि नया से नया क़ानून भी कुछ ही अरसे में अप्रासंगिक लगने लगता है। वर्ष 2000 में जब भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम नामक विशेष क़ानून लागू हुआ था तो इसे क़ानून के क्षेत्र में एक अत्यंत क्रांतिकारी और दूरगामी कदम माना गया, लेकिन कुछ ही वर्ष बाद यह क़ानून अपर्याप्त साबित होने लगा। लिहाजा उक्त क़ानून में संशोधन की जरूरत और मांग को देखते हुए एक विशेषज्ञ समिति के सुझावों के आधार पर काफी विचार-विमर्श के बाद सरकार ने 15 दिसम्बर, 2006 को लोक सभा के शीतकालीन सत्र में उक्त क़ानून में व्यापक संशोधन किए जाने के लिए एक विधेयक पुर:स्थापित किया है। हालांकि प्रस्तावित नए क़ानून के दायरे में सायबर अपराध के विभिन्न रूपों को लाने की कोशिश की गई है, लेकिन कहना मुश्किल है कि उनको लागू करा पाना प्रवर्तन एजेंसियों के लिए कहां तक संभव हो सकेगा। प्रस्तावित संशोधनों के कारगर सिद्ध होने पर अभी से संदेह व्यक्त किए जाने लगे हैं।

इंटरनेट से जुड़े अधिकांश अपराध चूंकि भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं, दूसरी राष्ट्रीयता वाले सायबर अपराधियों को अपने क़ानूनों के दायरे में ला पाना और उनपर मुकदमा चलाना बहुत मुश्किल होता है, भले ही ऐसा करने के लिए क़ानूनी उपबंध मौजूद हों। उदाहरण के लिए, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 75 (1) में कहा गया है -

….the provisions of this Act shall apply also to any offence or contravention committed outside India by any person irrespective of his nationality.

(…इस अधिनियम के उपबंध भारत से बाहर किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अपराध अथवा उल्लंघन पर भी लागू होंगे, चाहे उसकी राष्ट्रीयता कुछ भी हो।)

क़ानून की इस धारा का इस्तेमाल अमेरिका में बसे भारतीय मूल के युवक गौतम प्रसाद द्वारा दिसम्बर, 2006 में यूट्यूब.कॉम की वीडियो शेयरिंग सेवा के जरिए अपनी वेबसाइट पर महात्मा गांधी की वेशभूषा वाले एक व्यक्ति को अश्लील हरकतें करते दिखाए जाने के मामले में किया जा सकता था, लेकिन इस मामले पर देश भर में हुई व्यापक और तीव्र प्रतिक्रिया को सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संज्ञान में लाए जाने के बावजूद उसने इस मामले में कोई कार्रवाई करने की पहल नहीं की। जबकि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत इंडियन कंप्यूटर इमर्जेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी-इन) के पास इस मामले में समुचित कार्रवाई कर सकने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं। अलबत्ता उक्त वीडियो के कुछ अंश ख़बर के रूप में सीएनएन-आईबीएन तथा सहारा टी.वी. द्वारा दिखाए जाने पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उन दोनों न्यूज चैनलों को नोटिस जरूर भेज दिया।

राज्य सभा में प्रश्न काल के दौरान 15 मार्च, 2007 को संसद सदस्य जनेश्वर मिश्र द्वारा इस बारे में प्रश्न किए जाने पर संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री दयानिधि मारन का उत्तर था:

A website by the name http://youtube.com has hosted some objectionable content regarding Mahatma Gandhi. This said website is hosted on servers in United States of America. Information Technology Act, 2000 together with Indian Penal Code provides a legal framework to check misuse of websites and cyber crimes in India.

However, the websites hosted on the servers abroad are subject to the laws of those countries. This poses technological as well as legal issues in taking action against such websites.

(यूट्यूब.कॉम नामक एक वेबसाइट ने महात्मा गांधी के बारे में कुछ आपत्तिजनक सामग्री होस्ट की है। उक्त वेबसाइट संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित सर्वरों पर होस्ट है। भारतीय दंड संहिता के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत भारत में वेबसाइटों के दुरुपयोग और सायबर अपराधों को रोकने के लिए क़ानूनी कार्यढांचे का उपबंध है।

तथापि, विदेश स्थित सर्वरों पर होस्ट किए गए वेबसाइट उन देशों के क़ानूनों के अध्यधीन हैं। इसलिए ऐसी वेबसाइटों के विरुद्ध कार्रवाई कर सकने में प्रौद्योगिकीय तथा विधिक मुद्दों की अड़चनें है।)

इस मामले में बंगलौर स्थित एक गैर-सरकारी संगठन डिजिटल सोसायटी फाउंडेशन द्वारा कर्णाटक उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके भारत सरकार को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिए जाने की मांग की गई। इस मामले में 16 अप्रैल, 2007 को सुनवाई होनी थी, लेकिन फिलहाल यह सुनवाई कुछ और दिनों के लिए टल गई है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में इंटरनेट पर इस तरह की आपत्तिजनक सामग्री को प्रकाशित या प्रचारित करने के दोषी व्यक्तियों के लिए दंड का मौजूदा प्रावधान निम्नानुसार है:

67. Whoever publishes or transmits or causes to be published or transmitted in the electronic form, any material which is lascivious or appeals to the prurient interest or if its effect is such as to tend to deprave and corrupt persons who are likely, having regard to all relevant circumstances, to read, see or hear the matter contained or embodied in it, shall be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to two years and with fine which may extend to five lakh rupees and in the event of second or subsequent conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to five years and also with fine which may extend to ten lakh rupees.

लेकिन, प्रस्तावित नए विधेयक में उक्त उपबंध के साथ एक और उपबंध जोड़ते हुए निम्नानुसार दंड का प्रावधान भी किया गया है:

67A. Whoever publishes or transmits or causes to be published or transmitted in the electronic form any material which contains sexually explicit act or conduct shall be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to five years and with fine which may extend to ten lakh rupees and in the event of second or subsequent conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years and also with fine which may extend to ten lakh rupees.

इन उपबंधों के संदर्भ में निम्न स्पष्टीकरण भी जोड़ा गया है:

This section and section 67 does not extend to any book, pamphlet, paper, writing, drawing, painting, representation or figure in electronic form the publication of which is proved to be justified as being for the public good on the ground that such book, pamphlet, paper, writing, drawing, painting, representation or figure is in the interest of science, literature, art or learning or other objects of general concern; or which is kept or used bona fide for religious purposes.