Friday, April 10, 2009
ना भूलने वाली बात-2
पत्रकारिया के पेशे में आने से पहले जिन्दगी के तमाम रंग हमने देखे है. लेकिन कभी उसे शब्दों में उसे नहीं बाँधा । कुछ अपने अनुभवों को शब्दों में ढाल कर प्रसिद्धि पा लेते है. लेकिन मेरा ऐसा मकसद नहीं है. मैंने अपने एक पोस्ट में ना भूलने वाली बात में छोटा सा अनुभव लिखा था जिसे अपलोगो ने पढ़ा और सराहा. हालाँकि मेरा दिल्ली में यह शुरूआती अनुभव था । अबतक के हालत को शब्दों में ढाले तो कई छोटी कहानिया बन जायेगी. लेकिन एक बात तय है महानगरो में आकर अपने सपने को सच बनाने की तमन्ना रखने वाले या फिर उन अभिभावकों के लिए जो अपने बच्चों को कुछ बनाने के लिए यहाँ भेजते है उनके लिए, ऑंखें खोलने वाली चीज जरुर होगी . अगली पोस्ट में आप जैसे लोगो के लिए मै अपने अनुभव को शेयर करूँगा. लेकिन इसे सिर्फ पढेंगे कही प्रकाशित नहीं करेंगे, यह निवेदन है. क्योंकि सच बहुत कड़वा होता है. और मैं भी अपने अतीत को छुपाना चाहता हूँ ।
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