Sunday, November 2, 2008

इस देश पर हम सबका हक ह

ैसंजय कुमार

जो हो रहा है, वह ठीक नहÈ हैण् आज आतंकवाद जैसे कई समस्याओं से हम जूझ रहे हैंण् विघटनकारी शक्तियां सक्रिय हैण् ऐसे में राज्य स्तरीय राजनीति के कारण ऐसा लगने लगा है कि हम एक देश नहÈ, अपितु कई देशों में रह रहे हैंण् ारतीय संविधान में स्पष्ट उल्लेख है कि कोई ी कहÈ ी रहने, आजीविका पाने का अधिकार रखता हैण् कई कारणों से लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं, केवल गरीबी ही नहÈ है, शिक्षा के लिए लोग बाहर जाते हैंण् अपने को बेहतर साबित करने के लिए लोग दूसरे राज्य जाते हैंण् कोटा में अधिकतर उत्तर ारत के छात्र कोÇचग के लिए जाते हैं, तो क्या राजस्थान कहेगा, यहां केवल राजस्थानी ही पढ़ सकत हैंण् ऐसे में तो देश की अवधारणा ही खत्म हो जायेगीण् दूसरी ओर इसके प्रतिक्रियास्वरूप जो Çहसात्मक विरोध का तरीका अपनाया गया, उसे ी जायज नहÈ ठहराया जा सकताण् अपना विरोध राजनीतिक नेतृत्व के सामने रखिएण् राज्य का नेतृत्व इस मुद्दे पर अपनी चिंताएं प्रकट करेगाण्
बिहार में 15 सालों से विकास का अवरुद्ध रहा है, इसके कारण अधिकतर लोग इस क्षेत्र से दूसरे राज्य में जाते हैंण् ऐसा नहÈ है कि सिर्फ गरीब ही पलायन करतेे हैं, अमीरों में एक खूबी है कि वह जहां जाते हैं वहां के माहौल में घुल जाते हैंण् उनके खिलाफ गरीबों जैसा उपद्रव नहÈ होता हैण् उन्हें कोई कुछ नहीं कहताण् मजदूर बड़ी संख्या में जाते हैंण् वहां उनकी जरूरत ी हैण् चुनावी ला हासिल करने के राजनेता ी क्षेत्रवाद को बढ़ावा देते हैं, वे तोड़ने की राजनीति अधिक करते हैं बजाय जोड़ने केण् महाराष्ट सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक सी फायदे की राजनीति कर रहे हैंण् महाराष्ट में जो पुलिस राज ठाकरे पर अंकुश लगा सकती थी, उस पर राज्य सरकार का दबाव होने की वजह से वह ी मूक बनकर रह जाती हैण्
एक सवाल यह ी उठता है कि केंद्र की सत्ता में उत्तर ारतीय नेताओं की संख्या अधिक होने के बावजूद आखिर इन क्षेत्रों में विकास अवरूद्ध क्यों रहाण् आखिर क्यों यहां के लोग दूसरे राज्यों में आजीविका के लिए जाने को मजबूर हैण् इसका ऐतिहासिक पहलू हैण् उत्तर ारत खासकर बिहार, झारखंड और यूपी की बात करें, तो वहां सामंतवादी समाज हमेशा से व्याप्त रहीण् जमीन के रिश्ते नहÈ बदलेण् ूमि सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी रहीण् शिक्षा को लेकर ी प्रयास बहुत निम्न स्तर की रहीण् साथ जनसंख्या पर नियंत्रण को लेकर गंीर प्रयास नहÈ हुएण् दूसरी वहां आजीविका के रूप में जमीन ही थीण् एक ही पेशा था, जमीन से उपजाओ और खाओण् दूसरी ओर पंजाब जैसे राज्यों ने हरित क्रांति कर सामजिक तानेबाने को ध्वस्त कियाण् दक्षिण के राज्यों में गुजरात आदि की बात करें हर शिक्षा, रोजगार के स्तर पर काफी तरôी कीण् समुद्र तटीय इलाका होने के कारण कई राज्यों में व्यापारिक माहौल पैदा हुएण् लोगों को रोजगार मिलाण् दूसरी ओर उत्तर ारत में लैंड लॉक्ड होने के कारण इस तरह के विकास नहÈ हुएण् तीसरी, स्वतंत्रता के बाद जिन दलों ने इस क्षेत्र का नेतृत्व किया, पहले कांग्रेस और बाद में लालू जैसे नेताओं ने राजनीतिक फायदे के लिए गरीबी-अमीरी के बीच विेद को और बढ़ाने का काम कियाण् गरीब और निरक्षर व्यक्ति राजनीतिक ाषा कम जाति व सांप्रदायिक ाषा को अधिक समझते हैंण् उनमें व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहÈ होतीण् जबकि अमीर व संपé व्यक्ति आवाज उठाने में नहÈ हिचकते, इसको ध्यान में रखते हुए वहां के राजनेताओं ने राजनीति कीण् अमत्र्य सेन जैसे आर्थशािóयों ने ी अमीरी-गरीबी के विेद को लेकर ऐसी ही बातों उठायी हैंण् बदलाव के लिए आवाज उठाने के लिए आम आदमी में उतनी क्षमता नहÈ रह जाती हैण् व्यक्तिगत स्तर पर कोई प्रयास उतना कारगर हो ी नहÈ सकताण् राजनैतिक इच्छाशक्ति ही बदलाव ला सकती हैण् दरअसल, इस देश में आइडिया ऑफ नेशन और आइडिया ऑफ सिटीजनशिप की अवधारणा स्पष्ट नहÈ हो पायी हैण्
यह सवाल उठना जायज है कि जब की विदेशों में ारतीयों के खिलाफ उपद्रव होती है, तो यहां राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो जाती है, लेकिन अपने देश में जब ऐसी घटना होती है, तो केंद्र गंीरता से नहÈ लेताण् दरअसल, वह विदेश की बात है, वहां के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहÈ किया जा सकताण् एंबेसी के माध्यम से अपनी Çचताए व्यक्त की जाती हैण् जब यह हमारा अपना मसला हैण् इसमें नेताओं का सीधा हस्क्षेप हैण् यहां वह गलत है या सही है, यह नहÈ देखते, बल्कि इसमें फायदा है या नहÈ, इसे देखकर कोई कदम उठाते हैंण् महाराष्ट में जो कुछ हुआ, जिस तरह से वहां की पुलिस व्यवस्था ने कदम उठाये, महाराष्ट सरकार की ओर से कदम उठाये गये, केंद्र का नरम रुख रहा, बिहार के नेता एक मंच पर आये या फिर यूपी के नेताओं की बयानबाजी को ले, सबको एक ही नजर से देखा जाना चाहिएण्
इस पूरे प्रकरण पर मैं यह कहूंगी कि महाराष्ट सरकार को राजठाकरे को रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन को सपोर्ट करनी चाहिएण् सिटी से सिटीजनशिप की अवधारणा को समझेण् आप यह समझे कि निम्न स्तर के काम के लिए आप इन्हÈ पर निZर हैण् उनके बिना आपका काम नहÈ चल सकताण्
साथ ही उत्तरारतीय निवासियों के लिए ी यह समझ लेना चाहिए कि Çहसात्मक प्रतिरोध समस्या का हल नहÈ हैण् इससे विरोध के तरीके को जायज कहलाने का हक मिल जाता है और वास्तविक समस्या जस की तस रह जाती हैण् साथ ही उत्तर ारतीय नेताओं के लिए सुझाव के तौर पर मैं यह कहना चाहूंगी कि वे दक्षिण ारत से सबक लेण् वहां के नेता ी राजनीति करते हैं, लेकिन साथ ही विकास के लिए काम करते हैंण् आप आरोप-प्रत्यारोप की जगह अपने क्षेत्र में विकास को आगे बढ़ाये, अपने प्रदेश की जनता को अपमानित न होना पड़े, इसके लिए सोचे-विचारेण्

रवÈद कौर, प्रोफेसर, समाजशाó, आइआइटी, दिल्ली, से बातचीत पर आधारित

Wednesday, October 15, 2008

पत्रकारिता और मै

वर्ष २००१ के आखिरी महीने की बात है मुजफ्फरपुर से दिल्ली आया था शिक्षा के नए आयाम की तलाश में । पता नहीं था आखिरी दौर में पत्रकारिता को ही मंजिल बनाऊंगा । गाँव और शहर के बिच पला मेट्रो शहर की चकाचौंध से दूर इस अनजाने शहर में आ तो आ गया लेकिन क्या करना है क्या नहीं करना है इसकी कोई खास जानकारी नहीं थी फ़िलहाल तो इस बेहद खर्चीले शहर में आर्थिक विपन्नता से उबरने का ही ध्येय था । बडे भाई के साथ जिस फ्लैट में ठहरा था उसी कुछ लोग और भी थे जो ए थे मेरी ही तरह किसी मंजिल की तलाश में लेकिन वे लोग इस विपन्नता से उबरन सिख चुके थेमेरे लिए अछि बात थी की उनका संपर्क था उन्ही के दिखाए मार्ग पर चला ८०० रुपये की तनख्वाह पर टूशन पकड़ी । इस पेशे में भी कई समस्याएँ थी सुंदर चेहरा आकर्षक परिधान साथ ही दिल्ली की स्थानीय भाषा का सही सही उच्चारण जैसे किसी मोडेलिंग कंपनी के मातहत रैंप पर उतरने जा रहे हो चुक हुई तो शिष्यों की हंसी का पात्र बनिए इनसे बच निकले तो मन सम्मान के साथ मनचाहे कीमत भी ऊपर वाले ने चेहरा तो ख़राब नहीं दिया इतना कुछ तो जानकारी थी की बच्चो को अपनी ज्ञान की शेखी बघार उन्हें बारगल सकू यहाँ इस पेशे का एक कायदा है आप कुछ भी पढाये अंक अच्छे आने चाहिए यहाँ चालाकी यही है स्तुन्देंट्स असे खोजे जो खुद ही इतने काबिल हो की अच्छे अंक ले आये मेरी किस्मत यहाँ साथ थी सरे स्टुडेंट उच्चबुद्धि वाले थे इसीतरह महीने की ढाई से तिन हज़ार का जुगार हो गया अब आगे उस रह को तलासने की बरी थी जिसे संजोये में दिल्ली आया था

Thursday, July 31, 2008

हवाईकिलाबंदी है तीसरा मोर्चा

संजय कुमार
वर्तमान में जिस तरह का राजनीतिक समीकरण उरकर सामने आया है, उससे यह कहना कि वाम समर्थित और अचानक मुख्य केंद्र में आयी मायावती की अगुवाइवाली नवगठित तीसरा मोर्चा किसी कामयाब मंजिल को तय कर पायेगी, संदेहास्पद हैण् दरअसल, इस नये तीसरे मोर्चे का गठन बुलबुले और हताशा से अधिक प्रेरित हैण् यह तीसरा मोर्चा किसी ठोस बुनियाद पर नहÈ खड़ा हैण् इसमें शामिल क्षेत्रीय दल ी मौकापरस्त राजनीति के मातहत एक झंडे के तहत शामिल हुए हैंण्
इस नवगठित तीसरे मोर्चे के विष्य की बात करें, तो कोई सार्थक उपलब्धि मुझे नहÈ दिखायी देताण् तेलगू देशम पार्टी जो कल तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गंठबंधन का अंग थीण् इस मोर्चे में शामिल जरूर हुई है, पर उसके अपने राजनैतिक सैद्धांतिक बाध्यताएं हैंण् वह कबतक इस मोर्चे को सहयोग करेगी, यह देखनेवाली बात होगीण् जहां तक वामपंथियों का सवाल है, जिस तरह के समीकरण अी दिख रहे हैं, उनका आधार आनेवाले चुनाव में खिसकेगाण् केरल व पश्चिम बंगाल के पिछले परि.श्य पर नजर डाले, तो यह स्पष्ट दिखता हैण् वैसे ी कांग्रेस ने वामपंथियों के लिए दरवाजे अी बंद नहÈ किये हैंण् कोई वजह नहÈ मौकापरस्त सत्ता संस्—ति आनेवाले दिनों में वामदलों को कांग्रेस के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित न करेंण्
यह कहना कि तीसरा मोर्चा केंद्र की राजनीति में ती स्थायित्व पा सकता है, जब तक कि बड़ी पार्टियां कांग्रेस या ाजपा कोई एक समर्थन न करेंण् चंद्रशेखर की सरकार जिस तरह के समीकरण के साथ सत्ता में आयी, वैसे हालात अी तो नहÈ दिखतेण् सवाल यह है कि क्या कांग्रेस चार-साढ़े चार वर्ष केंद्र की सत्ता पर काबिज रहकर 6-8 महीने बाद आगामी चुनाव में तीसरे मोर्चे से सहयोग करने के तैयार होगीण् आखिर वह जनता के बीच क्या लेकर जायेगीण् ाजपा ी अी अपने आपको कमतर नहÈ मान रही हैण् वह ी फिलवक्त अपने आप को बेहतर मान रही हैण् ऐसे में तीसरे मोर्चे को कोई सपोर्ट मिलेगा, सवाल ही नहÈ उठताण् तीसरे मोर्चे के अभ्युदय तथा इसकी मजबूती को लेकर चर्चाएं हो रही हैं, वह हवाई किला बनाकर अखबारों की सुिर्खयों में बनाने का एक कुप्रबंध हैण् हालांकि इसकी वजह से बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती को थोड़ा ला जरूर मिला हैण् एक सशक्त नेतृत्व बताकर अपने को प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करने का ला मायावती को दूसरे राज्यों तक विस्तार करने के लिए मौके जरूर प्रदान किये हैंण् लेकिन आनेवाले चुनाव में मायावती को यह कितना ला पहुंचायेगी, इस पर संदेह हैण् वंचितों के बीच दलितों का सवाल उठाकर वह सहानुूति व ावनात्मक जुड़ाव लाने के लिए वह हमेशा से इस तरह की बातें करती रही हैंण् लेकिन प्रधानमंत्री का ख्वाब उसके लिए एक हसीन सपने जैसा हैण् दूसरे वामदलों के साथ सबसे मुश्किल यह है कि वह सिद्धांवादी होने का दं तो रते हैं, लेकिन अपने को केंद्र में नहÈ लातेण् वरना मायावती की तरह प्रकाश करात ी अपने आप को प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार के रूप में पेश करते नजर आतेण् वामदलों का जनाधार काफी नपा तुला और फिक्स हैण् इस बात की पूरी संावना है कि आनेवाले चुनाव में उसका जनाधार खिसकेगाण् इसके अलावा जो ी दल है, वह बरसात के पानी की तरह हैण्
इतिहास में जायें, तो की ी चुनाव में विदेश नीति बड़ा मुद्दा बनकर नहÈ आया हैण् किसी ी दल को इसका ला नहÈ मिला हैण् हां, युद्ध जैसी बात हो, शांति-सद्ाववाली बात हो, पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश से जुड़ा कोई मसला हो तो इसका ला मिलता हैण् जैसा कि 1973 तथा 1998-99 के कारगिल प्रकरण के समय हम देख चुके हैंण् चुनाव में वामदल आखिर क्या मुद्दा लेकर जायेंगे? बसपा को पिछले चुनाव में ला मिला, तो इसके पीछे चारकोणीय प्रतिद्वंद्विता (बसपा, सपा, ाजपा तथा कांग्रेस) थीण् यदि आगामी चुनाव में सपा कांग्रेस के साथ गंठजोड़ कर लेती है, तो उसे कितना ला मिल पायेगा, यह देखनेवाली बात होगीण् यह ी एक तथ्य है कि न तो बसपा साम्यवादियों को ला पहुंचा सकती है, न ही साम्यवादी उसेण्
इनकी एकजुटता कितने समय तक बनी रहती है, इस पर ी संदेह हैण् हालिया राजनीतिक घटनाक्रम से वामपंथियों ने ी अपने मौकापरस्त चरित्र को सामने ला दिया हैण् दूसरी तरफ बसपा तो पहले से ही कहती रही है कि जो हमे सत्ता में हिस्सेदारी देगा, हम उसके साथ हो लेंगेण् उसकी अपनी कोई आइडियोलॉजी या सिद्धांत नहÈ हैण् उत्तर प्रदेश या हरियाणा के अन्य छोटे दल कितना हद तक सहयोग कर पायेंगे, इस पर शक ही हैण्
दरअसल, तीसरा मोर्चा एक ऐसा बास्केट बन गया है, जहां हर कोई की ी आ सकता है, की ी बाहर हो सकता हैण् छोटे दलों या निर्दलियों की पूछ दशक में की कार ही आता हैण् नरसिंह राव के जमाने में झामुमो ने सरकार बचाने के लिए अपनी बोली लगायी थीण् दूसरा वाकया हमने इस बार देखा हैण्
विगत में तीसरा मोचा± यदि कामयाब नहÈ हुआ है, तो इसके पीछे सबसे बड़ी सिद्धांतविहीन राजनीति हैण् वििé धारा व सोचवालों के लिए यह अंदर-बाहर होते रहने का एक जरिया बनकर रह गया हैण् इसमें अधिकतर शोषित तबके ही आते हैंण् जिनका उद्देश्य मौकापरस्त राजनीति का ला उठाना होता हैण् एक सशक्त नेतृत्व का अाव ी इसके विघटन का कारण बनता रहा हैण्
पुष्कर राज, राजनीतिक विश्लेषक से बातचीत पर आधारितण्

घट रही है समझौता करने की प्रवृित्त

संजय कुमार
byline
परिवार में बढ़ रहे बिखराव को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय की टिप्पणी उल्लेखनीय हैण् यह समाज में बढ़ रहे नैतिक मूल्यों में हृास को इंगित करता हैण् दरअसल, सर्वाेच्च न्यायालय ने 1955 में बने Çहदू विवाह अधिनियम के संदZ में यह कहा है कि तलाक और दांपत्य जीवन बहाल करने का यह कानून अंग्रेजों के समय में बनाया गया है जबकि आज की परिस्थितियां काफी कुछ बदल चुकी हैंण् इस कानून में समय के साथ कई बार फेरबदल किये गयेण् लेकिन यह कानून परिवारों को जोड़ने की बजाय उन्हें विखंडित व पति-पत्नी के बीच अलगाव बढ़ाने का कारण बन रहा हैण् यह बच्चों के दीघZकालिक स्वस्थ विष्य के लिहाज से सही नहÈ हैण् समाज के बदलते माहौल पर Çचता जताते हुए न्यायालय ने पूर्वजों के रीति-रिवाजों और पारिवारिक कायदों की याद दिलाते हुए कहा कि पुराने जमाने में हमारे पूर्वज आपस में ऐसे मामले स्वयं की पहल से बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया करते थे, लेकिन आज के समय में कानूनी आड़ लेकर तलाक जैसे मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखने को मिल रही हैण्
दरसअल, सर्वाेच्च न्यायालय किसी ी मसले पर दो तरह से अपनी राय या निर्णय रखती हैण् पहला किसी मुद्दे पर और दूसरा विचारो की अिव्यक्ति परण् सर्वाेच्च न्यायालय ने तलाक के मामले और परिवार के बिखराव को लेकर जो विचार रखे हैं, वह एक अच्छा कदम हैण् सर्वाेच्च न्यायालय ऐसे मामलों पर गहन छानबीन कर ही कोई निर्णय देती हैण् पारिवारिक कलह जब अदालत में पहुंचता है, तब न्यायालय परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेती हैण् पारिवारिक कलह से तंग आकर अदालत में तलाक की अजÊ देनेवाले मामले ी कई प्रकार के होते हैंण् मसलन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका उद्देश्य ही तलाक लेना होता हैण् जबकि कई मामलों में इसकी वजह संपित्त, जाति, नौकरी, कैरियर आदि होता हैण् न्यायालय ी पहले दोनों पक्षों को मामले को खुद निपटाने के लिए समय देती हैण् तलाक का कोई ी मामला सामने आने पर जज की पहली कोशिश उस रिश्ते को बचाने की होती हैण् इसके लिए दोनों पक्षों की काउंसÇलग ी करवाई जाती हैण् इस प्रक्रिया के असफल होने के बाद न्यायालय पति-पत्नी के आरोप-प्रत्यारोपों को सुनती है और सारे सबूतों पर विचार करने के बाद दंपति को अलग होने की अनुमति देती हैण् किसी ी निर्णय को लेते समय न्यायालय बच्चे की इच्छा और विष्य को केंद्र में रखती हैण् वह उन सी पहलुओं पर गौर करती है, जिससे कि बच्चे का विष्य खराब न होण् हां, कानून की आड़ में कुछ लोग इसका दुरुपयोग जरूर कर रहे हैं, जो Çचताजनक हैण्
ारतीय परिवारों में बिखराव की कई वजहें हैंण् जैसे- जैसे नगरीकरण और शहरीकरण की गति बढ़ रही है लोगों में गांव से शहर की ओर रुख करने की प्रवृित्त बढ़ी हैण् स्थान परिवर्तन होने से संयुक्त परिवार एक साथ नहÈ रह पाते हैंण् उनपर एक तरह का दबाव होता हैण् आर्थिक दबाव मुख्य वजह है स्थान परिवर्तन के लिएण् एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने से पति और पत्नी के बीच दूरी बढ़ती हैण् बढ़ते खर्च और आर्थिक तंगी की वजह से पति-पत्नी दोनों रोजगार करने पर मजबूर होते हैंण् इसके अलावा प्रतिस्पद्धाZत्मक मनोवृित्त ी बढ़ रही हैण् यह एक दुविधाजनक स्थिति होती हैण् इससे पारिवारिक स्तर पर कई तरह के बदलाव आता हैण् स्थान परिवर्तन से परिवेश बदलता हैण् परिवेश व्यक्ति की मनोवृित्त को बदलती हैण् जिस कारण दोनों पक्षों में समझौता करने की प्रवृित्त का हृास हो रहा है, सहनशीलता और सहिष्णुता की ावना घटी हैण् ऐसे में दो व्यक्तिगत अहं के बीच टकराव बढ़ता हैण् एक-दूसरे के साथ बंधे रहने की प्रवृित्त में कमी आती हैण् सहनशीलता की कमी अलगाव को प्रेरित करता हैण् पारिवारिक मूल्यो में परिवर्तन व क्षरण की प्रवृित्त ने ी अलगाव को प्रेरित किया हैण् आर्थिक निZरता, शिक्षा स्वािमान, कामयाबी महत्वाकांक्षा ी इसमें प्रमुख कारक है, जो बिखराव के लिए जिम्मेवार हैण् आज परिवार का दायरा सिमटता जा रहा हैण् यह ी देखने को मिल रहा है कि आर्थिक मजबूरी के कारण वृद्धों को अकेलेपन की Çजदगी जीना पड़ता हैण् इसका एक पक्ष यह ी है कि समाज की परिाषा बदल रही हैण् बिरादरी का दबाव अब मायने नहÈ रख पा रहा हैण् पहले शादी-ब्याह जैसे रिश्तो पर बिरादरी का दबाव होता थाण् दूसरी जाति या धर्म में शादी करने पर बिरादरी से निकाले जाने का डर रहता थाण् हालांकि हम यूं नहÈ कह सकते कि हमारे समाज में बिरादरी प्रथा समाप्ति की कगार पर हैण् आज ी देश के बड़े हिस्से में बिरादरी का अस्तित्व हैण् स्थान परिवर्तन होने के बावजूद युुवा अपनी जाति बिरादरी और समाज से जुड़े हुए हैण् वह बहुत स्वतंत्र होकर अपना निर्णय शायद ही ले पाते हैंण् यह सही है कि उदारीकरण के कारण पाश्चात्य संस्—ति का प्राव हमारे समाज पर पड़ा है, लेकिन पश्चिम के देशों की तुलना में हमारे यहां अी ी परिवार का बिखराव कम हैण् परिवार के बिखराव में कई आर्थिक और सामाजिक मानसिक दबाव अहम ूमिका निाते हैंण् पश्चिम के बनिस्बत हमारे देश में ग्रामीण आबादी अधिक है, जो परंपरागत व्यवसाय से जुड़े हैंण् यही कारण है कि हमारे देश में सहनशीलता, अपने माता-पिता और समाज के प्रति युवाओं में श्रद्धााव अधिक है, जबकि पश्चिम में व्यक्तिवादी सोच और ौतिकतावादी प्रवृित्त के चलते युवाओं में परिवार और समाज की बजाय व्यक्तिगत उपलब्धि अधिक महत्वपूर्ण होता हैण् सामूहिकता से व्यक्तिवादी सोच के नजरिये ने समाज और परिवार को अलग कर दिया हैण् परिवार के बिखराव को रोकने के लिए मूल्य आधारित सोच व शिक्षा को आधार बनाया जा सकता हैण् स्वार्थपरकता को मूल्यपरकता में बदलना होगाण् इस समस्या के समूल निदान के लिए कानून की बजाय समाज की समग्रतावादी समन्वय की ावना कहÈ अधिक महत्वपूर्ण हैण्
आज युवाओं को समाज और परिवार के अस्तित्व में ही खुद के अस्तित्व को तलाशने की जरूरत हैण् किसी ी समाज की उéति उस समाज में रह रहे लोगों के बीच परस्पर रिश्ते और सम्मान ावना से ही होती हैण् वर्तमान आर्थिक बाजारवादी परिवेश ने रिश्तों का ी बाजारीकरण कर दिया हैण् आज लोग लम्हों की खुशी को अधिक महत्व दे रहे हैंण् आने वाली पीढ़ी के समाजीकरण की दिशा में सोचने के लिए आज माता-पिता के पास समय नहÈ हैण् सब के सब आपाधापी के बीच अलग-थलग जीवन जी रहे हैंण् इस कारण आज समूह में रहने की प्रवृित्त घटी हैण् इसी का नतीजा है जो परिवार और व्यक्ति के बिखराव के रूप में सामने आ रहा हैण्
यागेंद्र सिंह से बातचीत से बातचीत पर आघारितण्

क्या है विश्वासमत प्रस्ताव

लोकसा मेेंं जब कोई सरकार अथाZत प्रधानमंत्री यह सिद्ध करने के लिए प्रस्ताव करती है कि उसके पास सदन में आवश्यक बहुमत है और इसके लिए वह मतदान के लिए तैयार है, तो इसे सामान्यतौर पर विश्वासमत प्रस्ताव नाम से जाना जाता हैण् इसमें वोटिंग के लिए केवल लोकसा के सांसद ही योग्य होते हैं, इस तरह राज्यसा के सांसद वोÇटग प्रक्रिया में ाग नहीं ले सकतेण् उदाहरण के तौर पर हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिह राज्यसा से सांसद होने के कारण सरकार के मुखिया होने के बावजूद ी वह मतदान में ाग नहÈ ले सकते, लेकिन वह बहस में ाग ले सकते हैंण्
अविश्वास प्रस्ताव और विश्वासप्रस्ताव मत में क्या अंतर है
यह दोनों ही संसदीय प्रकिया का अंग है, जिसके तहत सदन में सरकार के बहुमत को जांचा जाता हैण् विश्वासमत की प्रस्तावना सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री द्वारा रखा जाता है जबकि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की तरफ से लाया जाता हैण्
विश्वासमत प्रस्ताव मेें हार पर क्या हो सकता है
यदि सरकार सदन में विश्वासप्रस्ताव के दौरान सामान्य बहुमत साबित नहÈ कर पाती है तो ऐसे में सरकार को या तो इस्तीफा देना होता है अथवा वह लोकसा को ंग करके आम चुनाव की सिफारिश राष्ट्रपति से कर सकते हैंण् फिर यह राष्ट्रपति पर निZर करता है कि वह नयी सरकार को आमंत्रित करें अथवा ऐसा संव न होने पर वर्तमान सरकार को ही चुनाव संपé होने और नयी सरकार के बनने तक कार्यवाहक सरकार के तौर पर काम करने को कहेण् एक रोचक तथ्य यह ी है कि यदि सरकार विश्वासमत जीत जाती है तो 15 दिन बाद विपक्ष पुन: सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकता हैण् दरअसल, संसदीय प्रावधान में कहा गया है कि एक बार अविश्वास प्रस्ताव लाने के के छ: महीने बाद ही दुबारा अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जा सकता है, जबकि विश्वासमत सरकार की तरफ से लाया जाता है इसलिए उक्त कानून इस पर लागू नहÈ होताण्
विश्वासमत हासिल करने की प्रक्रिया क्या है और वोटों की गिनती कैसे होती है
विश्वासमत प्रस्ताव की अवधारणा संविधान में नहÈ रखा गया है बल्कि इसका प्रावधान संसद की कार्यवाही प्रक्रिया के तहत किया गया हैण् पहली बार विश्वासमत प्रस्ताव वीपी Çसह सरकार के समय में लाया गया थाण् संसद के पूर्व महासचिव सीके जैन के मुताबिक विश्वासमत हासिल करने के लिए सरकार को सामान्य बहुमत अथाZत लोकसा के कुल उपस्थित सदस्यों के आधे से एक अधिक (50 प्रतिशत + 1) मत प्राप्त करना होता हैण् गौरतलब है कि लोकसाध्यक्ष को वोट देने का अधिकार नहÈ होताण् हालांकि वह निर्णायक वोट कर सकता हैण् उदाहरण के लिए यदि पक्ष और विपक्ष में पड़े मत बराबर हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में लोकसाध्यक्ष का वोट निर्णायक माना जाता हैण् लोकसा में कुल 545 सीटें हैं, जिसमें मेरठ और वेल्लारी की सीटें खाली हैण् पीसी थॉमस को वोट देने का अधिकार नहÈ हैण् इस प्रकार वर्तमान में सांसदों की कुल संख्या 543 हैण् बहुमत के लिए सरकार को कुल 272 मत पाना अनिवार्य हैण् लेकिन यदि मतदान के समय 540 सदस्य ही ाग लेते हैें तो सरकार को बहुमत के लिए 271 मतों की ही जरूरत होगीण् किसी स्थिति में यदि सरकार निर्धारित मत हासिल करने में असफल होती है तो वह सदन का विश्वास खो देगीण्
मतदान कैसे होता है
मतदान के दौरान सांसदों को मत देते समय लाल, हरा और पीला बटन दबाना होता हैण् हरा बटन दबाने का अर्थ है कि उस सांसद द्वारा सरकार के विश्वासमत को समर्थन दिया जा रहा है और लाल बटन उस सांसद के असमति अथवा विरोध को बताता है जबकि पीला बटन संबंधित सांसद के वोÇटग में ाग न लेने अथवा गैर-हाजिरी माना जाता है और उसके वोटों की गिनती अनुपस्थित सदस्यों की श्रेणी के तहत किया जाता हैण् लेकिन यदि किसी सांसद से गलती से पीला बटन दब जाता है और वह अपनी गलती के बारे में लोकसाध्यक्ष को तत्काल जानकारी देता है तो उसके अनुरोध को लोकसाध्यक्ष द्वारा स्वीकार ी किया जाता है और उसे पुनर्मतदान की अनुमति मिलती हैण्

13 दिनों से चल रही ड्रामेबाजी का हुआ अंत

संसद में विश्वासमत हासिल करने के बाद सरकार बचाने के लिए चली आ रही 13 दिनों की ड्रामेबाजी का अंत हो गयाण
संजय कुमार
byline
नयी दिल्ली : दो दिनों की बहस के बाद यूपीए सरकार लोकसा में विश्वास मत हासिल करने में सफल रहीण् लोकसा में लोकतंत्र को लज्जित करनेवाली घटनाओं के लिए याद रहनेवाला मंगलवार का दिन सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में किसी प्रधानमंत्री के लिखित जवाब के लिए ी जाना जायेगाण् डॉ मनमोहन Çसह दो दिन की चर्चा समाप्त होने के बाद विपक्ष के हंगामे के कारण बहस का जवाब नहंÈ दे सकेण्
इसके बाद उन्होंने जवाब देने की औपचारिता निाते हुए अपना लिखित ाषण सदन पटल पर रख दिया और स्पीकर ने विश्वास प्रस्ताव पर शक्ति परीक्षण की प्रक्रिया के पहले चरण में ध्वनिमत कराने की घोषणा कर दीण् इससे पहले सदन में बीएसपी सांसदों ने यह आरोप लगा कर सनसनी पैदा कर दी कि सत्तापक्ष ने उनपर सरकार के पक्ष में वोट डालने के लिए दबाव बनाने के इरादे से उनके घर सीबीआइ के अधिकारी ेजे थेण् अी हंगामें के बाद सदन की कार्यवाही शुरू ही हुई थी कि ाजपा के सांसद अशोक अर्गल द्वारा सदन पटल पर एक करोड़ रुपये के नोटों की गिड्डयां रखे जाने के बाद तो सदन का आगे चलना मुश्किल हो गयाण्
ड्रामेबाजी में खास :
ं अपनी जापान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने आइएइए जाने की घोषणा कर दीण् इससे वामपंथी ड़क गये और आठ जुलाई को समर्थन वापसी की घोषणा कर दीण्
ं कुछ समय बाद ही सपा अध्यक्ष मुलायम Çसह यादव ने परमाणु करार का समर्थन करते हुए परमाणु मुद्दे पर संसद में सरकार को बचाने का ऐलान कर दियाण् कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलकर सपा महासचिव अमर Çसह ने सपा संसदीय दल के प्रस्ताव से उन्हें अवगत कराते हुए आश्वस्त किया कि लोकसा में समाजवादी पार्टी का हर सांसद सरकार के पक्ष में वोट करेगाण्
ं समर्थन वापसी की वामदलों की धमकी के बाद से ही यूपीए सरकार के सियासी प्रबंधकों और कांग्रेस के रणनीतिकारों ने नये सहारे की तलाश शुरू कर दी थीण् सपा के साथ बातचीत पôी होने के बाद ही प्रधानमंत्री मनमोहन Çसह जी आठ की बैठक में ाग लेने के लिए जापान रवाना हुएण्
ं चार साल से सरकार को अपने समर्थन पर टिकाये रखनेवाले वामदलों द्वारा समर्थन वापसी के बाद सरकार बचाने और गिराने का खेल शुरू हो गयाण् विदेश मंत्री प्रणव मुखजÊ ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की प्रस्तावित 28 जुलाई की बैठक में वियेना जाने से पहले सरकार लोकसा में विश्वासमत प्राप्त करेगी, राजनीतिक दलों में सांसदों के अंकगणित को बदलने की कवायद शुरू हो गयीण्
ं सोनिया गांधी के आवास पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में स्थिति की समीक्षा की गयीण् लोकसा में अंकगणित का हिसाब लगाया गयाण् मुलायम Çसह, अजित Çसह और देवेगौड़ा के साथ-साथ टीआरएस के चंद्रशेखर राव, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनजÊ, एमडीएमके नेता वाइको, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी नेताओं के साथ-साथ एमएनएफ और निर्दलीय सांसदों को जोड़ने की कवायद शुरू हो गयीण्
ं लेट द्वारा यूपीए से समर्थन वापस लेने के बाद लाल—ष्ण आडवाणी के घर पर ाजपा के बड़े नेताओं की इमरजेंसी मीÇटग हुईण् इसमें आगे की रणनीति पर चर्चा की गयीण्
ं सरकार को बचाने के लिए जहां सपा ने कांग्रेस से हाथ मिलाया, तो उधर वामदलों ने सरकार को संसद में पठखनी देने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ जुगलबंदी कर लीण् जिस सपा को बसपा के टूटने की उम्मीद थी, उसने सपा के घर में ही सेंध लगा दीण् सपा सांसद शाहिद सिद्दकी को अपने पाले में करते हुए उसने एक और कामयाबी बटोरीण् मायावती और वामदल के खेमे में यूएनपीए के घटक दल तेलगू देशम पार्टी, असम गण परिषद, इंडियन नैशनल लोकदल और झारखंड विकास पार्टी शामिल हो गयेण् कई पार्टियों ने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में ी प्रोजेक्ट करने की बात कह डालीण्
ं यूपीए के लिए आंकड़े जुटाने में सबसे ज्यादा रुलाया झामुमो नेण् ऐसे समय जब यूपीए को आंकड़ों की दरकार थी, झामुमो नेता शिबू सोरेन सरकार से नाक ौ सिकोड़ रहे थेण् जिस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लिया, उस मुद्दे से झामुमो का कोई सरोकार नहÈ रहा, उसका सारा ध्येय मौके की नजाकत देख अपनी 15 सुत्री मांगें मनवाना थाण् इसमें कैबिनेट मंत्री समेत कई मांग रखÈ गयीण् आखिरकार शिबु सोरेन सोनिया गंाधी के साथ एक घंटे की बैठक के बाद पत्रकारों के सामने खुलकर यूपीए के समर्थन में बोलते नजर आयेण्

ं छोटे चौधरी यानी अजीत Çसह सियासी पाला बदलने में उस्ताद माने जाते हैंण् की एनडीए में, की यूएनपीए तो की कांग्रेस के साथण् आम चुनाव में कांग्रेस और सपा का साथ मिलेगा, ती अजीत Çसह की चुनावी नैया पार हो पायेगीण् यही सोच उन्हें यूपीए की तरफ खÈच रहा थाण् यूपीए में शामिल होने की उनकी शर्त थी कि लखनऊ हवाई अड्डा का नाम चरण Çसह रख दिया जायेण् सरकार ने उनकी तमéा पूरी ी कर दीण् लेकिन ऐन वक्त छोटे चौधरी ने धोखा दे दियाण् मायावती से मिलने के बाद उनके तेवर बदल गयेण्
ं केरल के जनतादल(एस) सांसद विरेंद्र कुमार पार्टी के लाइन पर लौटने की घोषणा कर दी हैण् गौरतलब है कि वह पहले सरकार के खिलाफ वोट देने की बात कर रहे थेण् देवगौड़ा ी मायावती के पक्ष में चले गयेण्
ं सोमनाथ चटजÊ के लोकसा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की अटकलें ी अंत-अंत तक चलती रहीण् सीपीएम द्वारा राष्ट्रपति को सौंपे गये समर्थन वापसी पत्र में सोमनाथ दा का नाम शामिल करने पर जमकर बवाल हुआण् अंत में सीपीएम ने सोमनाथ को पार्टी लाइन से अलग रहने की बात कहीण्
ं सांसदों की खरीद-बिक्री को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर ी खास चर्चा का विषय बनाण् सीपीआइ महासचिव ने यूपीए पर 25-25 करोड़ में सांसदों की खरीद का आरोप लगायाण् जानकारों के मुताबिक पहले ी सरकार बचाने या गिराने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त की बातें हो थीण् लेकिन ये बातें परदे के पीछे ही रहती थी, जबकि इस बार खरीद फरोख्त की बात को सार्वजनिक मंच पर उछाल कर नेताओं ने इसे पुख्ता करार दिया हैण् साथ ही अवसरवादी राजनीति और नैतिक गिरावट को लेकर ी खूब चर्चाएं रहÈण्
ं राजनीतिक दलों के कारपोरेट जगत के साथ संबंध ी इस बार खास चर्चा में रहेण् खासकर अपने घरेलू विवाद को लेकर मुकेश अंबानी का पीएम से मिलना, इस विवाद को हवा देने में काम आयाण्

खेती, किसान और खाद्य संकट

संजय कुमार
byline
जीडीपी में —षि की हिस्सेदारी मात्र 18 फीसदी
ारतीय अर्थव्यवस्था पिछले पांच सालों से 8ण्5 फीसदी औसत की गति से तेजी से विकसित हो रही हैण् लेकिन यह विकास दर निर्माण उद्योग और बढ़ते सेवा क्षेत्र तक ही सीमित हैण् दूसरी ओर पिछले पांच सालों में —षि क्षेत्र में मुश्किल से मात्र 2ण्6 फीसदी विकास हुआ है और पिछले डेढ़ दशक में इसकी विकास दर की प्रवृित्त देखी जाये, तो यह दर गिरी ही हैण् परिणामस्वरूप, अनाज (गेहूं और चावल) की प्रति व्यक्ति पैदावार वर्तमान में ी लगग उसी स्तर पर है, जितनी कि 1970 में हुआ करती थीण् इस समस्या ने गंीर रुख ले लिया है, क्योंकि ारत के 1ण्1 अरब लोगों के 60 फीसदी की जीविका खेती से ही चलती हैण् देश के सकल घरेलू उत्पाद में —षि की हिस्सेदारी 1982-83 में 36ण्4 प्रतिशत से घटकर 2006-07 में 18ण्5 प्रतिशत रह गयी हैण्
नाजुक स्थिति में अनाज ंडार
केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के अनुसार ी देश में गेहूंं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर से नीचे जा पहुंचा हैण् ताजा आंकड़ों के अनुसार सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर दो करोड़ टन से कम हैण्
अनाज का सुरक्षित ंडार न्यूनतम 20 मिलियन टन होना चाहिए, लेकिन जनवरी माह में यह सिर्फ 19ण्2 मिलियन टन ही थाण् वहÈ जनवरी 2004 में यह स्टॉक 24ण्4 मिलियन टन थाण् हालांकि ारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के अनुसार ारत में अनाज की कमी नहÈ हैण् निगम के पास गेहूं का 55 लाख टन का ंडार हैण् —षि उत्पादों में कमी को देश में अनाज के ंडारों की स्थिति से समझा जा सकता हैण्
छह साल पहले हमारा अनाज ंडारण रिकॉर्ड स्तर का थाण् तब नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमत्र्य सेन ने कहा था कि अगर सरकारी संस्था ारतीय खाद्य निगम के गेहूं और चावल के सी बोरों को एकसाथ रख दिया जाये, तो यह ढेर चांद तक पहुंच जायेगाण् पिछले तीन सालों में कम उत्पादन और निर्यात की वजह से अनाज ंडारों में काफी कमी आई हैण्
—षि के प्रति उदासीन रवैया
ारतीय किसान खासतौर पर असुरक्षित है, क्योंकि देश में कुल —षि योग्य ूमि के 60 फीसदी हिस्से को Çसचाई के लिए पानी नहÈ मिलताण् इसके लिए उन्हें चार महीने के मानसून पर ी निZर रहना पड़ता है, जिस दौरान पूरे साल की 80 फीसदी वषाZ होती हैण् इससे पहले ारत में की अनाज की इतनी कमी नहÈ रहीण् तब ी नहÈ जब 1943 में बंगाल में 15 लाख से ी ज्यादा लोगों के ूख से मर जाने का अनुमान लगाया गया थाण् दाल और चावल बहुत से ारतीयों का मूल ोजन है, तब और आज की समस्या एक ही है - उचित मूल्य पर ोजनण्
ारतीय —षि का वर्तमान संकट बहुत से कारकों की वजह से है जैसे- खेती के उत्पादन में कम विकास, पैदावार का उचित मूल्य न मिलना, अनाज संग्रह और रखरखाव की उचित सुविधाओं की कमी और उसके कारण खराब हुए अनाज से होने वाला नुकसानण् जमीन का विाजन और ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर सिंचाई सुविधाओं में निवेश की कमी को ी दोषी ठहराया जा सकता हैण्
पूरे विश्व में है खाद्याé संकट
विश्व के कई देशों में गंीर सूखे की स्थिति और अनाज से जैव इ±धन के निर्माण पर जोर देने के कारण दुनिया में खाद्याé की आपूर्ति कम हो गयी हैण् इससे पूरा विश्व खाद्याé संकट की गिरत में हैण् गल्फ टुडे समाचार पत्र के अनुसार अनाजों की बढ़ती हुई कीमतों का प्राव अब सड़कों पर लोगों के प्रदर्शनों से दिखाई देने लगा हैण् पूरी दुनिया में सरकारें कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए आयात और अन्य उपायों का सहारा ले रही हैण् विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार करीब 33 देश बढ़ती हुई अनाज और तेल की कीमतों के कारण सामाजिक अशांति का सामना कर सकते हैंण् सूखे के कारण ऑस्ट्रेलिया को अपना गेहूं निर्यात कम करना पड़ा हैण् विश्व में गेहूं का ंडार 1979 के बाद से इस साल सबसे कम हैण् ारत, चीन और वियतनाम ने ी अपने चावल निर्यात में कमी की हैण् खाद्याéों की महंगाई से निपटने के लिए इंडोनेशिया ने आयात शुल्क में ारी कमी की हैण्
बढ़ाई जा सकती है पैदावार
ारतीय —षि अनुसंधान परिषद की वािर्षक रिपोर्ट (2007-08) तथा मई 2007 में —षि पर गठित नेशनल डेवलेपमेंट काउंसिल की सब-कमेटी द्वारा योजना आयोग को सौंपी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में पैदावार हालिया क्षमता को 40फीसदी बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते कि खेती के लिए पर्याप्त सुविधाएं व प्रोत्साहन दी जायेण् हाल के वर्ष में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के हिस्सों में गेहूं की पैदावार 3ण्5 से 4ण्5 टन प्रति हेक्टेयर हुई, जो कि चीन के 4ण्25 टन के बराबर है तथा अमेरिका(2ण्9 टन) तथा ऑस्ट्रेलिया(1ण्64 टन) के मुकाबले बेहतर हैण् रिपोर्ट में पैदावार क्षमता के संदZ में कहा गया है कि अकेले उत्तर प्रदेश में 9 मिलियन हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है, यह देश के कुल गेहूं में 12 मिलियन टन की हिस्सेदारी कर सकने में सक्षम हैण् वहÈ हरियाणा में 20 फीसदी तथा राजस्थान में वर्तमान क्षमता से 40 फीसदी अधिक उत्पादन किया जा सकता हैण्
बिहार के बारे में कहा गया है कि यह 3ण्8 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम है, वहÈ महाराष्ट्र 1ण्5 मिलियन टन तथा मध्यप्रदेश 6 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम हैण् झारखंड में संावित उत्पादन और प्राप्त उत्पादन में काफी अंतर हैण् ारत के कुल धान उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा अकेले बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से संव हैण् इसी तरह 25 से 30 मिलियन टन चावल का उत्पादन अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश से संव हैण् —षि के पिछड़े क्षेत्रों में उत्पादकता की निम्न दर एक बड़ी समस्या हैण् कम उत्पादकता के लिए कई बाधाएं जिम्मेवार हैंण् इन कारणों में राज्य की —षि एजेंसियों द्वारा तकनीक के वितरण में कमजोरी, फसलों का गलत चयन, विविध किस्म की बीजों का समुचित उपयोग न होना, खाद का अपर्याप्त इस्तेमाल और खराब जल-प्रबंधन मुख्य समस्याएं हैंण् इनमें से कई समस्याओं पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाये, तो —षि पैदावार बढ़ाया जा सकता हैण्
संजय कुमार

ारत की खुफिया ढांचा

संजय कुमार
byline
राष्टीय सुरक्षा परिषद यानी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल
ारतीय सुरक्षा परिषद के गठन की बात वर्ष 1980 के विश्वनाथ प्रताप Çसह सरकार के समय से ही चल रही थीण् वर्ष 1998 में पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री केसी पंत की अध्यक्षतावाली टास्क फोर्स ने इसकी रूपरेखा तय कीण् अंतत: इसकी स्थापना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 19 नवंबर 1998 में की गयीण् ब्रजेश मिश्रा इसके पहले राष्टीय सुरक्षा सलाहकार बनेंण् इस सर्वाेच्च संस्था का अध्यक्ष प्रधानमंत्री खुद होते हैंण् ारतीय सुरक्षा परिषद तीन स्तरीय संगठनों द्वारा कार्य करता हैण्
रणनीतिक समूह
यह राष्टीय सुरक्षा परिषद में नीतिनिर्धारक की ूमिका अदा करता हैण् इसके सदस्यों में सैन्य (आमÊ, नेवी तथा एयरफोर्स) प्रमुख के अलावा सिविलियन में कैबिनेट सचिव, विदेश सचिव, गृह सचिव, रक्षा सचिव, गुप्तचर विाग के निदेशक आदि आते हैंण्
राष्टीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड
इसमें सरकार से अलग वििé क्षेत्रों के विशेषज्ञ जैसे बाह्य सुरक्षा, सामरिक विशेषज्ञ, रक्षा व सैन्य विशेषज्ञ आदि शामिल होते हैंण् बोर्ड की प्रतिमाह एक बैठक होना अनिवार्य समझा गया हैण्
संयुक्त गुप्तचर समिति(जेआइसी)
सरकार की संयुक्त गुप्तचर समिति यानी जेआइसी सी एजेंसियों, आइबी, रॉ तथा मिलिटी, नेवल, एयर इंटलीजेंस निदेशालय से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करती हैण् जेआइसी का अपना सचिवालय है, जो कैबिनेट सचिवालय के मातहत काम करती हैण्
खुफिया विाग (आइबी)
गृह मंत्रालय के अधीन खुफिया विाग की स्थापना वर्ष 1947 में की गयी थीण् यह ारत की सर्वाेच्च गुप्तचर इकाई हैण् यह राज्य की खुफिया विागों से तालमेल कर आतंकी गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करती है तथा जेआइसी को इसकी रिपोर्ट देती हैण् इसे कई अधिकार दिये गये हैंण् यह बिना वारंट के किसी को फोन टैप कर सकती हैण्
शोध एवं विश्लेषण प्राग (रॉ)
कैबिनेट सेके्रटेरिएट के अंतर्गत कार्यरत शोध एवं विश्लेषण प्राव यानी रॉ ारत की प्रमुख बाह्य खुफिया इकाई हैण् खुफिया विाग से अलग इसकी स्थापना स्वतंत्र इकाई के तौर पर सितंबर 1968 में की गयी थीण् इसका दायरा विदेशों तक फैला हुआ हैण् यह आशंकित जानकारी जुटाकर जेआइसी और प्रधानमंत्री कार्यालय को ेजती हैण्
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ)
केंद्रीय जांच ब्यूरो की स्थापना एक अप्रैल 1963 में की गयी थीण् यह आपधारिक तथा राष्टीय सुरक्षा के मसले पर व्यापक जिम्मेवारी निाता हैण् सीबीआइ ारत की आधिकारिक इंटरपोल यूनिट हैण् वर्तमान में सीबीआइ के निदेशक पर 1969 बैच के आइपीएस विजयशंकर हैण्
रक्षा व अर्द्धसैनिक बलों की खुफिया एजेंसी
आमÊ, एयरफोर्स तथा नेवी के पास अपने खुफिया प्राग हैण् यहां से सारी सूचनाएं एजेंसी जेआइसी को सौंपती हैंण्
वित्तीय खुफिया विाग
यहां से वित्त से जुड़ी सूचनाएं जेआइसी तथा वित्त मंत्रालय को दी जाती हैण्

Saturday, June 14, 2008

मेरा दर्द न जाने कोय

byline
संजय कुमार
जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पायी हैं बांग्लादेश में रह रहे बिहारी मुसलिम समुदाय पर यह बात अक्षरश: उच्चरित होती हैं भारत -पाकिस्तान के बीच जब बंटवारा हो रहा था, तो भारत के उर्दू भाषी सभी बिहारी मुसलिम अपनी अिस्मता, धार्मिक पहचान व Çहदू कौम से अलग धार्मिक देश पाकिस्तान की सरजमÈ पर रहने की अपनी मंशा से पूवÊ पाकिस्तान का रुख कर गयेण् लेकिन आज स्थिति यह है कि न तो उनकी पहचान ारतीय के रूप में की जाती है, न ही पाकिस्तान उन्हें स्वीकार कर रहा है और न ही बांग्लादेश उनको ा रहा हैण् यहां तक कि उन्हें शरणाथÊ ी नहÈ माना जाता है, क्योंकि वे इसके लिए अंतरराष्टीय मानकों पर खरे नहÈ उतरतेण् आजादी के 37 वर्ष बाद वहां के हाईकोर्ट ने यह निर्णय दिया है कि नयी पीढ़ी को बांग्लादेश की नागरिकता मिल पायेगी, वही उन्हें मतदान करने के अलावा वे सी सुविधाएं मुहैया होगी, जो आम नागरिकों को दी जाती हैण् बिहारी मुसलिम समुदाय आखिर इतने वषो± तक अपनी पहचान की लड़ाई लड़ने की जद्दोजहद क्यों कर रहे हैं, इसके लिए बंटवारे के इतिहास को याद करना जरूरी हैण्
यह कहानी शुरू होती है ारत-पाकिस्तान बंटवारे के साथण् वर्ष 1947 में औपनिवेशिक ारत का जब बंटवारा हो रहा था, तब तकरीबन 10 लाख उर्दू ाषी मुसलिम (वर्तमान बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश तथा राजस्थान के इलाकों से, जिन्हें वहां बाद में बिहारी मुसलिम से संबोधित किया जाने लगाण्) पूर्वी पाकिस्तान की ओर पलायन करने लगेण् पूवÊ पाकिस्तान आगे चलकर बांग्लादेश बनाण् पूवÊ पाकिस्तान की रुख करने की कई वजहें थÈण् एक सांप्रदायिक खून-खराबे से बचना, दूसरा इसलामिक संरक्षण प्राप्त करना तथा तीसरा वे इसे एक ऐसे मौके के तौर पर देख रहे थे, जिससे वे Çहदू बहुल समुदाय से दूर हो सकते थेण् उर्दू लहजे में पलायन करने की इस प्रवृित्त को हिजरत कहा जाता हैण् लेकिन इस कदम से उनका मकसद अधूरा ही रहाण् रीति-रिवाज, परंपराओं, रहन-सहन व ाषाई स्तर पर उनकी िéताएं उनके लिए दुखदाई बन गयीण् हालांकि पकिस्तान की आधिकारिक ाषा `उर्दू´ ही थी, लेकिन पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली ाषी समुदाय बहुसंख्य थे, इसलिए वे अल्पसंख्यक के तौर पर ही चििन्हत हुएण्
पाकिस्तान सरकार की ओर से उनके हितों का ख्याल रखने का पूरा आश्वासन दिया गया थाण् बंगाली समुदाय जहां पारंपरिक —षि कार्य में लगे थे, तो बिहारी मुसलिम औद्योगिक क्षेत्र, लघु उद्योग, व्यापार तथा वाणिज्य में लगे थेण्
यह कहना मौजूं होगा कि शुरू से ही स्थानीय लोगों के साथ इन बिहारी मुसलिमों का छत्तीस का आंकड़ा रहाण् वे एक-दूसरे को हिकारत की नजर से देखते थेण् आधिकारिक ाषा के रूप में उर्दू को शामिल करने के मुद्दे पर उनका पूरा समर्थन था, जबकि इस क्षेत्र में बहुसंख्य की ाषा बंगाली थीण् वर्ष 1952 में बंगालियों द्वारा छेड़े गये आंदोलन का उन्होंने पूरा विरोध कियाण् साथ ही वर्ष 1970 में हुए राष्टीय तथा प्रांतीय चुनाव में यूनाइटेड पाकिस्तान के मुद्दे पर वे सरकार के साथ रहेण् जब 1971 में बांग्लादेश स्वतंत्र होने की लड़ाई लड़ रहा था, वे एकजुट होकर पाकिस्तानी सरकार के पक्ष में लामबंद हो रहे थेण् जब बांग्लादेश आजाद हुआ, तब वे लोग पूवÊ पाकिस्तान में ही बसना चाहते थे, लेकिन बंटवारे की जटिल प्रकिया के बीच उनके सारे मंसूबों पर पानी फिर गयाण् पाकिस्तान की ओर से किया गया वादा वादा ही रह गयाण् उन वादों पर आज तक अमल नहÈ हो पायाण् आज स्थिति यह है कि पाकिस्तान इनसे कोई सरोकार नहÈ रखना चाहता हैण्
एक रिपोर्ट के अनुसार तीन लाख लोग अी तक अपनी पहचान को लेकर संघर्षरत हैण् बिहारी मुसलिम समुदाय बांग्लादेश के वििé इलाकों में 66 से ी ज्यादा शिविरों में रह रहे हैंण् तीन दशक से नारकीय Çजदगी जीने को मजबूर हैण् वे शरणाथÊ शिविरों में तो रह रहे हैं, लेकिन यूनाइटेड नेशंस हाईकमिशनर फॉर रियूजी यानी यूएनएचसीआर के मानदंडों को पूरा नहÈ कर पाने के कारण शरणाथÊ कहलाने से वंचित है, साथ ही शरणाथÊ के नाम पर मिलनेवाली सुविधाओं से ी वंचित हैण् अब जबकि बांग्लादेश के हाइकोर्ट ने यह निर्णय दिया है कि 37 वर्ष पहले पाकिस्तान के बंटवारे के समय बांग्लादेश में छूट गये लोगों के बच्चे देश की नागरिकता पाने के हकदार है, तो एक उम्मीद तो बंधी ही हैण् प्रमुख अधिवक्ता हाफीजुर रहमान खान के मुताबिक वे आनेवाले चुनाव में वोट देने के अधिकार ी रखेंगेण्
तीन लाख की आबादीवाले इस समुदाय की आधी जनसंख्या जो अपनी स्वीकार्यता को लेकर अबतक पाकिस्तान के रुख का बांट जोह रहे थे, कानूनी तौर पर अब बांंग्लादेश का नागरिक बन सकेंगेण् बांग्लादेश में जन्मे 1,40,000 बिहारी मुसलिम अब सी नागरिक सुविधाओं का ला उठा पायेंगेण् इस समुदाय की एक बड़ी आबादी अब ी पाकिस्तान की सरजमÈ पर बसने की इच्छा रखते हैं, उन्हें आज ी इस देश से उम्मीद हैण्

Saturday, May 31, 2008

महंगाई का हिसाब-किताब

अलग-अलग स्तरों पर चीजों के दाम अलग-अलग होते हैं। सब्जियों के दाम होलसेलर के लिए अलग होते हैं। होलसेलर से खरीदने वाले रिटेलर के लिए दाम अलग होते हैं और रिटेलर से आप जिस कीमत पर सब्जी खरीदते हैं उसमें रिटेलर का मुनाफा भी जुड़ा रहता है। चढ़ती-उतरती कीमतों को नापने के लिए एक निश्चित इंडेक्स की जरूरत होती है। भारत में महंगाई को मापने के लिए वैसे तो कई इंडेक्स हैं मगर सरकारी तौर पर इसका आकलन थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआई) से किया जाता है। यानी जिस दाम पर चीजें थोक में बिकती हैं, उसके आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है।

महंगाई दर हर हफ्ते नापी जाती है। डब्लूपीआई, कमोडिटी इंडेक्स है जिसमें 5 बड़े ग्रुप होते हैं- प्राइमरी आर्टिकल, फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स और मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट। इन्हें फिर छोटे सब-ग्रुप में बांटा जाता है। मसलन, प्राइमरी आर्टिकल ग्रुप में फूड आर्टिकल, नॉन फूड आर्टिकल और मिनरल्स शामिल हैं। सभी सब-ग्रुप में कई कमोडिटी होती हैं।

अभी डब्लूपीआई में 435 कमोडिटी हैं जिनके थोक मूल्यों के आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है। इनमें 98 प्राइमरी आर्टिकल हैं, 19 फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स ग्रुप में आते हैं जबकि 318 मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट्स ग्रुप के अंतर्गत हैं।

डब्लूपीआई मुख्य शहरों और राज्यों की राजधानियों से जमा किए डेटा के आधार पर केलकुलेट करते हैं। रिस्पॉन्डेंट का इंटरव्यू लेकर सीधे डेटा लिया जाता है। ये रिस्पॉन्डेंट ऐसी कंपनियों के होते हैं जो कमर्शल कमोडिटी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी तरह सभी कमोडिटी का प्राइस लिया जाता है।

अगर हम कहें कि 22 मार्च को खत्म हुए हफ्ते में महंगाई दर 7 फीसदी रही तो इसका मतलब हुआ कि उससे पिछले साल इसी हफ्ते की तुलना में इस अवधि में चीजें इतनी महंगी हुईं।

डब्ल्यूपीआई के आधार पर महंगाई नापने की कोशिश की आलोचना होती रही है। वजह यह है कि आम कंस्यूमर को जिस महंगाई का सामना करना पड़ता है, वह थोक नहीं, रिटेल मूल्यों की है। इसी लिए कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स ज्यादा सटीक माना जाता है, जो आम तौर पर थोक मूल्य सूचकांक से कई फीसदी ज्यादा रहता है। भारत में सीपीआई है, लेकिन वह सही तरीके से विकसित नहीं हो सका है।

महंगाई को डिमांड और सप्लाई में गड़बड़ी के तौर पर देखा जाता है और इसकी कई वजहें हो सकती हैं। सरकार इसके खिलाफ वित्तीय और प्रशासकीय कदम उठाती है। लेकिन इसे देखने का एक नजरिया मौद्रिक भी है। इसके तहत महंगाई को इनफ्लेशन यानी पैसे का फैलाव कहा जाता है। यानी जब लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आता है, तो डिमांड बढ़ती है और इससे चीजें महंगी होने लगती हैं। रिजर्व बैंक यही नजरिया अपनाता है और इसलिए पैसे का फैलाव रोकने के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ा देता है। इस कदम का नुकसान यह है कि पैसा महंगा हो जाता है, जिसका असर इकनॉमिक ग्रोथ पर पड़ता है। यानी महंगाई पर काबू पाने की कोशिश में सरकार को यह भी देखना होता है कि वह ग्रोथ से कितनी छेड़छाड़ करे। जाहिर है, यह एक मुश्किल चुनाव है, इसलिए ज्यादातर लोग चाहते हैं कि वित्तीय और प्रशासकीय कदमों से ही महंगाई पर काबू पाया जाए।

महंगाई

धर्मकीर्ति जोशी
प्रिसिंपल इकनॉमिस्ट क्रिसिल


22 मार्च का सप्ताह बीतते-बीतते महंगाई के स्तर में आए 7 फीसदी के तेज उछाल ने सबको चौंका दिया है। भारत और विश्व में तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर महंगाई में बढ़ोतरी तो संभावित थी लेकिन 3 ही हफ्तों में यह 5 से बढ़कर 7 फीसदी तक आ जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। सूरजमुखी और सरसों के तेल जैसी बेसिक जरूरत की चीजों में 21 से 33 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। इंपोर्टेड ऑयल की महंगाई तो 47 फीसदी के आंकड़े को छू रही है। ज्यादा महंगाई का मतलब यह है कि रिजर्व बैंक फिलहाल तो इंटरेस्ट रेट घटाने से रहा।

महंगाई इस समय एक ग्लोबल समस्या है। चीन में महंगाई दर अपने ग्यारह सालों के उच्चतम स्तर 8.7 फीसदी पर है। वियतनाम में यह आंकड़ा 16 फीसदी है। एशिया के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अनाज की कीमतों में आई तेजी से निपटना ही फिलहाल एशियाई देशों के लिए बड़ी चुनौती है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी एशिया की सरकारों के लिए खाद्यान्न और ईधन की कीमतों का सामना करना अमेरिका की आर्थिक तंगी और ग्लोबल मंदी जैसी चुनौतियों से कहीं अधिक भारी पड़ रहा है।

भारत अब तक खुद को ग्लोबल महंगाई के असर से अलग रखने में लगभग कामयाब रहा है। तेल की कीमतों में हुई ग्लोबल बढ़त का असर यहां कंस्यूमर तक नहीं पहुंचने दिया गया। अनाज की कीमतों में भी यहां दुनिया की औसत दर के मुकाबले कहीं कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। रुपये के मूल्य में सुधार ने भी हमें वैश्विक मुद्रास्फीति से बचाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन अब यहां भी हालात चिंताजनक हो गए हैं। इस तरह की अचानक बढ़ी महंगाई का सबब क्या है और आगे हालात का रुख क्या होगा, किसी को नहीं मालूम।

महंगाई के मौजूदा दौर के लिए 3 चीजें सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, पहला तेल (पेट्रोलियम) की कीमतों में उछाल, दूसरा स्टील और अन्य मेटल के मूल्यों में तेजी और तीसरा कृषि क्षेत्र में उत्पादन और कीमतों के बदतर हालात। दुनिया के स्तर पर तेल की कीमत पिछले कुछ महीनों में बहुत बढ़ी हैं। दूसरी ओर बढ़ती मांग के दबाव में कोयले और आयरन ओर की कीमत में इजाफे के कारण मेटल और खास तौर से स्टील का मूल्य भी चढ़ता रहा। वर्तमान में मुद्रास्फीति की भागती रफ्तार में सबसे अहम भूमिका भारत और विश्व की खस्ताहाल कृषि के कारण अनाज की कीमतों पर लगातार बढ़ते दबाव की है। यह खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया, चीन और यूरोप के देशों में अनाज से बायो फ्यूल बनाने और खराब मौसम की वजह से हो रहा है। नतीजतन दुनिया का फूड स्टॉक आज 2 दशकों के न्यूनतम स्तर पर है, जिसके कारण दूसरे कृषि उत्पादों के मूल्य भी आसमान छूने लगे हैं। हमारी घरेलू खेती भी इस लिहाज से कुछ अच्छा नहीं कर सकी है। जिसकी वजह से इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ गई है।

खाने की चीजों में आई तेजी की वजह से अनेक देशों के अलग-अलग वर्गों के लोग विभिन्न तरीकों से आहत हुए हैं। अमेरिका जैसे आधुनिक अर्थतंत्र में कुल व्यय का 10 फीसदी हिस्सा खाने की चीजों पर जाता है। जैसे-जैसे हम आर्थिक रूप से कमजोर देशों की ओर जाएंगे, यह बढ़ता जाएगा। चीनी व्यक्ति की कुल आय का 30 फीसदी और भारतीय का 40 फीसदी खाने की चीजों में जाता है। अगर खाद्यान्न के मूल्यों में इजाफे का सिलसिला रोका न गया तो गरीब देशों के हालात क्या होंगे, सोचा जा सकता है। यदि किसी देश में अनाज के लिए मारामारी और हिंसा की खबरें आने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दूसरी सरकारों की ही तरह भारत ने भी मुद्रास्फीति कम करने के लिए कई नीतियां घोषित की हैं। इसमें खाद्य तेलों पर शुल्क में कटौती और निर्यात पर लगाम लगाना अहम बातें हैं। सरकार सीमेंट और स्टील कंपनियों से भी कीमत घटाने को कह चुकी है। लेकिन महंगाई पर लगाम कसने के लिए इतना ही काफी नहीं है। कंपनियों पर कीमत घटाने का दबाव भविष्य में मूल्य नियंत्रण के लिहाज से बुरा ही साबित होगा क्योंकि यह आर्थिक विकास के अहम जरिए को हतोत्साहित करने जैसा है। खाद्यान्न मूल्यों में तेजी की स्थिति आगे भी बनी रहने वाली है, इसलिए सिर्फ इंपोर्ट पर निर्भरता अच्छी नहीं है। इस समस्या से निजात का स्थाई तरीका यही हो सकता है कि घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके इस लिहाज से आत्मनिर्भरता पाई जाए। खेती में उत्पादकता बढ़ाने की नीतियां लागू की जानी चाहिए। जब तक आत्म निर्भरता हासिल नहीं होती, हमें खाद्यान्न के लोकल और ग्लोबल सिनेरियो पर करीबी निगाह रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर संकट से काफी पहले आयात कर लेना होगा।

महंगाई और चुनाव-1


राजनाथ सिंह
बीजेपी, राष्ट्रीय अध्यक्ष



कांग्रेस के शासन काल में हर मोर्चे पर तबाही ही तबाही दिख रही है। मैं समझता हूं अब तक कांग्रेस का वह गरूर जरूर टूट गया होगा कि सिर्फ उसे ही शासन करना आता है। बल्कि यह साबित हो गया है कि उसे शासन करना कतई नहीं आता। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन देश को जिस मुकाम पर ले आई है, आम लोगों को यह कसक जरूर हो रही होगी कि वर्ष 2004 में उन्होंने एनडीए सरकार को हटाकर भारी भूल की। आम आदमी का नारा देकर शासन में आई यूपीए सरकार ने उसे तबाह करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जानेमाने अर्थशास्त्री हैं लेकिन आसमान छूती महंगाई के सामने उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।

अब यूपीए की सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई हक नहीं है। देश के लोग अब बीजेपी को आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। उन्हें एनडीए के शासन के उस जमाने की याद सता रही है, जब महंगाई पूरी तरह सरकार के काबू में थी। यूपीए गठबंधन कोई सरकार नहीं बल्कि आम आदमी के खिलाफ एक षडयंत्र नजर आ रहा है।

तमाम दावों के बावजूद महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है। अब जबकि महंगाई की दर 7.4 तक पहुंच गई है तो कांग्रेस को यह मान लेना चाहिए कि आम लोगों को महंगाई की मार से बचाने का माद्दा उसमें नहीं बचा। कांग्रेस जितने दिनों तक सत्ता में बनी रहेगी, देश का बेड़ा गर्क होता रहेगा। स्थिति और भी बदतर होने वाली है। कांग्रेस पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का तर्क देकर अपनी विफलता नहीं छिपा सकती है। दुनिया के किसी भी देश में महंगाई की यह स्थिति नहीं है। सच यह है कि मौजूदा महंगाई यूपीए सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का नतीजा है।

आम आदमी के साथ कांग्रेस ने छल किया है, जिसका खामियाजा उसे आगामी लोकसभा चुनाव में भुगतना ही पड़ेगा। महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस की पोल खोलने के लिए बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने कमर कस ली है। बीजेपी महंगाई को आगामी चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बनाने जा रही है। यह महंगाई कांग्रेस को आगामी चुनावों में बड़ी महंगी पड़ने वाली है। संसद के भीतर और बाहर हम कांग्रेस को चैन से नहीं रहने देंगे। अब पानी सिर के बहुत ऊपर आ चुका है। यूपीए सरकार जल्द से जल्द महंगाई पर श्वेत पत्र जारी करे और आम जनता के सामने अपना 'जुर्म' स्वीकार करे।

देश के सबसे बड़े उत्पादक एवं उपभोक्ता किसानों की दुर्दशा के लिए भी कांग्रेस पूरी तरह से दोषी है। किसान यूपीए के पिछले 4 साल के शासन में जितने तबाह हुए हैं, उतने पहले कभी नहीं हुए थे। बजट में किसानों की कर्ज माफी की तथाकथित महत्वाकांक्षी स्कीम के बाद सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों का मनोबल इस कदर टूट चुका है कि उन्हें आत्महत्या करने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। कर्ज माफी की योजना भी किसानों के प्रति कांग्रेस का छल ही साबित हुई है।

लोकसभा चुनाव के बाद हम सत्ता में आए तो हम दिखा देंगे कि किसानों की समस्याएं कैसे हल की जाती हैं। किसानों के स्वाभिमान को फिर बहाल करने का पूरा ब्लूप्रिंट हमने तैयार कर रखा है। किसानों की बढ़ती समस्याओं के लिए हम सरकार को बहुत पहले से आगाह करते आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

कांग्रेस अपनी कोई भी ऐसी उपलब्धि बता दे जिस पर उसे नाज हो। महंगाई का सवाल हो, किसानों का सवाल हो या फिर आतंकवाद से जंग करने का सवाल हो, हर मोर्चे पर कांग्रेस नीत सरकार विफल ही साबित हुई है। अब कांग्रेस के पास कुतर्क देने के सिवा और कुछ भी नहीं बचा है। एनडीए की पूर्व की सरकार ने देश में आर्थिक विकास का जो दौर शुरू किया था, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने उसे भी जाया कर दिया। देश की अर्थव्यवस्था मंदी के भंवर में फंसने ही वाली है। कांग्रेस अपने पूरे शासन काल में बस एक ही काम करती रही। वह है वोट बैंक की राजनीति। पिछले 4 सालों में एक खास समुदाय के तुष्टीकरण के जरिए कांग्रेस समाज की समरसता में जहर घोलने का काम करती रही।

आतंकवाद जैसे अहम मसले को भी उसने वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देश की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। आतंकवाद को काबू में करने के लिए जहां कड़े से कड़े कानून की जरूरत थी, कांग्रेस ने पहले से बने पोटा कानून को रद्द कर दिया। आतंकवाद के प्रति कांग्रेस के सॉफ्ट रुख का ही नतीजा है कि उसकी जड़ें वहां भी फैल गई हैं, जहां आतंकवाद का नामों निशान नहीं था।

महंगाई और चुनाव


महेश रंगराजन
राजनीतिक विश्लेषक

सत्तारूढ़ यूपीए सरकार को महंगाई के प्रेत ने परेशान कर डाला है। महंगाई की दर ने 22 मार्च के सप्ताह के बीतते बीतते 7 फीसदी का आंकड़ा पार कर लिया और अब वह 7.41 फीसदी तक पहुंच गई है, जो कि पिछले तीन सालों में महंगाई का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इस तरह सत्तारूढ़ गठबंधन और खासतौर पर कांग्रेस के लिए जो चीज मुश्किल का सबसे बड़ा सबब बनने जा रही है, वह इस साल देश के कई राज्यों में होने वाले चुनाव हैं, जहां मतदाता महंगाई को लेकर बेहद संवेदनशील हैं।

कोई हैरत की बात नहीं कि कांग्रेस पर इस वक्त राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दोनों छोरों से हमले हो रहे हैं। एल. के. आडवाणी ने साफ तौर पर यह जाहिर कर दिया कि इस बार चुनाव का मुख्य मुद्दा महंगाई ही होगी। कोयंबटूर में हुए हालिया कॉन्फ्रेंस के बाद से सीपीएम भी इस मुद्दे को लेकर सड़क पर आने को उतारू है। बीजेपी का रुख मनमोहन सरकार के गठन के बाद से अब तक लगातार आक्रामक ही रहा है।

व्यापक स्तर पर चीजें सचमुच बहुत खराब दिख रही हैं। महंगाई बढ़ने और चुनावी नतीजे के इतिहास पर नजर यह समझने में मदद कर सकती है कि क्यों आशंकाएं वास्तविक दिखाई दे रही हैं। 1971 में इंदिरा गांधी ने बहुत बड़ी जीत हासिल की। लेकिन 1974 तक सारी चीजें उलट-पुलट हो गईं। इसकी एक बड़ी वजह महंगाई थी। 1971-73 का सूखा और बांग्लादेश के युद्ध ने कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया था। 1973-74 के दौरान औद्योगिक श्रम के लिए कमोडिटी प्राइस इंडेक्स में 21 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई थी और जैसे ही तेल की कीमत में इजाफा हुआ, उसके बाद अगले ही वर्ष महंगाई में भी काफी बढ़ोतरी हो गई।

हम कहेंगे कि ये सब बीते सालों की बातें हैं। 1965-73 के दौरान भारत की विकास दर 3 फीसदी से भी कम थी। लेकिन 2003 के बाद से अब तक भारत अभूतपूर्व रफ्तार से विकास यात्रा कर रहा है। भारत पहले की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा अमीर मुल्क है।

लेकिन एक परेशान करने वाली बात है। पी.बी. नरसिंह राव का नेताओं, व्यवसायियों और उद्योगपतियों के बीच एक समय काफी अच्छा प्रभाव था। लेकिन 1994 के वर्षांत तक आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के एसेंबली चुनावों के नतीजे पार्टी के फिर से उठने की किसी भी संभावना पर भारी पड़ गए। इसका भी अहम कारण चावल की कीमत में आया उछाल ही था। 1998 से लगातार कांग्रेस नरसिंह राव का नाम लेने से बचती रही है। 2006 की गर्मियों में केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के राज्य में, करुणानिधि के नेतृत्व वाले गठबंधन ने गरीब परिवारों को प्रतिमाह 10 किलो चावल मुफ्त देकर अपने लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। मार्च 2007 में अकाली दल के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शहरी गरीबों के वोट की बदौलत मैदान मार लिया। यहां भी सस्ती दाल और आटे के वादे ने ही असर दिखाया।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 1991 से लेकर आज तक प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता में 13 फीसदी की कमी आई है और दालों के संदर्भ में यह आंकड़ा 33 फीसदी का है। आज खाद्य चीजों की कीमत पिछले छह महीने के स्तर से भी काफी अधिक है। दाल और खाद्य तेलों के मूल्य देखकर तो यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है।

भारत के विकास की रफ्तार भले ही बहुत तेज हो, लेकिन इस विकास में हर किसी की हिस्सेदारी बराबर नहीं है। भूमिहीन मजदूरों और गरीब किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक के अनेक तबके फिर भी संघर्ष करने को बाध्य हैं। मंडी में खाद्य चीजों की कीमत में जारी लगातार इजाफा आय के नजरिए से भी किसानों को कोई खास फायदा नहीं दे पा रहा। हमारी श्रम शक्ति का आधा हिस्सा आज भी कृषि कामों में लगा हुआ है। इसलिए सिंचाई की पम्पिंग मशीनों के लिए डीजल और कृषि उत्पादों को नजदीकी सड़क अथवा रेल तक पहुंचाना भी महंगा और इसलिए काफी भारी साबित हो रहा है।

किसानों और गरीबों पर शिकंजे की तरह कसती महंगाई ने सत्तारूढ़ गठबंधन की रातों की नींद हराम कर रखी है। प्याज की कीमत को लेकर पार्टी द्वारा कभी मचाया गया हो हल्ला भी कौन भूल सकता है? पहले इसने 1980 की लोकसभा में इंदिरा गांधी की मदद की, फिर 1998 में सोनिया गांधी ने इसका सहारा लिया।

फूड क्राइसिस है, लेकिन डर किस बात का


भारत डोगरा


युनाइटेड नेशंस के सेक्रेटरी जनरल बान की मून ने हाल ही में चेतावनी दी कि दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और भूख तथा कुपोषण की समस्या विकट हो रही है। मार्च महीने के अपने संदेश में उन्होंने कहा कि गेहूं, चावल और मक्का की कीमतें महज 6 महीने में 50 फीसदी या उससे अधिक बढ़कर रेकॉर्ड बना रही हैं, जबकि खाद्य भंडार बहुत नीचे गिर गए हैं। इसके बाद यह खबर आई कि दुनिया में अन्न का भंडार सिर्फ 12 हफ्तों के लिए बचा है। जाहिर है, हम भोजन के एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया दुनिया में खाद्यान्न के सबसे बड़े उत्पादक हैं। लेकिन इस बार वहां खेती पर मौसम की मार पड़ी है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी डिमांड और सप्लाई का संतुलन गड़बड़ा गया है। कमी की एक वजह यह भी है कि महंगे क्रूड ऑयल से घबराकर अमेरिका ने मक्का की फसल को बडे़ पैमाने पर जैव ईंधन तैयार करने में झोंक दिया है। दुनिया के कई देश इस गलती में उसके साथी हैं। इस नए खाद्य संकट की दस्तक भारत में भी चढ़ती कीमतों और सरकार के खाली होते गोदामों के रूप में नजर आ रही है। बहुत दिन नहीं हुए जब अर्थशास्त्री ज्यां ड्रेज ने अंदाजा लगाया था कि फूड कॉरपोरेशन के गोदामों में पडे़ अनाज के बोरों को एक के ऊपर एक रख दिया जाए, तो वे चांद तक पहुंच जाएंगे।

जून 2002 में एफसीआई के गोदामों में 647 लाख टन अनाज (गेहूं और चावल) था, जबकि जरूरत लगभग 230 लाख टन की ही थी। अगले 4 साल में ही हालत यह हो गई कि अक्टूबर 2006 में गोदामों में सिर्फ 124 लाख टन अनाज था, जबकि उस वक्त जरूरत 162 लाख टन की थी। 2006-07 में 55 लाख टन गेहूं इम्पोर्ट किया गया। 2007-08 में भी 18 लाख टन गेहूं इम्पोर्ट करने के ऑर्डर दिए गए। तब जाकर यह हालत थी कि इस वर्ष के शुरू में 192 लाख टन अनाज गोदामों में था, जबकि जनवरी में इसकी मात्रा 200 लाख टन होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, लाखों टन के इम्पोर्ट के बावजूद एफसीआई के गोदामों में अनाज जरूरत से कम ही रहा।

लोगों को यह जानने का हक है कि 5-6 बरसों के भीतर ऐसा कैसे हो गया? जानना तो लोग यह भी चाहते हैं कि सस्ते में एक्सपोर्ट और महंगे में इम्पोर्ट क्यों किए गए? सपोर्ट प्राइस बढ़ाकर किसानों से ज्यादा अनाज हासिल करने के बजाय महंगा इम्पोर्ट क्यों किया गया? अगर खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी खाद्यान्न जुटाने में दिक्कत आ रही थी तो अनाज की खरीद में प्राइवेट कंपनियों को इतनी तेजी से क्यों आगे आने दिया गया? ऐसे सब मामलों पर पारदर्शिता की बहुत जरूरत है।

फिलहाल इस बात से इनकार नहीं कि हम संकट में पड़ गए हैं, लेकिन इसके बावजूद यह जोर देकर कहना जरूरी है कि घबराने की कोई वजह नहीं है और न ही जल्दबाजी में कोई कदम उठाना चाहिए। 1960 के दशक में खाद्य संकट को इस तरह पेश किया गया जैसे कि प्रलय आ गया हो। घबराहट के उस माहौल में ऐसी महंगी तकनीकों को पास करवा लिया गया जो बाहरी बीजों, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर आधारित हैं। उनके कारण हमारी मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन नष्ट होता गया और किसान महंगी खेती के जाल में फंसकर कर्जग्रस्त होते गए। इन दिनों भी खाद्य संकट की दुहाई देकर स्वास्थ्य, पर्यावरण और किसानी के लिए खतरनाक जीएमओ जैसी तकनीकों की पैरवी की जा रही है।

जरूरत तो इस बात की है कि पर्यावरण की रक्षा और छोटे किसान की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए खाद्य उत्पादन बढ़ाने की सस्ती, टिकाऊ और आत्मनिर्भर तकनीकों का प्रसार किया जाए, जिनमें गांवों में और उनके आसपास उपलब्ध संसाधनों का बेहतर से बेहतर उपयोग हो सके। इसमें गांववासियों के परंपरागत ज्ञान का अधिकतम फायदा उठाना चाहिए। विख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर. एच. रिछारिया ने 60 के दशक में इस आधार पर देश में उपलब्ध धान की जैव विविधता का लाभ उठाते हुए चावल का उत्पादन बढ़ाने का एक बेहद उपयोगी प्रोग्राम तैयार किया था। लेकिन उन्हीं दिनों रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर आधारित विदेशी किस्मों के प्रसार की आंधी ऐसी चली कि उसके आगे डॉ. रिछारिया के सब सपने ढह गए। बाद में उन्होंने चावल की 17,000 से ज्यादा किस्मों और उप किस्मों को इकट्ठा किया, जिनमें सबसे बढ़िया किस्में आदिवासी किसानों से हासिल हुईं। लेकिन जब उन्होंने किसानों के इस खजाने पर बाहरी शिकंजा कसने का विरोध किया तो उन्हें गुमनामी के अंधेरे में खोने के लिए मजबूर कर दिया गया। बाद में इंदिरा गांधी के कार्यालय ने उन्हें चावल उत्पादन बढ़ाने का प्रोग्राम तैयार करने को कहा, लेकिन इंदिरा की हत्या के बाद यह शुरुआत भी ठप हो गई।

इस त्रासद कहानी का सबक यह है कि भारतीय खेती की सही संभावनाओं को हासिल करने में कोई न कोई अड़चन आती रही और किसानों की भलाई के साथ खाद्य सुरक्षा मजबूत करने का मकसद पीछे छूटता गया। नतीजा यह है कि वर्ष 1990-2007 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन की सालाना बढ़ोतरी सिर्फ 1.2 फीसदी पर सिमट गई, जो जनसंख्या में इजाफे की 1.9 फीसदी की दर से भी कम थी। अनाज की प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1990 में 468 ग्राम थी, जो घटकर 2005-06 में 412 ग्राम रह गई। दालों की उपलब्धता इस दौरान 42 ग्राम से गिरकर 33 ग्राम पर पहुंच गई।

वर्ष 2007-08 के इकनॉमिक सर्वे में स्वीकार किया गया है कि रासायनिक खादों के जरूरत से ज्यादा और गलत इस्तेमाल से मिट्टी के उपजाऊपन और फसलों की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ा है। सर्वे मानता है कि खेती में सार्वजनिक निवेश कम हुआ है। 1989-90 से 2005-06 के बीच खाद्यान्न उत्पादन का एरिया घटता रहा। सिंचाई क्षमता में बढ़ोतरी 1950-51 से 1989-90 के दौरान 3 फीसदी सालाना थी। लेकिन इसके बाद के 15 बरसों में यह दर आधी रह गई। सिंचाई की उपलब्ध क्षमता का इस्तेमाल भी चिंताजनक बना रहा।

इन बढ़ती परेशानियों का सबक यही है कि अब नीतियों को सुधारने का वक्त आ गया है। भारतीय किसानों ने कई बार दिखा दिया है कि सही मौका मिले तो वे हर चुनौती को स्वीकार करने को तैयार हैं। अब भी यह करिश्मा हो सकता है।

संसाधनों के पर्याप्त दोहन की जरूरत

शेलोम सिमखोन

पिछले दिनों मुझे भारत को देखने का मौका मिला। मैं यहां पहली बार आया था। यह एक सद्भाव यात्रा थी, जो कृषि मंत्री शरद पवार की इस्त्राइल यात्रा के जवाब में आयोजित की गई थी। अपनी इस यात्रा के दौरान मैंने यहां के कुछ राज्यों और वहां हो रही खेती को देखा। यहां पुल प्राकृतिक संसाधन देख कर मैं मुग्ध रह गया। यह देश विश्व की एक बहुत बड़ी ताकत बन सकता है, लेकिन यहां के संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। अपनी इस यात्रा के दौरान हमने महसूस किया कि दोनों देशों की अनेक समस्याएं समान हैं। हम मिल कर बहुत कुछ कर सकते हैं। हमने इस्त्राइल में तकनीक पर काफी काम किया है।

वर्ष 1948 में इस्त्राइल की राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। यह लगभग वही समय है जब भारत भी आजाद हुआ था। तब इसाइल की अर्थव्यवस्था का वास्तविक आधार भी खेती ही थी। वहां पारंपरिक ढंग की खेती हुआ करती थी और कुछ पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं। उस समय हम नींबू प्रजाति के कुछ फल निर्यात किया करते थे। लेकिन बाद के सालों में हमने इसमें बहुत सारे बदलाव किए हैं। आज हमारे सामने पूरा विश्व एक खुला बाजार है और हम अनेक प्रकार के खाद्य उत्पादों की विश्व भर में बिक्री करते हैं। अब हम सेब और केले जैसे फलों का भी भरपूर उत्पादन करने लगे हैं जिन्हें पानी और सर्द मौसम वाले इलाकों की फसल माना जाता है।

हालांकि इस्त्राइल एक छोटा सा देश है, लेकिन भारत की ही तरह यहां भी कई तरह के मौसम हैं और खेती के लिहाज से अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और मिजाज भी अलग-अलग है। हमने उन्हें ध्यान में रख कर नई कृषि तकनीक और उसके उपकरण विकसित किए हैं। इसका हमें प्रत्यक्ष लाभ मिला है। इसे एक उदाहरण से समझाया जा सकता है। जैसे इसाइल ने ऐसी ग्रीनहाउस तकनीकों का विकास किया है, जो खासतौर से गर्म मौसम वाले इलाकों के लिए हैं। इस ग्रीनहाउस सिस्टम में कुछ विशेष प्रकार की प्लास्टिक फिल्में, हीटिंग और वेंटिलेशन की तरकीबें इस्तेमाल की जाती हैं। इनसे इसाइली किसानों को हर सीजन में 35-40 लाख गुलाब प्रति हेक्टेयर उगाने में मदद मिलती है। इससे औसतन प्रति हेक्टेयर 400 टन टमाटर उगाया जाता है। खुले खेतों में होने वाली फसल के मुकाबले यह पैदावार चार गुनी है।

भारत के पश्चिमी राज्यों में पानी की भारी कमी है। राजस्थान का एक बड़ा इलाका रेगिस्तानी है। गुजरात और महाराष्ट्र के भी कुछ इलाके सूखे हैं। हमारे इस्त्राइल की भी यही स्थिति है। रेगिस्तान से सटे होने के अलावा हमारा देश बेहद छोटा भी है। इसाइल की कुल भूमि का क्षेत्रफल 21 हजार वर्ग किलोमीटर है। इसमें सिर्फ 4.4 लाख हेक्टेयर यानी 20 फीसदी भूमि ही कृषि योग्य है। असल में तो खेती लायक जमीन 3.6 लाख हेक्टेयर भूमि ही है, शेष 1.8 लाख हेक्टेयर भूमि को हमने सिंचाई द्वारा खेती के लायक बनाया है। यह सिंचाई पद्धति सिर्फ जमीन पर पानी डाल देने की पारंपरिक पद्धति नहीं है। इसमें पानी में ही घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है और खाद तथा पानी दोनों की मात्रा मौसम, मिट्टी और पौधे की जरूरत के मुताबिक नियंत्रित की जाती है।

इस्त्राइल की आधी से ज्यादा भूमि बंजर है। इस देश में मौसम की कठिन परिस्थतियों और जल की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए सिंचाई की तकनीक पर यहां काफी काम किया गया है। यह देखा गया कि भूतल पर सिंचाई के बजाय दबावीकृत सिंचाई में जल का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी है। फिर सिंचाई तरह-तरह की तकनीकें और उपकरण विकसित किए गए-जैसे ड्रिप इरिगेशन ऑटोमैटिक वॉल्व्स और कंट्रोलर्स, लो डिस्चार्ज स्प्रेयर्स और मिनी स्प्रिंक्लर्स आदि। फर्टिगेशन (सिंचाई के साथ खाद का इस्तेमाल) आम है। खाद उत्पादकों ने अत्यंत घुलनशील और दव रूप वाली खाद का विकास किया है, जो इस तकनीक के लिए काम आती हैं।

देश भर में कृषि मौसम स्टेशनों का नेटवर्क है, जो मौसम के बारे में किसानों को तात्कालिक आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। इन आंकड़ों के जरिए सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह विकसित कम्प्यूटर नियंत्रित ड्रिप्स सिंचाई प्रणाली बड़ी मात्रा में पानी बचाती है और सिंचाई के जरिए ही खाद की सप्लाई को संभव बनाती है। सोचिए, इस तकनीक और अनुभव का लाभ उठा कर हम भारत के पश्चिमी प्रदेश को कितना हराभरा और उपजाऊ बना सकते हैं। यह खुशी की बात है कि दोनों देशों की सरकारों का ध्यान इस ओर गया है और वे गंभीरता से इस पर काम कर रही हैं। अगले 5 सालों में शायद राजस्थान खुद जैतून के तेल का उत्पादन करने लगेगा।

अपने मौसम की प्रतिकूलता को देखते हुए हमने 50 के दशक से ही खेती और सिंचाई पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया था। इसके अंतर्गत गैर-अनुभवी किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे कृषि की आधुनिक विधियों का इस्तेमाल सीमित संसाधनों के बीच अपनी क्षमता के अनुसार कर सकें। साल बीतते गए और कृषि का तेजी से विकास हुआ, क्योंकि शोध में मिली जरूरी सूचनाएं तेजी से खेतों और किसानों तक पहुंचीं। देश में इस दिशा में काम करने वाले टीमों की स्थापना की गई, जिन्होंने देश भर में कुशल और सक्षम प्रशिक्षण दिया। बाजार में प्रतियोगिता का दौर होने के बावजूद कृषि के पेशेवर विकास में प्रशिक्षण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही और इससे गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा मिला। यह अनुभव और शोध का एक ऐसा मिलाजुला क्षेत्र है जिसमें भारत और इस्त्राइल काफी कुछ एक-दूसरे के साथ बांट सकते हैं।

पशुओं और बीजों की उन्नत प्रजातियां विकसित करने के अलावा कंट्रोल्ड रिलीज फर्टिलाइजर्स जैसी तकनीक के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। इनसे भूमिगत जल का प्रदूषण भी कम होता है। जिन नए तरीकों का आविष्कार किया गया है उनमें सिंचाई की क्रांतिकारी तकनीक, भूमि को उपजाऊ बनाना और रेगिस्तान के उपयोग के लिए खारे पानी का इस्तेमाल बढ़ाना शामिल है। शोधकर्ताओं, किसानों और कृषि पर आधारित उद्योगों के बीच करीबी सहयोग से बाजारोन्मुखी कृषि व्यापार को मजबूती मिली है, जो अपनी कृषि तकनीक का निर्यात पूरे विश्व को कर रहा है।

कृषि बाजारों में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे उत्पाद जो कीटों, रोगाणुओं और कीटनाशकों से मुक्त हों। इसाइल में फसल कटाई के बाद की स्थितियों पर भी काफी काम हुआ है, ताकि इस प्रकार के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मार्केटिंग हो सके। कैसे भंडारण किया जाए, किस तरह की पैकेजिंग की जाए, दुकानों की शेल्फ पर किस तरह से अपने कृषि उत्पादों को ज्यादा से ज्यादा समय तक ताजा रखा जा सके -इस पर भी इस्त्राइल में काफी काम हुआ है। भारत में कृषि उत्पाद की अकूत क्षमता है, वह विश्व बाजार में अपनी धाक जमा सकता है। हम भारत के साथ अपने अनुभव बांटने के लिए बहुत ही उत्सुक हैं।
( लेखक इस्त्राइल के कृषि मंत्री हैं)

महंगाई के नाम पर

 राजेंद्र शर्मा
बेलगाम हुई महंगाई से यूपीए सरकार के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें पड़ गई हैं। बेशक ऐसा न होता तो हैरानी की बात होती। खुद प्रधानमंत्री ने फिक्की की सालाना बैठक के अपने उद्घाटन भाषण में यह स्वीकार किया था कि गरीबी की मार आम आदमी पर ही ज्यादा पड़ती है, जिसकी कोई भी अनदेखी नहीं कर सकता। इलेक्शन के साल में तो हर्गिज नहीं। याद रहे कि प्रधानमंत्री की यह चेतावनी यूपीए सरकार का अंतिम मुकम्मल बजट पेश करने के फौरन बाद महंगाई के खतरनाक तरीके से तेजी पकड़ना शुरू करने से पहले ही आ चुकी थी। इसके बावजूद पी. चिदंबरम के बजट प्रस्तावों से महंगाई की आग पर ठंडे पानी के छींटे पड़ने के बजाय कीमतें उछलती चली गईं। मौजूदा महंगाई के राजनीतिक मतलबों को अगर हम कुछ देर के लिए एक तरफ रख दें, तब भी कोई पूछ सकता है कि क्या यह वित्त मंत्री की विफलता का भी मामला नहीं है? असल में पूछा यह भी जा सकता है कि क्या यह पूरी सरकार की भी विफलता का मामला नहीं है?

कथित खुलेपन की नीतियों के दौर में जिम्मेदारी का सवाल उठाया जाना ही सबसे पहले नापसंद किया जाता है! यह सवाल उठाना तो जैसे अपराध ही हो गया है कि आखिरकार यह किन या किस तरह की नीतियों की नाकामी है! जाहिर है, जब जिम्मेदार नीतियों की पहचान नहीं की जा सकती है, तो उस नाकामी की खाई से बाहर निकलने के लिए कुछ करना ही कहां संभव है! इसीलिए हम यह अनोखा तमाशा देख रहे हैं कि यह जानते हुए भी कि इसकी बहुत भारी सियासी कीमत चुकानी पड़ सकती है, पूरी की पूरी सरकार लाचार बनकर महंगाई का तमाशा देख रही है। उसने अगर कोई कोशिश की है तो महंगाई पर अंकुश लगाने की नहीं बल्कि पब्लिक को सिर्फ यह समझाने की कि महंगाई चूंकि बाहर से आई है, इसलिए सरकार उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वित्त मंत्री ने पिछले ही दिनों केरल में कांग्रेस की एक चिंतन बैठक में ऐलान किया कि 'हम महंगाई इम्पोर्ट कर रहे हैं।' आप जानते हैं कि इम्पोर्टेड चीज का आदर करना हमारी परंपरा है।

लेकिन यह किस्सा सिर्फ इतना नहीं है कि महंगाई हो या खाद्य सुरक्षा, पब्लिक पर सीधे मार करने वाले बुनियादी आर्थिक मसलों को भी बाढ़, सूखे या भूकंप की तरह प्राकृतिक आपदा बनाया जा रहा है, जिसके आने-जाने में सरकार का कोई दखल नहीं होता। इससे आगे बढ़कर संकट के असली कारणों पर पर्दा डालने की हड़बड़ी में ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो संकट को और गहरा ही कर सकते हैं। एक छोटी सी मिसाल पेश है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि महंगाई के मौजूदा चक्र को सबसे बढ़कर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल ने भड़काया है। लेकिन चूंकि पिछले दो साल में हमारे देश में खाद्यान्न पैदावार में किसी तरह की गिरावट न होकर बढ़ोतरी ही हुई है, कीमतों में इस उछाल के कारण संकटग्रस्त खेती से बाहर ही होने चाहिए। अब तो सरकार भी न चाहते हुए यह मानने पर मजबूर है कि खेती की पैदावार में फॉरवर्ड ट्रेडिंग के नाम पर सट्टेबाजी ही कीमतों में इस उछाल के पीछे है। और यह सट्टेबाजी मुमकिन हुई है खेती की पैदावारों की खरीद का मैदान देशी-विदेशी बड़े व्यापारियों के लिए खोल दिए जाने से। इसने पीडीएस यानी आम आदमी की इकलौती रक्षा छतरी को जिस तरह तबाह किया है, वह जगजाहिर है। इसने पिछले दो वर्षों में लगातार बढ़ते दाम पर गेहूं का आयात करने, यानी महंगाई के आयात की जो मजबूरी पैदा की थी, वह भी किसी से छुपी नहीं है।

इस समस्या से निपटने के लिए यूपीए सरकार क्या कर रही है? क्या वह कृषि उत्पादों में सट्टेबाजी पर रोक लगा रही है, जिसकी मांग वामपंथी पार्टियों ने ही नहीं, बल्कि संसदीय समिति ने भी की है? जी नहीं। क्या वह उपजों की खरीद में निजी क्षेत्र के दखल पर अंकुश लगा रही है, ताकि भारतीय खाद्य निगम के जरिए सरकार के हाथों में ज्यादा पैदावार पहुंचे और वह पीडीएस के रास्ते आम लोगों को महंगाई से बचा सके? नहीं। वह तो इस मामले में सारी जिम्मेदारी से अपनी जान छुड़ाने की ही कोशिश कर रही है। तभी तो कृषि राज्य मंत्री ने लोकसभा को यह जानकारी दी कि चार राज्यों को मार्च से मई तक अपनी मर्जी के मुताबिक गेहूं के आयात की इजाजत दे दी गई है। ये चार राज्य हैं- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। मंत्री महोदय ने बताया कि आंध्र और केरल से भी आयात पर विचार करने के लिए कहा गया है। यूपीए सरकार के हिसाब से इन आयातों के जरिए ये राज्य, पीडीएस और दूसरे कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए खाद्यान्न की अपनी जरूरत के करीब आधे की भरपाई करेंगे। मंत्री महोदय ने माना कि 2007 में केंद्रीय पूल में कम गेहूं पहुंचने और ज्यादा मांग आने के चलते यह कदम उठाना जरूरी हो गया था।

यह तो साफ ही है कि इस तरह यूपीए सरकार आम आदमी को न्यूनतम भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी और जवाबदेही, दोनों से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन असल में इस उलटी चाल के नतीजे दूर तक जाते हैं। राज्यों को अपनी जरूरत के लिए खाद्यान्न का आयात करने के भरोसे छोड़े जाने का मतलब यह भी है कि इन राज्यों को इंटरनैशनल मंडी में आपस में ही होड़ के लिए धकेला जा रहा होगा। इससे आयात तो अपेक्षाकृत महंगे पड़ ही रहे होंगे, केंद्र के साथ और आपस में भी राज्यों के संबंधों पर इसका जो असर पड़ेगा, उसका आसानी से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बड़े निवेश और ऋणों के मामले में राज्यों के बीच होड़ ने उन्हें जिस तरह ज्यादा से ज्यादा रियायतें देने पर मजबूर किया है, वह सबके सामने है। जाहिर है, यह रास्ता सिस्टम को ही कमजोर किए जाने की ओर जाता है। इसके जरिए खाद्य सुरक्षा तक के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी नियोजित प्रयास को नामुमकिन बनाया जा रहा होगा। लेकिन आम आदमी के हितों के मामले में शासन को ज्यादा से ज्यादा लाचार बनाया जाना तो उदारीकरण की बुनियादी विशेषता ही है। किसने सोचा होगा कि राज्य के धीरे-धीरे खत्म हो जाने का मार्क्सवादी विचार इस तरह सच होगा!

अमेरिकी मंदी से डरना कैसा?

भरत झुनझुनवाला

अमेरिका में मंदी गहराती जा रही है। वहां के बैंकों को लगातार घाटा हो रहा है। मंदी से छुटकारा पाने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में भारी कटौती की है। लेकिन इकॉनमी डूबती ही जा रही है। सवाल यह है कि क्या भारत भी उसकी चपेट में आएगा? पहली नजर में तो ऐसा होता लग रहा है। हमारे निर्यातकों को दिक्कत हो रही है और शेयर बाजार से अमेरिकी पूंजी निकल रही है। लेकिन दूसरे तमाम मामलों में यह रिश्ता टूटता दिखता है। र्वल्ड प्रेस डॉटकॉम पर प्रीयरडू प्लेसेस अमेरिकी मंदी की चार वजहें बताते हैं- होड़ लेने की ताकत का अभाव, तेल के दाम, हाउसिंग बुलबुले का फूटना और उपभोक्ता में भरोसे की कमी। देखना चाहिए कि ये कारण भारत में कितने मौजूद हैं। इससे संकेत मिल जाएगा कि भारत मंदी की चपेट में आएगा या नहीं।

अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का मुख्य कारण उस देश के ऊंचे वेतन हैं। किसी अर्धकुशल श्रमिक, जैसे टैक्सी ड्राइवर की दैनिक आय अमेरिका में लगभग दस हजार रुपये है। तुलना में भारत में टैक्सी ड्राइवर की आय महज 250 रुपये है। ऊंचे वेतन होने से अमेरिकी उद्योग ग्लोबल होड़ में टिक नहीं पा रहे। इसका साफ संकेत कॉल सेन्टर से मिलता है। अमेरिकी कंपनियों के लिए अमेरिकी श्रमिक से इस सेवा को लेना महंगा पड़ता है, जबकि भारतीय श्रमिक से सस्ता। इसलिए अमेरिका के कॉल सेन्टर बंद हो रहे हैं और भारत में खुल रहे हैं। मतलब यह हुआ कि अमेरिका में होड़ की क्षमता का टूटना और भारत में इस क्षमता का सृजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए अमेरिकी मंदी का गहराना हमारे लिए शुभ होगा। वहां से रोजगार का पलायन तेजी से भारत की ओर होगा। हां, हमें बांग्लादेश और वियतनाम से होड़ करनी होगी। फिर भी हम पर असर सकारात्मक ही पड़ेगा।

अमेरिका में होड़ की क्षमता के अभाव का कारण तकनीकी विकास में ठहराव भी है। पिछले सौ बरसों के प्रमुख आविष्कार अमेरिका में ही हुए। लेकिन पिछले दस बरसों से इस सिलसिले में ठहराव सा आ गया है। इस क्षेत्र में भी भारत का सूरज उगता दिखता है। मसलन नैनो बनाकर भारत ने ग्लोबल ऑटो इंडस्ट्री के सामने नई चुनौती पेश की है।

अमेरिकी मंदी का दूसरा कारण तेल के बढ़ते दाम हैं। कार को अमेरिकी कल्चर का प्रतीक कहा जा सकता है। वीकएंड पर पूरा देश कार में बैठकर सैर को निकल पड़ता है। बड़ी कारों का भी उन्हें शौक है। इसलिए अमेरिका पर तेल के बढ़ते मूल्यों का गहरा असर पड़ना ही है। भारत पर यह असर आंशिक रूप से ही पड़ेगा, क्योंकि कार की संस्कृति अभी हम पर पूरी तरह से हावी नहीं हुई है। इसके अलावा तेल की ऊंची कीमत अदा करने से हुए नुकसान की कुछ भरपाई भारत को हो जाएगी। तेल से पश्चिम एशिया, रूस और वेनेजुएला को भारी आय हो रही है। ये देश अपने विकास के लिए बड़े प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं।। इन प्रोजेक्ट के लिए भारत से श्रमिकों और माल की मांग बढ़ रही है। इस तरह तेल पर खर्च हुआ कुछ पैसा वापस भी लौट रहा है।

तेल उत्पादक देशों के सामने समस्या है कि अपनी कमाई का निवेश कहां करें। अतीत में यह निवेश अमेरिका में किया जा रहा था। सत्तर और अस्सी के दशक में तेल के दाम उछले थे और तेल उत्पादक देशों को भारी आय हुई थी। इस आय के बड़े हिस्से का निवेश उन्होंने अमेरिका में किया था। सऊदी अरब के राजकुमारों ने मैनहटन में प्रॉपर्टी खरीदी। इस रकम को पेट्रो डॉलर कहा गया था।

अमेरिका द्वारा तेल के लिए अदा की गई रकम घूमकर वापस आ गई। लेकिन अब यह सूचक्र टूट गया है। अमेरिकी डॉलर टूटने से सऊदी राजकुमारों के लिए अमेरिका में पेट्रो डॉलर का निवेश फायदेमंद नहीं रह गया है। यानी समस्या तेल की ऊंची कीमत से नहीं बल्कि डॉलर के टूटने से पैदा हुई है। भारत की स्थिति बिल्कुल उलट है। रुपया चढ़ रहा है। सऊदी राजकुमारों के लिए नरीमन पॉइंट का आकर्षण बढ़ रहा है। इसलिए पेट्रो डॉलर का बहाव भारत की तरफ आने की पूरी गुंजाइश है। तेल के बुरे असर की कुछ भरपाई इस प्रवाह से हो जाएगी। यानी हम उस बीमारी से पीड़ित नहीं हैं, जिससे अमेरिका है।

अमेरिकी मंदी की तीसरी वजह हाउसिंग बुलबुले का फूटना है। दरअसल अमेरिका में मंदी ने 2002 में डॉटकॉम बुलबुले के फूटने के साथ ही पैर पसार लिए थे, लेकिन उस समय यह दिखी नहीं थी। अमेरिकी केन्द्रीय बैंक के प्रमुख एलन ग्रीनस्पैन ने हालत को भांप लिया। मंदी से निजात दिलाने के लिए उन्होंने हाउसिंग लोन सस्ते कर दिए, जबकि सरकारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर बढ़ा दी। हाउसिंग लोन सस्ता होने से अमेरिकी नागरिकों ने मकान खरीदे। इससे हाउसिंग सेक्टर में सीमेंट, स्टील और ग्लास आदि की मांग पैदा हुई। साथ ही सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बॉन्ड पर ब्याज दर ऊंची होने से पूंजी का प्रवाह अमेरिका की तरफ बना रहा। ग्रीनस्पैन ने चार्वाक की 'कर्ज लेकर घी पीओ' की नीति अपनाई। जब तक कर्ज मिलता रहा, पार्टी चलती रही। लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती? जल्द ही निवेशकों को समझ आने लग गया कि अमेरिकी इकॉनमी अंदर से खोखली होती जा रही है। उन्हें दिखने लगा कि डॉलर टूटेगा। उन्होंने अमेरिकी टेजरी बॉन्ड खरीदने से हाथ खींच लिया। अमेरिका को आसान पूंजी मिलना बन्द हो गया और हाउसिंग बबल फूट गया। साथ ही अमेरिका की होड़ लेने की क्षमता घटने से नागरिकों के रोजगार संकट में पड़ गए। वे हाउसिंग लोन की अदायगी नहीं कर सके। मतलब यह है कि अमेरिका का हाउसिंग संकट उसकी गलत नीतियों की देन है। इसका भारत से कुछ भी लेना-देना नहीं।

अमेरिकी मंदी का चौथा कारण कंस्यूमर में भरोसे की कमी है। आज अमेरिकी उपभोक्ता उसी तरह मायूस है जैसे लॉटरी खेलने वाला न जीतने पर हो जाता है। इसके उलट भारत में शॉपिंग मॉल्स का फैलता कल्चर बताता है कि कंस्यूमर के हौसले बुलंद हैं।

मेरी समझ अमेरिकी मंदी के चारों कारण भारत पर लागू नहीं होते। हमारे निर्यातकों को परेशानी होगी और शेयर बाजार भी कुछ टूटेगा। लेकिन भारतीय इकॉनमी की बुनियाद मजबूत ही बनी रहेगी। हमें इन तात्कालिक समस्याओं से विचलित नहीं होना चाहिए।

महंगाई नहीं रोक पाएगी सरकार

भरत झुनझुनवाला

इस वक्त महंगाई का जो आलम है, उसकी पहली वजह यह है कि खाद्य पदार्थों का भारी मात्रा में उपयोग बायोडीजल बनाने के लिए हो रहा है, खास तौर से अमेरिका में मक्के और ब्राजील में गन्ने का। दुनिया के खाद्य उत्पादन में से यह मात्रा निकल जाने के कारण दूसरे खाद्य पदार्थों पर दबाव पड़ रहा है। महंगाई की दूसरी वजह भारत और चीन में तेज आर्थिक विकास है। ये देश बुनियादी ढांचे में भारी मात्रा में निवेश कर रहे हैं। जिससे स्टील आदि की मांग और दाम बढ़ रहे हैं। पिछले दिनों तेल के दाम में हुई भारी बढ़ोतरी भी इसी क्रम में है। भारत में बायोडीजल के उत्पादन के लिए खाद्यान्नों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। लेकिन विश्व स्तर पर ऐसे उपयोग का असर हम पर पड़ रहा है।

सामान्य हालात में अमेरिकी इकॉनमी में गहराती मंदी को महंगाई रोकने में मददगार होना चाहिए था। अगर चीन में तेजी के कारण स्टील की मांग ज्यादा है तो अमेरिका में मंदी के कारण मांग कम है। लेकिन अमेरिकी मंदी के बावजूद स्टील और गेहूं के वैश्विक मूल्यों के बढ़ने से पता लगता है कि अमेरिकी मांग में हो रही कटौती की तुलना में भारत और चीन में मांग में बढ़ोतरी ज्यादा हो रही है। यह इस बात का सबूत है कि भारत-चीन तथा अमेरिका की इकॉनमी में अलगाव हो चुका है।

इसके अलावा चीजों की भी भिन्नता है। अमेरिकी मांग में कपड़े, खिलौने, कार आदि का हिस्सा ज्यादा था। अमेरिका के मंद पड़ने से इन माल के दाम घट रहे हैं। खबर है कि भारतीय कपड़ा मिलों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उनके ऑर्डर कैंसल हो रहे हैं और गारर्मेन्ट्स के दाम घट रहे हैं। लेकिन भारत के बाजार में इन वस्तुओं का महत्व कम है इसलिए इस मूल्य कटौती का असर नहीं दिख रहा है। हमारी इकॉनमी में स्टील, सीमेंट और दूसरे कन्स्ट्रक्शन मटीरियल का हिस्सा ज्यादा है। इनके दाम बढ़ रहे हैं।

लेकिन शेयर बाजारों में पिछले दो माह में आई गिरावट इस अलगाव पर सवालिया निशान खड़ा करती है। अमेरिकी मंदी के गहराने के साथ-साथ भारत के शेयर बाजार टूट रहे हैं। मेंरा मानना है कि यह अल्पकालीन असर है। अमेरिकी संकट के हमारे शेयर बाजार पर दो असर पड़ते हैं। तत्काल हमारे यहां बिकवाली होती है। अमेरिकी बैकों को अमेरिका में हुए घाटे की भरपाई के लिए यहां पर अपनी होल्डिंग की बिक्री करनी पड़ रही है। लेकिन दूसरा असर उल्टी दिशा में होता है। दुनिया के निवेशकों को सदा निवेश के अवसरों की खोज रहती है। मसलन सऊदी अरब के राजघराने को तेल के ऊंचे दामों से भारी फायदा हो रहा है।

पहले वह इस आय के बड़े हिस्से का निवेश अमेरिका में कर रहा था, लेकिन अब वहां निवेश करना आकर्षक नहीं रह गया है। अमेरिका में मंदी के गहराने के साथ अमेरिकी डॉलर का मूल्य गिर रहा है जिससे निवेशकों को भारी घाटा लगता है। लिहाजा दुनिया के तमाम निवेशकों को खोज है ऐसी मुद्रा की जिसके मूल्य में बढ़ोतरी होने की गुंजाइश हो। हमारा रुपया ऐसी स्थिति में है। इसलिए दुनिया भर के निवेशकों का रुख भारत की तरफ हो रहा है। पिछले चार माह में सीधा विदेशी निवेश रेकॉर्ड 10 अरब डॉलर के स्तर पर रहा है, जो कि इस प्रवाह का संकेत देता है। इस प्रवाह से भारत और चीन में महंगाई की दर भी बढ़ रही है। इसलिए अमेरिकी मंदी का महंगाई पर असर नहीं दिख रहा।

इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार द्वारा महंगाई पर नियंत्रण करने की कोशिशों का मूल्यांकन करना चाहिए। सरकार ने कई वस्तुओं पर आयात शुल्क घटा दिया है, जैसे स्टील और खाद्य तेल पर। दूसरी वस्तुओं के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, जैसे चावल। यह कदम सही दिशा में होने के बावजूद ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है। मूल समस्या विश्व बाजार में स्टील और सीमेंट की ज्यादा मांग होने से इनके वैश्विक मूल्यों में तेजी है। जब रूस, हांगकांग और दुबई में स्टील का दाम बढ़ रहा है तो इस पर आयात कर घटाने से मामूली अंतर ही पड़ेगा। इसके अलावा आयात शुल्क शून्य कर देने के बाद यह नुस्खा फेल हो जाता है। यही स्थिति चावल के निर्यात पर पाबंदी की है।

मान लिया कि पाबंदी लगाने से चावल के बाहरी मूल्यों से हमारा बाजार प्रभावित नहीं होगा। लेकिन हम दूसरे खाद्य पदार्थों का आयात कर रहे हैं जैसे गेहूं का। गेहूं का वैश्विक मूल्य बढ़ने से गेहूं के घरेलू मूल्य बढ़ेंगे और सहानुभूति में चावल के दाम भी बढ़ जाएंगे। आयातित पाम ऑयल के महंगा होने के कारण घरेलू मूंगफली और नारियल के तेल भी महंगे हो जाएंगे। सरकार द्वारा दूसरा कदम कैश रिजर्व रेशो को बढ़ाना है। इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए रकम कम बचेगी। कर्ज कम मिलने से फैक्ट्रियां कम लगेंगी और स्टील तथा सीमेंट की मांग कम होगी। यह कदम सही दिशा में होते हुए भी बेअसर होगा, क्योंकि मांग में बढ़ोतरी के दूसरे दरवाजे खुले हैं।

सरकार को दूसरी स्ट्रैटिजी अपनानी चाहिए। महंगाई का मूल कारण विदेशी निवेश का भारी मात्रा में आगमन है। सीधे इस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। जब विदेशी पूंजी कम आएगी तो महंगाई अपने आप काबू में आएगी। खाद्य पदार्थों का मामला ज्यादा पेचीदा है। गेहूं, चावल और तेल के दाम बढ़ने से हमारे किसान फायदे में रहते हैं। इनकी मूल्य बढ़ोतरी से किसानों को आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की भी प्रेरणा मिलती है। खाद्य पदार्थों के मूल्य पिछले 20 बरसों में औद्योगिक माल की तुलना में कम ही बढ़े हैं।

इनमें मूल्य बढ़ोतरी देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी हितकारी है। इसलिए खाद्य पदार्थों की मूल्य बढ़ोतरी रोकने के स्थान पर आम आदमी को महंगे खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए सक्षम बनाना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि श्रम की मांग बढ़े और श्रमिक की दिहाड़ी वर्तमान 120 रुपये से बढ़कर 200 रुपये हो जाए। तब गरीब के लिए महंगे खाद्यान्न खरीदना मुमकिन होगा। खाद्य सुरक्षा हासिल होगी, किसान खुशहाल होगा और गरीब भी महंगाई की मार से बच जाएगा।

Friday, May 30, 2008

मुद्रा स्फीति (en:inflation)

मुद्रा स्फीति (en:inflation) एक गणितीय युक्ति (तरकीब) है जिससे बाज़ार में मुद्रा का फैलाव व चीजों की कीमतों में वृद्धि को नापा जाता है। उदाहरण के लिएः 1990 में एक सौ रुपए में जितना सामान आता था, अगर 2000 में उसे ख़रीदने के लिए दो सौ रुपए की ज़रूरत पड़ती है तो ये कहा जाएगा कि मुद्रा स्फीति में शत-प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

चीज़ों की क़ीमतों में बढ़ोतरी और मुद्रा की क़ीमत में कमी को वैज्ञानिक ढंग से सूचीबद्ध करना मुद्रा स्फीति का काम होता है। इससे ब्याज दरें भी तय होती हैं।

मुद्रा स्फीति समस्त अर्थशास्त्रीय शब्दों में संभवतः सर्वाधिक लोकप्रिय है। किंतु इसे पारिभाषित करना एक कठिन कार्य है। विभिन्न विद्वानों ने इसकी भिन्न-भिन्न परीभाषा दी है :
बहुत कम माल के लिए बहुत अधिक धन की आपूर्ति हो जाने से इसका जन्म हो जाता है
माल या सेवा की आपूर्ति की तुलना में मांग अधिक हो जाने पर भी इसका जन्म ही जाता हैं
आपूर्ति में दोष, गत्यावरोध तथा ढांचागत असंतुलन के चलते भी मुद्रा स्फीति पनपती हैं

सामान्य रूप से इसका अर्थ ये होगा की ये बिना रुके बढ़ती दर से किसी दिए गए काल खंड में मूल्य स्तर की वृद्धि हैं जो भविष्य में और अधिक वृद्धि की संभावना को बढ़ाती है।अनुक्रम [छुपाएँ]
१ मुद्रा स्फीति के कारण
१.१ मांग कारक
१.२ मूल्य वृद्धि कारक
२ मुद्रा स्फीति के प्रभाव

मुद्रा स्फीति के कारण

कारणात्मक रूप से मुद्रा स्फीति के कई कारण हो सकते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागो में बाँट सकते हैं:
मांग कारक (demand pull)
मूल्य वृद्धि कारक (cost push)

मांग कारक माल सेवा की मांग में वृद्धि से पैदा होते हैं जबकि मूल्य वृद्धि कारक स्पष्टतः मूल्य वृद्धि अथवा माल सेवा की आपूर्ति में कमी से उत्पन्न होते हैं।

मांग कारक
बढ़ता सरकारी व्यय - जो की विगत कई सालों से बढ़ रहा हो जिस से सामान्य जनता के हाथों में अधिक धन आ जाता हैं जो उनकी खरीद क्षमता को बढाता है। यह मुख्य रूप से गैर योजना व्यय (Unplanned expenditure) है जो की अनुत्पादक प्रकृति का होता है तथा केवल क्रय क्षमता में तथा मांग में वृद्धि करता है।
घाटे की पूर्ति तथा मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि से बढ़ते सरकारी व्यय की पूर्ति, घाटे के बजट (Deficit Budget) से तथा नई मुद्रा छाप कर की जाती हैं जो मुद्रा स्फीति तथा आपूर्ति दोनों में वृद्धि कर देते हैं।
काला धन मांग उपभोग में अदृश्य रूप से वृद्धि करता है।
बढ़ती जनसंख्या भी मांग तथा मूल्य में वृद्धि करती है।

मूल्य वृद्धि कारक
उत्पादन-आपूर्ति में उतार चढ़ाव: जब कभी उत्पादन में अत्याधिक उतार चढ़ाव आता हैं या प्राप्त उत्पादन को मुनाफाखोर जमा कर लेते हैं।
उत्पादकता से अधिक वेतन वृद्धि लागत मूल्य को बढ़ाते हैं जो नतीजतन मूल्य में वृद्धि कर देते हैं, साथ ही मांग तथा क्रय क्षमता में भी वृद्धि होती हैं जो पहले वाले शीर्षक के अंतर्गत वृद्धि कर देती हैं।
अप्रत्यक्ष कर भी लागत मूल्य बढ़ा कर सामग्री के मूल्य में वृद्धि के कारक बनते हैं।
ढांचागत विकास में कमी या दोष से प्रति इकाई लागत मूल्य बढ़ता हैं जो कि सामान्य कीमत में वृद्धि कर देता हैं।
प्रशासित मूल्य में वृद्धि जैसे खाद्यान्न के न्यूनतम समर्थन मूल्य या पेट्रोल तथा अन्य उत्पादों के मूल्य जिन्हें सरकार स्वेच्छा से निर्धारित करती हैं क्योंकि वे आम आदमी के बजट का एक बड़ा भाग होते हैं।
आयात मूल्य में वृद्धि घरेलू मूल्य में वृद्धि कर देती हैं जिसे आयात मूल्य वृद्धि मुद्रा स्फीति कहते हैं।
किसी भी समय मुद्रा स्फीति उपरोक्त दोनों प्रकार के कारकों के मिलेजुले प्रभाव से पैदा होती है।
मुद्रा स्फीति के प्रभाव
उत्पादन में अनिश्चितता के परिणामस्वरूप उत्पाद की माँग अनिश्चित हो जाती है व संसाधनों का वितरण असंगत हो जाता है। पूँजी संसाधन दीर्घ कालीन रुप में नहीं वरन् लघु कालीन प्रयोग में आने लगते हैं तथा उत्पादकों का झुकाव ज़रूरी से गैर जरूरी उत्पाद की ओर हो जाता है क्योंकि गैर ज़रूरी उत्पाद की कीमत बढ़ जाने पर उनमें निवेश लाभप्रद हो जाता है।
मुद्रा स्फीती से अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में मंदी आ जाती है जैसे भारत में कपड़ा उत्पाद मूल्य बढ़ जाने पर इन उत्पादों की मांग में गिरावट आ जाती है, लोग केवल बेहद ज़रूरी माल ही खरीदते हैं। इससे उद्योग ठप्प पड़ जाते हैं।
देश में आयवितरण गड़बड़ा जाता है। मुनाफाखोरों को लाभ होने लगता है और नौकरीपेशा संकट में पड़ जाते हैं। भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और सट्टेबाजी बढ़ती है। कठोर श्रम की इच्छा शक्ति में भी कमी आ जाती है।
भारत में मुद्रा स्फीती का नापन थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) तथा औद्योगिक श्रमिक हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (en:Consumer_Price_Index Consumer Price Index) से होता है।

Monday, May 26, 2008

बिहार का भारत के प्राचीन परम्परा से लेकर आजतक का योगदान

क्या कभी आपने सोचा है कि बेरोजगारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, सुखार और लोगों का जत्थे से जत्थे में हो रहे पलायन, इत्यादि समस्यायों से घिरे राज्य बिहार का भारत के प्राचीन परम्परा से लेकर आजतक क्या योगदान रहा है। जनक, जरासंध, कर्ण, सीता, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, मनु, याज्ञबल्कय, मण्डन मिश्र, भारती, मैत्रेयी, कात्यानी, अशोक, बिन्कुसार, बिम्बिसार, से लेकर बाबू कुंवर सिंह, बिरसा मुण्डा, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, रामधारी दिन्कर, नार्गाजून और न जाने कितने महान एवं तेजस्वी पुत्र एवं पुत्रियों को अपने मिट्टी में जन्म देकर भारत को वि के सांस्कृतिक पटल पर अग्रणी बनाने में बिहार का सर्वाधिक स्थान रहा है।
सांस्कृतिक भौगोलिक क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए इस प्रदेश को निम्नलिखित पॉकेटों मे रखकर समझा जा सकता है :

(क) मगध

(ख) मिथिला एवं वैसाली

(ग) अंग

(ध) भोजपुर

सत्य की खोज करते एवं सच्चे ज्ञान की आकांक्षा में भटकते सिद्धार्थ को कोइ भी ज्ञान-वान बनाने में समर्थ न हो सका परन्तु गया के नजदिक एक बृक्ष के नीचे जब एक अनपढ़ भीलनी ने यह गीत गाया :

बीणा के तार को इतना मत खींचो

कि तार ही टूट जाये,

बीणा के तार को इतना ढीला भी न छोड़ो

कि आबाज ही न निकले

एकाएक वे समझ गये कि मध्यम-मार्ग ही सही मार्ग है। और उसी दिन से सिद्धार्थ गौतम बुद्ध हो गये। अब जरा एक-एक सांस्कृतिक क्षेत्र को समझने का प्रयास करें।

(क) मगध

मगध का भारतीय संस्कृति के निर्माण में जो योगदान है, उसे कौन भुला सकता है?

वैदिक साहित्य के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में बिहार तीन भागों में विभाजित था - मगध, अंग और विदेह (या मिथिला)।

वैदिक साहित्य के प्राचीन अंग ॠगवेद सारिता में कीटक नाम से जिस प्रदेश की निन्दित चर्चा मिलती है, उसका बहुत कुछ संकेत मगध से ही माना जाता है। बहुत संभव है, उस समय तक यह प्रदेश आर्येतर जातियां का निवास स्थान रहा हो और मध्य एशिया से आगत आर्य जाति की सभ्यता का आलोक वहाँ न पहुँचा हो। मगध में व्यवस्थित रुप से राज्य की स्थापना का उल्लेख वाल्मीकिरामायण के 32 वें अध्याय में मिलता है। इस राज्य के प्रथम संस्थापक आर्यवसु थे। जिनके बाद चन्द्रगुप्त और महान अशोक जैसे सम्राटों की समृद्ध परम्परा में यह शासित होता रहा । सभ्यता और सांस्कृतिक गरिमा की दृष्टि से भारतीय इतिहास में मग्ध का अत्यधिक महत्त्व रहा है।

छठी शताब्दी ई. पूर्व में मगध राज्य वर्तमान पटना एवं गया जिलों में के स्थान पर स्थित था । मगध की राजधानी गिरिव्रज थी जो अपने वैभव के लिए प्रसिद्ध थी। मगध में सर्वप्रथम राजवंश की स्थापना व्रहद्रथ ने की थी। कालान्तर में वह अत्यन्त शक्तिशाली राज्य बना था तथा समीपवर्ती समस्त राज्यों पर मगध का अधिकार हो गया।

महात्त्मा बुद्ध के समकालीन मगध के शासक क्रमशः विम्बिसार एवं उसका पुत्र अजातशत्रु थे। महात्त्मा बुद्ध के समय में चार प्रमुख राजतन्त्रः मगध, कौशल, वत्स और अवन्ति थे। उल्लेखनीय है कि इन चारों राजतन्त्रों में से मगध-साम्राज्य का ही विकास हो सका, क्योंकि वीर, प्रतापी एवं योग्य शासकों के अतिरिक्त मगध के एक साम्राजवादी शक्ति के रुप में उभरने में अनेक परिस्थितियों ने भी सहायता की।

मगध पर शासन करने वाला प्राचीनतम ज्ञात राजवंश वृहद्रथ-वंश है। महाभारत व पुराणों से ज्ञात होता है कि प्राग्-ऐतिहासिक काल में चेदिराज वसु के पुत्र बृहदर्थ ने गिरिव्रज को राजधानी बनाकर मगध में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया था। दक्षिणी बिहार के गया और पटना जनपदों के स्थान पर तत्कालीनमगध - साम्राज्य था । इसके उत्तर में गंगानदी, पश्चिम में सोननदी, पूर्व में चम्पा नदी तथा दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वतमाला थी। बृहद्रथ के द्वारा स्थापित राजवंश को बृहद्रथ-वंश कहा गया। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक था, जो बृहद्रथ का पुत्र था। जरासंध अत्यन्त पराक्रमी एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण से ज्ञात होता है कि उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांन्धार के राजाओं को परास्त किया। इसी कारण पुराणों में जरासंध को महाबाहु, महाबली और देवेन्द्र के समान तेज वाला कहा गया है। बृहद्रथवंश का अन्तिम शासक रिपुंजय था, जिसकी हत्या उसके मन्त्री पुलिक ने कर दी तथा अपने पुत्र बालक को मगध का शासक नियुक्त किया। इस प्रकार बृहद्रथवंश का पतन हो गया। कुछ समय पश्चात् महिय नामक एक सामन्त ने बालक की हत्या करके अपने पुत्र बिम्बिसार (544-492 ई.पू.) को मगध की राजगद्दी पर बैठाया।


वास्तविक अर्थों में मगध साम्राज्य का उत्कर्ष बिम्बिसार के समय ही प्रारम्भ हुआ। बिम्बिसार हर्यक-कुल का शासक था। उसने एक ओर वैवाहिक-सम्बन्ध के द्वारा काशी को और दूसरी ओर विजय द्वारा अंग को मगध में विलीन कर, मगध को साम्राज्य निर्माण के पथ पर अग्रसर कर दिया।

बिम्बिसार के विशाल साम्राज्य की राजधानी गिरिव्रज थी। ह्मवेनसांग के अनुसार गिरिव्रज में बहुधा अग्निकाण्ड की घटनाएं होती रहती थीं, अतः बिम्बिसार ने एक नवीन नगर की स्थापना की जिसे राजगृह कहा गया। हलांकि, पार्टयान राजगृह की स्थापना का श्रेय अजातशत्रु को देता है।

राज्य की सम्पूर्ण शक्ति स्वयं में निहित होने के पश्चात् भी बिम्बिसार निरंकुश शासक नहीं था। राजकीय समस्याओं का निराकरण वह प्रमुख अधिकारियों के अतिरिक्त गांव के प्रमुखों (ग्रामिकों) की सलाह लेने के पश्चात् ही करता था।

बिम्बिसार के पश्चात् उसका पुत्र अजातशत्रु ( 492 ई० पूर्व - 462 ई० पूर्व ) मगध के राजसिंहासन पर आसीन हुआ। वह बड़ा ही सशक्त शासक प्रमाणित हुआ। अजातशत्रु का शासन हर्यक वंश का चरमोत्कर्ष काल था । उसने कोशल, वैशाली, अवन्ति राज्यों को वहाँ के राजा को पराजित कर मगध साम्राज्य में मिला। 462 ई० पूर्व में अजातशत्रु की मृत्यु हो गयी।

अजातशत्रु के पश्चात् उसका पुत्र उदयन राजगद्दी पर बैठा। उदयन ने मगध राज्य के केन्द्र में स्थित पाटलिगांव में नई राजधानी का निर्माण कराया जो पुष्पपुर अथवा पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) के नाम से प्रसिद्ध हुई। उदयन षड़यन्त्र के द्वारा मारा गया। उदयन के उतराधिकारी अयोग्य एवं दुर्बल शासक थे। इनके शासन से जनता त्रस्त थी, अतः जनता ने क्रोधवश पूरे राजपरिवार को निष्कासित कर नागदशक के योग्य आमात्य शिशुनाग को मगध के सिहांसन पर आरुढ़ किया।

इस प्रकार मगध में हर्यक कुल का पतन हो गया तथा शिशुनाग-वंश ( 414 ई० पूर्व - 346 ई० पूर्व ) की स्थापना हुई।

शिशुनाग के राज्यकाल में मगध-साम्राज्य अत्यन्त विशाल हो गया। शिशुनाग के पश्चात् उसका पुत्र कालोशोक ( 396 ई० पूर्व - 368 ई० पूर्व ) अथवा काकवर्ण शासक बना। कालाशोक के पश्चात् उसके दस पूत्रों - भद्रसेन, कोरण्डवर्ण, मुंगर, सवर्ंजट, जालिक, उभक, संजय, नन्दिवर्धन तथा पंचमक - ने 22 वर्षों तक शासन किया तत्पश्चात् महापद्म ने शिशुनाग वंश को समाप्त कर मगध में नन्द-वंश की सथापना की।

मगध में नन्द-वंश की सथापना से एक नवीन युग का आर्विभाव हुआ। इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य को लांघ गईं। उसी समय से भारतीय इतिहास में क्षत्रिय रक्त पर अभिमान करने वाले राजवंशों की अखण्ड परम्परा का अन्त हो गया क्योंकि नन्दवंशीय शासक उच्च कुल के न थे।

महापद्म अत्यन्त शक्तिशाली शासक था। अपनी शक्ति के द्वारा ही उसने मगध-साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। पुराणें के अनुसार वह ‘अनुल्लंघित’ शासन वाला था, जिसने दिग्विज्य से एकछत्र राज्य की स्थापना की थी। उसने अनेक क्षत्रिय राजवंशों का उन्मूलन किया था। इसी कारण उसे ‘अखिलक्षत्रान्तकारी’ और ‘क्षत्रविनाशकृता’ कहा गया। उसके आठ पुत्र थे। इस प्रकार नौ नन्द राजाओं का उल्लेख बौद्ध साहित्य में मिलता है जिनके नाम इस प्रकार हैं - उग्रसेन (महापद्म नन्द), पण्डुक, पण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपात, गौविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त और धननन्द। महापद्म के इन आठों पुत्रों ने 322 ई० पूर्व तक राज्य किया। इनमें नन्द-वंश का अन्तिम शासक धननन्द सबसे प्रतापी सिद्ध हुआ।

सिकन्दर लौटने के पश्चात मगध की स्थिति चरमरा गई। उसी समय चन्द्रगुप्त मौर्य ( 322 ई० पूर्व ) का आविर्भाव हुआ। भारत के राजनीतिक व्योम पर चन्द्रगुप्त मौर्य के रुप में एक उदीयमान प्रकाशपूर्ण नक्षत्र का उदय हुआ जिसने भारतीयों का नेता व राजा बनकर उत्तर - पश्चिमी भारत से सिकन्दर के युनानी सैनिक - गढ़ों और पवन - क्षत्रयों को नष्ट-भ्रष्ट कर भारत के उस भू-भाग को वैदेशिक परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त किया तथा ‘अधार्मिक’ नन्द-वंश के राजा को उन्मूलित कर मगध में अपने नए राजवंश की प्रतिस्थापना की, जो भारतिय इतिहास में मौर्य-वंश ( 322 ई० पूर्व - 184 ई० पूर्व ) के नाम से सुविख्यात है। मौर्यों का आगमन इतिहासकारों के लिए अन्धकार से प्रकाश की ओर का मार्ग प्रशस्त करता है, कालक्रम की सहसा निश्चित एवं स्पष्ट होने लगता है तथा भारत के छोटे-छोटे टुकड़ों को मिलाकर एक विशाल साम्राज्य का उदय होता है।

चन्द्रगुप्त मौर्य एक कुशल सेनानायक व वीर योद्धा था। चन्द्रगुप्त और चाणक्य दोनों का ही प्रमुख उद्देश्य नन्द-वंश का विनाश कर मगध के राजसिंहासन पर अधिकार करना था। उसने अपने 24 वर्ष के शासनकाल में जितनी सफलताएं प्राप्त की उतनी उपलब्धियां इतने अल्पकाल में किसी अन्य भारतीय शासक ने प्राप्त नहीं की। वह ऐसा प्रथम व्यक्ति था जिसने न केवल यूनानी व वैदेशिक आक्रमणों को विफल किया वरन् भारत के बड़े भू-भाग को युनानी अधिपतय से मुक्त कराया। चन्द्रगुप्त ने सर्वप्रथम भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की। हेमचन्द्र राय चौधरी ने लिखा है : ‘चन्द्रगुप्त की राजनैतिक और सैनिक सफलताएं काफी उदान्त हैं, पर इनसे उसकी सफलताओ की इतिश्री नहीं हो जाती है। इस महायोद्धा ने एक ओर जहाँ एक कुख्यात राजवंश के शासन से देश के एक भाग को मुक्त किया वहीं दूसरी ओर देश के दूसरे भू-भाग को विदेशी दासता से मुक्त कराया। वह एक ऐसे साम्राज्य का निर्माता था जिसमें सम्पूर्ण भारत तो नहीं उसका अधिकांश भाग आ गया था। वह युद्ध में जितना स्फूर्तिवान था, शान्ति की कला में भी उतना ही कर्मठ था। वह भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट है।

चन्द्रगुप्त के पश्चात् 298 ई० पूर्व में उसका पुत्र बिन्दुसार ( 298 ई० पूर्व - 273 ई० पूर्व ) मगध के राजसिहांसन पर आसीन हुआ।

जैन-ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि बिन्दुसारके माता का नाम दुर्धरा था। परिशिष्टपर्वन ्नामक ग्रन्थ उसके जन्म के विष्य में एक रोचक प्रसंग आया है। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को विष का अभ्यास डालने के उद्देश्य से उसको भोजन में अल्पमात्रा में विष देना आरम्भ किया था। इसका उद्देश्य यह था कि यदि कोई शत्रु विष अथवा विषकन्या द्वारा चन्द्रगुप्त की हत्या करना चाहे तो वह सफल न हो सके। एक दिन चन्द्रगुप्त की पत्नी दुर्धरा ने भी चन्द्रगुप्त के साथ भोजन किया, किन्तु विष के प्रभाव से उसकी मृत्यु हो गई। उस समय रानी दुर्धरा गर्भवती थी। चाणक्य ने शीध्र ही उसके उदर को चिरवाकर बच्चे को निकलवा दिया। इस बालक के मस्तक पर विष की एक बूंद लगी थी, अतः उसका नाम बिन्दुसार रक्खा गया।

बिन्दुसार एक शक्तिशाली एवं योग्य शासक था उसके शासनकाल में मौर्य - साम्राज्य ने अत्यधिक उन्नति की। उसे प्रौढ़, धृष्ट, प्रगल्भ, प्रियवादी व संवृन्त कहा गया है। बिन्दुसार की मृत्यु 273 ई० पूर्व में हुई।

बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अशोक ( 269 ई० पूर्व - 232 ई० पूर्व ) शासक बना। अशोक का शासनकाल भारतीय इतिहास का अत्यन्त गौरवमयी काल था क्योंकि उस समय में अशोक ने अपनी असाधारण क्षमताओंसे भारत को सर्वोन्मुखी उन्नति प्रदान की। यही कारण है कि अशोक को न केवल भारत के वरन् विश्व के महानतम शासकों में से एक माना जाता है। साम्राज्य विस्तार, प्रशासनिक व्व्यवस्था, धर्म-संरक्षण, हृदय की उदारता, कला के विकास एवं प्रजा-वत्सलता, आदि प्रत्येक दृष्टिकोण से अशोक का स्थान सर्वोच्च है। उसने अपने सुविशाल साम्राज्यके प्रशासन को पूर्ण बनाने तथा अपनी प्रजा को सुखी बनाने के लिये जो बिड़ा उठाया था, इसके लिए वह कोई कोशिश बाकी नहीं छोड़ी।

अशोक ने कलिंग पर आक्रमण 261 ई० पूर्व किया। कलिंग के निवासियों ने अत्यन्त वीरतापूर्वक मौर्य-सेना का सामना किया। अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए वहाँ की स्रियों व पुरुषों ने प्राणों की बाजी लगा दी। अतः यह युद्ध अत्यधिक रक्तरंजित हुआ। इस युद्ध का वर्णन अशोक के तेहरवें शिलालेख में मिलता है। इस अभिलेख के अनुसार, “राज्याभिषेक के आठ वर्ष पश्चात् देवताओं के प्रिय सम्राट प्रियदर्शी (अशोक) ने कलिंग पर विजय प्राप्त की। इस युद्ध मे 1,50,000 व्यक्ति व पशु बन्दी बनाकर कलिंग से लाए गए व 1,00,000 व्यक्ति युद्ध भूमि में मारेे गए तथा उनके कई गुणा अन्य कारणों से नष्ट हो गए। युद्ध के पश्चात् महामना सम्राट ने दया के धर्म की शरण ली, इस धर्म से अनुराग किया और इसका सम्पूर्ण साम्राज्य में प्रचार किया। इस विनाश की ताण्डव लीला ने, जो कि कलिंग राज्य को जीतने में हुआ, सम्राट के हृदय को द्रवित कर दिया व पश्चाताप से भर दिया।” यह इस प्रकार अशोक ने युद्ध की नीति सदैव के लिए त्याग दिया तथा दिग्विजय के स्थान पर ‘धम्म-विजय’ को अपनाया।

अशोक के मृत्यु के पश्चात् उसके किसी भी उत्तराधिकारी के उसके समान योग्य न होने के कारण, शीध्र ही मौर्य-साम्राज्य का पतन हो गया। अशोक के मृत्यु के बाद उसका पुत्र कुणाल शासक बना। कुणाल के पश्चात् दशरथ शासक बना। दशरथ के पश्चात् सम्प्रति, शालिशुक, देववर्मन व शतधनुष शासक हुए। उनके पश्चात् बृहद्रथ के सेनापति पुष्पमित्र शुंग ने उसकी दुर्बलता का लाभ उठाकर 184 ई० पूर्व में उसकी हत्या कर दी तथा राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार 184 ई० पूर्व में मौर्य-साम्राज्य का पतन हो गया।

36 वर्ष तक शासन करने पश्चात् 148 ई० पूर्व में पुष्पमित्र की मृत्यु हो गई, किन्तु इन 36 वर्षों में अनेक उपलब्धियां प्राप्त कर उसने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान अर्जित किया। पुष्पमित्र एक महान सेनानी, कुशल संगठनकर्त्ता तथा दूरदर्शी शासक था। वह एक वीर साम्राज्यवादी व योग्य शासक ही नहीं वरन् महान साहित्य एवं कलाप्रेमी भी था। पुश्पमित्र ने ब्राह्मणधर्म के विलुप्त हो रहे वैभव को पुनः गौरव के उच्च शिखर तक पहुँचाया तथा भारत में पुनः वैदिक संस्कृति को सशक्त बनाया। पुष्पमित्र ने वैदिक-धर्म को राजधर्म घोषित किया तथा पाली के स्थान पर संस्कृत को राजभाषाका रुप प्रदान किया। इस प्रोत्साहन के परिणामस्वरुप पातंजलि का महाभाष्य तथा मनु की मनुस्मृति की रचना हुई। इस प्रकार राजनैतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में उसने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की। पुष्पमित्र शुंग की मृत्यु 148 ई० पूर्व में हुई।

शुंग-वंश के शासकों ने 112 वर्ष तक राज्य किया।शुंग-वंश के शासकों में अग्निमित्र, वसुज्येष्ठ, तत्पश्चात् अग्निमित्र का पुत्र वसुमित्र शासक बना। वसुमित्र के पश्चात् क्रमशः आंध्रक, पुलिण्डक, घोष, वज्रमित्र, भाग तथा देवभूति ने शासन किया। देवभूति शुंग-वंश का अन्तिम शासक था। देवभूति की हत्या उसके मंत्री वासुदेव कण्व ने कर दी तथा कण्व-वंश की स्थापना की । इस प्रकार शुंग-वंश की समाप्ति 72 ई० पूर्व हुई।

कण्व-वंश में चार शासक वसुमित्र, भूमिमित्र, नारायण मित्र व सुशर्मा हुए जिन्होने क्रमश 9, 14, 12 व 10 वर्ष शासन किया। इस प्रकार कण्व-वंश ने कुल 45 वर्ष तक ( 72 ई० पूर्व - 27 ई० पूर्व ) शासन किया। कण्व-वंश के शासक भी ब्राह्मण थे, अतः उन्होने भी सम्भवतः ब्राह्मण- धर्म के पुरुत्थान के लिये प्रयतेन किया होगा।

27 ई० पूर्व में कण्व-वंश के पतन के पश्चात् सातवाहन-वंश का प्रादुर्भाव हुआ।

हर्ष की मृत्यु के पश्चात् उसके राज्य के विधटन में मगध की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। मगध में इस समय उत्तरवर्ती गुप्त शासक शासन कर रहे। हर्ष के शासन काल में मगध हर्ष के साम्राज्य का ही एक भाग था, जिसकी पुष्टि चीनी-साहित्य एवं बाणकृत हर्षचरित्र से होती है।

हर्ष की मृत्यु के बाद भारत में व्याप्त अराजकता से लाभ उठाते हुए मगध के तत्कालीन गुप्त शासक आदित्यसेन, जो अत्यन्त पराक्रमी एवं वीर था, ने उत्तरी भारत के विस्तृत भू-भाग पर अधिकार कर लिया।

कहा जाता है कि गुप्तवंश का भी मगध एवं पाटलिपुत्र से गहरा सम्बन्ध था। पुराणों में एक श्लोक मिलता है जिसके आधार पर कतिपय विद्वान गंगा-यमुना के दोआब तथा मध्यदेश को गुप्तों का मूल निवास-स्थान मानते हैं। श्लोक कुछ प्रकार है :

अनुगंगा प्रयागं च साकेतं मगधांस्तथा।

एतन् जनपदान् सर्वान् मोक्षन्ते गुप्त वंशजः ।।

अर्थात् गुप्त-वंश के लोग गंगा नदी के किनारे स्थित साकेत (कोसल), प्रयाग एवं मगध, आदि जनपदों का उपभोग करेंगे। पुराणों के अनुसार प्रारम्भिक गुप्त शासकों का उत्तर-प्रदेश व मगध पर एकाधिकार था। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तों का आदि निवास-स्थान पूर्वी उत्तर-प्रदेश व पश्चिमी मगध का कुछ भू-भाग था। गुप्त-वंश के संस्थापक का नाम “गुप्त” ही था। श्रीगुप्ते ने लगभग 275 ई० से 300 ई० तक राज्य किया।

श्री गुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र घटोत्कच ( 300-319 ई० ) शासक बना। घटोत्कच के पश्चात् उसका पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम शासक बना। चन्द्रगुप्त के समय की प्रमुख घटना अपने राज्यारोहन के समय उसके द्वारा एक नवीन सम्वत् की स्थापना करनी थी जो गुप्त-सम्वत् के नाम से जाना जाता है। चन्द्रगुप्त ने इस सम्नत् की स्थापना 319-20 ई० में की थी।

चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त (325 ई० - 375 ई०) शासक बना। समुद्रगुप्त भारत के महानतम सम्राटों में से एक था तथा वह अपनी उपल्बिधियों के कारण विश्व-इतिहास में अविस्मरणीय है। आर० सी० मजुमदार समुद्रगुप्त का जीक करते हुए कहते हैं : “उसके (समुद्रगुप्त) सिक्कों और अभिलेखों के अध्ययन से हमारे समक्ष एक ऐसे वज्रदेह शक्तिशाली सम्राट की मूर्ति आ खड़ी होती है जिसकी शारीरिक ओज के अनुरुप बौद्धिक एवं सांस्कृतिक सम्पन्नता ने उस नवयुग का सूत्रपात्र किया जिसमें आर्यावर्त ने, नवीन, राजनैतिक चेतना और राष्ट्रीय एकात्त्मता पांच सदियों के राजनीतिक विघटन और परकीय आधिप्तय के बाद, पुनः उपलब्ध की और नैतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और भौतिक समृद्धि की वह उच्चता अधिगत की जिसने इसे भारत का स्वर्णयुग बना दिया - ऐसा स्वर्णयुग जिसकी ओर अगणित भावी पीढियां मार्ग-दर्शन और प्रेरणा के लिए सदा देखने वाली थीं।

समुद्रगुप्त के मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र रामगुप्त शासक बना। रामगुप्त ने चार-पांच वर्ष तक शासन किया।

रामगुप्त के असामयिक निधन के बाद उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय ( 380 ई० - 412 ई० ) शासक बना। वह अपने महान पिता का महान पुत्र साबित हुआ। शासन और समर दोनों में चन्द्रगुप्त द्वितीय की ख्याति और कीर्ति उसके पिता समुद्रगुप्त की भांति ही सुप्रसिद्ध एवं सुचर्चित है। गुप्त सम्राटों में समुद्रगुप्त की तरह स्वभुज बल-विक्रम द्वारा समस्त शत्रुओं को उन्मूलित कर सर्वराजोच्छेता की उपाधि ग्रहण करने वाला वही दूसरा सम्राट हुआ है। चन्द्रगुप्त द्वितीय एक महान् विजेता, अतुल पराक्रमी, और धर्मनिष्ठ शासक था, यह निर्विवाद है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त (413 ई० - 455 ई०) सिंहासनारुढ़ हुआ। उसने साम्राज्य विस्तार की ओर ध्यान न देकर अपने शासनकाल के प्रारम्भ में साम्राज्य के साधनों का प्रयोग सार्वजनिक एवं धार्मिक कृत्यों में किया। कुमारगुप्त के साम्राज्य में चतुर्दिक सुख एवं शान्ति का वातावरण विद्यमान है

कुमारगुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका प्रतापी पुत्र स्कन्दगुप्त सिंहासनारुढ़ हुआ। स्कन्दगुप्त गुप्तवंश का अन्तिम प्रतापी शासक था। स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारी उसकी मृत्यु ( 465 ई० ) के पश्चात् एक शताब्दी तक भी शासन न कर सके व 500 ई० के लगभग शक्तिशाली गुप्त-साम्राज्य का अन्त हो गया।

गुप्त वंश के पतन के पश्चात् जिन कतिपय राजवंशों का प्रादुर्भाव हुआ, उसमें परवर्ती गुप्त-वंश भी था। गुप्तशासकों के पश्चात् शासन करने के कारण इसे उत्तरकालीन गुप्त-वंश तथा मगध में शासन करने के कारण इस वंश को मगध गुप्त-वंश के नाम से भी जाना जाता है। मगध ही इस वंश का मूल स्थान प्रतीत होता है। अभिलेखों में इस वंश के निम्नलिखित आठ शासकों के नाम उल्लेख है: (1 ) कृष्णगुप्त; (2 ) हर्षगुप्त; (3 ) जीवितगुप्त; (4 ) कुमारगुप्त; (5 ) दामोदरगुप्त; (6 ) महासेनगुप्त; (7 ) माधवगुप्त; (8 ) आदित्यसेन।

कन्नोज के राजा यशोधर्मा ने परवर्ती गुप्त-वंश के अन्तिम शासक जीवितगुप्त पर आक्रमण किया तथा उसे परास्त कर गुप्त-वंश का अन्त कर दिया। इस प्रकार शक्तिशाली परवर्ती गुप्त-राजवंश का आठवीं शताब्दी में पतन हो गया।

लोक विद्या के क्षेत्र में भी मगध का अपना स्थान रहा है। इस सन्दर्भ में दो गीत मगही लोकगीतों का वर्णन अनिवार्य हो जाता है। प्रथम लोकगीत में नायक-नायिका का प्रकृति-प्रांगण में स्वच्छंद विलास को दर्शाया गया है। कथा वस्तु यह है कि किसी रम्य नदी के किनारे गूलर का बगीचा है ! साजनी पके-पके मनोहरी गूलर को तोड़ता है, सजनी खाती है। उन्माद का वातावरण है ! नायक नेत्र-संकेत से गोरी के हृदय का हाल पूछता है। गौरी के हृदय में कम्पन के साथ लज्जा होती है। नायिका का यौवन भी तो अनोखा है। उसमें वैसी ही चिकनाहट है, जैसी पीपल के कोमल पत्ते में और घी। फिर नाय लुब्ध क्यों न हो।

दूसरा लोकगीत सन्दर्भ एक विरहिणी नायिका की प्रेम-परीक्षा है। वर्णन कुछ यो है: परदेश बाबा गयेथे, तो द्वार पर चन्दन के वृक्ष में सुखद हिंडोला लगा कर गये थे। प्रियतम परदेश गया है, तो सदा लिये दु:ख वारिधि में डुबो कर। वह छाती में वज्र-किवाड़ लगा गया है और उस पर भी सांकल चढ़ा गया है। आम और महुआ के सघन बाग में विरहिणी सुन्दरी खड़ी है। उसके सुकोमल कपोलों पर अश्रु की बूँदें ढ़٠??क रही हैं। द्रवित-बटोही ने पूछा- सुन्दरी तुम्हारी आंखें मोती क्यों बरसा रही हैं? अश्रुसिक्त सुन्दरी ने कहा - तुम्हारे ही जैसा कृशांग मेरा कान्त है। उसने परदेश जाकर मुझे विसरा दिया है। पथिक की आँखें चमक उठीं। उसने कहा - अपने ब्याहता (पति) की आशा छोड़ दो। लो डाला-भर सोना ! मोतियों ॠंगार करो ! सतवन्ती गौरा ने कहा - तुम्हारे सोने में आग लग जाये। मोतियों पर वज्र गिरे। अपने प्रियतम की प्रतीक्षा मैं अनन्त काल तक करुँगी। मेरा जी कहता है वह व्यापार से लौटेगा और सोने से हमरा और घर का ॠंगार करेगा।

Sunday, May 25, 2008

परमाणु समझौता -3

परमाणु करार खत्म करने का मतलब
अरुंधति घोष
आलेख. अक्टूबर माह की 12 तारीख को हमारे संस्कारवान, मृदुभाषी और जहीन प्रधानमंत्री ने न सिर्फ मीडिया बल्कि रणनीतिकारों की बिरादरी में भी एक और तूफान खड़ा कर दिया। कई हफ्तों से वामदलों के प्रवक्ता अमेरिका के संबंध में भारत की विदेश नीति में कथित ‘भटकाव’ को लेकर अशुभ और धमकीभरा शोर मचा रहे थे।

साथ ही परमाणु समझौते को खत्म करने की कसमें भी खा रहे थे, भले ही इसका मतलब देश में अस्थिरता पैदा करना और देश को मध्यावधि चुनाव में धकेलना ही क्यों न हो। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने इस आशय की बात कही कि समझौते को स्थगित किया जा सकता है और इस देरी से होने वाले नुकसान को भी होने दिया जा सकता है। समझौते की मुखालफत करने वालों के खैमे में इससे जहां खुशी की लहर दौड़ गई वहीं समर्थकों के बीच निराशा व चिंता नजर आई।

अब यह बात साफ हो चुकी है कि बहस समझौते की रहस्यपूर्णता को लेकर नहीं बची है। वामदलों द्वारा समस्यापूर्ण माने गए अधिकांश मुद्दों का 123 समझौते में संतोषजनक ढंग से ध्यान रखा गया है; दरअसल सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि सारी दुनिया का मानना है कि भारत को एक बेहतरीन सौदा मिला है जो उसकी पहुंच अत्याधुनिक अंतरराष्ट्रीय टेक्नोलॉजी और परमाणु ऊर्जा बाजार तक बनाता है, वह भी अपनी किसी भी धारणा पर समझौता किए बगैर।

सोमवार को संपन्न यूपीए-वामदलों की बैठक में विभिन्न पक्षों के रवैये में कोई बदलाव नजर नहीं दिखा, सिवाय इसके कि यूपीए अब भी प्रक्रिया के अगले चरणों की तरफ बढ़ने की इच्छा रखे नजर आया। पूरा मामला 16 नवंबर तक के लिए टल गया है। यह देखना बाकी है कि उस तारीख तक किसी दल के रवैये में कोई बदलाव आता है या नहीं। कुछ ने तो कम से कम इस सरकार के कार्यकाल के बाकी महीनों तक के लिए ‘सौदे’ को खारिज मान लिया है।

समझौता मामले का हल आखिरकार चाहे जो हो, इस घटनाक्रम का असर भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर होगा ही। वार्ताकार के रूप में भारत की विश्वसनीयता और घरेलू स्तर पर कड़ा फैसला करने की क्षमता की प्रतिछाया जरूरी तौर पर इस बात पर पड़ेगी कि मुल्क की अंतरराष्ट्रीय वचनबद्धताओं का आकलन अन्य देश किस तरह करेंगे।

अगर समझौता नाकाम रहता है, तो भी निश्चित तौर पर सब कुछ खत्म नहीं हो जाएगा, मगर भारत अपनी आवाज खो चुका होगा। माना जाएगा कि भले ही भारत महत्वाकांक्षी हो, खंडित सियासत के चलते अपने समझौतों को लागू करने की इच्छाशक्ति या काबिलियत उसमें नहीं है। अपने वादों को पूरा करने के संकल्प और साझा वार्ताकार के रूप में भारत की गंभीरता पर सवालिया निशान लग जाएंगे।

द्विपक्षीय संबंधों के परिणामों पर पूर्वानुमान मुश्किल हैं फिर भी अमेरिका में नकारात्मक प्रतिक्रिया निश्चित है। जैसी कि अटकलें लगाई जा रही हैं अमेरिका का अगला राष्ट्रपति डेमोक्रेट और कांग्रेस डेमोक्रेटिक होगी।

यदि ऐसा होता है तो भारत फिर से अपने खिलाफ माहौल की उम्मीद कर सकता है। परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), विखंडन सामग्री कटौती संधि (एफएमसीटी) और परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव इनमें शामिल हैं।

हम जहां से शुरू हुए थे वापस उसी मुकाम पर और भी बुरी स्थिति में पहुंच जाएंगे। हो सकता है इससे भारत में वामदल खुश हो जाएं, मगर उनकी यह खुशफहमी जारी नहीं रह सकेगी, क्योंकि दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यावसायिक रिश्ते तथा नागरिकों के आपसी संबंध मजबूत होने ही हैं।

परमाणु ऊर्जा के लिए विश्व बाजार खुलने से व्यावसायिक रूप से लाभ में आने वाले रूस और फ्रांस जैसे अन्य बड़े मुल्कों में निश्चित तौर पर भारत के लिए आदर में कमी आएगी। चीन का रुख जानना शायद सबसे दिलचस्प होगा, जो हमें चीन-भारत-रूस बैठक के दौरान देखने को मिलेगा। जैसी कि वामदल बेसब्री से उम्मीद करते नजर आते हैं, क्या गुट निरपेक्ष देश भारत को अपना नेता स्वीकार करेंगे?

इन नकारात्मक पहलुओं और समझौता लागू होने में लगने वाली देर के बावजूद, कुछ कदम जो उठाए जा चुके हैं वापस नहीं लिए जा सकते। अमेरिका के साथ सहयोग का एक व्यापक आधार आकार ले रहा है और 123 समझौते की पहल हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय ताप नाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र (आईटीईआर ) का भारत एक सदस्य है।

मगर परमाणु ऊर्जा रेजीम में पूरी तरह भागीदारी के बिना यह सदस्यता जारी रहेगी या नहीं यह एक बहस के योग्य मुद्दा है। भारत को छूट देने वाला अमेरिकी कानून पास हो चुका है और परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) के कई मुल्क भारत के साथ असैन्य परमाणु सहयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास करने में दिलचस्पी रखते हैं। मगर वैश्विक स्तर पर अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी नकारी जाती रहेगी और भारत के लिए अवसरों की खिड़की दिखलाई पड़ रहे भविष्य तक बंद हो चुकी होगी।

-लेखक संयुक्त राष्ट्र में भारत की राजदूत रह चुकी हैं।