Sunday, May 25, 2008

परमाणु समझौता -3

परमाणु करार खत्म करने का मतलब
अरुंधति घोष
आलेख. अक्टूबर माह की 12 तारीख को हमारे संस्कारवान, मृदुभाषी और जहीन प्रधानमंत्री ने न सिर्फ मीडिया बल्कि रणनीतिकारों की बिरादरी में भी एक और तूफान खड़ा कर दिया। कई हफ्तों से वामदलों के प्रवक्ता अमेरिका के संबंध में भारत की विदेश नीति में कथित ‘भटकाव’ को लेकर अशुभ और धमकीभरा शोर मचा रहे थे।

साथ ही परमाणु समझौते को खत्म करने की कसमें भी खा रहे थे, भले ही इसका मतलब देश में अस्थिरता पैदा करना और देश को मध्यावधि चुनाव में धकेलना ही क्यों न हो। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने इस आशय की बात कही कि समझौते को स्थगित किया जा सकता है और इस देरी से होने वाले नुकसान को भी होने दिया जा सकता है। समझौते की मुखालफत करने वालों के खैमे में इससे जहां खुशी की लहर दौड़ गई वहीं समर्थकों के बीच निराशा व चिंता नजर आई।

अब यह बात साफ हो चुकी है कि बहस समझौते की रहस्यपूर्णता को लेकर नहीं बची है। वामदलों द्वारा समस्यापूर्ण माने गए अधिकांश मुद्दों का 123 समझौते में संतोषजनक ढंग से ध्यान रखा गया है; दरअसल सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि सारी दुनिया का मानना है कि भारत को एक बेहतरीन सौदा मिला है जो उसकी पहुंच अत्याधुनिक अंतरराष्ट्रीय टेक्नोलॉजी और परमाणु ऊर्जा बाजार तक बनाता है, वह भी अपनी किसी भी धारणा पर समझौता किए बगैर।

सोमवार को संपन्न यूपीए-वामदलों की बैठक में विभिन्न पक्षों के रवैये में कोई बदलाव नजर नहीं दिखा, सिवाय इसके कि यूपीए अब भी प्रक्रिया के अगले चरणों की तरफ बढ़ने की इच्छा रखे नजर आया। पूरा मामला 16 नवंबर तक के लिए टल गया है। यह देखना बाकी है कि उस तारीख तक किसी दल के रवैये में कोई बदलाव आता है या नहीं। कुछ ने तो कम से कम इस सरकार के कार्यकाल के बाकी महीनों तक के लिए ‘सौदे’ को खारिज मान लिया है।

समझौता मामले का हल आखिरकार चाहे जो हो, इस घटनाक्रम का असर भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर होगा ही। वार्ताकार के रूप में भारत की विश्वसनीयता और घरेलू स्तर पर कड़ा फैसला करने की क्षमता की प्रतिछाया जरूरी तौर पर इस बात पर पड़ेगी कि मुल्क की अंतरराष्ट्रीय वचनबद्धताओं का आकलन अन्य देश किस तरह करेंगे।

अगर समझौता नाकाम रहता है, तो भी निश्चित तौर पर सब कुछ खत्म नहीं हो जाएगा, मगर भारत अपनी आवाज खो चुका होगा। माना जाएगा कि भले ही भारत महत्वाकांक्षी हो, खंडित सियासत के चलते अपने समझौतों को लागू करने की इच्छाशक्ति या काबिलियत उसमें नहीं है। अपने वादों को पूरा करने के संकल्प और साझा वार्ताकार के रूप में भारत की गंभीरता पर सवालिया निशान लग जाएंगे।

द्विपक्षीय संबंधों के परिणामों पर पूर्वानुमान मुश्किल हैं फिर भी अमेरिका में नकारात्मक प्रतिक्रिया निश्चित है। जैसी कि अटकलें लगाई जा रही हैं अमेरिका का अगला राष्ट्रपति डेमोक्रेट और कांग्रेस डेमोक्रेटिक होगी।

यदि ऐसा होता है तो भारत फिर से अपने खिलाफ माहौल की उम्मीद कर सकता है। परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), विखंडन सामग्री कटौती संधि (एफएमसीटी) और परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव इनमें शामिल हैं।

हम जहां से शुरू हुए थे वापस उसी मुकाम पर और भी बुरी स्थिति में पहुंच जाएंगे। हो सकता है इससे भारत में वामदल खुश हो जाएं, मगर उनकी यह खुशफहमी जारी नहीं रह सकेगी, क्योंकि दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यावसायिक रिश्ते तथा नागरिकों के आपसी संबंध मजबूत होने ही हैं।

परमाणु ऊर्जा के लिए विश्व बाजार खुलने से व्यावसायिक रूप से लाभ में आने वाले रूस और फ्रांस जैसे अन्य बड़े मुल्कों में निश्चित तौर पर भारत के लिए आदर में कमी आएगी। चीन का रुख जानना शायद सबसे दिलचस्प होगा, जो हमें चीन-भारत-रूस बैठक के दौरान देखने को मिलेगा। जैसी कि वामदल बेसब्री से उम्मीद करते नजर आते हैं, क्या गुट निरपेक्ष देश भारत को अपना नेता स्वीकार करेंगे?

इन नकारात्मक पहलुओं और समझौता लागू होने में लगने वाली देर के बावजूद, कुछ कदम जो उठाए जा चुके हैं वापस नहीं लिए जा सकते। अमेरिका के साथ सहयोग का एक व्यापक आधार आकार ले रहा है और 123 समझौते की पहल हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय ताप नाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र (आईटीईआर ) का भारत एक सदस्य है।

मगर परमाणु ऊर्जा रेजीम में पूरी तरह भागीदारी के बिना यह सदस्यता जारी रहेगी या नहीं यह एक बहस के योग्य मुद्दा है। भारत को छूट देने वाला अमेरिकी कानून पास हो चुका है और परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) के कई मुल्क भारत के साथ असैन्य परमाणु सहयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास करने में दिलचस्पी रखते हैं। मगर वैश्विक स्तर पर अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी नकारी जाती रहेगी और भारत के लिए अवसरों की खिड़की दिखलाई पड़ रहे भविष्य तक बंद हो चुकी होगी।

-लेखक संयुक्त राष्ट्र में भारत की राजदूत रह चुकी हैं।

परमाणु समझौता-2

 
दोनो पक्षों ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया है इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी ने भी इसे एक अच्छा कदम बताया है। आइये देखते है दोनो पक्ष अपने अपने नजरिये से इस समझौते को कैसे देखते हैं:

भारत का नजरिया
भारत इस सौदे को अभूतपूर्व और ऐतिहासिक मानता है क्योंकि
इस से भारत साउथ एशिया मे अमरीका का सबसे बड़ा सहयोगी बन जायेगा।
भारत को परमाणु सम्पन्न देश का दर्जा मिल जायेगा।
भारत को अपनी शर्तों पर परमाणु ईधन और साजो-सामान मिलेगा
बिना परमाणु अप्रसार संधि किए ये समझौता हो रहा है।
अमरीका का सामरिक सहयोगी होने से रुतबा बढेगा।
अमरीका का निकट सहयोगी बनने से सुरक्षा परिषद मे स्थायी सीट मिलने का रास्ता साफ हो जायेगा।
पाकिस्तान पर दबाव बढेगा।

अमरीका का नजरिया
एशिया मे शक्ति संतुलन।
चीन पर परोक्ष रुप से दबाव
ईरान मसले पर सहयोग की आकांक्षा।
भारत की यूरेनियम संवर्द्वन की तकनीक पाने की उम्मीद

मेरे विचार
मै इसे अभूतपूर्व नही मानता, क्योंकि अमरीका पहले भी परमाणु ईधन का वादा करके मुकर चुका है।रही बात शक्ति संतुलन की, तो अमरीका को एक मोहरा चाहिये और भारत इस जाल मे फ़ंस रहा है।रही बात सुरक्षा परिषद की सीट की, वो तो अमरीका अभी नही देने वाला, अलबत्ता ईरान मसले पर भारत अमरीका के पक्ष मे झुकता दिखता है।कुल मिलाकर, भारत सिर्फ और सिर्फ आश्वासन पर अपने स्टैन्ड को बदल रहा है, कंही दीर्घ काल मे उसे यह मंहगा ना पड़ जाय।सामने से देखने पर ये समझौता भारत के पक्ष मे दिखता है, लेकिन क्या बन्द कमरों मे बैठकर हमने अमरीका से कुछ गुपचुप वादे किये हैं? ये देखने वाली बात होगी।

भारत को यदि महाशक्ति बनना है, तो उसे सबसे पहले अपने पड़ोसियों से सम्बंध सुधारने पड़ेंगे, फिर अर्थव्यवस्था को और मजबूत करना पड़ेगा, विकास दर सही रखनी पड़ेगी, और सबसे बड़ी बात, बुनियादी सुविधाओं को और बढाना होगा। उसके बाद ही हम भारत को महाशक्ति के रुप मे देखने की सोच सकते है।

परमाणु समझौता

सन १९४७ मे भारत की आजादी के बाद, बढती ऊर्जा जरुरतो को देखते हुए, परमाणु ऊर्जा संयत्रों की जरुरत महसूस की जाने लगी थी।
१९५० :अमरीका ने भारत को तारापुर परमाणु संयंत्र बनाने मदद की और ईधन मुहैया कराने को तैयार हो गया। शर्त सिर्फ़ यही थी, परमाणु उर्जा का इस्तेमाल शान्ति के कार्यों मे किया जायेगा।
चीनी हमले के बाद,चीन ने अपना परमाणु परीक्षण किया तभी भारतीय हुक्मरानों को परमाणु शक्ति सम्पन्न होने की जरुरत महसूस होने लगी।भारतीय नेताओ ने अमरीका से परमाणु बम तक की मांग की थी, जिसे अमरीका ने ठुकरा दी थी और ताना मारकर कहा था, चाहो तो अपने आप बना लो (अमरीका जानता था कि भारत के पास तकनीक नही है।) भारतीय वैज्ञानिकों ने खून पसीना एक करके परमाणु शस्त्र तकनीक पर काम शुरु किया। इधर अमरीका के दिमाग मे खलबली मच गयी।
१९६८ : अमरीका ने भारत पर परमाणु अप्रसार संधि स्वीकार करने का दबाव डाला। जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया।
१९७४ : भारत ने प्रथम परमाणु परीक्षण किया।अमरीका ने सहयोग करना बन्द कर दिया और प्रतिबन्ध लगा दिये। भारत ने तब तक रूस का दामन थाम लिया था, ये भारत अमरीका के खराब सम्बंधो का दौर था जो कई दशक चला।शीत युद्द का समय था, इसी समय एक और नाटक चला जिसे लोग गुट निरपेक्ष आन्दोलन कहते है, मुझे आज तक समझ नही आया, रूस के साथ रहते रहते भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का मुखिया कैसे रहा। खैर हम पथ से नही भटकते,इस मसले पर फिर कभी बात करेंगे।

पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अमरीका दामन थाम लिया, फलस्वरुप अमरीका से हमारे सम्बंध कभी नरम तो कभी गरम रहे।
१९९८ : अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बावजूद परमाणु परीक्षण किया।

समय बदला, भारत के तकनीकी ज्ञान ने विश्व मे पहचान बनाई।लेकिन उससे बड़ी बात भारत एक बहुत ही बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर उभरा और अर्थव्यवस्था भी सही रास्ते पर चल पडी है। इसलिये अमरीका को भी अपना रुख लचीला करना पड़ा।
२००० : अमरीका ने भारत के साथ सामरिक साझेदारी बनाने की ओर कदम बढाये।
१८ जुलाई, २००५ : अमरीका और भारत, परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण प्रयोग के सहयोग रजामन्द हुए और एक करार पर हस्ताक्षर हुए।

मार्च २००६ : इस परमाणु समझौते पर सहमति। इस समझौते के तहत, भारत अपने २२ मे से १४ परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को अंतर्राष्ट्रीय निगरानी मे रखने को तैयार हो गया, जिसके बदले मे उसे परमाणु ऊर्जा मिलेगी और सारे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध हटा लिये जायेंगे।अभी इस समझौते को अमरीकी संसद की मंजूरी मिलनी बाकी है।

लेकिन अमरीका क्या चाहता है?
निश्चय ही अमरीका यहाँ पर चैरिटी करने तो नही आया। परमाणु समझौता वो भी भारत की शर्तों पर, बात कुछ हजम नही होती। अमरीका का थिंक टैंक बहुत ही दूरगामी सोच रहा है। शीतयुद्द के समाप्त होने के बाद अमरीका को रूस से इतना खतरा नही है, जितना उसे चीन की बढती हुई ताकत से है। निसंदेह चीन सबसे ज्यादा तेजी से आगे आ रहा है, आर्थिक और सामरिक रुप से भी। आने वाले वर्षों मे चीन की अर्थव्यवस्था दिन दूनी और रात चौगुनी की प्रगति करेगी, इससे चीन पर लगाम कसना और मुश्किल होता जायेगा।इसीलिये अमरीका जो स्वयंभू विश्वविधाता है, उसे एक एशिया मे एक विश्वसनीय साथी चाहिये, इसमे भारत काफी सही तरीके से फिट बैठता है।

दूसरे अमरीका को भारत की परमाणु ईधन के पुन:प्रयोग की तकनीक भी चाहिये, ताकि वो तेल पर अपनी निर्भरता घटा सके। और आखिरी बात, उसे एशिया प्रशान्त क्षेत्र मे सतर्क पहरेदार चाहिये, जो भारत के रुप मे उसे मिल गया है। अमरीका का इतिहास है, जब तक जरुरत होती है, वो सबको माईबाप बना लेता है, जरुरत पूरी होते ही, कैसा व्यवहार करता है, बताने की जरुरत नही।

लेकिन इस समझौते के कई पहलू है, इन्ही पर नजर डालेंगे, अगली पोस्ट मे… इन्तजार कीजिये।

आप क्या सोचते है इस समझौते के बारे मे, अपने विचार अपने चिट्ठे अथवा टिप्पणी मे अवश्य लिखियेगा।

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आरक्षण-व्यवस्था

संविधान में आरक्षण-व्यवस्था बहुत सोच-समझ कर की गई थी। सदियों की जड़ जाति-व्यवस्था के अन्यायों को दूर करना और घोर विषम समाज को समतामूलक समाज में बदलना इसका लक्ष्य था। भारतीय नवजागरण के प्रणेता स्वामी दयानंद सरस्वती, ज्योतिबा फुले, महादेव गोविंद रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, जानकीनाथ घोषाल आदि से लेकर महात्मा गांधी, डा. भीमराव अंबेडकर और डा. राममनोहर लोहिया तक के नेताओं के विचारों तथा संघर्ष ने इसका स्वरूप निश्चित किया था। लेकिन नेहरू सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक किसी ने भी इसे समझने और ठीक प्रकार से लागू कने की कोशिश नहीं की। इसके विपरीत इसमें एक के बाद एक गांठे डालकर इसे उलझाया जाता रहा।
आरक्षण संबंधी समस्याएं इसलिए अब तक बनी हुई हैं क्योंकि हमने संविधान की आरक्षण व्यवस्था को लागू करने के लिए शुरू से ही वैज्ञानिक प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया। इस व्यवस्था को सही ढंग से लागू करने के लिए जरूरी था कि जातियों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति के आंकड़ें जमा किए जाएं और उनके आधार पर जातियों का अगड़े, पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदि श्रेणियों में वर्गीकरण किया जाए। प्रत्येक जनगणना के साथ ये आंकड़ें जमा किए जाएं और हर दस साल बाद आंकड़ों के विश्लेषण से पता लगाया जाए कि किन जातियों को संविधान के अनुच्छेत 16(4) के अनुसार नौकरियों आदि में ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ मिल गया है और जिन्हें मिल गया हो उन्हें आरक्षण की परिधि से बाहर किया जाए। इस प्रकार उत्तरोत्तर निचली जातियों को आरक्षण की सुविधा मिलती जाती। कालांतर में सभी जातियों को ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ मिल जाता तथा आरक्षण व्यवस्था स्वत: समाप्त हो जाती।
लेकिन हमारी सरकारें नेहरू सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक जातियों के वैज्ञानिक आंकड़े जमा करने से घबराती रहीं, इसलिए कि ये आंकड़े सामने आए तो जातिगत शोषण की नंगी तस्वीर सामने आ जाएगी। इससे पता चलेगा कि जिन जातियों का कुल जनसंख्या में अनुपात 15-16 प्रतिशत हैं, वे 90-95 प्रतिशत पदों पर कब्जा जमाए बैठी हैं। अंतिम बार जातियों के आंकड़े 1931 की जनगणना में इकट्ठे किए गए थे। उसके बाद ये आंकड़े जान-बूझ कर जमा नहीं किए गए और बिना वैज्ञानिक आंकड़ों के जातियों की शिनाख्त करने, उनका श्रेणीकरण करने तथा आरक्षण कोटा निर्धारित करने के सारे काम अनाप-शनाप ढंग से हुए।
हमें यह मानकर चलना पड़ेगा कि भारतीय समाज का गठन वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत हुआ है और इस तथ्य को हम नजरों से आ॓झल नहीं कर सकते कि जो जातियां द्विज वर्णों में यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में नहीं आतीं वे या तो पिछड़े वर्गों में आती हैं या फिर अनुसूचित जातियों और जनजातियों में। जनगणना में इस आधार पर वर्गीकरण हो जाने के बाद ही ‘क्रीमी लेयर’ की कसौटी (संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ की कसौटी) लागू हो तथा आरक्षण की परिधि से निकाले गए नागरिक वर्गों को अगड़ों में शामिल माना जाए। जनगणना के आंकड़ों से पहले क्रीमी लेयर लागू करना अवैज्ञानिक होगा और इसके लिए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण या किसी और प्रकार के सर्वेक्षण के आंकड़े भी अधूरे ही होंगे। जनगणना कार्यालय के अभिलेखों को छोड़ कर शेष सभी सरकारी और गैर सरकारी दस्तावेजों में जातिबोधक नामों का उल्लेख प्रतिबंधित कर दिया जाए तथा प्रमाणपत्रों आदि में चार या पांच श्रेणियों या उनकी क्रम संख्या का ही उल्लेख किया जाए।
चूंकि जाति सभी राजनीतिक पार्टियों का निहित स्वार्थ बन गई हैं, कोई भी सरकार यह काम करने को तैयार नहीं होगी। अत: उच्चतम न्यायालय को ही इसका स्पष्ट निर्देश देना पड़ेगा। जैसे अमेरिका में रंग-भेद को समाप्त करने का काम वहां के उच्चतम न्यायालय को मुख्य न्यायाधीश अर्ल वारेन के प्रसिद्ध निर्णय के द्वारा करना पड़ा। वैसे ही हमारे उच्चतम न्यायालय को करना पड़ेगा।
1857 की क्रांति में हिस्सा लेने वाली सभी जातियों को अभी तक न्याय नहीं मिला है। प्रथम स्वाधीनता आंदोलन की 150 वीं जयंती पर भी हमारा ध्यान इस आ॓र नहीं गया है। समस्याओं का अंत तभी होगा जब संविधान की आरक्षण व्यवस्था को पीछे कहे गए अनुसार वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाएगा और उच्चतम न्यायालय को आरक्षणों की 50 प्रतिशत सीमा को भी हटाना पड़ेगा और यह सीमा अद्विज जातियों की जनसंख्या को देखते हुए ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित करनी पडे़गी।

म्यूचल फंड का फंडा

पिछले लेख मे मैने आपको म्यूचल फंड से सम्बंधित प्राथमिक जानकारी दी थी, लेकिन कई सवाल अनुत्तरित रह गए थे। आइए आज उन कुछ अनुत्तरित सवालों के बारे मे बात करते है।

लेकिन म्यूचल फंड के क्या फायदे है और ये शेयरों से किस तरह से अलग है?

म्यूचल फंड के कई फायदे है, अव्वल तो इसमे आपको कम पूँजी, कम समय और काफी कम तकनीकी जानकारी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा इसमे जोखिम भी (अपेक्षाकृत शेयर बाजार के) कम रहता है। म्यूचल फंड के फायदों को संक्षेप मे इस तरह से बताया जा सकता है:
म्यूचल फंड महंगे शेयरों मे निवेश करने का सस्ता तरीका है।
म्यूचल फंड मे जोखिम कम होता है क्योंकि आपका पैसा किसी एक शेयर मे ना लगाकर, कई शेयरों मे एक साथ लगाया जाता है।
म्यूचल फंड पेशेवर फंड व्यस्थापकों (Fund Managers) द्वारा चलाए जाते है, जिनको शेयर बाजार की काफी अच्छी जानकारी होती है। इनको किसी भी शेयर मे प्रवेश करने और बाहर निकलने के अवसरों का बेहतर ज्ञान रहता है।
म्यूचल फंड हाउस (AMCs) के पास अपनी रिसर्च टीम होती है, इनके पास शेयरों के सम्बंध मे तकनीकी जानकारी और विश्लेषण मौजूद रहता है। कुल मिलाकर इनकी रिसर्च टीम किसी भी निवेशक के मुकाबले शेयर बाजार की अधिक जानकारी रखती है।
छोटे निवेशक का समय और श्रम बचता है।
म्यूचल फंड की गतिविधियों पर सेबी की कड़ी नजर रहती है, इस तरह से छोटे निवेशकों के हितों को अनदेखा नही किया जाता।
म्यूचल फंड मे आप निश्चित अवधि मे आटोमेटिक तरीके से (SIP) से निवेश अथवा निकासी (SWP) कर सकते है।
चूँकि म्यूचल फंड बड़े स्तर पर खरीदारी करते है इसलिए उनको ब्रोकरेज और अन्य खर्चों पर भी बचत होती है।
म्यूचल फंड के निवेश मे काफी ज्यादा पारदर्शिता होती है।
निवेशक को किसी भी प्रकार का निवेश खाता (Demat Account) नही खोलना पड़ता।
निवेशक सही समय पर किसी भी एक स्कीम से दूसरी स्कीम मे जा सकता है।

म्यूचल फंड के नुकसान

दुनिया मे कोई ऐसी चीज नही जिसके फायदे हों और उसके नुकसान ना हो। म्यूचल फंड मे भी कुछ नुकसान हो सकते है, उदाहरण के लिए:
म्यूचल फंड हाउस के खर्चों पर निवेशक का नियंत्रण नही रहता।
निवेशक को अपनी पसन्द के शेयर खरीदने(Customized Portfolio) का आप्शन नही रहता। निवेशको को म्यूचल फंड की किसी स्कीम को ही चुनना होता है।
म्यूचल फंड की सही स्कीम का चुनाव करना भी एक टेढी खीर है।

म्यूचल फंड किस तरह से बाजार मे पैसा लगाते है।

म्यूचल फंड, अपने निवेशको द्वारा प्रदान किए गए पैसों को एक जगह एकत्रित करते है और उस फंड से शेयर बाजार मे खरीद फरोख्त करते है। चूँकि फंड हाउस काफी बड़े स्तर पर खरीद फरोख्त करते है इसलिए इनको बाजार के उतार चढावों का अच्छा ज्ञान होता है। सही समय पर शेयरों मे खरीद बिक्री की जाती है और आने वाले नफ़े-नुकसान को उसी एकत्रित फंड मे रखा जाता है। म्यूचल फंड कम्पनिया अपने खर्चो को इसी फंड से निकालती है। म्यूचल फंड के निवेश को सार्वजनिक किया जाता है और प्रतिदिन फंड को अपनी नैट एसैट वैल्यू (NAV) अर्थात हर यूनिट का खरीद और बिक्री मूल्य प्रकाशित करना होता है। इसी मूल्य पर निवेशक, म्यूचल फंड मे अपना निवेश और निकासी कर सकते है। नैट एसैट वैल्यू से किसी भी फंड के स्वास्थ्य की जाँच की जा सकती है। निवेशक को यह अधिकार है कि वह किसी भी समय अपना पैसा लेकर फंड से बाहर निकल सकता है।

क्या सेबी ने म्यूचल फंड हाउस पर कुछ नियमावली जारी की है?

अच्छा सवाल। एक निवेशको को यह सवाल जरुर पूछना चाहिए। सेबी सभी फंडो पर नज़र रखता है और समय समय पर नए दिशा निर्देश भी जारी करता है।सेबी ने फंड हाउस के लिए निम्नलिखित नियमावाली जारी की है।
सभी म्यूचल फंड हाउस की स्थापना भारतीय ट्रस्ट एक्ट के अंतर्गत होगी और इन फंड कम्पनियों को पेशेवर लोगों द्वारा चलाया जाएगा।
इन फंड हाउस का निर्दॆशकों का एक बोर्ड होगा।
प्रत्येक फंड हाउस की न्यूनतम पूँजी 5 करोड़ (Five Crores) होनी चाहिए।
फंड हाउस के ट्रस्टी और चलाने वाले अलग अलग व्यक्ति (संस्था) होने चाहिए।
प्रत्येक फंड हाउस को सेबी से अनुमति लेना आवश्यक है।
फंड हाउस को अपनी हर योजना को सेबी के पास पंजीकृत कराना अनिवार्य है।
फंड हाउस अपने लाभ का कम से कम 90% अपने निवेशकों मे बाँटना आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त समय समय पर सेबी द्वारा प्रदान की जाने वाले दिशा निर्देशों का पालन अनिवार्य है।

म्यूचल फंड की योजनाए किस प्रकार की होती है?

म्यूचल फंड की योजनाए मुख्यत: दो प्रकार की होती है।

असीमित अवधि वाले फंड (Open Ended Funds)

इस प्रकार के फंड सभी के लिए खुले हुए होते है। निवेशक जब चाहे फंड मे निवेश अथवा विनिवेश(निकासी) कर सकते है। म्यूचल फंड निवेश के लिए प्रवेश शुल्क (Entry Load) लेती है और कभी कभी विनिवेश के लिए निकासी शुल्क(Exit Load) लेती है।

सीमित अवधि वाले फंड (Closed Ended Funds)

इस प्रकार के फंड मे निवेश की सीमा की अवधि तक निवेशक को इस फंड मे बने रहना होता है। निश्चित अवधि के उपरान्त ही निवेशक अपना पैसा इस फंड से निकाल सकता है।
म्यूचल फंड कितने प्रकार के होते है?
म्यूचल फंड के खर्चे किस प्रकार के होते है?
एक निवेशको को म्यूचल फंड मे निवेश करते समय क्या क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
म्यूचल फंड की किसी भी स्कीम का चुनाव कैसे करें?
किस तरह के फंड मे निवेश करें?

क्या होता है शेयर, सरकारी प्रतिभूतिया बांड और म्यूचल फंड

शेयर (Shares)

जैसा कि आपको पता है किसी भी व्यापार को चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। यदि व्यापार छोटा है तो निजी,पारिवारिक अथवा मित्रों के स्तर पर पूँजी की व्यवस्था की जाती है अथवा कंही ऋण लिया जाता है। लेकिन यदि व्यापार काफी बड़े स्तर पर हो, पूँजी की व्यवस्था सार्वजनिक रुप से की जाती है। ऐसे मे पूँजी को छोटे छोटे हिस्सों मे बाँट दिया जाता है जिन्हे शेयर कहा जाता है और इस शेयर को पब्लिक को खरीदने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसका मतलब है कि यदि आपने किसी कम्पनी के शेयरधारक है तो आप उस कम्पनी मे पूँजी के उतने हिस्से के हकदार है। कम्पनियां अपना मुनाफ़ा इन शेयरधारकों के बीच बाँटती है जिसे डिवीडेंड कहते है। इन कम्पनियों के शेयर, शेयर बाजार मे भी बिक्री खरीद के लिए उपलब्ध होते है। यदि कोई कम्पनी पहली बार अपने शेयर बाजार मे लाती है तो उसको इनीश्यल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) कहते है। ये तो रही शेयर की बात, आइए अब बात करते है डिबेंचर की।

डिबेंचर (Debenture)

डिबेंचर भी शेयर की तरह होता है, बस फर्क इतना होता है कि यह पूँजी का हिस्सा ना होकर, कम्पनी द्वारा पब्लिक से मांगा गया ऋण होता है। इस डिबेंचर पर कम्पनिया प्रतिवर्ष, डिवीडेंड की जगह ब्याज देती है। कई कम्पनियां डिबेंचर को शेयर मे स्थानांतरित करने का भी प्रावधान रखती है। आजकल डिबेंचर का प्रचलन कम हो गया है।

सरकारी प्रतिभूतिया (Government Bonds)

जिस तरह व्यापारियों को व्यापार चलाने के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है उसी प्रकार सरकारों को भी काम-काज चलाने के लिए पूँजी की जरुरत होती है। वैसे तो यह पूँजी सरकार टैक्स लगाकर इकट्ठा करती है, लेकिन कभी कभी किसी प्रोजेक्ट विशेष के लिए सरकार बॉन्ड भी जारी करती है। इसी तरह विभिन्न पूँजीगत संस्थाएं (Financial Institutions) भी बॉंड जारी करती है। सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज थोड़ा कम मिलता है लेकिन इसमे पूँजी की गारंटी सरकार देती है, इसलिए यह एक सेफ इंवेस्टमेंट की तरह माना जाता है।

म्यूचल फंड ( Mutual Fund)

आइए अब बात करते है म्यूचल फंड की। जैसा कि आपको पता है कि शेयर बाजार मे निवेश करने के लिए आपको काफी समय, जानकारी और कुछ हद तक (अच्छी खासी) पूँजी की आवश्यकता होती है। अब बड़े निवेशक तो शेयर मार्केट के होने वाले उतार-चढावों पर नजर रखने के लिए समय निकालते है, लेकिन कई ऐसे छोटे निवेशक भी होते है जिनके पास समय और पूँजी की कमी होती है। उदाहरण के लिए मान लीजिए आप और आपके पाँच मित्रों के पास 50,000 रुपए (प्रति व्यक्ति) है जिनको आप शेयर बाजार मे लगाना चाहते है, लेकिन आपको शेयर बाजार के झंझटों के बारे मे कोई जानकारी नही है और ना ही इतना समय है कि आप अपने व्यापार/नौकरी से समय निकालकर इस निवेश पर नजर रख सकें। तो आपके पास विकल्प क्या है:
आप किसी पहचान वाले बन्दे को पकड़े जो शेयर बाजार मे निवेश करता हो।
किसी संस्था को पैसा दे दो, जो आपकी तरफ़ से शेयर बाजार मे निवेश करे।
आप सभी अपना अपना पैसा मिलाकर एक साथ, एक जगह निवेश करें और किसी भी एक व्यक्ति जो इस बारे मे जानकारी रखता हो, उस पर निवेश की देखरेख करने के जिम्मेदारी लगा दें।

अब मान लीजिए आप लोग पाँच नही, बल्कि पूरे 5000 लोग है, तो ऐसे मे आपके पास विकल्प म्यूचल फंड का ही है। इसमे आप अपना निवेश म्यूचल फंड मैनेजमेन्ट कम्पनी (Asset Management Company) को दे देते है। आपके पैसे की देखभाल पेशेवर फंड मैनेजर करते है जो शेयर बाजार की बारीकियों को अच्छी तरह से समझते है। बदले मे ये म्यूचल फंड कम्पनिया आपसे कुछ हिस्सा अपने खर्चों सरकार अपनी नीतियो द्वारा इन म्यूचल फंड कम्पनियों पर निगरानी रखती है। इस पूरी प्रक्रिया मे म्यूचल फंड कम्पनिया अनेक प्रकार की स्कीम लाती है, हर स्कीम मे लगाए जाने वाली पूँजी को छोटे छोटे, बराबर के हिस्सों मे (शेयरों की तरह) बाँट दिया जाता है। निवेशक अपने अपने हिस्से के हकदार होते है जिन्हे यूनिट (Unit) कहा जाता है। इस तरह छोटे निवेशक भी शेयर बाजार मे अप्रत्यक्ष रुप से हिस्सा ले सकते है।

लेकिन म्यूचल फंड के क्या फायदे है और ये शेयरों से किस तरह से अलग है?

काफी अच्छा सवाल। लेख थोड़ा लम्बा हो रहा है इसलिए इस सवाल का जवाब इस लेख के अगले हिस्से मे समेटते है। आशा है इस लेख से आपकी म्यूचल फंड की जानकारी मे कुछ वृद्दि जरुर हुई होगी। म्यूचल फंड किसी भी सवाल के लिए टिप्पणी द्वारा सम्पर्क किया जा सकता है।

आगे भी जारी है……