संजय कुमार
वर्तमान में जिस तरह का राजनीतिक समीकरण उरकर सामने आया है, उससे यह कहना कि वाम समर्थित और अचानक मुख्य केंद्र में आयी मायावती की अगुवाइवाली नवगठित तीसरा मोर्चा किसी कामयाब मंजिल को तय कर पायेगी, संदेहास्पद हैण् दरअसल, इस नये तीसरे मोर्चे का गठन बुलबुले और हताशा से अधिक प्रेरित हैण् यह तीसरा मोर्चा किसी ठोस बुनियाद पर नहÈ खड़ा हैण् इसमें शामिल क्षेत्रीय दल ी मौकापरस्त राजनीति के मातहत एक झंडे के तहत शामिल हुए हैंण्
इस नवगठित तीसरे मोर्चे के विष्य की बात करें, तो कोई सार्थक उपलब्धि मुझे नहÈ दिखायी देताण् तेलगू देशम पार्टी जो कल तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गंठबंधन का अंग थीण् इस मोर्चे में शामिल जरूर हुई है, पर उसके अपने राजनैतिक सैद्धांतिक बाध्यताएं हैंण् वह कबतक इस मोर्चे को सहयोग करेगी, यह देखनेवाली बात होगीण् जहां तक वामपंथियों का सवाल है, जिस तरह के समीकरण अी दिख रहे हैं, उनका आधार आनेवाले चुनाव में खिसकेगाण् केरल व पश्चिम बंगाल के पिछले परि.श्य पर नजर डाले, तो यह स्पष्ट दिखता हैण् वैसे ी कांग्रेस ने वामपंथियों के लिए दरवाजे अी बंद नहÈ किये हैंण् कोई वजह नहÈ मौकापरस्त सत्ता संस्—ति आनेवाले दिनों में वामदलों को कांग्रेस के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित न करेंण्
यह कहना कि तीसरा मोर्चा केंद्र की राजनीति में ती स्थायित्व पा सकता है, जब तक कि बड़ी पार्टियां कांग्रेस या ाजपा कोई एक समर्थन न करेंण् चंद्रशेखर की सरकार जिस तरह के समीकरण के साथ सत्ता में आयी, वैसे हालात अी तो नहÈ दिखतेण् सवाल यह है कि क्या कांग्रेस चार-साढ़े चार वर्ष केंद्र की सत्ता पर काबिज रहकर 6-8 महीने बाद आगामी चुनाव में तीसरे मोर्चे से सहयोग करने के तैयार होगीण् आखिर वह जनता के बीच क्या लेकर जायेगीण् ाजपा ी अी अपने आपको कमतर नहÈ मान रही हैण् वह ी फिलवक्त अपने आप को बेहतर मान रही हैण् ऐसे में तीसरे मोर्चे को कोई सपोर्ट मिलेगा, सवाल ही नहÈ उठताण् तीसरे मोर्चे के अभ्युदय तथा इसकी मजबूती को लेकर चर्चाएं हो रही हैं, वह हवाई किला बनाकर अखबारों की सुिर्खयों में बनाने का एक कुप्रबंध हैण् हालांकि इसकी वजह से बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती को थोड़ा ला जरूर मिला हैण् एक सशक्त नेतृत्व बताकर अपने को प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करने का ला मायावती को दूसरे राज्यों तक विस्तार करने के लिए मौके जरूर प्रदान किये हैंण् लेकिन आनेवाले चुनाव में मायावती को यह कितना ला पहुंचायेगी, इस पर संदेह हैण् वंचितों के बीच दलितों का सवाल उठाकर वह सहानुूति व ावनात्मक जुड़ाव लाने के लिए वह हमेशा से इस तरह की बातें करती रही हैंण् लेकिन प्रधानमंत्री का ख्वाब उसके लिए एक हसीन सपने जैसा हैण् दूसरे वामदलों के साथ सबसे मुश्किल यह है कि वह सिद्धांवादी होने का दं तो रते हैं, लेकिन अपने को केंद्र में नहÈ लातेण् वरना मायावती की तरह प्रकाश करात ी अपने आप को प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार के रूप में पेश करते नजर आतेण् वामदलों का जनाधार काफी नपा तुला और फिक्स हैण् इस बात की पूरी संावना है कि आनेवाले चुनाव में उसका जनाधार खिसकेगाण् इसके अलावा जो ी दल है, वह बरसात के पानी की तरह हैण्
इतिहास में जायें, तो की ी चुनाव में विदेश नीति बड़ा मुद्दा बनकर नहÈ आया हैण् किसी ी दल को इसका ला नहÈ मिला हैण् हां, युद्ध जैसी बात हो, शांति-सद्ाववाली बात हो, पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश से जुड़ा कोई मसला हो तो इसका ला मिलता हैण् जैसा कि 1973 तथा 1998-99 के कारगिल प्रकरण के समय हम देख चुके हैंण् चुनाव में वामदल आखिर क्या मुद्दा लेकर जायेंगे? बसपा को पिछले चुनाव में ला मिला, तो इसके पीछे चारकोणीय प्रतिद्वंद्विता (बसपा, सपा, ाजपा तथा कांग्रेस) थीण् यदि आगामी चुनाव में सपा कांग्रेस के साथ गंठजोड़ कर लेती है, तो उसे कितना ला मिल पायेगा, यह देखनेवाली बात होगीण् यह ी एक तथ्य है कि न तो बसपा साम्यवादियों को ला पहुंचा सकती है, न ही साम्यवादी उसेण्
इनकी एकजुटता कितने समय तक बनी रहती है, इस पर ी संदेह हैण् हालिया राजनीतिक घटनाक्रम से वामपंथियों ने ी अपने मौकापरस्त चरित्र को सामने ला दिया हैण् दूसरी तरफ बसपा तो पहले से ही कहती रही है कि जो हमे सत्ता में हिस्सेदारी देगा, हम उसके साथ हो लेंगेण् उसकी अपनी कोई आइडियोलॉजी या सिद्धांत नहÈ हैण् उत्तर प्रदेश या हरियाणा के अन्य छोटे दल कितना हद तक सहयोग कर पायेंगे, इस पर शक ही हैण्
दरअसल, तीसरा मोर्चा एक ऐसा बास्केट बन गया है, जहां हर कोई की ी आ सकता है, की ी बाहर हो सकता हैण् छोटे दलों या निर्दलियों की पूछ दशक में की कार ही आता हैण् नरसिंह राव के जमाने में झामुमो ने सरकार बचाने के लिए अपनी बोली लगायी थीण् दूसरा वाकया हमने इस बार देखा हैण्
विगत में तीसरा मोचा± यदि कामयाब नहÈ हुआ है, तो इसके पीछे सबसे बड़ी सिद्धांतविहीन राजनीति हैण् वििé धारा व सोचवालों के लिए यह अंदर-बाहर होते रहने का एक जरिया बनकर रह गया हैण् इसमें अधिकतर शोषित तबके ही आते हैंण् जिनका उद्देश्य मौकापरस्त राजनीति का ला उठाना होता हैण् एक सशक्त नेतृत्व का अाव ी इसके विघटन का कारण बनता रहा हैण्
पुष्कर राज, राजनीतिक विश्लेषक से बातचीत पर आधारितण्
Thursday, July 31, 2008
घट रही है समझौता करने की प्रवृित्त
संजय कुमार
byline
परिवार में बढ़ रहे बिखराव को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय की टिप्पणी उल्लेखनीय हैण् यह समाज में बढ़ रहे नैतिक मूल्यों में हृास को इंगित करता हैण् दरअसल, सर्वाेच्च न्यायालय ने 1955 में बने Çहदू विवाह अधिनियम के संदZ में यह कहा है कि तलाक और दांपत्य जीवन बहाल करने का यह कानून अंग्रेजों के समय में बनाया गया है जबकि आज की परिस्थितियां काफी कुछ बदल चुकी हैंण् इस कानून में समय के साथ कई बार फेरबदल किये गयेण् लेकिन यह कानून परिवारों को जोड़ने की बजाय उन्हें विखंडित व पति-पत्नी के बीच अलगाव बढ़ाने का कारण बन रहा हैण् यह बच्चों के दीघZकालिक स्वस्थ विष्य के लिहाज से सही नहÈ हैण् समाज के बदलते माहौल पर Çचता जताते हुए न्यायालय ने पूर्वजों के रीति-रिवाजों और पारिवारिक कायदों की याद दिलाते हुए कहा कि पुराने जमाने में हमारे पूर्वज आपस में ऐसे मामले स्वयं की पहल से बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया करते थे, लेकिन आज के समय में कानूनी आड़ लेकर तलाक जैसे मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखने को मिल रही हैण्
दरसअल, सर्वाेच्च न्यायालय किसी ी मसले पर दो तरह से अपनी राय या निर्णय रखती हैण् पहला किसी मुद्दे पर और दूसरा विचारो की अिव्यक्ति परण् सर्वाेच्च न्यायालय ने तलाक के मामले और परिवार के बिखराव को लेकर जो विचार रखे हैं, वह एक अच्छा कदम हैण् सर्वाेच्च न्यायालय ऐसे मामलों पर गहन छानबीन कर ही कोई निर्णय देती हैण् पारिवारिक कलह जब अदालत में पहुंचता है, तब न्यायालय परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेती हैण् पारिवारिक कलह से तंग आकर अदालत में तलाक की अजÊ देनेवाले मामले ी कई प्रकार के होते हैंण् मसलन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका उद्देश्य ही तलाक लेना होता हैण् जबकि कई मामलों में इसकी वजह संपित्त, जाति, नौकरी, कैरियर आदि होता हैण् न्यायालय ी पहले दोनों पक्षों को मामले को खुद निपटाने के लिए समय देती हैण् तलाक का कोई ी मामला सामने आने पर जज की पहली कोशिश उस रिश्ते को बचाने की होती हैण् इसके लिए दोनों पक्षों की काउंसÇलग ी करवाई जाती हैण् इस प्रक्रिया के असफल होने के बाद न्यायालय पति-पत्नी के आरोप-प्रत्यारोपों को सुनती है और सारे सबूतों पर विचार करने के बाद दंपति को अलग होने की अनुमति देती हैण् किसी ी निर्णय को लेते समय न्यायालय बच्चे की इच्छा और विष्य को केंद्र में रखती हैण् वह उन सी पहलुओं पर गौर करती है, जिससे कि बच्चे का विष्य खराब न होण् हां, कानून की आड़ में कुछ लोग इसका दुरुपयोग जरूर कर रहे हैं, जो Çचताजनक हैण्
ारतीय परिवारों में बिखराव की कई वजहें हैंण् जैसे- जैसे नगरीकरण और शहरीकरण की गति बढ़ रही है लोगों में गांव से शहर की ओर रुख करने की प्रवृित्त बढ़ी हैण् स्थान परिवर्तन होने से संयुक्त परिवार एक साथ नहÈ रह पाते हैंण् उनपर एक तरह का दबाव होता हैण् आर्थिक दबाव मुख्य वजह है स्थान परिवर्तन के लिएण् एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने से पति और पत्नी के बीच दूरी बढ़ती हैण् बढ़ते खर्च और आर्थिक तंगी की वजह से पति-पत्नी दोनों रोजगार करने पर मजबूर होते हैंण् इसके अलावा प्रतिस्पद्धाZत्मक मनोवृित्त ी बढ़ रही हैण् यह एक दुविधाजनक स्थिति होती हैण् इससे पारिवारिक स्तर पर कई तरह के बदलाव आता हैण् स्थान परिवर्तन से परिवेश बदलता हैण् परिवेश व्यक्ति की मनोवृित्त को बदलती हैण् जिस कारण दोनों पक्षों में समझौता करने की प्रवृित्त का हृास हो रहा है, सहनशीलता और सहिष्णुता की ावना घटी हैण् ऐसे में दो व्यक्तिगत अहं के बीच टकराव बढ़ता हैण् एक-दूसरे के साथ बंधे रहने की प्रवृित्त में कमी आती हैण् सहनशीलता की कमी अलगाव को प्रेरित करता हैण् पारिवारिक मूल्यो में परिवर्तन व क्षरण की प्रवृित्त ने ी अलगाव को प्रेरित किया हैण् आर्थिक निZरता, शिक्षा स्वािमान, कामयाबी महत्वाकांक्षा ी इसमें प्रमुख कारक है, जो बिखराव के लिए जिम्मेवार हैण् आज परिवार का दायरा सिमटता जा रहा हैण् यह ी देखने को मिल रहा है कि आर्थिक मजबूरी के कारण वृद्धों को अकेलेपन की Çजदगी जीना पड़ता हैण् इसका एक पक्ष यह ी है कि समाज की परिाषा बदल रही हैण् बिरादरी का दबाव अब मायने नहÈ रख पा रहा हैण् पहले शादी-ब्याह जैसे रिश्तो पर बिरादरी का दबाव होता थाण् दूसरी जाति या धर्म में शादी करने पर बिरादरी से निकाले जाने का डर रहता थाण् हालांकि हम यूं नहÈ कह सकते कि हमारे समाज में बिरादरी प्रथा समाप्ति की कगार पर हैण् आज ी देश के बड़े हिस्से में बिरादरी का अस्तित्व हैण् स्थान परिवर्तन होने के बावजूद युुवा अपनी जाति बिरादरी और समाज से जुड़े हुए हैण् वह बहुत स्वतंत्र होकर अपना निर्णय शायद ही ले पाते हैंण् यह सही है कि उदारीकरण के कारण पाश्चात्य संस्—ति का प्राव हमारे समाज पर पड़ा है, लेकिन पश्चिम के देशों की तुलना में हमारे यहां अी ी परिवार का बिखराव कम हैण् परिवार के बिखराव में कई आर्थिक और सामाजिक मानसिक दबाव अहम ूमिका निाते हैंण् पश्चिम के बनिस्बत हमारे देश में ग्रामीण आबादी अधिक है, जो परंपरागत व्यवसाय से जुड़े हैंण् यही कारण है कि हमारे देश में सहनशीलता, अपने माता-पिता और समाज के प्रति युवाओं में श्रद्धााव अधिक है, जबकि पश्चिम में व्यक्तिवादी सोच और ौतिकतावादी प्रवृित्त के चलते युवाओं में परिवार और समाज की बजाय व्यक्तिगत उपलब्धि अधिक महत्वपूर्ण होता हैण् सामूहिकता से व्यक्तिवादी सोच के नजरिये ने समाज और परिवार को अलग कर दिया हैण् परिवार के बिखराव को रोकने के लिए मूल्य आधारित सोच व शिक्षा को आधार बनाया जा सकता हैण् स्वार्थपरकता को मूल्यपरकता में बदलना होगाण् इस समस्या के समूल निदान के लिए कानून की बजाय समाज की समग्रतावादी समन्वय की ावना कहÈ अधिक महत्वपूर्ण हैण्
आज युवाओं को समाज और परिवार के अस्तित्व में ही खुद के अस्तित्व को तलाशने की जरूरत हैण् किसी ी समाज की उéति उस समाज में रह रहे लोगों के बीच परस्पर रिश्ते और सम्मान ावना से ही होती हैण् वर्तमान आर्थिक बाजारवादी परिवेश ने रिश्तों का ी बाजारीकरण कर दिया हैण् आज लोग लम्हों की खुशी को अधिक महत्व दे रहे हैंण् आने वाली पीढ़ी के समाजीकरण की दिशा में सोचने के लिए आज माता-पिता के पास समय नहÈ हैण् सब के सब आपाधापी के बीच अलग-थलग जीवन जी रहे हैंण् इस कारण आज समूह में रहने की प्रवृित्त घटी हैण् इसी का नतीजा है जो परिवार और व्यक्ति के बिखराव के रूप में सामने आ रहा हैण्
यागेंद्र सिंह से बातचीत से बातचीत पर आघारितण्
byline
परिवार में बढ़ रहे बिखराव को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय की टिप्पणी उल्लेखनीय हैण् यह समाज में बढ़ रहे नैतिक मूल्यों में हृास को इंगित करता हैण् दरअसल, सर्वाेच्च न्यायालय ने 1955 में बने Çहदू विवाह अधिनियम के संदZ में यह कहा है कि तलाक और दांपत्य जीवन बहाल करने का यह कानून अंग्रेजों के समय में बनाया गया है जबकि आज की परिस्थितियां काफी कुछ बदल चुकी हैंण् इस कानून में समय के साथ कई बार फेरबदल किये गयेण् लेकिन यह कानून परिवारों को जोड़ने की बजाय उन्हें विखंडित व पति-पत्नी के बीच अलगाव बढ़ाने का कारण बन रहा हैण् यह बच्चों के दीघZकालिक स्वस्थ विष्य के लिहाज से सही नहÈ हैण् समाज के बदलते माहौल पर Çचता जताते हुए न्यायालय ने पूर्वजों के रीति-रिवाजों और पारिवारिक कायदों की याद दिलाते हुए कहा कि पुराने जमाने में हमारे पूर्वज आपस में ऐसे मामले स्वयं की पहल से बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया करते थे, लेकिन आज के समय में कानूनी आड़ लेकर तलाक जैसे मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखने को मिल रही हैण्
दरसअल, सर्वाेच्च न्यायालय किसी ी मसले पर दो तरह से अपनी राय या निर्णय रखती हैण् पहला किसी मुद्दे पर और दूसरा विचारो की अिव्यक्ति परण् सर्वाेच्च न्यायालय ने तलाक के मामले और परिवार के बिखराव को लेकर जो विचार रखे हैं, वह एक अच्छा कदम हैण् सर्वाेच्च न्यायालय ऐसे मामलों पर गहन छानबीन कर ही कोई निर्णय देती हैण् पारिवारिक कलह जब अदालत में पहुंचता है, तब न्यायालय परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेती हैण् पारिवारिक कलह से तंग आकर अदालत में तलाक की अजÊ देनेवाले मामले ी कई प्रकार के होते हैंण् मसलन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका उद्देश्य ही तलाक लेना होता हैण् जबकि कई मामलों में इसकी वजह संपित्त, जाति, नौकरी, कैरियर आदि होता हैण् न्यायालय ी पहले दोनों पक्षों को मामले को खुद निपटाने के लिए समय देती हैण् तलाक का कोई ी मामला सामने आने पर जज की पहली कोशिश उस रिश्ते को बचाने की होती हैण् इसके लिए दोनों पक्षों की काउंसÇलग ी करवाई जाती हैण् इस प्रक्रिया के असफल होने के बाद न्यायालय पति-पत्नी के आरोप-प्रत्यारोपों को सुनती है और सारे सबूतों पर विचार करने के बाद दंपति को अलग होने की अनुमति देती हैण् किसी ी निर्णय को लेते समय न्यायालय बच्चे की इच्छा और विष्य को केंद्र में रखती हैण् वह उन सी पहलुओं पर गौर करती है, जिससे कि बच्चे का विष्य खराब न होण् हां, कानून की आड़ में कुछ लोग इसका दुरुपयोग जरूर कर रहे हैं, जो Çचताजनक हैण्
ारतीय परिवारों में बिखराव की कई वजहें हैंण् जैसे- जैसे नगरीकरण और शहरीकरण की गति बढ़ रही है लोगों में गांव से शहर की ओर रुख करने की प्रवृित्त बढ़ी हैण् स्थान परिवर्तन होने से संयुक्त परिवार एक साथ नहÈ रह पाते हैंण् उनपर एक तरह का दबाव होता हैण् आर्थिक दबाव मुख्य वजह है स्थान परिवर्तन के लिएण् एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने से पति और पत्नी के बीच दूरी बढ़ती हैण् बढ़ते खर्च और आर्थिक तंगी की वजह से पति-पत्नी दोनों रोजगार करने पर मजबूर होते हैंण् इसके अलावा प्रतिस्पद्धाZत्मक मनोवृित्त ी बढ़ रही हैण् यह एक दुविधाजनक स्थिति होती हैण् इससे पारिवारिक स्तर पर कई तरह के बदलाव आता हैण् स्थान परिवर्तन से परिवेश बदलता हैण् परिवेश व्यक्ति की मनोवृित्त को बदलती हैण् जिस कारण दोनों पक्षों में समझौता करने की प्रवृित्त का हृास हो रहा है, सहनशीलता और सहिष्णुता की ावना घटी हैण् ऐसे में दो व्यक्तिगत अहं के बीच टकराव बढ़ता हैण् एक-दूसरे के साथ बंधे रहने की प्रवृित्त में कमी आती हैण् सहनशीलता की कमी अलगाव को प्रेरित करता हैण् पारिवारिक मूल्यो में परिवर्तन व क्षरण की प्रवृित्त ने ी अलगाव को प्रेरित किया हैण् आर्थिक निZरता, शिक्षा स्वािमान, कामयाबी महत्वाकांक्षा ी इसमें प्रमुख कारक है, जो बिखराव के लिए जिम्मेवार हैण् आज परिवार का दायरा सिमटता जा रहा हैण् यह ी देखने को मिल रहा है कि आर्थिक मजबूरी के कारण वृद्धों को अकेलेपन की Çजदगी जीना पड़ता हैण् इसका एक पक्ष यह ी है कि समाज की परिाषा बदल रही हैण् बिरादरी का दबाव अब मायने नहÈ रख पा रहा हैण् पहले शादी-ब्याह जैसे रिश्तो पर बिरादरी का दबाव होता थाण् दूसरी जाति या धर्म में शादी करने पर बिरादरी से निकाले जाने का डर रहता थाण् हालांकि हम यूं नहÈ कह सकते कि हमारे समाज में बिरादरी प्रथा समाप्ति की कगार पर हैण् आज ी देश के बड़े हिस्से में बिरादरी का अस्तित्व हैण् स्थान परिवर्तन होने के बावजूद युुवा अपनी जाति बिरादरी और समाज से जुड़े हुए हैण् वह बहुत स्वतंत्र होकर अपना निर्णय शायद ही ले पाते हैंण् यह सही है कि उदारीकरण के कारण पाश्चात्य संस्—ति का प्राव हमारे समाज पर पड़ा है, लेकिन पश्चिम के देशों की तुलना में हमारे यहां अी ी परिवार का बिखराव कम हैण् परिवार के बिखराव में कई आर्थिक और सामाजिक मानसिक दबाव अहम ूमिका निाते हैंण् पश्चिम के बनिस्बत हमारे देश में ग्रामीण आबादी अधिक है, जो परंपरागत व्यवसाय से जुड़े हैंण् यही कारण है कि हमारे देश में सहनशीलता, अपने माता-पिता और समाज के प्रति युवाओं में श्रद्धााव अधिक है, जबकि पश्चिम में व्यक्तिवादी सोच और ौतिकतावादी प्रवृित्त के चलते युवाओं में परिवार और समाज की बजाय व्यक्तिगत उपलब्धि अधिक महत्वपूर्ण होता हैण् सामूहिकता से व्यक्तिवादी सोच के नजरिये ने समाज और परिवार को अलग कर दिया हैण् परिवार के बिखराव को रोकने के लिए मूल्य आधारित सोच व शिक्षा को आधार बनाया जा सकता हैण् स्वार्थपरकता को मूल्यपरकता में बदलना होगाण् इस समस्या के समूल निदान के लिए कानून की बजाय समाज की समग्रतावादी समन्वय की ावना कहÈ अधिक महत्वपूर्ण हैण्
आज युवाओं को समाज और परिवार के अस्तित्व में ही खुद के अस्तित्व को तलाशने की जरूरत हैण् किसी ी समाज की उéति उस समाज में रह रहे लोगों के बीच परस्पर रिश्ते और सम्मान ावना से ही होती हैण् वर्तमान आर्थिक बाजारवादी परिवेश ने रिश्तों का ी बाजारीकरण कर दिया हैण् आज लोग लम्हों की खुशी को अधिक महत्व दे रहे हैंण् आने वाली पीढ़ी के समाजीकरण की दिशा में सोचने के लिए आज माता-पिता के पास समय नहÈ हैण् सब के सब आपाधापी के बीच अलग-थलग जीवन जी रहे हैंण् इस कारण आज समूह में रहने की प्रवृित्त घटी हैण् इसी का नतीजा है जो परिवार और व्यक्ति के बिखराव के रूप में सामने आ रहा हैण्
यागेंद्र सिंह से बातचीत से बातचीत पर आघारितण्
क्या है विश्वासमत प्रस्ताव
लोकसा मेेंं जब कोई सरकार अथाZत प्रधानमंत्री यह सिद्ध करने के लिए प्रस्ताव करती है कि उसके पास सदन में आवश्यक बहुमत है और इसके लिए वह मतदान के लिए तैयार है, तो इसे सामान्यतौर पर विश्वासमत प्रस्ताव नाम से जाना जाता हैण् इसमें वोटिंग के लिए केवल लोकसा के सांसद ही योग्य होते हैं, इस तरह राज्यसा के सांसद वोÇटग प्रक्रिया में ाग नहीं ले सकतेण् उदाहरण के तौर पर हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिह राज्यसा से सांसद होने के कारण सरकार के मुखिया होने के बावजूद ी वह मतदान में ाग नहÈ ले सकते, लेकिन वह बहस में ाग ले सकते हैंण्
अविश्वास प्रस्ताव और विश्वासप्रस्ताव मत में क्या अंतर है
यह दोनों ही संसदीय प्रकिया का अंग है, जिसके तहत सदन में सरकार के बहुमत को जांचा जाता हैण् विश्वासमत की प्रस्तावना सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री द्वारा रखा जाता है जबकि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की तरफ से लाया जाता हैण्
विश्वासमत प्रस्ताव मेें हार पर क्या हो सकता है
यदि सरकार सदन में विश्वासप्रस्ताव के दौरान सामान्य बहुमत साबित नहÈ कर पाती है तो ऐसे में सरकार को या तो इस्तीफा देना होता है अथवा वह लोकसा को ंग करके आम चुनाव की सिफारिश राष्ट्रपति से कर सकते हैंण् फिर यह राष्ट्रपति पर निZर करता है कि वह नयी सरकार को आमंत्रित करें अथवा ऐसा संव न होने पर वर्तमान सरकार को ही चुनाव संपé होने और नयी सरकार के बनने तक कार्यवाहक सरकार के तौर पर काम करने को कहेण् एक रोचक तथ्य यह ी है कि यदि सरकार विश्वासमत जीत जाती है तो 15 दिन बाद विपक्ष पुन: सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकता हैण् दरअसल, संसदीय प्रावधान में कहा गया है कि एक बार अविश्वास प्रस्ताव लाने के के छ: महीने बाद ही दुबारा अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जा सकता है, जबकि विश्वासमत सरकार की तरफ से लाया जाता है इसलिए उक्त कानून इस पर लागू नहÈ होताण्
विश्वासमत हासिल करने की प्रक्रिया क्या है और वोटों की गिनती कैसे होती है
विश्वासमत प्रस्ताव की अवधारणा संविधान में नहÈ रखा गया है बल्कि इसका प्रावधान संसद की कार्यवाही प्रक्रिया के तहत किया गया हैण् पहली बार विश्वासमत प्रस्ताव वीपी Çसह सरकार के समय में लाया गया थाण् संसद के पूर्व महासचिव सीके जैन के मुताबिक विश्वासमत हासिल करने के लिए सरकार को सामान्य बहुमत अथाZत लोकसा के कुल उपस्थित सदस्यों के आधे से एक अधिक (50 प्रतिशत + 1) मत प्राप्त करना होता हैण् गौरतलब है कि लोकसाध्यक्ष को वोट देने का अधिकार नहÈ होताण् हालांकि वह निर्णायक वोट कर सकता हैण् उदाहरण के लिए यदि पक्ष और विपक्ष में पड़े मत बराबर हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में लोकसाध्यक्ष का वोट निर्णायक माना जाता हैण् लोकसा में कुल 545 सीटें हैं, जिसमें मेरठ और वेल्लारी की सीटें खाली हैण् पीसी थॉमस को वोट देने का अधिकार नहÈ हैण् इस प्रकार वर्तमान में सांसदों की कुल संख्या 543 हैण् बहुमत के लिए सरकार को कुल 272 मत पाना अनिवार्य हैण् लेकिन यदि मतदान के समय 540 सदस्य ही ाग लेते हैें तो सरकार को बहुमत के लिए 271 मतों की ही जरूरत होगीण् किसी स्थिति में यदि सरकार निर्धारित मत हासिल करने में असफल होती है तो वह सदन का विश्वास खो देगीण्
मतदान कैसे होता है
मतदान के दौरान सांसदों को मत देते समय लाल, हरा और पीला बटन दबाना होता हैण् हरा बटन दबाने का अर्थ है कि उस सांसद द्वारा सरकार के विश्वासमत को समर्थन दिया जा रहा है और लाल बटन उस सांसद के असमति अथवा विरोध को बताता है जबकि पीला बटन संबंधित सांसद के वोÇटग में ाग न लेने अथवा गैर-हाजिरी माना जाता है और उसके वोटों की गिनती अनुपस्थित सदस्यों की श्रेणी के तहत किया जाता हैण् लेकिन यदि किसी सांसद से गलती से पीला बटन दब जाता है और वह अपनी गलती के बारे में लोकसाध्यक्ष को तत्काल जानकारी देता है तो उसके अनुरोध को लोकसाध्यक्ष द्वारा स्वीकार ी किया जाता है और उसे पुनर्मतदान की अनुमति मिलती हैण्
अविश्वास प्रस्ताव और विश्वासप्रस्ताव मत में क्या अंतर है
यह दोनों ही संसदीय प्रकिया का अंग है, जिसके तहत सदन में सरकार के बहुमत को जांचा जाता हैण् विश्वासमत की प्रस्तावना सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री द्वारा रखा जाता है जबकि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की तरफ से लाया जाता हैण्
विश्वासमत प्रस्ताव मेें हार पर क्या हो सकता है
यदि सरकार सदन में विश्वासप्रस्ताव के दौरान सामान्य बहुमत साबित नहÈ कर पाती है तो ऐसे में सरकार को या तो इस्तीफा देना होता है अथवा वह लोकसा को ंग करके आम चुनाव की सिफारिश राष्ट्रपति से कर सकते हैंण् फिर यह राष्ट्रपति पर निZर करता है कि वह नयी सरकार को आमंत्रित करें अथवा ऐसा संव न होने पर वर्तमान सरकार को ही चुनाव संपé होने और नयी सरकार के बनने तक कार्यवाहक सरकार के तौर पर काम करने को कहेण् एक रोचक तथ्य यह ी है कि यदि सरकार विश्वासमत जीत जाती है तो 15 दिन बाद विपक्ष पुन: सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकता हैण् दरअसल, संसदीय प्रावधान में कहा गया है कि एक बार अविश्वास प्रस्ताव लाने के के छ: महीने बाद ही दुबारा अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जा सकता है, जबकि विश्वासमत सरकार की तरफ से लाया जाता है इसलिए उक्त कानून इस पर लागू नहÈ होताण्
विश्वासमत हासिल करने की प्रक्रिया क्या है और वोटों की गिनती कैसे होती है
विश्वासमत प्रस्ताव की अवधारणा संविधान में नहÈ रखा गया है बल्कि इसका प्रावधान संसद की कार्यवाही प्रक्रिया के तहत किया गया हैण् पहली बार विश्वासमत प्रस्ताव वीपी Çसह सरकार के समय में लाया गया थाण् संसद के पूर्व महासचिव सीके जैन के मुताबिक विश्वासमत हासिल करने के लिए सरकार को सामान्य बहुमत अथाZत लोकसा के कुल उपस्थित सदस्यों के आधे से एक अधिक (50 प्रतिशत + 1) मत प्राप्त करना होता हैण् गौरतलब है कि लोकसाध्यक्ष को वोट देने का अधिकार नहÈ होताण् हालांकि वह निर्णायक वोट कर सकता हैण् उदाहरण के लिए यदि पक्ष और विपक्ष में पड़े मत बराबर हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में लोकसाध्यक्ष का वोट निर्णायक माना जाता हैण् लोकसा में कुल 545 सीटें हैं, जिसमें मेरठ और वेल्लारी की सीटें खाली हैण् पीसी थॉमस को वोट देने का अधिकार नहÈ हैण् इस प्रकार वर्तमान में सांसदों की कुल संख्या 543 हैण् बहुमत के लिए सरकार को कुल 272 मत पाना अनिवार्य हैण् लेकिन यदि मतदान के समय 540 सदस्य ही ाग लेते हैें तो सरकार को बहुमत के लिए 271 मतों की ही जरूरत होगीण् किसी स्थिति में यदि सरकार निर्धारित मत हासिल करने में असफल होती है तो वह सदन का विश्वास खो देगीण्
मतदान कैसे होता है
मतदान के दौरान सांसदों को मत देते समय लाल, हरा और पीला बटन दबाना होता हैण् हरा बटन दबाने का अर्थ है कि उस सांसद द्वारा सरकार के विश्वासमत को समर्थन दिया जा रहा है और लाल बटन उस सांसद के असमति अथवा विरोध को बताता है जबकि पीला बटन संबंधित सांसद के वोÇटग में ाग न लेने अथवा गैर-हाजिरी माना जाता है और उसके वोटों की गिनती अनुपस्थित सदस्यों की श्रेणी के तहत किया जाता हैण् लेकिन यदि किसी सांसद से गलती से पीला बटन दब जाता है और वह अपनी गलती के बारे में लोकसाध्यक्ष को तत्काल जानकारी देता है तो उसके अनुरोध को लोकसाध्यक्ष द्वारा स्वीकार ी किया जाता है और उसे पुनर्मतदान की अनुमति मिलती हैण्
13 दिनों से चल रही ड्रामेबाजी का हुआ अंत
संसद में विश्वासमत हासिल करने के बाद सरकार बचाने के लिए चली आ रही 13 दिनों की ड्रामेबाजी का अंत हो गयाण्
संजय कुमार
byline
नयी दिल्ली : दो दिनों की बहस के बाद यूपीए सरकार लोकसा में विश्वास मत हासिल करने में सफल रहीण् लोकसा में लोकतंत्र को लज्जित करनेवाली घटनाओं के लिए याद रहनेवाला मंगलवार का दिन सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में किसी प्रधानमंत्री के लिखित जवाब के लिए ी जाना जायेगाण् डॉ मनमोहन Çसह दो दिन की चर्चा समाप्त होने के बाद विपक्ष के हंगामे के कारण बहस का जवाब नहंÈ दे सकेण्
इसके बाद उन्होंने जवाब देने की औपचारिता निाते हुए अपना लिखित ाषण सदन पटल पर रख दिया और स्पीकर ने विश्वास प्रस्ताव पर शक्ति परीक्षण की प्रक्रिया के पहले चरण में ध्वनिमत कराने की घोषणा कर दीण् इससे पहले सदन में बीएसपी सांसदों ने यह आरोप लगा कर सनसनी पैदा कर दी कि सत्तापक्ष ने उनपर सरकार के पक्ष में वोट डालने के लिए दबाव बनाने के इरादे से उनके घर सीबीआइ के अधिकारी ेजे थेण् अी हंगामें के बाद सदन की कार्यवाही शुरू ही हुई थी कि ाजपा के सांसद अशोक अर्गल द्वारा सदन पटल पर एक करोड़ रुपये के नोटों की गिड्डयां रखे जाने के बाद तो सदन का आगे चलना मुश्किल हो गयाण्
ड्रामेबाजी में खास :
ं अपनी जापान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने आइएइए जाने की घोषणा कर दीण् इससे वामपंथी ड़क गये और आठ जुलाई को समर्थन वापसी की घोषणा कर दीण्
ं कुछ समय बाद ही सपा अध्यक्ष मुलायम Çसह यादव ने परमाणु करार का समर्थन करते हुए परमाणु मुद्दे पर संसद में सरकार को बचाने का ऐलान कर दियाण् कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलकर सपा महासचिव अमर Çसह ने सपा संसदीय दल के प्रस्ताव से उन्हें अवगत कराते हुए आश्वस्त किया कि लोकसा में समाजवादी पार्टी का हर सांसद सरकार के पक्ष में वोट करेगाण्
ं समर्थन वापसी की वामदलों की धमकी के बाद से ही यूपीए सरकार के सियासी प्रबंधकों और कांग्रेस के रणनीतिकारों ने नये सहारे की तलाश शुरू कर दी थीण् सपा के साथ बातचीत पôी होने के बाद ही प्रधानमंत्री मनमोहन Çसह जी आठ की बैठक में ाग लेने के लिए जापान रवाना हुएण्
ं चार साल से सरकार को अपने समर्थन पर टिकाये रखनेवाले वामदलों द्वारा समर्थन वापसी के बाद सरकार बचाने और गिराने का खेल शुरू हो गयाण् विदेश मंत्री प्रणव मुखजÊ ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की प्रस्तावित 28 जुलाई की बैठक में वियेना जाने से पहले सरकार लोकसा में विश्वासमत प्राप्त करेगी, राजनीतिक दलों में सांसदों के अंकगणित को बदलने की कवायद शुरू हो गयीण्
ं सोनिया गांधी के आवास पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में स्थिति की समीक्षा की गयीण् लोकसा में अंकगणित का हिसाब लगाया गयाण् मुलायम Çसह, अजित Çसह और देवेगौड़ा के साथ-साथ टीआरएस के चंद्रशेखर राव, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनजÊ, एमडीएमके नेता वाइको, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी नेताओं के साथ-साथ एमएनएफ और निर्दलीय सांसदों को जोड़ने की कवायद शुरू हो गयीण्
ं लेट द्वारा यूपीए से समर्थन वापस लेने के बाद लाल—ष्ण आडवाणी के घर पर ाजपा के बड़े नेताओं की इमरजेंसी मीÇटग हुईण् इसमें आगे की रणनीति पर चर्चा की गयीण्
ं सरकार को बचाने के लिए जहां सपा ने कांग्रेस से हाथ मिलाया, तो उधर वामदलों ने सरकार को संसद में पठखनी देने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ जुगलबंदी कर लीण् जिस सपा को बसपा के टूटने की उम्मीद थी, उसने सपा के घर में ही सेंध लगा दीण् सपा सांसद शाहिद सिद्दकी को अपने पाले में करते हुए उसने एक और कामयाबी बटोरीण् मायावती और वामदल के खेमे में यूएनपीए के घटक दल तेलगू देशम पार्टी, असम गण परिषद, इंडियन नैशनल लोकदल और झारखंड विकास पार्टी शामिल हो गयेण् कई पार्टियों ने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में ी प्रोजेक्ट करने की बात कह डालीण्
ं यूपीए के लिए आंकड़े जुटाने में सबसे ज्यादा रुलाया झामुमो नेण् ऐसे समय जब यूपीए को आंकड़ों की दरकार थी, झामुमो नेता शिबू सोरेन सरकार से नाक ौ सिकोड़ रहे थेण् जिस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लिया, उस मुद्दे से झामुमो का कोई सरोकार नहÈ रहा, उसका सारा ध्येय मौके की नजाकत देख अपनी 15 सुत्री मांगें मनवाना थाण् इसमें कैबिनेट मंत्री समेत कई मांग रखÈ गयीण् आखिरकार शिबु सोरेन सोनिया गंाधी के साथ एक घंटे की बैठक के बाद पत्रकारों के सामने खुलकर यूपीए के समर्थन में बोलते नजर आयेण्
ं छोटे चौधरी यानी अजीत Çसह सियासी पाला बदलने में उस्ताद माने जाते हैंण् की एनडीए में, की यूएनपीए तो की कांग्रेस के साथण् आम चुनाव में कांग्रेस और सपा का साथ मिलेगा, ती अजीत Çसह की चुनावी नैया पार हो पायेगीण् यही सोच उन्हें यूपीए की तरफ खÈच रहा थाण् यूपीए में शामिल होने की उनकी शर्त थी कि लखनऊ हवाई अड्डा का नाम चरण Çसह रख दिया जायेण् सरकार ने उनकी तमéा पूरी ी कर दीण् लेकिन ऐन वक्त छोटे चौधरी ने धोखा दे दियाण् मायावती से मिलने के बाद उनके तेवर बदल गयेण्
ं केरल के जनतादल(एस) सांसद विरेंद्र कुमार पार्टी के लाइन पर लौटने की घोषणा कर दी हैण् गौरतलब है कि वह पहले सरकार के खिलाफ वोट देने की बात कर रहे थेण् देवगौड़ा ी मायावती के पक्ष में चले गयेण्
ं सोमनाथ चटजÊ के लोकसा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की अटकलें ी अंत-अंत तक चलती रहीण् सीपीएम द्वारा राष्ट्रपति को सौंपे गये समर्थन वापसी पत्र में सोमनाथ दा का नाम शामिल करने पर जमकर बवाल हुआण् अंत में सीपीएम ने सोमनाथ को पार्टी लाइन से अलग रहने की बात कहीण्
ं सांसदों की खरीद-बिक्री को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर ी खास चर्चा का विषय बनाण् सीपीआइ महासचिव ने यूपीए पर 25-25 करोड़ में सांसदों की खरीद का आरोप लगायाण् जानकारों के मुताबिक पहले ी सरकार बचाने या गिराने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त की बातें हो थीण् लेकिन ये बातें परदे के पीछे ही रहती थी, जबकि इस बार खरीद फरोख्त की बात को सार्वजनिक मंच पर उछाल कर नेताओं ने इसे पुख्ता करार दिया हैण् साथ ही अवसरवादी राजनीति और नैतिक गिरावट को लेकर ी खूब चर्चाएं रहÈण्
ं राजनीतिक दलों के कारपोरेट जगत के साथ संबंध ी इस बार खास चर्चा में रहेण् खासकर अपने घरेलू विवाद को लेकर मुकेश अंबानी का पीएम से मिलना, इस विवाद को हवा देने में काम आयाण्
संजय कुमार
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नयी दिल्ली : दो दिनों की बहस के बाद यूपीए सरकार लोकसा में विश्वास मत हासिल करने में सफल रहीण् लोकसा में लोकतंत्र को लज्जित करनेवाली घटनाओं के लिए याद रहनेवाला मंगलवार का दिन सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में किसी प्रधानमंत्री के लिखित जवाब के लिए ी जाना जायेगाण् डॉ मनमोहन Çसह दो दिन की चर्चा समाप्त होने के बाद विपक्ष के हंगामे के कारण बहस का जवाब नहंÈ दे सकेण्
इसके बाद उन्होंने जवाब देने की औपचारिता निाते हुए अपना लिखित ाषण सदन पटल पर रख दिया और स्पीकर ने विश्वास प्रस्ताव पर शक्ति परीक्षण की प्रक्रिया के पहले चरण में ध्वनिमत कराने की घोषणा कर दीण् इससे पहले सदन में बीएसपी सांसदों ने यह आरोप लगा कर सनसनी पैदा कर दी कि सत्तापक्ष ने उनपर सरकार के पक्ष में वोट डालने के लिए दबाव बनाने के इरादे से उनके घर सीबीआइ के अधिकारी ेजे थेण् अी हंगामें के बाद सदन की कार्यवाही शुरू ही हुई थी कि ाजपा के सांसद अशोक अर्गल द्वारा सदन पटल पर एक करोड़ रुपये के नोटों की गिड्डयां रखे जाने के बाद तो सदन का आगे चलना मुश्किल हो गयाण्
ड्रामेबाजी में खास :
ं अपनी जापान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने आइएइए जाने की घोषणा कर दीण् इससे वामपंथी ड़क गये और आठ जुलाई को समर्थन वापसी की घोषणा कर दीण्
ं कुछ समय बाद ही सपा अध्यक्ष मुलायम Çसह यादव ने परमाणु करार का समर्थन करते हुए परमाणु मुद्दे पर संसद में सरकार को बचाने का ऐलान कर दियाण् कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलकर सपा महासचिव अमर Çसह ने सपा संसदीय दल के प्रस्ताव से उन्हें अवगत कराते हुए आश्वस्त किया कि लोकसा में समाजवादी पार्टी का हर सांसद सरकार के पक्ष में वोट करेगाण्
ं समर्थन वापसी की वामदलों की धमकी के बाद से ही यूपीए सरकार के सियासी प्रबंधकों और कांग्रेस के रणनीतिकारों ने नये सहारे की तलाश शुरू कर दी थीण् सपा के साथ बातचीत पôी होने के बाद ही प्रधानमंत्री मनमोहन Çसह जी आठ की बैठक में ाग लेने के लिए जापान रवाना हुएण्
ं चार साल से सरकार को अपने समर्थन पर टिकाये रखनेवाले वामदलों द्वारा समर्थन वापसी के बाद सरकार बचाने और गिराने का खेल शुरू हो गयाण् विदेश मंत्री प्रणव मुखजÊ ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की प्रस्तावित 28 जुलाई की बैठक में वियेना जाने से पहले सरकार लोकसा में विश्वासमत प्राप्त करेगी, राजनीतिक दलों में सांसदों के अंकगणित को बदलने की कवायद शुरू हो गयीण्
ं सोनिया गांधी के आवास पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में स्थिति की समीक्षा की गयीण् लोकसा में अंकगणित का हिसाब लगाया गयाण् मुलायम Çसह, अजित Çसह और देवेगौड़ा के साथ-साथ टीआरएस के चंद्रशेखर राव, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनजÊ, एमडीएमके नेता वाइको, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी नेताओं के साथ-साथ एमएनएफ और निर्दलीय सांसदों को जोड़ने की कवायद शुरू हो गयीण्
ं लेट द्वारा यूपीए से समर्थन वापस लेने के बाद लाल—ष्ण आडवाणी के घर पर ाजपा के बड़े नेताओं की इमरजेंसी मीÇटग हुईण् इसमें आगे की रणनीति पर चर्चा की गयीण्
ं सरकार को बचाने के लिए जहां सपा ने कांग्रेस से हाथ मिलाया, तो उधर वामदलों ने सरकार को संसद में पठखनी देने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ जुगलबंदी कर लीण् जिस सपा को बसपा के टूटने की उम्मीद थी, उसने सपा के घर में ही सेंध लगा दीण् सपा सांसद शाहिद सिद्दकी को अपने पाले में करते हुए उसने एक और कामयाबी बटोरीण् मायावती और वामदल के खेमे में यूएनपीए के घटक दल तेलगू देशम पार्टी, असम गण परिषद, इंडियन नैशनल लोकदल और झारखंड विकास पार्टी शामिल हो गयेण् कई पार्टियों ने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में ी प्रोजेक्ट करने की बात कह डालीण्
ं यूपीए के लिए आंकड़े जुटाने में सबसे ज्यादा रुलाया झामुमो नेण् ऐसे समय जब यूपीए को आंकड़ों की दरकार थी, झामुमो नेता शिबू सोरेन सरकार से नाक ौ सिकोड़ रहे थेण् जिस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लिया, उस मुद्दे से झामुमो का कोई सरोकार नहÈ रहा, उसका सारा ध्येय मौके की नजाकत देख अपनी 15 सुत्री मांगें मनवाना थाण् इसमें कैबिनेट मंत्री समेत कई मांग रखÈ गयीण् आखिरकार शिबु सोरेन सोनिया गंाधी के साथ एक घंटे की बैठक के बाद पत्रकारों के सामने खुलकर यूपीए के समर्थन में बोलते नजर आयेण्
ं छोटे चौधरी यानी अजीत Çसह सियासी पाला बदलने में उस्ताद माने जाते हैंण् की एनडीए में, की यूएनपीए तो की कांग्रेस के साथण् आम चुनाव में कांग्रेस और सपा का साथ मिलेगा, ती अजीत Çसह की चुनावी नैया पार हो पायेगीण् यही सोच उन्हें यूपीए की तरफ खÈच रहा थाण् यूपीए में शामिल होने की उनकी शर्त थी कि लखनऊ हवाई अड्डा का नाम चरण Çसह रख दिया जायेण् सरकार ने उनकी तमéा पूरी ी कर दीण् लेकिन ऐन वक्त छोटे चौधरी ने धोखा दे दियाण् मायावती से मिलने के बाद उनके तेवर बदल गयेण्
ं केरल के जनतादल(एस) सांसद विरेंद्र कुमार पार्टी के लाइन पर लौटने की घोषणा कर दी हैण् गौरतलब है कि वह पहले सरकार के खिलाफ वोट देने की बात कर रहे थेण् देवगौड़ा ी मायावती के पक्ष में चले गयेण्
ं सोमनाथ चटजÊ के लोकसा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की अटकलें ी अंत-अंत तक चलती रहीण् सीपीएम द्वारा राष्ट्रपति को सौंपे गये समर्थन वापसी पत्र में सोमनाथ दा का नाम शामिल करने पर जमकर बवाल हुआण् अंत में सीपीएम ने सोमनाथ को पार्टी लाइन से अलग रहने की बात कहीण्
ं सांसदों की खरीद-बिक्री को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर ी खास चर्चा का विषय बनाण् सीपीआइ महासचिव ने यूपीए पर 25-25 करोड़ में सांसदों की खरीद का आरोप लगायाण् जानकारों के मुताबिक पहले ी सरकार बचाने या गिराने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त की बातें हो थीण् लेकिन ये बातें परदे के पीछे ही रहती थी, जबकि इस बार खरीद फरोख्त की बात को सार्वजनिक मंच पर उछाल कर नेताओं ने इसे पुख्ता करार दिया हैण् साथ ही अवसरवादी राजनीति और नैतिक गिरावट को लेकर ी खूब चर्चाएं रहÈण्
ं राजनीतिक दलों के कारपोरेट जगत के साथ संबंध ी इस बार खास चर्चा में रहेण् खासकर अपने घरेलू विवाद को लेकर मुकेश अंबानी का पीएम से मिलना, इस विवाद को हवा देने में काम आयाण्
खेती, किसान और खाद्य संकट
संजय कुमार
byline
जीडीपी में —षि की हिस्सेदारी मात्र 18 फीसदी
ारतीय अर्थव्यवस्था पिछले पांच सालों से 8ण्5 फीसदी औसत की गति से तेजी से विकसित हो रही हैण् लेकिन यह विकास दर निर्माण उद्योग और बढ़ते सेवा क्षेत्र तक ही सीमित हैण् दूसरी ओर पिछले पांच सालों में —षि क्षेत्र में मुश्किल से मात्र 2ण्6 फीसदी विकास हुआ है और पिछले डेढ़ दशक में इसकी विकास दर की प्रवृित्त देखी जाये, तो यह दर गिरी ही हैण् परिणामस्वरूप, अनाज (गेहूं और चावल) की प्रति व्यक्ति पैदावार वर्तमान में ी लगग उसी स्तर पर है, जितनी कि 1970 में हुआ करती थीण् इस समस्या ने गंीर रुख ले लिया है, क्योंकि ारत के 1ण्1 अरब लोगों के 60 फीसदी की जीविका खेती से ही चलती हैण् देश के सकल घरेलू उत्पाद में —षि की हिस्सेदारी 1982-83 में 36ण्4 प्रतिशत से घटकर 2006-07 में 18ण्5 प्रतिशत रह गयी हैण्
नाजुक स्थिति में अनाज ंडार
केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के अनुसार ी देश में गेहूंं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर से नीचे जा पहुंचा हैण् ताजा आंकड़ों के अनुसार सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर दो करोड़ टन से कम हैण्
अनाज का सुरक्षित ंडार न्यूनतम 20 मिलियन टन होना चाहिए, लेकिन जनवरी माह में यह सिर्फ 19ण्2 मिलियन टन ही थाण् वहÈ जनवरी 2004 में यह स्टॉक 24ण्4 मिलियन टन थाण् हालांकि ारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के अनुसार ारत में अनाज की कमी नहÈ हैण् निगम के पास गेहूं का 55 लाख टन का ंडार हैण् —षि उत्पादों में कमी को देश में अनाज के ंडारों की स्थिति से समझा जा सकता हैण्
छह साल पहले हमारा अनाज ंडारण रिकॉर्ड स्तर का थाण् तब नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमत्र्य सेन ने कहा था कि अगर सरकारी संस्था ारतीय खाद्य निगम के गेहूं और चावल के सी बोरों को एकसाथ रख दिया जाये, तो यह ढेर चांद तक पहुंच जायेगाण् पिछले तीन सालों में कम उत्पादन और निर्यात की वजह से अनाज ंडारों में काफी कमी आई हैण्
—षि के प्रति उदासीन रवैया
ारतीय किसान खासतौर पर असुरक्षित है, क्योंकि देश में कुल —षि योग्य ूमि के 60 फीसदी हिस्से को Çसचाई के लिए पानी नहÈ मिलताण् इसके लिए उन्हें चार महीने के मानसून पर ी निZर रहना पड़ता है, जिस दौरान पूरे साल की 80 फीसदी वषाZ होती हैण् इससे पहले ारत में की अनाज की इतनी कमी नहÈ रहीण् तब ी नहÈ जब 1943 में बंगाल में 15 लाख से ी ज्यादा लोगों के ूख से मर जाने का अनुमान लगाया गया थाण् दाल और चावल बहुत से ारतीयों का मूल ोजन है, तब और आज की समस्या एक ही है - उचित मूल्य पर ोजनण्
ारतीय —षि का वर्तमान संकट बहुत से कारकों की वजह से है जैसे- खेती के उत्पादन में कम विकास, पैदावार का उचित मूल्य न मिलना, अनाज संग्रह और रखरखाव की उचित सुविधाओं की कमी और उसके कारण खराब हुए अनाज से होने वाला नुकसानण् जमीन का विाजन और ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर सिंचाई सुविधाओं में निवेश की कमी को ी दोषी ठहराया जा सकता हैण्
पूरे विश्व में है खाद्याé संकट
विश्व के कई देशों में गंीर सूखे की स्थिति और अनाज से जैव इ±धन के निर्माण पर जोर देने के कारण दुनिया में खाद्याé की आपूर्ति कम हो गयी हैण् इससे पूरा विश्व खाद्याé संकट की गिरत में हैण् गल्फ टुडे समाचार पत्र के अनुसार अनाजों की बढ़ती हुई कीमतों का प्राव अब सड़कों पर लोगों के प्रदर्शनों से दिखाई देने लगा हैण् पूरी दुनिया में सरकारें कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए आयात और अन्य उपायों का सहारा ले रही हैण् विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार करीब 33 देश बढ़ती हुई अनाज और तेल की कीमतों के कारण सामाजिक अशांति का सामना कर सकते हैंण् सूखे के कारण ऑस्ट्रेलिया को अपना गेहूं निर्यात कम करना पड़ा हैण् विश्व में गेहूं का ंडार 1979 के बाद से इस साल सबसे कम हैण् ारत, चीन और वियतनाम ने ी अपने चावल निर्यात में कमी की हैण् खाद्याéों की महंगाई से निपटने के लिए इंडोनेशिया ने आयात शुल्क में ारी कमी की हैण्
बढ़ाई जा सकती है पैदावार
ारतीय —षि अनुसंधान परिषद की वािर्षक रिपोर्ट (2007-08) तथा मई 2007 में —षि पर गठित नेशनल डेवलेपमेंट काउंसिल की सब-कमेटी द्वारा योजना आयोग को सौंपी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में पैदावार हालिया क्षमता को 40फीसदी बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते कि खेती के लिए पर्याप्त सुविधाएं व प्रोत्साहन दी जायेण् हाल के वर्ष में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के हिस्सों में गेहूं की पैदावार 3ण्5 से 4ण्5 टन प्रति हेक्टेयर हुई, जो कि चीन के 4ण्25 टन के बराबर है तथा अमेरिका(2ण्9 टन) तथा ऑस्ट्रेलिया(1ण्64 टन) के मुकाबले बेहतर हैण् रिपोर्ट में पैदावार क्षमता के संदZ में कहा गया है कि अकेले उत्तर प्रदेश में 9 मिलियन हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है, यह देश के कुल गेहूं में 12 मिलियन टन की हिस्सेदारी कर सकने में सक्षम हैण् वहÈ हरियाणा में 20 फीसदी तथा राजस्थान में वर्तमान क्षमता से 40 फीसदी अधिक उत्पादन किया जा सकता हैण्
बिहार के बारे में कहा गया है कि यह 3ण्8 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम है, वहÈ महाराष्ट्र 1ण्5 मिलियन टन तथा मध्यप्रदेश 6 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम हैण् झारखंड में संावित उत्पादन और प्राप्त उत्पादन में काफी अंतर हैण् ारत के कुल धान उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा अकेले बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से संव हैण् इसी तरह 25 से 30 मिलियन टन चावल का उत्पादन अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश से संव हैण् —षि के पिछड़े क्षेत्रों में उत्पादकता की निम्न दर एक बड़ी समस्या हैण् कम उत्पादकता के लिए कई बाधाएं जिम्मेवार हैंण् इन कारणों में राज्य की —षि एजेंसियों द्वारा तकनीक के वितरण में कमजोरी, फसलों का गलत चयन, विविध किस्म की बीजों का समुचित उपयोग न होना, खाद का अपर्याप्त इस्तेमाल और खराब जल-प्रबंधन मुख्य समस्याएं हैंण् इनमें से कई समस्याओं पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाये, तो —षि पैदावार बढ़ाया जा सकता हैण्
संजय कुमार
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जीडीपी में —षि की हिस्सेदारी मात्र 18 फीसदी
ारतीय अर्थव्यवस्था पिछले पांच सालों से 8ण्5 फीसदी औसत की गति से तेजी से विकसित हो रही हैण् लेकिन यह विकास दर निर्माण उद्योग और बढ़ते सेवा क्षेत्र तक ही सीमित हैण् दूसरी ओर पिछले पांच सालों में —षि क्षेत्र में मुश्किल से मात्र 2ण्6 फीसदी विकास हुआ है और पिछले डेढ़ दशक में इसकी विकास दर की प्रवृित्त देखी जाये, तो यह दर गिरी ही हैण् परिणामस्वरूप, अनाज (गेहूं और चावल) की प्रति व्यक्ति पैदावार वर्तमान में ी लगग उसी स्तर पर है, जितनी कि 1970 में हुआ करती थीण् इस समस्या ने गंीर रुख ले लिया है, क्योंकि ारत के 1ण्1 अरब लोगों के 60 फीसदी की जीविका खेती से ही चलती हैण् देश के सकल घरेलू उत्पाद में —षि की हिस्सेदारी 1982-83 में 36ण्4 प्रतिशत से घटकर 2006-07 में 18ण्5 प्रतिशत रह गयी हैण्
नाजुक स्थिति में अनाज ंडार
केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के अनुसार ी देश में गेहूंं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर से नीचे जा पहुंचा हैण् ताजा आंकड़ों के अनुसार सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर दो करोड़ टन से कम हैण्
अनाज का सुरक्षित ंडार न्यूनतम 20 मिलियन टन होना चाहिए, लेकिन जनवरी माह में यह सिर्फ 19ण्2 मिलियन टन ही थाण् वहÈ जनवरी 2004 में यह स्टॉक 24ण्4 मिलियन टन थाण् हालांकि ारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के अनुसार ारत में अनाज की कमी नहÈ हैण् निगम के पास गेहूं का 55 लाख टन का ंडार हैण् —षि उत्पादों में कमी को देश में अनाज के ंडारों की स्थिति से समझा जा सकता हैण्
छह साल पहले हमारा अनाज ंडारण रिकॉर्ड स्तर का थाण् तब नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमत्र्य सेन ने कहा था कि अगर सरकारी संस्था ारतीय खाद्य निगम के गेहूं और चावल के सी बोरों को एकसाथ रख दिया जाये, तो यह ढेर चांद तक पहुंच जायेगाण् पिछले तीन सालों में कम उत्पादन और निर्यात की वजह से अनाज ंडारों में काफी कमी आई हैण्
—षि के प्रति उदासीन रवैया
ारतीय किसान खासतौर पर असुरक्षित है, क्योंकि देश में कुल —षि योग्य ूमि के 60 फीसदी हिस्से को Çसचाई के लिए पानी नहÈ मिलताण् इसके लिए उन्हें चार महीने के मानसून पर ी निZर रहना पड़ता है, जिस दौरान पूरे साल की 80 फीसदी वषाZ होती हैण् इससे पहले ारत में की अनाज की इतनी कमी नहÈ रहीण् तब ी नहÈ जब 1943 में बंगाल में 15 लाख से ी ज्यादा लोगों के ूख से मर जाने का अनुमान लगाया गया थाण् दाल और चावल बहुत से ारतीयों का मूल ोजन है, तब और आज की समस्या एक ही है - उचित मूल्य पर ोजनण्
ारतीय —षि का वर्तमान संकट बहुत से कारकों की वजह से है जैसे- खेती के उत्पादन में कम विकास, पैदावार का उचित मूल्य न मिलना, अनाज संग्रह और रखरखाव की उचित सुविधाओं की कमी और उसके कारण खराब हुए अनाज से होने वाला नुकसानण् जमीन का विाजन और ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर सिंचाई सुविधाओं में निवेश की कमी को ी दोषी ठहराया जा सकता हैण्
पूरे विश्व में है खाद्याé संकट
विश्व के कई देशों में गंीर सूखे की स्थिति और अनाज से जैव इ±धन के निर्माण पर जोर देने के कारण दुनिया में खाद्याé की आपूर्ति कम हो गयी हैण् इससे पूरा विश्व खाद्याé संकट की गिरत में हैण् गल्फ टुडे समाचार पत्र के अनुसार अनाजों की बढ़ती हुई कीमतों का प्राव अब सड़कों पर लोगों के प्रदर्शनों से दिखाई देने लगा हैण् पूरी दुनिया में सरकारें कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए आयात और अन्य उपायों का सहारा ले रही हैण् विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार करीब 33 देश बढ़ती हुई अनाज और तेल की कीमतों के कारण सामाजिक अशांति का सामना कर सकते हैंण् सूखे के कारण ऑस्ट्रेलिया को अपना गेहूं निर्यात कम करना पड़ा हैण् विश्व में गेहूं का ंडार 1979 के बाद से इस साल सबसे कम हैण् ारत, चीन और वियतनाम ने ी अपने चावल निर्यात में कमी की हैण् खाद्याéों की महंगाई से निपटने के लिए इंडोनेशिया ने आयात शुल्क में ारी कमी की हैण्
बढ़ाई जा सकती है पैदावार
ारतीय —षि अनुसंधान परिषद की वािर्षक रिपोर्ट (2007-08) तथा मई 2007 में —षि पर गठित नेशनल डेवलेपमेंट काउंसिल की सब-कमेटी द्वारा योजना आयोग को सौंपी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में पैदावार हालिया क्षमता को 40फीसदी बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते कि खेती के लिए पर्याप्त सुविधाएं व प्रोत्साहन दी जायेण् हाल के वर्ष में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के हिस्सों में गेहूं की पैदावार 3ण्5 से 4ण्5 टन प्रति हेक्टेयर हुई, जो कि चीन के 4ण्25 टन के बराबर है तथा अमेरिका(2ण्9 टन) तथा ऑस्ट्रेलिया(1ण्64 टन) के मुकाबले बेहतर हैण् रिपोर्ट में पैदावार क्षमता के संदZ में कहा गया है कि अकेले उत्तर प्रदेश में 9 मिलियन हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है, यह देश के कुल गेहूं में 12 मिलियन टन की हिस्सेदारी कर सकने में सक्षम हैण् वहÈ हरियाणा में 20 फीसदी तथा राजस्थान में वर्तमान क्षमता से 40 फीसदी अधिक उत्पादन किया जा सकता हैण्
बिहार के बारे में कहा गया है कि यह 3ण्8 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम है, वहÈ महाराष्ट्र 1ण्5 मिलियन टन तथा मध्यप्रदेश 6 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम हैण् झारखंड में संावित उत्पादन और प्राप्त उत्पादन में काफी अंतर हैण् ारत के कुल धान उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा अकेले बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से संव हैण् इसी तरह 25 से 30 मिलियन टन चावल का उत्पादन अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश से संव हैण् —षि के पिछड़े क्षेत्रों में उत्पादकता की निम्न दर एक बड़ी समस्या हैण् कम उत्पादकता के लिए कई बाधाएं जिम्मेवार हैंण् इन कारणों में राज्य की —षि एजेंसियों द्वारा तकनीक के वितरण में कमजोरी, फसलों का गलत चयन, विविध किस्म की बीजों का समुचित उपयोग न होना, खाद का अपर्याप्त इस्तेमाल और खराब जल-प्रबंधन मुख्य समस्याएं हैंण् इनमें से कई समस्याओं पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाये, तो —षि पैदावार बढ़ाया जा सकता हैण्
संजय कुमार
ारत की खुफिया ढांचा
संजय कुमार
byline
राष्टीय सुरक्षा परिषद यानी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल
ारतीय सुरक्षा परिषद के गठन की बात वर्ष 1980 के विश्वनाथ प्रताप Çसह सरकार के समय से ही चल रही थीण् वर्ष 1998 में पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री केसी पंत की अध्यक्षतावाली टास्क फोर्स ने इसकी रूपरेखा तय कीण् अंतत: इसकी स्थापना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 19 नवंबर 1998 में की गयीण् ब्रजेश मिश्रा इसके पहले राष्टीय सुरक्षा सलाहकार बनेंण् इस सर्वाेच्च संस्था का अध्यक्ष प्रधानमंत्री खुद होते हैंण् ारतीय सुरक्षा परिषद तीन स्तरीय संगठनों द्वारा कार्य करता हैण्
रणनीतिक समूह
यह राष्टीय सुरक्षा परिषद में नीतिनिर्धारक की ूमिका अदा करता हैण् इसके सदस्यों में सैन्य (आमÊ, नेवी तथा एयरफोर्स) प्रमुख के अलावा सिविलियन में कैबिनेट सचिव, विदेश सचिव, गृह सचिव, रक्षा सचिव, गुप्तचर विाग के निदेशक आदि आते हैंण्
राष्टीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड
इसमें सरकार से अलग वििé क्षेत्रों के विशेषज्ञ जैसे बाह्य सुरक्षा, सामरिक विशेषज्ञ, रक्षा व सैन्य विशेषज्ञ आदि शामिल होते हैंण् बोर्ड की प्रतिमाह एक बैठक होना अनिवार्य समझा गया हैण्
संयुक्त गुप्तचर समिति(जेआइसी)
सरकार की संयुक्त गुप्तचर समिति यानी जेआइसी सी एजेंसियों, आइबी, रॉ तथा मिलिटी, नेवल, एयर इंटलीजेंस निदेशालय से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करती हैण् जेआइसी का अपना सचिवालय है, जो कैबिनेट सचिवालय के मातहत काम करती हैण्
खुफिया विाग (आइबी)
गृह मंत्रालय के अधीन खुफिया विाग की स्थापना वर्ष 1947 में की गयी थीण् यह ारत की सर्वाेच्च गुप्तचर इकाई हैण् यह राज्य की खुफिया विागों से तालमेल कर आतंकी गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करती है तथा जेआइसी को इसकी रिपोर्ट देती हैण् इसे कई अधिकार दिये गये हैंण् यह बिना वारंट के किसी को फोन टैप कर सकती हैण्
शोध एवं विश्लेषण प्राग (रॉ)
कैबिनेट सेके्रटेरिएट के अंतर्गत कार्यरत शोध एवं विश्लेषण प्राव यानी रॉ ारत की प्रमुख बाह्य खुफिया इकाई हैण् खुफिया विाग से अलग इसकी स्थापना स्वतंत्र इकाई के तौर पर सितंबर 1968 में की गयी थीण् इसका दायरा विदेशों तक फैला हुआ हैण् यह आशंकित जानकारी जुटाकर जेआइसी और प्रधानमंत्री कार्यालय को ेजती हैण्
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ)
केंद्रीय जांच ब्यूरो की स्थापना एक अप्रैल 1963 में की गयी थीण् यह आपधारिक तथा राष्टीय सुरक्षा के मसले पर व्यापक जिम्मेवारी निाता हैण् सीबीआइ ारत की आधिकारिक इंटरपोल यूनिट हैण् वर्तमान में सीबीआइ के निदेशक पर 1969 बैच के आइपीएस विजयशंकर हैण्
रक्षा व अर्द्धसैनिक बलों की खुफिया एजेंसी
आमÊ, एयरफोर्स तथा नेवी के पास अपने खुफिया प्राग हैण् यहां से सारी सूचनाएं एजेंसी जेआइसी को सौंपती हैंण्
वित्तीय खुफिया विाग
यहां से वित्त से जुड़ी सूचनाएं जेआइसी तथा वित्त मंत्रालय को दी जाती हैण्
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राष्टीय सुरक्षा परिषद यानी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल
ारतीय सुरक्षा परिषद के गठन की बात वर्ष 1980 के विश्वनाथ प्रताप Çसह सरकार के समय से ही चल रही थीण् वर्ष 1998 में पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री केसी पंत की अध्यक्षतावाली टास्क फोर्स ने इसकी रूपरेखा तय कीण् अंतत: इसकी स्थापना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 19 नवंबर 1998 में की गयीण् ब्रजेश मिश्रा इसके पहले राष्टीय सुरक्षा सलाहकार बनेंण् इस सर्वाेच्च संस्था का अध्यक्ष प्रधानमंत्री खुद होते हैंण् ारतीय सुरक्षा परिषद तीन स्तरीय संगठनों द्वारा कार्य करता हैण्
रणनीतिक समूह
यह राष्टीय सुरक्षा परिषद में नीतिनिर्धारक की ूमिका अदा करता हैण् इसके सदस्यों में सैन्य (आमÊ, नेवी तथा एयरफोर्स) प्रमुख के अलावा सिविलियन में कैबिनेट सचिव, विदेश सचिव, गृह सचिव, रक्षा सचिव, गुप्तचर विाग के निदेशक आदि आते हैंण्
राष्टीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड
इसमें सरकार से अलग वििé क्षेत्रों के विशेषज्ञ जैसे बाह्य सुरक्षा, सामरिक विशेषज्ञ, रक्षा व सैन्य विशेषज्ञ आदि शामिल होते हैंण् बोर्ड की प्रतिमाह एक बैठक होना अनिवार्य समझा गया हैण्
संयुक्त गुप्तचर समिति(जेआइसी)
सरकार की संयुक्त गुप्तचर समिति यानी जेआइसी सी एजेंसियों, आइबी, रॉ तथा मिलिटी, नेवल, एयर इंटलीजेंस निदेशालय से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करती हैण् जेआइसी का अपना सचिवालय है, जो कैबिनेट सचिवालय के मातहत काम करती हैण्
खुफिया विाग (आइबी)
गृह मंत्रालय के अधीन खुफिया विाग की स्थापना वर्ष 1947 में की गयी थीण् यह ारत की सर्वाेच्च गुप्तचर इकाई हैण् यह राज्य की खुफिया विागों से तालमेल कर आतंकी गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करती है तथा जेआइसी को इसकी रिपोर्ट देती हैण् इसे कई अधिकार दिये गये हैंण् यह बिना वारंट के किसी को फोन टैप कर सकती हैण्
शोध एवं विश्लेषण प्राग (रॉ)
कैबिनेट सेके्रटेरिएट के अंतर्गत कार्यरत शोध एवं विश्लेषण प्राव यानी रॉ ारत की प्रमुख बाह्य खुफिया इकाई हैण् खुफिया विाग से अलग इसकी स्थापना स्वतंत्र इकाई के तौर पर सितंबर 1968 में की गयी थीण् इसका दायरा विदेशों तक फैला हुआ हैण् यह आशंकित जानकारी जुटाकर जेआइसी और प्रधानमंत्री कार्यालय को ेजती हैण्
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ)
केंद्रीय जांच ब्यूरो की स्थापना एक अप्रैल 1963 में की गयी थीण् यह आपधारिक तथा राष्टीय सुरक्षा के मसले पर व्यापक जिम्मेवारी निाता हैण् सीबीआइ ारत की आधिकारिक इंटरपोल यूनिट हैण् वर्तमान में सीबीआइ के निदेशक पर 1969 बैच के आइपीएस विजयशंकर हैण्
रक्षा व अर्द्धसैनिक बलों की खुफिया एजेंसी
आमÊ, एयरफोर्स तथा नेवी के पास अपने खुफिया प्राग हैण् यहां से सारी सूचनाएं एजेंसी जेआइसी को सौंपती हैंण्
वित्तीय खुफिया विाग
यहां से वित्त से जुड़ी सूचनाएं जेआइसी तथा वित्त मंत्रालय को दी जाती हैण्
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