टि्रंग, टि्रंग। मोबाइल की घंटी अचानक बज उठी। कौन हो सकता है। अखबार में छपे इश्तहार को पढ़ते हुए मैंने फोन उठाया। मिस्टर संजय-उधर से आवाज आयी। हां, बोल रहा हूं, आप कौन, मैंने सवाल किया। जी, मैं अरोड़ा बोल रहा हूं, परफेक्ट ट्यूशन ब्यूरो से।
हां, हां बोलिये, मैं आप ही के फोन का इंतजार कर रहा था। मैंने उत्सुकता से जवाब दिया। जी, आपके लिए एक ट्यूशन का ऑफर है। एक लड़की है। नौंवी क्लास की स्टूडेंट है। कल सुबह ट्रायल के लिए आपको जाना पड़ेगा।
मगर अरोड़ा साहब ट्रायल किस बात का। मैंने पूछा। देखिए यहां का नियम है। ट्यूशन के लिए छात्र अपनी च्वाइस के हिसाब से टीचर का चुनाव करते हैंं। अगर उन्हें आप पसंद आये, तो वे हमें हां कह देंगे। फिर आप कंटीन्यू कर सकते हैं। अरोड़ा ने समझाते हुए कहा आप इसको लेकर चिंता न करे। आपमें प्रतिभा है, आप आसानी से हैंडल कर लेंगे। अब आप एड्रेस नोट कर लें। आपको वहां दस बजे पहुंचना है। याद रखें। आप वहां दस बजे ही पहुंचेंगे। जी, इसका ख्याल रखूंगा। मिस्टर पी सचदेवा, सीडी ब्लॉक, 47, रोहिणी सेक्टर-8। ओके संजय जी। बेस्ट ऑफ लक। ओके। अरोड़ा ने फोन काट दिया।
अजीब है अब मुझे भी ट्रायल देना पड़ेगा। अखबार के पन्नों में नौकरी के इश्तहार पर नजर डालते हुए मन में ख्याल आ रहा था। यूनिवर्सिटी में साइंस विषय में भले ही मैंने टॉप नहींं की है, लेकिन क्या हुआ। इस विषय में अपने बैच में सबसे तेज मैं ही था। होठों पर मुस्कान के साथ मन में डर भी था। पता नहीं क्या पूछेगा। अगर उसने ओके नहीं किया तो परफेक्ट टयूशन ब्यूरो में रजिस्ट्रेशन के लिए दिये पांच सौ रूपये भी नहीं लौटेंगे।
मुजफ्फरपुर से दिल्ली आया था एक बेहतर भविश्य संवारने के ख्याल से। राजधानी दिल्ली शिक्षा का हब है। यही सोचकर ट्रेन पकड़ा था। लेकिन यहां आते ही जीवन उन सच्चाईयों से रूबररू हुआ, जिसे संघशZ की जिंदगी कहते है। महानगरीय जीवन चर्या में सबकुछ दौड़ता भागता हुआ पाया। जिस व्यक्ति के पास आकर ठहरा। उसने सलाह दी। यहां कुछ भी करने से पहले अपने हाथ इतने मजबूत कर लो, कि भूखा न सहना पडे़। किसी के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है छोटे-मोटे पार्ट टाइम जॉब कर लो। ‘ ‘
‘शायद पहले दिन इसलिए यह बात मेरी समझ में नहीं आयी, क्योंकि धर से आते वक्त मेरे पास पर्याप्त पैसे थे। तकरीबन दो हजार रूपये लेकर दिल्ली आया था। हमारे साथ के लोगों ने सलाह दी दिल्ली यूनिवर्सिटी जाकर पता करें। कौन-कौन से कोर्स है। पहले दिल्ली के संस्थानों में जाकर अच्छी तरह पता कर ले। फिर क्या करना है, किसमें एडमिशन लेना है, यह तय कीजिये। दो हजार की राशि में पांच सौ रूप्ये तो ट्रेन के किराये और छोटे-मोटे चीजों में खर्च हो गये थै।
ख्ौर, धर से निकलते ही बस स्टैंड पर पहुंचा। लोगों से पूछा दिल्ली विश्वविद्यालय कहां है। एक मुसाफिर जो किसी बस के इंतजार में खड़ा था। उसने कहां नये आये हो। हां। मेरा जवाब सुनकर उसने मुस्कुरा दिया। उसने कहा मुद्रिका रूट की बस ले लो। दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंच जाओगे। बस में मैं बैठ गया। पूरी दिल्ली का एक चक्कर लगा गया, लेकिन मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के दशZन नहीं हुए। यहां मैं धोखा खा गया। हमारे यहां बिहार में बस सफर करते समय आने वाले जगह की जानकारी कंडक्टर मिनट मिनट पर देता रहता है। लेकिन यहां तो कंडक्टर बड़े मजे से कुर्सी पर बैठा टिकट काट रहा था। उसने एक बार भी आवाज लगाना मुनासिब नहीं समझा। पास बैठै एक यात्री से मैंने पूछा भाई साहब, दिल्ली विश्वविद्यालय यहां से कितना दूर होगा। उसने पूछा, आपने बस कहां से ली है। मैंने कहा, जी शालीमार बाग में चढ़ा था। उसने कहां आप बहुत आगे निकल चुके हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय तो पीछे छूट गया। कोई बात नहीं, आप यहां उतर कर, दूसरी मुद्रिका निगेटिव साइन वाली पकड़ कर लौट जाये। और याद रखें यहां कंडक्टर आवाज नहीं लगाता, आपको खुद ध्यान रखना होगा, तभी आप सही जगह उतर पायेंगे। अनजान शहर में इस तरह दिनभर घूमता रहा। मेरे पास कुल जमा कुल 800 रूपये बच गये थे। इतनी जल्दी सारे पैसे खर्च हो जायेंगे मैंने सोचा नहीं था। मनोज, जिसके पास मैं ठहरा था, उसने मुझे सलाह दी। दोस्त ऐसा ही होता है। पहले मैं भी जब यहां आया था, ऐसे ही कुछ सपने थे हमारे साथ। लेकिन हालात ऐसा बना कि अपने खर्च चलाने के लिए टयूशन करना पड़ा। उसने सलाह दी, क्यों नहीं तुम टयूशन कर लेते हो। यहां साइंस के टयूटर की बड़ी डिमांड है। अब तो मेरी भी इच्छा थी किसी तरह टयूशन मिल जाये, ताकि कुछ आय के स्रोत तो हो। परफेक्ट टयूशन ब्यूरो। संजय, इसी ने मुझे पहली बार टयूशन दिलाया था। मैं यहां तुम्हारा रजिस्ट्रेशन करा देता हूं। 500 रूपये लगेंगे। कोई ऑफर आता है, तो तुम्हें इनफॉर्म कर देंगे। ठीक है, जेब से 500 रूपये निकालकर मनोज के हाथों में देते हुए कहा फिर तो आज ही रजिस्ट्रेशन करवा दो। और आज उसका ऑफर मुझे आया है।
क्या सोच रहे हो? मनोज की आवाज सुनते ही जैसे मेरा ध्यान टूटा। अरे मनोज तुम कुछ नहीं यार। हां, परफेक्ट टूशन ब्यूरो से मिस्टर अरोड़ा का फोन आया था। वाह, तो तुझे टयूशन मिल ही गया। मनोज ने बधाई देते हुए कहा। लेकिन यार तुमने मुझे यह नहीं बताय कि टयूशन के लिए स्टूडेंट पहले ट्रायल क्लास लेते हैं। अच्छा तो तुझे ट्रायल के उसने बोला है। मनोज ने सोचते हुए कहा, यहां कुछ ऐसा ही है। उसने मुझे समझाया कि टयूशन में ट्रायल का मतलब क्या होता है। दरअसल, हां ज्ञान के साथ-साथ चेहरा और आपका स्मार्टनेस बिकता है। मैं समझा नहीं, मनोज की बातें मेरे पल्ले नहीं पड़ी। इसे यों समझों, स्टूडेंट दो प्रकार के होते हैं। एक जो पढ़ाई में अव्वल होते हैं, दूसरे वे जो पढ़ाई में सिफर। यदि तुम्हारा पाला पहले वाले स्टूडेंट से होता है, तो वह तुझमें यह नहीं देखेंगे कि तुम्हें क्या आता है क्या नही। मैंने उत्सुकतावश पूछा, फिर क्या देखेंगे। मनोज ने कहा, वे यह देखेंगे कि तुम उन्हें कितना एंटरटेन कर सकते हो। एंटरटेन,मगर किस तरह से। घबड़ाओं नहीं, वे एंटरटेन का मतलब तुम्हें समझा देगें। मनोज सोफे पर बैठते हुए बोला। और दूसरे टाइप का स्टूडेंट मिला तो। तो। समझ लो बेटा तुम्हारा ख्ौर नहीं। वे तुमसे कोर्स के सवाल करें, लेकिन तुम्हें परेशान करने के लिए। यहां तुम्हें सावधान रहने की जरूरत है। इसलिए पहले तय कर लो पहली क्लास यानी ट्रायल में तुम क्या पढ़ाओगे। हो सके तो थोड़ा स्टडी कर लो।
रात के 10 बज गये। आखिर टूयशन में शुरूआत क्या करूूं, जिससे छात्र मुझसे इंप्रेस हो जाये और ओके कर दे। जेनेटिक्स, ओके इससे ही शुरू करूंगा। बेहद इटरेस्टिंग सब्जेक्ट। एक बार इसको पलटकर देख लूं, कुछ भूल गया तो। आलमारी से बायालोजी की पुस्तक निकाली। क्रांसिंग ओवर। गुड यही पढ़ाउंगा कल। पुस्तक के पन्ने पलटते-पलटते कब नींद लग गयी पता ही नहीं चला।