Tuesday, April 7, 2009

`वोट ´ जुटाने की चुनावी तिकड़म...

जैसे जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, छोटी-मोटी वििन्न पार्टियां की गंठबंधन तो की बिखर का स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में उतर रहे हैं. इन दिनों छोटी पार्टियां बड़ी पार्टियों को मात देने के लिए सी तरह के तिकड़म िड़ा रहे हैं. क्षेत्रीय पार्टियां दो तरफा गेम खेल रही है. केंद्र की राजनीति में मुख्य दो पार्टियां ाजपा और कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय पार्टियां परेशानी पैदा कर रहे हैं. वैसे तो राजग और संप्रग को नेतृत्व देनेवाली ाजपा व कांग्रेस को उनके अपने ही चुनावी बिसात में साथ छोड़ कर चले गये हैं, जैसा कि राजग के पुराने साथी उड़ीसा में बीजेडी साथ छोड़कर अकेले ही मैदान में उतर चुके हैं. कांग्रेस के लिए उनकी अपनी सहयोगी पार्टियां कम परेशानी पैदा नहीं कर रही है. क्षेत्रीय पार्टियों इस चुनाव में ऐसा समीकरण बिठाया है कि सांप ी मर जाये और लाठी ी न टूटे. यूपीए के साथ राजद, लोजपा और सपा ने कुछ ऐसे ही प्लान किये हैं. अपने अपने क्षेत्रों में कांग्रेस को फटकने नहीं देना चाहते. मजबूरन कांग्रेस ने सी जगह अपने उम्मीदवार खड़े किये हैं. सपा की बात करें, एक तरफ वे अपने बयानों में कांग्रेस की निंदा करते हैं, तो दूसरी तरफ यूपीए के साथ अपने गंठबंधन की ावी स्थायित्व से ी इनकार नहीं करते. कांग्रेस के साथ सुनील दत्त की बेटी प्रिया दत्त पार्टी में प्रतिनिधित्व करती है, तो संजय को पार्टी में शामिल करने के लिए सपा एड़ी़ चोटी एक कर देती है. जब कोर्ट उन्हें चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं देता, तो उनको महासचिव बना दिया जाता है. कांग्रेस से नजदीकियां दिखाने के लिए सपा ने राहुल और सोनिया गांधी के खिलाफ इस बार कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं कर रही है. उधर बिहार में राजद और लोजपा कांग्रेस को बढ़ने नहीं देना चाहते. राजद और लोजपा ने साझा रणनीति के तहत सीटों का ऐसा समीकरण बिठाया कि प्रदेश कांग्रेसियों को लगा कि उन्हें इन राज्यों से पूरी तरह बेदखल करने की साजिश रची जा रही है. अंतत: कांग्रेस ने जनाधार बचाने के लिए अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव खुलकर बोल, कांग्रेस को औकात पता चल जायेगा. ाजपा और जद-यू और ाजपा के बीच सीटों के बंटवारें को लेकर सहमति बनी हुई है, लेकिन राजनीति कुछ ऐसी ही है. जद-यू राजग का सदस्य रहना चाहती है, लेकिन उसे ाजपा की कुछ नीतियों का विरोध है. वरुण गांधी मसले पर जद-यू का टोन ाजपा से अलग रहा. दरअसल, क्षेत्रीय पार्टियां यह महसूस कर रहे थे कि बड़ी पार्टियों के साथ उनका गंठबंधन होने से उनके जनाधार में इजाफा होगा, लेकिन चुनाव के दौरान जब बड़ी पार्टियों ने अधिक सीटों की डिमांड की तो इनको नागवार गुजरा. बिहार और उत्तर प्रदेश से लोकसा में 120 सीटों की साझेदारी अथाZत 25फीसदी से ज्यादा है. इसलिए इन राज्यों में सीटों को लेकर बड़ी तथा छोटी पार्टियां सी मौका नहीं गंवाना चाहते. राजद, लोजपा और सपा ले ही कांग्रेसनीत यूपीए गंठबंधन के सदस्य होने का दावा कर रहे हो, लेकिन यह गंठबंधन सरकार बनाने की स्थिति के लिए है, लेकिन चुनाव में वे कांग्रेस को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते. इसके लिए उन्होंने चौथा मंच ी बना लिया. राजनीतिज्ञ पंडितों का मानना है कि राज्यों में यदि बड़ी पार्टियों को बढ़त मिलती है, तो उनका जनाधार खत्म हो जायेगा. यही कारण है कि इन पार्टियों ने एकजुट होकर कांग्रेस को पटखनी देने की रणनीति बनायी है. उधर महाराष्ट में एनसीपी और कांग्रेस के बीच ऐसा ही समीकरण देखा जा रहा है. तीसरे मोरचे की तरफ एनसीपी नेता शरद पवार का नरम रुख कांग्रेस के लिए चिंता का सबव बना हुआ है. तीसरे मोरचे की रैली में शरद पवार के शामिल होने की बात ी चर्चा में रही, हालांकि किसी कारण शरद पवार उसमें शामिल न हो सके. लेकिन फोन पर अपना संदेश जरूर पहुंचा दिया. दरअसल, वर्ष 1999 में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी रहा, लेकिन वर्ष 2004 के लोकसा चुनाव में फिर से पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया. हालांकि सरकार बनाने के लिए उसे छोटे दलों का समर्थन लेना पड़ा. इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के जनाधार को बढ़ाना चाहती है, इसलिए उसने अधिक सीटों की डिमांड की, लेकिन बात नहीं, तो अकेले चुनाव लड़ने का मन बना लिया. चुनावी जंग में अी शह-मात का खेल जारी है, लेकिन असली गंठबंधन और सहयोग की स्थिति चुनाव परिणाम आने के बाद ही दिख पायेगा.