सफलता उम्र की मोहताज नहÈ होती. अगर इससे इत्तेफाक नहÈ रखते तो मिलिए ऐसे ही एक शख्सीयत से. इनका नाम है आदिल बंदूकवाला. ानकी उम्र 26 साल है. लेकिन ओहदा सीइओ का है. एक छोटे शहर से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन 26 साल की उम्र में एक नहÈ , बल्कि दो दो कंपनियों के मालिक है. एक वेब कंसल्टेंसी फर्म लीडिंग माइंड्स तथा दूसरा रिक्रूटमेंट एजेंसी टैलेंट ओनियंस. अपनी सफलता के बारे में वे कहते हैं कि एंटरप्रेन्योरशिप के प्रति उनका लगाव शुरू से ही रहा है और यही मेरी सफलता का राज है. मैं बेलगांव का रहनेवाला हूं. जो कि बंगलुरू और मुंबई के मध्य स्थित है. स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद मैं कैट की परीक्षा में बैठा और इसके जरिये मुझे सिंबायोसिस के सेंटर फॉर मैनेजेंट एंड हयूमन रिसोर्स डेवलेपमेंट में दाखिला मिल गया, जहां मैंने एंटरप्रेन्योरशिप की पढ़ाई की. पहले वर्ष के तीन महीने में हम सी जिन्होंने इस विषय का चयन किया था, एक ी कक्षा में शामिल नहÈ हो पाये, क्योंकि इस विषय में कोई पढ़ाई नहÈ होती थी. इस बारे में हमने डीन से शिकायत की, तो हमें डीन ने कहा कि इस विषय में पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक ही मौजूद नहÈ है और सी छात्रों को दूसरे विषय में ट्रांसफर कर दिया जायेगा. उनके जवाब से हम सहमत नहÈ थे. आदिल ने दूसरे संस्थान का चयन कर लिया और वहां का वह टॉपर छात्र निकला. व्यवसाय संघर्ष एंटरप्रेन्योरशिप मेरे रक्त में है. मेरे पिताजी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी चलाते हैं और जब मैंने अपना कोर्स पूरा किया, तो मेरे लिये यह उचित था कि मैं अपना स्वयं का व्यवसाय शुरू करूं. इसलिए 2005 में मैंने अपने पिता से लोन लेकर लीडिंग माइंड नाम की एचआर फर्म की शुरुआत की. उसके बाद एजुकेशन कंसल्टेंसी की शुरुआत की, जिसे वेब एजेंसी में तब्दील कर दिया. इसके लिए मुझे अपने पिता से लोन लेना पडा, क्योंकि सरकारी बैंक ने लोन देने से इनकार कर दिया था. इस मामले में मैं ाग्यशाली हूं कि मेरा परिवार मुझे हमेशा सहयोग देता रहा. हालांकि मेरे पिताजी मुझे अपने व्यवसाय में शामिल होने को कहते रहे, लेकिन मैं उन्हें कुछ नया करने के लिए पांच साल का वक्त मांगता रहा. मेरा एक छोटा ाई जो कि पारिवारिक व्यवसाय से जुडा था, इसलिए मैं उसे पिता के व्यवसाय में लगाने का इच्छुक था. जब लीडिंग माइंड की शुरुआत हुई, तो ऐसा प्रतीत होता था कि यह एमबीए का कोचिंग इंस्टीट्यूट है. इसमें छात्रों को काउंसलिंग कोर्स की ट्रेनिंग और टेस्ट की सुविधा प्रदान की जाती थी. मैं तुरंत ही इस बात को समझ गया कि कंपनी की आमदनी वेबसाइट के निर्माण से अधिक हो रही है और धीरे-धीरे हमने इसे वेब कंसल्टेंसी फर्म में तब्दील कर दिया. दो साल बाद 2007 में बीपीओ जेनपैक्ट के वाइस प्रेसिडेंट से मेरी मुलाकात हुई और मैंने उनसे निवेदन किया कि वे अपनी कंपनी में कर्मचारियों के चयन के लिए हमारी कंसल्टेंसी फर्म की मदद करें. मैंने इसके बाद रिकू्रटमेंट एजेंसी में अवसरों को देखते हुए इस ओर ी ध्यान देना शुरू किया. एक साल में ही हमारे जरिये लगग दो सौ लोगों को नौकरी मिल गयी. हमारी कंपनी का एक ही क्लाइंट जेनपैक्ट था. शुरुआत काफी कठिन था, लोग हमें उतनी गंीरता से नहÈ लेते थे, क्योंकि हमारी कंपनी बेलगाम में थी, न कि मुंबई या दिल्ली में. मेरी उम्र ी केवल 22 साल थी. इसलिए अधिकांश व्यक्तियों को हमारे ऊपर विश्वास नहÈ होता था. इसके बाद हम अंबुजा सीमेंट और सीमैंस को ी अपनी सेवा देने लगे. और आज लगग 13 कंपनियां हमारी सेवाएं ले रही हैं. कुछ लोगों ने मुझमें विश्वास जताया, जबकि कुछ ने आलोचना की. लेकिन मैं सी का श्ुाक्रिया अदा करता हूं , क्योंकि इन बातों से मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला, जो मेरी कामयाबी में मददगार बना. आज लगग 13 कंपनियां हमारी सेवाएं ले रही हैं. कुछ लोगों ने मुझमें विश्वास जताया, जबकि कुछ ने आलोचना की. लेकिन मैं सी का श्ुाकि`या अदा करता हूं , क्योंकि इन बातों से मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला, जो मेरी कामयाबी में मददगार बना. दो कंपनियों को सीइओ बनने के बाद ी मैं रूका नहÈ. मैं किताबें पढने लगा और पीएचडी में दाखिला ी ले लिया. इस कोर्स के दौरान ी मुझे काफी कुछ सीखने का मौका मिला. मैं लिखने का शौकीन हूं, लेकिन आपको पहचान तब तक नहÈ मिल सकती,जबतक आपके पास पीएचडी की डिग`ी नहÈ हो. विष्य में मेरी इच्छा मैकिंटॉस कंपनी के लिए सॉफ्टवेयर बनाने की है. ारत में बहुत कम ही लोगों को इस कंपनी के बारे में मालूम हैं. विष्य में मेरी योजना टैलेंट ओनियंस को देश के वििé शहरों में स्थापित करने की है. अधिकांश युवा बिजनेसमैन की तरह मैं मुंबई और दिल्ली में रहने के बजाय अपने शहर में ही रहना पसंद करता हूं. मैं अपने छोटे शहर को बहुत प्यार करता हूं. जो सफल बिजनेस मैन बनना चाहते हैं, उनके बारे में मैं यही कहना चाहूंगा कि स्कूल में हमें सिखाया जाता है कि हारना कोई बुरी बात नहÈ, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि हर कोई जीतने के लिए खेलता है और सी को केवल जीतने के ही उद्देश्य से काम करना चाहिए. अधिकांश लोग छह महीने में ही व्यापार से मुनाफा कमाने की सोचने लगते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि कोई ी व्यापार शुरुआती दौर में मुनाफा नहÈ दे सकता है. इसके लिए धैर्य रखने की जरूरत है. अपने सपने में विश्वास कीजिए, काम करते रहिए, सफलता जरूर मिलेगी.
Thursday, May 21, 2009
छोटी उम्र में बड़ी सफलता
सफलता उम्र की मोहताज नहÈ होती. अगर इससे इत्तेफाक नहÈ रखते तो मिलिए ऐसे ही एक शख्सीयत से. इनका नाम है आदिल बंदूकवाला. ानकी उम्र 26 साल है. लेकिन ओहदा सीइओ का है. एक छोटे शहर से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन 26 साल की उम्र में एक नहÈ , बल्कि दो दो कंपनियों के मालिक है. एक वेब कंसल्टेंसी फर्म लीडिंग माइंड्स तथा दूसरा रिक्रूटमेंट एजेंसी टैलेंट ओनियंस. अपनी सफलता के बारे में वे कहते हैं कि एंटरप्रेन्योरशिप के प्रति उनका लगाव शुरू से ही रहा है और यही मेरी सफलता का राज है. मैं बेलगांव का रहनेवाला हूं. जो कि बंगलुरू और मुंबई के मध्य स्थित है. स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद मैं कैट की परीक्षा में बैठा और इसके जरिये मुझे सिंबायोसिस के सेंटर फॉर मैनेजेंट एंड हयूमन रिसोर्स डेवलेपमेंट में दाखिला मिल गया, जहां मैंने एंटरप्रेन्योरशिप की पढ़ाई की. पहले वर्ष के तीन महीने में हम सी जिन्होंने इस विषय का चयन किया था, एक ी कक्षा में शामिल नहÈ हो पाये, क्योंकि इस विषय में कोई पढ़ाई नहÈ होती थी. इस बारे में हमने डीन से शिकायत की, तो हमें डीन ने कहा कि इस विषय में पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक ही मौजूद नहÈ है और सी छात्रों को दूसरे विषय में ट्रांसफर कर दिया जायेगा. उनके जवाब से हम सहमत नहÈ थे. आदिल ने दूसरे संस्थान का चयन कर लिया और वहां का वह टॉपर छात्र निकला. व्यवसाय संघर्ष एंटरप्रेन्योरशिप मेरे रक्त में है. मेरे पिताजी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी चलाते हैं और जब मैंने अपना कोर्स पूरा किया, तो मेरे लिये यह उचित था कि मैं अपना स्वयं का व्यवसाय शुरू करूं. इसलिए 2005 में मैंने अपने पिता से लोन लेकर लीडिंग माइंड नाम की एचआर फर्म की शुरुआत की. उसके बाद एजुकेशन कंसल्टेंसी की शुरुआत की, जिसे वेब एजेंसी में तब्दील कर दिया. इसके लिए मुझे अपने पिता से लोन लेना पडा, क्योंकि सरकारी बैंक ने लोन देने से इनकार कर दिया था. इस मामले में मैं ाग्यशाली हूं कि मेरा परिवार मुझे हमेशा सहयोग देता रहा. हालांकि मेरे पिताजी मुझे अपने व्यवसाय में शामिल होने को कहते रहे, लेकिन मैं उन्हें कुछ नया करने के लिए पांच साल का वक्त मांगता रहा. मेरा एक छोटा ाई जो कि पारिवारिक व्यवसाय से जुडा था, इसलिए मैं उसे पिता के व्यवसाय में लगाने का इच्छुक था. जब लीडिंग माइंड की शुरुआत हुई, तो ऐसा प्रतीत होता था कि यह एमबीए का कोचिंग इंस्टीट्यूट है. इसमें छात्रों को काउंसलिंग कोर्स की ट्रेनिंग और टेस्ट की सुविधा प्रदान की जाती थी. मैं तुरंत ही इस बात को समझ गया कि कंपनी की आमदनी वेबसाइट के निर्माण से अधिक हो रही है और धीरे-धीरे हमने इसे वेब कंसल्टेंसी फर्म में तब्दील कर दिया. दो साल बाद 2007 में बीपीओ जेनपैक्ट के वाइस प्रेसिडेंट से मेरी मुलाकात हुई और मैंने उनसे निवेदन किया कि वे अपनी कंपनी में कर्मचारियों के चयन के लिए हमारी कंसल्टेंसी फर्म की मदद करें. मैंने इसके बाद रिकू्रटमेंट एजेंसी में अवसरों को देखते हुए इस ओर ी ध्यान देना शुरू किया. एक साल में ही हमारे जरिये लगग दो सौ लोगों को नौकरी मिल गयी. हमारी कंपनी का एक ही क्लाइंट जेनपैक्ट था. शुरुआत काफी कठिन था, लोग हमें उतनी गंीरता से नहÈ लेते थे, क्योंकि हमारी कंपनी बेलगाम में थी, न कि मुंबई या दिल्ली में. मेरी उम्र ी केवल 22 साल थी. इसलिए अधिकांश व्यक्तियों को हमारे ऊपर विश्वास नहÈ होता था. इसके बाद हम अंबुजा सीमेंट और सीमैंस को ी अपनी सेवा देने लगे. और आज लगग 13 कंपनियां हमारी सेवाएं ले रही हैं. कुछ लोगों ने मुझमें विश्वास जताया, जबकि कुछ ने आलोचना की. लेकिन मैं सी का श्ुाक्रिया अदा करता हूं , क्योंकि इन बातों से मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला, जो मेरी कामयाबी में मददगार बना. आज लगग 13 कंपनियां हमारी सेवाएं ले रही हैं. कुछ लोगों ने मुझमें विश्वास जताया, जबकि कुछ ने आलोचना की. लेकिन मैं सी का श्ुाकि`या अदा करता हूं , क्योंकि इन बातों से मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला, जो मेरी कामयाबी में मददगार बना. दो कंपनियों को सीइओ बनने के बाद ी मैं रूका नहÈ. मैं किताबें पढने लगा और पीएचडी में दाखिला ी ले लिया. इस कोर्स के दौरान ी मुझे काफी कुछ सीखने का मौका मिला. मैं लिखने का शौकीन हूं, लेकिन आपको पहचान तब तक नहÈ मिल सकती,जबतक आपके पास पीएचडी की डिग`ी नहÈ हो. विष्य में मेरी इच्छा मैकिंटॉस कंपनी के लिए सॉफ्टवेयर बनाने की है. ारत में बहुत कम ही लोगों को इस कंपनी के बारे में मालूम हैं. विष्य में मेरी योजना टैलेंट ओनियंस को देश के वििé शहरों में स्थापित करने की है. अधिकांश युवा बिजनेसमैन की तरह मैं मुंबई और दिल्ली में रहने के बजाय अपने शहर में ही रहना पसंद करता हूं. मैं अपने छोटे शहर को बहुत प्यार करता हूं. जो सफल बिजनेस मैन बनना चाहते हैं, उनके बारे में मैं यही कहना चाहूंगा कि स्कूल में हमें सिखाया जाता है कि हारना कोई बुरी बात नहÈ, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि हर कोई जीतने के लिए खेलता है और सी को केवल जीतने के ही उद्देश्य से काम करना चाहिए. अधिकांश लोग छह महीने में ही व्यापार से मुनाफा कमाने की सोचने लगते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि कोई ी व्यापार शुरुआती दौर में मुनाफा नहÈ दे सकता है. इसके लिए धैर्य रखने की जरूरत है. अपने सपने में विश्वास कीजिए, काम करते रहिए, सफलता जरूर मिलेगी.
Thursday, April 16, 2009
ना भूलनेवाली बात-४
टि्रंग, टि्रंग। मोबाइल की घंटी अचानक बज उठी। कौन हो सकता है। अखबार में छपे इश्तहार को पढ़ते हुए मैंने फोन उठाया। मिस्टर संजय-उधर से आवाज आयी। हां, बोल रहा हूं, आप कौन, मैंने सवाल किया। जी, मैं अरोड़ा बोल रहा हूं, परफेक्ट ट्यूशन ब्यूरो से।
हां, हां बोलिये, मैं आप ही के फोन का इंतजार कर रहा था। मैंने उत्सुकता से जवाब दिया। जी, आपके लिए एक ट्यूशन का ऑफर है। एक लड़की है। नौंवी क्लास की स्टूडेंट है। कल सुबह ट्रायल के लिए आपको जाना पड़ेगा।
मगर अरोड़ा साहब ट्रायल किस बात का। मैंने पूछा। देखिए यहां का नियम है। ट्यूशन के लिए छात्र अपनी च्वाइस के हिसाब से टीचर का चुनाव करते हैंं। अगर उन्हें आप पसंद आये, तो वे हमें हां कह देंगे। फिर आप कंटीन्यू कर सकते हैं। अरोड़ा ने समझाते हुए कहा आप इसको लेकर चिंता न करे। आपमें प्रतिभा है, आप आसानी से हैंडल कर लेंगे। अब आप एड्रेस नोट कर लें। आपको वहां दस बजे पहुंचना है। याद रखें। आप वहां दस बजे ही पहुंचेंगे। जी, इसका ख्याल रखूंगा। मिस्टर पी सचदेवा, सीडी ब्लॉक, 47, रोहिणी सेक्टर-8। ओके संजय जी। बेस्ट ऑफ लक। ओके। अरोड़ा ने फोन काट दिया।
अजीब है अब मुझे भी ट्रायल देना पड़ेगा। अखबार के पन्नों में नौकरी के इश्तहार पर नजर डालते हुए मन में ख्याल आ रहा था। यूनिवर्सिटी में साइंस विषय में भले ही मैंने टॉप नहींं की है, लेकिन क्या हुआ। इस विषय में अपने बैच में सबसे तेज मैं ही था। होठों पर मुस्कान के साथ मन में डर भी था। पता नहीं क्या पूछेगा। अगर उसने ओके नहीं किया तो परफेक्ट टयूशन ब्यूरो में रजिस्ट्रेशन के लिए दिये पांच सौ रूपये भी नहीं लौटेंगे।
मुजफ्फरपुर से दिल्ली आया था एक बेहतर भविश्य संवारने के ख्याल से। राजधानी दिल्ली शिक्षा का हब है। यही सोचकर ट्रेन पकड़ा था। लेकिन यहां आते ही जीवन उन सच्चाईयों से रूबररू हुआ, जिसे संघशZ की जिंदगी कहते है। महानगरीय जीवन चर्या में सबकुछ दौड़ता भागता हुआ पाया। जिस व्यक्ति के पास आकर ठहरा। उसने सलाह दी। यहां कुछ भी करने से पहले अपने हाथ इतने मजबूत कर लो, कि भूखा न सहना पडे़। किसी के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है छोटे-मोटे पार्ट टाइम जॉब कर लो। ‘ ‘
‘शायद पहले दिन इसलिए यह बात मेरी समझ में नहीं आयी, क्योंकि धर से आते वक्त मेरे पास पर्याप्त पैसे थे। तकरीबन दो हजार रूपये लेकर दिल्ली आया था। हमारे साथ के लोगों ने सलाह दी दिल्ली यूनिवर्सिटी जाकर पता करें। कौन-कौन से कोर्स है। पहले दिल्ली के संस्थानों में जाकर अच्छी तरह पता कर ले। फिर क्या करना है, किसमें एडमिशन लेना है, यह तय कीजिये। दो हजार की राशि में पांच सौ रूप्ये तो ट्रेन के किराये और छोटे-मोटे चीजों में खर्च हो गये थै।
ख्ौर, धर से निकलते ही बस स्टैंड पर पहुंचा। लोगों से पूछा दिल्ली विश्वविद्यालय कहां है। एक मुसाफिर जो किसी बस के इंतजार में खड़ा था। उसने कहां नये आये हो। हां। मेरा जवाब सुनकर उसने मुस्कुरा दिया। उसने कहा मुद्रिका रूट की बस ले लो। दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंच जाओगे। बस में मैं बैठ गया। पूरी दिल्ली का एक चक्कर लगा गया, लेकिन मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के दशZन नहीं हुए। यहां मैं धोखा खा गया। हमारे यहां बिहार में बस सफर करते समय आने वाले जगह की जानकारी कंडक्टर मिनट मिनट पर देता रहता है। लेकिन यहां तो कंडक्टर बड़े मजे से कुर्सी पर बैठा टिकट काट रहा था। उसने एक बार भी आवाज लगाना मुनासिब नहीं समझा। पास बैठै एक यात्री से मैंने पूछा भाई साहब, दिल्ली विश्वविद्यालय यहां से कितना दूर होगा। उसने पूछा, आपने बस कहां से ली है। मैंने कहा, जी शालीमार बाग में चढ़ा था। उसने कहां आप बहुत आगे निकल चुके हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय तो पीछे छूट गया। कोई बात नहीं, आप यहां उतर कर, दूसरी मुद्रिका निगेटिव साइन वाली पकड़ कर लौट जाये। और याद रखें यहां कंडक्टर आवाज नहीं लगाता, आपको खुद ध्यान रखना होगा, तभी आप सही जगह उतर पायेंगे। अनजान शहर में इस तरह दिनभर घूमता रहा। मेरे पास कुल जमा कुल 800 रूपये बच गये थे। इतनी जल्दी सारे पैसे खर्च हो जायेंगे मैंने सोचा नहीं था। मनोज, जिसके पास मैं ठहरा था, उसने मुझे सलाह दी। दोस्त ऐसा ही होता है। पहले मैं भी जब यहां आया था, ऐसे ही कुछ सपने थे हमारे साथ। लेकिन हालात ऐसा बना कि अपने खर्च चलाने के लिए टयूशन करना पड़ा। उसने सलाह दी, क्यों नहीं तुम टयूशन कर लेते हो। यहां साइंस के टयूटर की बड़ी डिमांड है। अब तो मेरी भी इच्छा थी किसी तरह टयूशन मिल जाये, ताकि कुछ आय के स्रोत तो हो। परफेक्ट टयूशन ब्यूरो। संजय, इसी ने मुझे पहली बार टयूशन दिलाया था। मैं यहां तुम्हारा रजिस्ट्रेशन करा देता हूं। 500 रूपये लगेंगे। कोई ऑफर आता है, तो तुम्हें इनफॉर्म कर देंगे। ठीक है, जेब से 500 रूपये निकालकर मनोज के हाथों में देते हुए कहा फिर तो आज ही रजिस्ट्रेशन करवा दो। और आज उसका ऑफर मुझे आया है।
क्या सोच रहे हो? मनोज की आवाज सुनते ही जैसे मेरा ध्यान टूटा। अरे मनोज तुम कुछ नहीं यार। हां, परफेक्ट टूशन ब्यूरो से मिस्टर अरोड़ा का फोन आया था। वाह, तो तुझे टयूशन मिल ही गया। मनोज ने बधाई देते हुए कहा। लेकिन यार तुमने मुझे यह नहीं बताय कि टयूशन के लिए स्टूडेंट पहले ट्रायल क्लास लेते हैं। अच्छा तो तुझे ट्रायल के उसने बोला है। मनोज ने सोचते हुए कहा, यहां कुछ ऐसा ही है। उसने मुझे समझाया कि टयूशन में ट्रायल का मतलब क्या होता है। दरअसल, हां ज्ञान के साथ-साथ चेहरा और आपका स्मार्टनेस बिकता है। मैं समझा नहीं, मनोज की बातें मेरे पल्ले नहीं पड़ी। इसे यों समझों, स्टूडेंट दो प्रकार के होते हैं। एक जो पढ़ाई में अव्वल होते हैं, दूसरे वे जो पढ़ाई में सिफर। यदि तुम्हारा पाला पहले वाले स्टूडेंट से होता है, तो वह तुझमें यह नहीं देखेंगे कि तुम्हें क्या आता है क्या नही। मैंने उत्सुकतावश पूछा, फिर क्या देखेंगे। मनोज ने कहा, वे यह देखेंगे कि तुम उन्हें कितना एंटरटेन कर सकते हो। एंटरटेन,मगर किस तरह से। घबड़ाओं नहीं, वे एंटरटेन का मतलब तुम्हें समझा देगें। मनोज सोफे पर बैठते हुए बोला। और दूसरे टाइप का स्टूडेंट मिला तो। तो। समझ लो बेटा तुम्हारा ख्ौर नहीं। वे तुमसे कोर्स के सवाल करें, लेकिन तुम्हें परेशान करने के लिए। यहां तुम्हें सावधान रहने की जरूरत है। इसलिए पहले तय कर लो पहली क्लास यानी ट्रायल में तुम क्या पढ़ाओगे। हो सके तो थोड़ा स्टडी कर लो।
रात के 10 बज गये। आखिर टूयशन में शुरूआत क्या करूूं, जिससे छात्र मुझसे इंप्रेस हो जाये और ओके कर दे। जेनेटिक्स, ओके इससे ही शुरू करूंगा। बेहद इटरेस्टिंग सब्जेक्ट। एक बार इसको पलटकर देख लूं, कुछ भूल गया तो। आलमारी से बायालोजी की पुस्तक निकाली। क्रांसिंग ओवर। गुड यही पढ़ाउंगा कल। पुस्तक के पन्ने पलटते-पलटते कब नींद लग गयी पता ही नहीं चला।
हां, हां बोलिये, मैं आप ही के फोन का इंतजार कर रहा था। मैंने उत्सुकता से जवाब दिया। जी, आपके लिए एक ट्यूशन का ऑफर है। एक लड़की है। नौंवी क्लास की स्टूडेंट है। कल सुबह ट्रायल के लिए आपको जाना पड़ेगा।
मगर अरोड़ा साहब ट्रायल किस बात का। मैंने पूछा। देखिए यहां का नियम है। ट्यूशन के लिए छात्र अपनी च्वाइस के हिसाब से टीचर का चुनाव करते हैंं। अगर उन्हें आप पसंद आये, तो वे हमें हां कह देंगे। फिर आप कंटीन्यू कर सकते हैं। अरोड़ा ने समझाते हुए कहा आप इसको लेकर चिंता न करे। आपमें प्रतिभा है, आप आसानी से हैंडल कर लेंगे। अब आप एड्रेस नोट कर लें। आपको वहां दस बजे पहुंचना है। याद रखें। आप वहां दस बजे ही पहुंचेंगे। जी, इसका ख्याल रखूंगा। मिस्टर पी सचदेवा, सीडी ब्लॉक, 47, रोहिणी सेक्टर-8। ओके संजय जी। बेस्ट ऑफ लक। ओके। अरोड़ा ने फोन काट दिया।
अजीब है अब मुझे भी ट्रायल देना पड़ेगा। अखबार के पन्नों में नौकरी के इश्तहार पर नजर डालते हुए मन में ख्याल आ रहा था। यूनिवर्सिटी में साइंस विषय में भले ही मैंने टॉप नहींं की है, लेकिन क्या हुआ। इस विषय में अपने बैच में सबसे तेज मैं ही था। होठों पर मुस्कान के साथ मन में डर भी था। पता नहीं क्या पूछेगा। अगर उसने ओके नहीं किया तो परफेक्ट टयूशन ब्यूरो में रजिस्ट्रेशन के लिए दिये पांच सौ रूपये भी नहीं लौटेंगे।
मुजफ्फरपुर से दिल्ली आया था एक बेहतर भविश्य संवारने के ख्याल से। राजधानी दिल्ली शिक्षा का हब है। यही सोचकर ट्रेन पकड़ा था। लेकिन यहां आते ही जीवन उन सच्चाईयों से रूबररू हुआ, जिसे संघशZ की जिंदगी कहते है। महानगरीय जीवन चर्या में सबकुछ दौड़ता भागता हुआ पाया। जिस व्यक्ति के पास आकर ठहरा। उसने सलाह दी। यहां कुछ भी करने से पहले अपने हाथ इतने मजबूत कर लो, कि भूखा न सहना पडे़। किसी के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है छोटे-मोटे पार्ट टाइम जॉब कर लो। ‘ ‘
‘शायद पहले दिन इसलिए यह बात मेरी समझ में नहीं आयी, क्योंकि धर से आते वक्त मेरे पास पर्याप्त पैसे थे। तकरीबन दो हजार रूपये लेकर दिल्ली आया था। हमारे साथ के लोगों ने सलाह दी दिल्ली यूनिवर्सिटी जाकर पता करें। कौन-कौन से कोर्स है। पहले दिल्ली के संस्थानों में जाकर अच्छी तरह पता कर ले। फिर क्या करना है, किसमें एडमिशन लेना है, यह तय कीजिये। दो हजार की राशि में पांच सौ रूप्ये तो ट्रेन के किराये और छोटे-मोटे चीजों में खर्च हो गये थै।
ख्ौर, धर से निकलते ही बस स्टैंड पर पहुंचा। लोगों से पूछा दिल्ली विश्वविद्यालय कहां है। एक मुसाफिर जो किसी बस के इंतजार में खड़ा था। उसने कहां नये आये हो। हां। मेरा जवाब सुनकर उसने मुस्कुरा दिया। उसने कहा मुद्रिका रूट की बस ले लो। दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंच जाओगे। बस में मैं बैठ गया। पूरी दिल्ली का एक चक्कर लगा गया, लेकिन मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के दशZन नहीं हुए। यहां मैं धोखा खा गया। हमारे यहां बिहार में बस सफर करते समय आने वाले जगह की जानकारी कंडक्टर मिनट मिनट पर देता रहता है। लेकिन यहां तो कंडक्टर बड़े मजे से कुर्सी पर बैठा टिकट काट रहा था। उसने एक बार भी आवाज लगाना मुनासिब नहीं समझा। पास बैठै एक यात्री से मैंने पूछा भाई साहब, दिल्ली विश्वविद्यालय यहां से कितना दूर होगा। उसने पूछा, आपने बस कहां से ली है। मैंने कहा, जी शालीमार बाग में चढ़ा था। उसने कहां आप बहुत आगे निकल चुके हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय तो पीछे छूट गया। कोई बात नहीं, आप यहां उतर कर, दूसरी मुद्रिका निगेटिव साइन वाली पकड़ कर लौट जाये। और याद रखें यहां कंडक्टर आवाज नहीं लगाता, आपको खुद ध्यान रखना होगा, तभी आप सही जगह उतर पायेंगे। अनजान शहर में इस तरह दिनभर घूमता रहा। मेरे पास कुल जमा कुल 800 रूपये बच गये थे। इतनी जल्दी सारे पैसे खर्च हो जायेंगे मैंने सोचा नहीं था। मनोज, जिसके पास मैं ठहरा था, उसने मुझे सलाह दी। दोस्त ऐसा ही होता है। पहले मैं भी जब यहां आया था, ऐसे ही कुछ सपने थे हमारे साथ। लेकिन हालात ऐसा बना कि अपने खर्च चलाने के लिए टयूशन करना पड़ा। उसने सलाह दी, क्यों नहीं तुम टयूशन कर लेते हो। यहां साइंस के टयूटर की बड़ी डिमांड है। अब तो मेरी भी इच्छा थी किसी तरह टयूशन मिल जाये, ताकि कुछ आय के स्रोत तो हो। परफेक्ट टयूशन ब्यूरो। संजय, इसी ने मुझे पहली बार टयूशन दिलाया था। मैं यहां तुम्हारा रजिस्ट्रेशन करा देता हूं। 500 रूपये लगेंगे। कोई ऑफर आता है, तो तुम्हें इनफॉर्म कर देंगे। ठीक है, जेब से 500 रूपये निकालकर मनोज के हाथों में देते हुए कहा फिर तो आज ही रजिस्ट्रेशन करवा दो। और आज उसका ऑफर मुझे आया है।
क्या सोच रहे हो? मनोज की आवाज सुनते ही जैसे मेरा ध्यान टूटा। अरे मनोज तुम कुछ नहीं यार। हां, परफेक्ट टूशन ब्यूरो से मिस्टर अरोड़ा का फोन आया था। वाह, तो तुझे टयूशन मिल ही गया। मनोज ने बधाई देते हुए कहा। लेकिन यार तुमने मुझे यह नहीं बताय कि टयूशन के लिए स्टूडेंट पहले ट्रायल क्लास लेते हैं। अच्छा तो तुझे ट्रायल के उसने बोला है। मनोज ने सोचते हुए कहा, यहां कुछ ऐसा ही है। उसने मुझे समझाया कि टयूशन में ट्रायल का मतलब क्या होता है। दरअसल, हां ज्ञान के साथ-साथ चेहरा और आपका स्मार्टनेस बिकता है। मैं समझा नहीं, मनोज की बातें मेरे पल्ले नहीं पड़ी। इसे यों समझों, स्टूडेंट दो प्रकार के होते हैं। एक जो पढ़ाई में अव्वल होते हैं, दूसरे वे जो पढ़ाई में सिफर। यदि तुम्हारा पाला पहले वाले स्टूडेंट से होता है, तो वह तुझमें यह नहीं देखेंगे कि तुम्हें क्या आता है क्या नही। मैंने उत्सुकतावश पूछा, फिर क्या देखेंगे। मनोज ने कहा, वे यह देखेंगे कि तुम उन्हें कितना एंटरटेन कर सकते हो। एंटरटेन,मगर किस तरह से। घबड़ाओं नहीं, वे एंटरटेन का मतलब तुम्हें समझा देगें। मनोज सोफे पर बैठते हुए बोला। और दूसरे टाइप का स्टूडेंट मिला तो। तो। समझ लो बेटा तुम्हारा ख्ौर नहीं। वे तुमसे कोर्स के सवाल करें, लेकिन तुम्हें परेशान करने के लिए। यहां तुम्हें सावधान रहने की जरूरत है। इसलिए पहले तय कर लो पहली क्लास यानी ट्रायल में तुम क्या पढ़ाओगे। हो सके तो थोड़ा स्टडी कर लो।
रात के 10 बज गये। आखिर टूयशन में शुरूआत क्या करूूं, जिससे छात्र मुझसे इंप्रेस हो जाये और ओके कर दे। जेनेटिक्स, ओके इससे ही शुरू करूंगा। बेहद इटरेस्टिंग सब्जेक्ट। एक बार इसको पलटकर देख लूं, कुछ भूल गया तो। आलमारी से बायालोजी की पुस्तक निकाली। क्रांसिंग ओवर। गुड यही पढ़ाउंगा कल। पुस्तक के पन्ने पलटते-पलटते कब नींद लग गयी पता ही नहीं चला।
ना भूलनेवाली बात-३
पिछले पोस्ट में अपने पढ़ा कि कैसे मै मुज़फ्फरपुर से आकर यहाँ पत्रकारिता में प्रवेश लिया. प्रवेश के साथ ही दिल्ली मै दोहरी जिन्दगी जीने लगा. एक युनिवेर्सिटी का तो दूसरा दूसरा दिल्ली में रहने के लिए के लिए आर्थिक संघर्षो का. दोनों ही जिन्दगी मै साथ साथ जी रहा था इसलिए दोनों साथ साथ लिखना ठीक रहेगा. प्रवेश के बाद पहला लक्ष्य था किसी तरह पार्ट टाइम जॉब पाने का....आगे की कहानी अगले पोस्ट में...
Friday, April 10, 2009
ना भूलने वाली बात-2
पत्रकारिया के पेशे में आने से पहले जिन्दगी के तमाम रंग हमने देखे है. लेकिन कभी उसे शब्दों में उसे नहीं बाँधा । कुछ अपने अनुभवों को शब्दों में ढाल कर प्रसिद्धि पा लेते है. लेकिन मेरा ऐसा मकसद नहीं है. मैंने अपने एक पोस्ट में ना भूलने वाली बात में छोटा सा अनुभव लिखा था जिसे अपलोगो ने पढ़ा और सराहा. हालाँकि मेरा दिल्ली में यह शुरूआती अनुभव था । अबतक के हालत को शब्दों में ढाले तो कई छोटी कहानिया बन जायेगी. लेकिन एक बात तय है महानगरो में आकर अपने सपने को सच बनाने की तमन्ना रखने वाले या फिर उन अभिभावकों के लिए जो अपने बच्चों को कुछ बनाने के लिए यहाँ भेजते है उनके लिए, ऑंखें खोलने वाली चीज जरुर होगी . अगली पोस्ट में आप जैसे लोगो के लिए मै अपने अनुभव को शेयर करूँगा. लेकिन इसे सिर्फ पढेंगे कही प्रकाशित नहीं करेंगे, यह निवेदन है. क्योंकि सच बहुत कड़वा होता है. और मैं भी अपने अतीत को छुपाना चाहता हूँ ।
Tuesday, April 7, 2009
`वोट ´ जुटाने की चुनावी तिकड़म...
जैसे जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, छोटी-मोटी वििन्न पार्टियां की गंठबंधन तो की बिखर का स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में उतर रहे हैं. इन दिनों छोटी पार्टियां बड़ी पार्टियों को मात देने के लिए सी तरह के तिकड़म िड़ा रहे हैं. क्षेत्रीय पार्टियां दो तरफा गेम खेल रही है. केंद्र की राजनीति में मुख्य दो पार्टियां ाजपा और कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय पार्टियां परेशानी पैदा कर रहे हैं. वैसे तो राजग और संप्रग को नेतृत्व देनेवाली ाजपा व कांग्रेस को उनके अपने ही चुनावी बिसात में साथ छोड़ कर चले गये हैं, जैसा कि राजग के पुराने साथी उड़ीसा में बीजेडी साथ छोड़कर अकेले ही मैदान में उतर चुके हैं. कांग्रेस के लिए उनकी अपनी सहयोगी पार्टियां कम परेशानी पैदा नहीं कर रही है. क्षेत्रीय पार्टियों इस चुनाव में ऐसा समीकरण बिठाया है कि सांप ी मर जाये और लाठी ी न टूटे. यूपीए के साथ राजद, लोजपा और सपा ने कुछ ऐसे ही प्लान किये हैं. अपने अपने क्षेत्रों में कांग्रेस को फटकने नहीं देना चाहते. मजबूरन कांग्रेस ने सी जगह अपने उम्मीदवार खड़े किये हैं. सपा की बात करें, एक तरफ वे अपने बयानों में कांग्रेस की निंदा करते हैं, तो दूसरी तरफ यूपीए के साथ अपने गंठबंधन की ावी स्थायित्व से ी इनकार नहीं करते. कांग्रेस के साथ सुनील दत्त की बेटी प्रिया दत्त पार्टी में प्रतिनिधित्व करती है, तो संजय को पार्टी में शामिल करने के लिए सपा एड़ी़ चोटी एक कर देती है. जब कोर्ट उन्हें चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं देता, तो उनको महासचिव बना दिया जाता है. कांग्रेस से नजदीकियां दिखाने के लिए सपा ने राहुल और सोनिया गांधी के खिलाफ इस बार कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं कर रही है. उधर बिहार में राजद और लोजपा कांग्रेस को बढ़ने नहीं देना चाहते. राजद और लोजपा ने साझा रणनीति के तहत सीटों का ऐसा समीकरण बिठाया कि प्रदेश कांग्रेसियों को लगा कि उन्हें इन राज्यों से पूरी तरह बेदखल करने की साजिश रची जा रही है. अंतत: कांग्रेस ने जनाधार बचाने के लिए अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव खुलकर बोल, कांग्रेस को औकात पता चल जायेगा. ाजपा और जद-यू और ाजपा के बीच सीटों के बंटवारें को लेकर सहमति बनी हुई है, लेकिन राजनीति कुछ ऐसी ही है. जद-यू राजग का सदस्य रहना चाहती है, लेकिन उसे ाजपा की कुछ नीतियों का विरोध है. वरुण गांधी मसले पर जद-यू का टोन ाजपा से अलग रहा. दरअसल, क्षेत्रीय पार्टियां यह महसूस कर रहे थे कि बड़ी पार्टियों के साथ उनका गंठबंधन होने से उनके जनाधार में इजाफा होगा, लेकिन चुनाव के दौरान जब बड़ी पार्टियों ने अधिक सीटों की डिमांड की तो इनको नागवार गुजरा. बिहार और उत्तर प्रदेश से लोकसा में 120 सीटों की साझेदारी अथाZत 25फीसदी से ज्यादा है. इसलिए इन राज्यों में सीटों को लेकर बड़ी तथा छोटी पार्टियां सी मौका नहीं गंवाना चाहते. राजद, लोजपा और सपा ले ही कांग्रेसनीत यूपीए गंठबंधन के सदस्य होने का दावा कर रहे हो, लेकिन यह गंठबंधन सरकार बनाने की स्थिति के लिए है, लेकिन चुनाव में वे कांग्रेस को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते. इसके लिए उन्होंने चौथा मंच ी बना लिया. राजनीतिज्ञ पंडितों का मानना है कि राज्यों में यदि बड़ी पार्टियों को बढ़त मिलती है, तो उनका जनाधार खत्म हो जायेगा. यही कारण है कि इन पार्टियों ने एकजुट होकर कांग्रेस को पटखनी देने की रणनीति बनायी है. उधर महाराष्ट में एनसीपी और कांग्रेस के बीच ऐसा ही समीकरण देखा जा रहा है. तीसरे मोरचे की तरफ एनसीपी नेता शरद पवार का नरम रुख कांग्रेस के लिए चिंता का सबव बना हुआ है. तीसरे मोरचे की रैली में शरद पवार के शामिल होने की बात ी चर्चा में रही, हालांकि किसी कारण शरद पवार उसमें शामिल न हो सके. लेकिन फोन पर अपना संदेश जरूर पहुंचा दिया. दरअसल, वर्ष 1999 में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी रहा, लेकिन वर्ष 2004 के लोकसा चुनाव में फिर से पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया. हालांकि सरकार बनाने के लिए उसे छोटे दलों का समर्थन लेना पड़ा. इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के जनाधार को बढ़ाना चाहती है, इसलिए उसने अधिक सीटों की डिमांड की, लेकिन बात नहीं, तो अकेले चुनाव लड़ने का मन बना लिया. चुनावी जंग में अी शह-मात का खेल जारी है, लेकिन असली गंठबंधन और सहयोग की स्थिति चुनाव परिणाम आने के बाद ही दिख पायेगा.
Saturday, April 4, 2009
बयानों की बानगी
संजय कुमार
नेता-अिनेता. अिनेता-नेता. दोनों ही इनदिनों एक-दूसरे के पूरक हो गये हैं. वह नेता ही क्या, जो अिनेताओं की तरह खड़े मंच पर शब्दों के जाल न फेकें, विलेन को पछाड़ने के लिए हुंकार न रे. वह अिनेता ही क्या, जो कलाकारी के दावं पेंच न सीखें. झूठ फरेब को परदे से निकालकर जनता के बीच न परोसें. पिछले दिनों बागपत के बसपा विधायक गुडूड पंडित को ही लीजिये. विपक्ष को ही नहीं, जनता को ही ललकार बैठे. जनता की कौन पूछे प्रशासन को ही अपनी जेब में रखने का संकेत दे बैठे. कहा बसपा की सरकार है और अी तीन साल चलेगी, अगर किसी ने वोट नहीं दिया, तो उसे मंदिर में बैठा गवान ी नहीं बचा सकता. कड़े लहजों में बता दिया कि ई किसमें हिम्मत है उनसे टकराने की. जनता ने टीवी पर फुटेज देखा.
राजनीति में पांव जमाने और चुनाव के समय वोट जुटाने के लिए क्या-क्या नहीं करने पड़ते. अब अिनेता संजय दŸा को ही लीजिये. टीवी में अपराधियों के नेतागिरी अपनाने के कई करतब देखें. चल पड़े जनता दरबार. लेकिन कोर्ट का निर्णय, बेचारे अयोग्य ठहरा दिये गये. बात नहीं बनी, अमर सिंह ने चुटकी काट ली. पैंतरा बदला. धमकी की स्टिंग करवा दी. पर नाम नहीं खोले. साथ ही कांग्रेस को अपने पिता की मौत के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया. कांग्रेस की ओर से बयान आया.
संजय ने कांग्रेस के अहसानों को ुला दिया. जनता ने इसे ी टीवी पर देखा. सवाल, क्या जनता मुद्दों से नहीं बयानों के आधार पर वोट देगी? सवाल सीधा है, लेकिन नेताओं को इसकी अच्छी समझ है. वे अच्छी तरह जानते हैं कि खिचड़ी मंे घी न हो तो खाने का मजा नहीं आता. बात यहां ी कुछ वैसी ही है. मुद्दे जनता के जेहन में हैं, लेकिन ऐसे बयानबाजी उनका दिल जरूर बहलाते हैं. थोड़ी देर बहस कर ली. अच्छा बुरा का फैसला चाहे किसी के हक में, हो कर दिया. अब कांग्रेस प्रत्याशी मुंबई में बिहारी नेता संजय निरुपम को ही लीजिए. पलटवार करते हुए संजय दŸा को मूर्ख कह दिया. अमर सिंह की दावं पेेंच में न फंसने की सलाह दे डाली. बयान की बानगी सिर्फ ये लोग ही नहीं दिखा रहे. छोटे से बड़ा दल और नेता इसी का तो ढोल पीट रहे हैं. वरुण गांधी के बयान ने बवाल खड़ा किया ही, साथ-साथ ही उनके बयान के जवाब में पक्ष-विपक्ष में ी कई बयान खड़े हो गये. इसी तरह कर्नाटक मंें ाजपा प्रत्याशी अनंत कुमार हेगड़े ी बयान से विवाद में आये. एक सा को संबोधित करने के दौरान अंत में उन्होंने कहा कि मेरे खिलाफ 63 आपराधिक मामले दर्ज है, लेकिन मुझे कोई डर नहीं है. मुझे चुनाव जीतने के लिए अल्पसंख्यकों का वोट नहीं चाहिए, न ही अपने क्षेत्र में अल्पसंख्यकों को मजहबी जुलूस निकालने की आजादी दूंगा.
की-की ध्यान आकर्षण के लिए दिया गया बयान अपने लिए ही मुसीबत पैदा कर देता है. अब सुषमा स्वराज को ही लीजिए. सुषमा ने अपने बयान में कहा कि मैं नहीं कह सकती कि एनडीए अपने बूते पर बहुमत प्राप्त करेगा, लेकिन यदि वह सबसे बड़े गंठबंधन के रूप में उरा तो चुनाव बाद सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होगा. बात तेजी से फैली. अब ाजपा के बड़े नेता इसकी सफाई देते फिर रहे हैं. चुनाव का मौसम है. पता नहीं कौन सा बयान उन्हें ला दिला जाये. काम कर गया तो ठीक, नहीं तो फिर बदल देगें. यह कोई नहीं बात नहीं है. उमा ारती को ही लीजिये, पिछले साल उनका बयान आया, वह देश के प्रधानमंत्री के रूप में लालकृष्ण आडवाणी की तुलना में बीएसपी सुप्रीमो और उŸारप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को पसंद करेगी. इस साल उनका बयान कुछ इस तरह आया, मैंने आडवाणी जी को हमेशा अपने पितातुल्य माना है और उनके खिलाफ की ी कोई निजी टिप्पणी नहीं की है. इसी तरह लाल प्रसाद यादवके बारे मंे मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 2004 में कुछ इस तरह के बयान दिये, मुझे तो समझ में नहीं आता कि बिहार की जनता इस जोकर को बर्दाश्त कैसे कर रही है. इस साल उनका बयान आया, लालू प्रसाद यादव कांग्रेस की तरह षडयंत्रकारी और धोखेबाज नहीं है. बयानों में वोट बटोरने की कितनी ताकत है, यह जनादेश ही बतायेगा, लेकिन यह तय है कि नेता मुद्दों के अलावा विवादस्पद बयानों में ी संावना देखने लगे हैं.
नेता-अिनेता. अिनेता-नेता. दोनों ही इनदिनों एक-दूसरे के पूरक हो गये हैं. वह नेता ही क्या, जो अिनेताओं की तरह खड़े मंच पर शब्दों के जाल न फेकें, विलेन को पछाड़ने के लिए हुंकार न रे. वह अिनेता ही क्या, जो कलाकारी के दावं पेंच न सीखें. झूठ फरेब को परदे से निकालकर जनता के बीच न परोसें. पिछले दिनों बागपत के बसपा विधायक गुडूड पंडित को ही लीजिये. विपक्ष को ही नहीं, जनता को ही ललकार बैठे. जनता की कौन पूछे प्रशासन को ही अपनी जेब में रखने का संकेत दे बैठे. कहा बसपा की सरकार है और अी तीन साल चलेगी, अगर किसी ने वोट नहीं दिया, तो उसे मंदिर में बैठा गवान ी नहीं बचा सकता. कड़े लहजों में बता दिया कि ई किसमें हिम्मत है उनसे टकराने की. जनता ने टीवी पर फुटेज देखा.
राजनीति में पांव जमाने और चुनाव के समय वोट जुटाने के लिए क्या-क्या नहीं करने पड़ते. अब अिनेता संजय दŸा को ही लीजिये. टीवी में अपराधियों के नेतागिरी अपनाने के कई करतब देखें. चल पड़े जनता दरबार. लेकिन कोर्ट का निर्णय, बेचारे अयोग्य ठहरा दिये गये. बात नहीं बनी, अमर सिंह ने चुटकी काट ली. पैंतरा बदला. धमकी की स्टिंग करवा दी. पर नाम नहीं खोले. साथ ही कांग्रेस को अपने पिता की मौत के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया. कांग्रेस की ओर से बयान आया.
संजय ने कांग्रेस के अहसानों को ुला दिया. जनता ने इसे ी टीवी पर देखा. सवाल, क्या जनता मुद्दों से नहीं बयानों के आधार पर वोट देगी? सवाल सीधा है, लेकिन नेताओं को इसकी अच्छी समझ है. वे अच्छी तरह जानते हैं कि खिचड़ी मंे घी न हो तो खाने का मजा नहीं आता. बात यहां ी कुछ वैसी ही है. मुद्दे जनता के जेहन में हैं, लेकिन ऐसे बयानबाजी उनका दिल जरूर बहलाते हैं. थोड़ी देर बहस कर ली. अच्छा बुरा का फैसला चाहे किसी के हक में, हो कर दिया. अब कांग्रेस प्रत्याशी मुंबई में बिहारी नेता संजय निरुपम को ही लीजिए. पलटवार करते हुए संजय दŸा को मूर्ख कह दिया. अमर सिंह की दावं पेेंच में न फंसने की सलाह दे डाली. बयान की बानगी सिर्फ ये लोग ही नहीं दिखा रहे. छोटे से बड़ा दल और नेता इसी का तो ढोल पीट रहे हैं. वरुण गांधी के बयान ने बवाल खड़ा किया ही, साथ-साथ ही उनके बयान के जवाब में पक्ष-विपक्ष में ी कई बयान खड़े हो गये. इसी तरह कर्नाटक मंें ाजपा प्रत्याशी अनंत कुमार हेगड़े ी बयान से विवाद में आये. एक सा को संबोधित करने के दौरान अंत में उन्होंने कहा कि मेरे खिलाफ 63 आपराधिक मामले दर्ज है, लेकिन मुझे कोई डर नहीं है. मुझे चुनाव जीतने के लिए अल्पसंख्यकों का वोट नहीं चाहिए, न ही अपने क्षेत्र में अल्पसंख्यकों को मजहबी जुलूस निकालने की आजादी दूंगा.
की-की ध्यान आकर्षण के लिए दिया गया बयान अपने लिए ही मुसीबत पैदा कर देता है. अब सुषमा स्वराज को ही लीजिए. सुषमा ने अपने बयान में कहा कि मैं नहीं कह सकती कि एनडीए अपने बूते पर बहुमत प्राप्त करेगा, लेकिन यदि वह सबसे बड़े गंठबंधन के रूप में उरा तो चुनाव बाद सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होगा. बात तेजी से फैली. अब ाजपा के बड़े नेता इसकी सफाई देते फिर रहे हैं. चुनाव का मौसम है. पता नहीं कौन सा बयान उन्हें ला दिला जाये. काम कर गया तो ठीक, नहीं तो फिर बदल देगें. यह कोई नहीं बात नहीं है. उमा ारती को ही लीजिये, पिछले साल उनका बयान आया, वह देश के प्रधानमंत्री के रूप में लालकृष्ण आडवाणी की तुलना में बीएसपी सुप्रीमो और उŸारप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को पसंद करेगी. इस साल उनका बयान कुछ इस तरह आया, मैंने आडवाणी जी को हमेशा अपने पितातुल्य माना है और उनके खिलाफ की ी कोई निजी टिप्पणी नहीं की है. इसी तरह लाल प्रसाद यादवके बारे मंे मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 2004 में कुछ इस तरह के बयान दिये, मुझे तो समझ में नहीं आता कि बिहार की जनता इस जोकर को बर्दाश्त कैसे कर रही है. इस साल उनका बयान आया, लालू प्रसाद यादव कांग्रेस की तरह षडयंत्रकारी और धोखेबाज नहीं है. बयानों में वोट बटोरने की कितनी ताकत है, यह जनादेश ही बतायेगा, लेकिन यह तय है कि नेता मुद्दों के अलावा विवादस्पद बयानों में ी संावना देखने लगे हैं.
Wednesday, April 1, 2009
Monday, January 12, 2009
ना ूलनेवाली बात
sanjay kumar
मुजफरपुर से दिल्ली आने के बाद विष्य को लेकर कई उम्मीदें-आशंकाएं थÈ. मेरे लिए वे संघर्ष के दिन थे. यह संयोग ही था कि दिल्ली आते ही, जिसके यहां मैं ठहरा, उसने अगले दिन ही मुझे टîूशन दिलवा दिया. मैंने ी खर्चे निकालने के लिए टîूशन करना जरूरी समझा. टîूशन की मामूली अनियमित आय के बीच मैं अपनी ावी Çजदगी के छोटे-छोटे सपने बुनने लग गया. चूंकि मैं पहली बार अपने छोटे शहर से रोजगार की तलाश में बाहर निकला था, इसलिए छोटी-छोटी तकलीफें, छोटे-छोटे अाव मुझे काफी दुख पहुंचाते थे. सोचा था एक अच्छे संस्थान में कोई अच्छा सा पाठîक्रम में दाखिला लूं. घर से चलने पर कुछ पैसे थे, मेरे पास. वह ी धीरे-धीरे खर्च हो गये. मैंने पास के स्टॉल से रोजगार समाचार लिया. उसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में Çहदी पत्रकारिता पाठîक्रम के लिए विज्ञापन निकला था. जिसके यहां मैं ठहरा था, मैंने उससे रिक्वेस्ट किया, तो उसने मेरे लिये फार्म ला दिया. फॉर्म के साथ 150 रुपये का डाट ी जमा करना था. मेरे पास कुल 200 रुपये बचे थे. मैंने पास के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ब्रांच में जाकर डाट बना लिया. आवेदन का वह आखिरी दिन था. 2 बजे का समय ी निर्धारित था. मेरे पास कुल 50 रुपये थे. शालीमार बाग से धौला कुंआ तक जाने का बस किराया 10 रुपया बैठता था. मैंने हिसाब लगाया, 20 रुपये में काम निपट जायेगा. आखिरकार मैं पत्रकारिता विाग में पहुंच गया. पहली बार इस रास्ते से जाने के कारण मैं लेट हो चुका था. मैं एक बजे वहां पहुंचा था. विाग में जैसे ही मैंने अपने सारे डॉक्यूमेंट निकाले, मैं दंग रह गया. डॉक्यूमेंट के साथ 150 रुपये का डाट नहÈ था. मैंने याद किया. कहÈ गिर तो नहÈ गया. फिर याद आया, अरे मैं तो घर पर ही ूल गया. मेरे पास एक घंटे ही शेष थे. स्टाफ ने कहा डाट नहÈ लाये, जाओ जल्दी से डाट बनाकर ले आओ. मैंने बैंक का लोकेशन पूछा. बैंक कैंपस के अंदर ही था. मैं ागा-ागा बैंक के अंदर गया. एक बार फिर निराश हो गया. मेरे जेब में तो मात्र 40 रुपये ही थे. बैंक के अंदर ही सोफे पर मैं बैठ गया. अपने नसीब को कोसने लगा. क्या करूं? कैसे घर लौटूं? एडमिशन तो हो नहीं पाया. घरवाले सुनेंगे, तो कितना खराब लगेगा. कितना कोसेंगे वे? लगग 20 मिनट मैं सोचता रहा. ती सिर पर किसी ने हाथ फेरा. मैंने सामने देखा. क्या हुआ? ऐसे क्यों बैठे हो? उस अनजान व्यक्ति ने मुझसे पूछा. मैंने उससे एक ही सांस में सबकुछ बता दिया. उसने झट 200 रुपये निकाले और अपने हाथों से फॉर्म ी र कर जमा करा दिया. 50 रुपये देते हुए कहा, तुम ी किसी और की मदद कर देना. मेरा हिसाब चुकता हो जायेगा. मैं उससे पता और फोन नंबर मांगते रहा, लेकिन उसने नहÈ दिया. उसे जल्दी थी, वह चला गया. बाद में उससे की मुलाकात नहÈ हुई. प्रवेश परीक्षा के बाद साक्षात्कार में ी मैं सफल हो गया. संघर्ष तो आज ी है, लेकिन पीछे मुड़कर देखता हूं, तो आज ी उस आदमी का चेहरा याद आता है.
मुजफरपुर से दिल्ली आने के बाद विष्य को लेकर कई उम्मीदें-आशंकाएं थÈ. मेरे लिए वे संघर्ष के दिन थे. यह संयोग ही था कि दिल्ली आते ही, जिसके यहां मैं ठहरा, उसने अगले दिन ही मुझे टîूशन दिलवा दिया. मैंने ी खर्चे निकालने के लिए टîूशन करना जरूरी समझा. टîूशन की मामूली अनियमित आय के बीच मैं अपनी ावी Çजदगी के छोटे-छोटे सपने बुनने लग गया. चूंकि मैं पहली बार अपने छोटे शहर से रोजगार की तलाश में बाहर निकला था, इसलिए छोटी-छोटी तकलीफें, छोटे-छोटे अाव मुझे काफी दुख पहुंचाते थे. सोचा था एक अच्छे संस्थान में कोई अच्छा सा पाठîक्रम में दाखिला लूं. घर से चलने पर कुछ पैसे थे, मेरे पास. वह ी धीरे-धीरे खर्च हो गये. मैंने पास के स्टॉल से रोजगार समाचार लिया. उसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में Çहदी पत्रकारिता पाठîक्रम के लिए विज्ञापन निकला था. जिसके यहां मैं ठहरा था, मैंने उससे रिक्वेस्ट किया, तो उसने मेरे लिये फार्म ला दिया. फॉर्म के साथ 150 रुपये का डाट ी जमा करना था. मेरे पास कुल 200 रुपये बचे थे. मैंने पास के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ब्रांच में जाकर डाट बना लिया. आवेदन का वह आखिरी दिन था. 2 बजे का समय ी निर्धारित था. मेरे पास कुल 50 रुपये थे. शालीमार बाग से धौला कुंआ तक जाने का बस किराया 10 रुपया बैठता था. मैंने हिसाब लगाया, 20 रुपये में काम निपट जायेगा. आखिरकार मैं पत्रकारिता विाग में पहुंच गया. पहली बार इस रास्ते से जाने के कारण मैं लेट हो चुका था. मैं एक बजे वहां पहुंचा था. विाग में जैसे ही मैंने अपने सारे डॉक्यूमेंट निकाले, मैं दंग रह गया. डॉक्यूमेंट के साथ 150 रुपये का डाट नहÈ था. मैंने याद किया. कहÈ गिर तो नहÈ गया. फिर याद आया, अरे मैं तो घर पर ही ूल गया. मेरे पास एक घंटे ही शेष थे. स्टाफ ने कहा डाट नहÈ लाये, जाओ जल्दी से डाट बनाकर ले आओ. मैंने बैंक का लोकेशन पूछा. बैंक कैंपस के अंदर ही था. मैं ागा-ागा बैंक के अंदर गया. एक बार फिर निराश हो गया. मेरे जेब में तो मात्र 40 रुपये ही थे. बैंक के अंदर ही सोफे पर मैं बैठ गया. अपने नसीब को कोसने लगा. क्या करूं? कैसे घर लौटूं? एडमिशन तो हो नहीं पाया. घरवाले सुनेंगे, तो कितना खराब लगेगा. कितना कोसेंगे वे? लगग 20 मिनट मैं सोचता रहा. ती सिर पर किसी ने हाथ फेरा. मैंने सामने देखा. क्या हुआ? ऐसे क्यों बैठे हो? उस अनजान व्यक्ति ने मुझसे पूछा. मैंने उससे एक ही सांस में सबकुछ बता दिया. उसने झट 200 रुपये निकाले और अपने हाथों से फॉर्म ी र कर जमा करा दिया. 50 रुपये देते हुए कहा, तुम ी किसी और की मदद कर देना. मेरा हिसाब चुकता हो जायेगा. मैं उससे पता और फोन नंबर मांगते रहा, लेकिन उसने नहÈ दिया. उसे जल्दी थी, वह चला गया. बाद में उससे की मुलाकात नहÈ हुई. प्रवेश परीक्षा के बाद साक्षात्कार में ी मैं सफल हो गया. संघर्ष तो आज ी है, लेकिन पीछे मुड़कर देखता हूं, तो आज ी उस आदमी का चेहरा याद आता है.
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