Sunday, May 25, 2008

परमाणु समझौता -3

परमाणु करार खत्म करने का मतलब
अरुंधति घोष
आलेख. अक्टूबर माह की 12 तारीख को हमारे संस्कारवान, मृदुभाषी और जहीन प्रधानमंत्री ने न सिर्फ मीडिया बल्कि रणनीतिकारों की बिरादरी में भी एक और तूफान खड़ा कर दिया। कई हफ्तों से वामदलों के प्रवक्ता अमेरिका के संबंध में भारत की विदेश नीति में कथित ‘भटकाव’ को लेकर अशुभ और धमकीभरा शोर मचा रहे थे।

साथ ही परमाणु समझौते को खत्म करने की कसमें भी खा रहे थे, भले ही इसका मतलब देश में अस्थिरता पैदा करना और देश को मध्यावधि चुनाव में धकेलना ही क्यों न हो। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने इस आशय की बात कही कि समझौते को स्थगित किया जा सकता है और इस देरी से होने वाले नुकसान को भी होने दिया जा सकता है। समझौते की मुखालफत करने वालों के खैमे में इससे जहां खुशी की लहर दौड़ गई वहीं समर्थकों के बीच निराशा व चिंता नजर आई।

अब यह बात साफ हो चुकी है कि बहस समझौते की रहस्यपूर्णता को लेकर नहीं बची है। वामदलों द्वारा समस्यापूर्ण माने गए अधिकांश मुद्दों का 123 समझौते में संतोषजनक ढंग से ध्यान रखा गया है; दरअसल सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि सारी दुनिया का मानना है कि भारत को एक बेहतरीन सौदा मिला है जो उसकी पहुंच अत्याधुनिक अंतरराष्ट्रीय टेक्नोलॉजी और परमाणु ऊर्जा बाजार तक बनाता है, वह भी अपनी किसी भी धारणा पर समझौता किए बगैर।

सोमवार को संपन्न यूपीए-वामदलों की बैठक में विभिन्न पक्षों के रवैये में कोई बदलाव नजर नहीं दिखा, सिवाय इसके कि यूपीए अब भी प्रक्रिया के अगले चरणों की तरफ बढ़ने की इच्छा रखे नजर आया। पूरा मामला 16 नवंबर तक के लिए टल गया है। यह देखना बाकी है कि उस तारीख तक किसी दल के रवैये में कोई बदलाव आता है या नहीं। कुछ ने तो कम से कम इस सरकार के कार्यकाल के बाकी महीनों तक के लिए ‘सौदे’ को खारिज मान लिया है।

समझौता मामले का हल आखिरकार चाहे जो हो, इस घटनाक्रम का असर भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर होगा ही। वार्ताकार के रूप में भारत की विश्वसनीयता और घरेलू स्तर पर कड़ा फैसला करने की क्षमता की प्रतिछाया जरूरी तौर पर इस बात पर पड़ेगी कि मुल्क की अंतरराष्ट्रीय वचनबद्धताओं का आकलन अन्य देश किस तरह करेंगे।

अगर समझौता नाकाम रहता है, तो भी निश्चित तौर पर सब कुछ खत्म नहीं हो जाएगा, मगर भारत अपनी आवाज खो चुका होगा। माना जाएगा कि भले ही भारत महत्वाकांक्षी हो, खंडित सियासत के चलते अपने समझौतों को लागू करने की इच्छाशक्ति या काबिलियत उसमें नहीं है। अपने वादों को पूरा करने के संकल्प और साझा वार्ताकार के रूप में भारत की गंभीरता पर सवालिया निशान लग जाएंगे।

द्विपक्षीय संबंधों के परिणामों पर पूर्वानुमान मुश्किल हैं फिर भी अमेरिका में नकारात्मक प्रतिक्रिया निश्चित है। जैसी कि अटकलें लगाई जा रही हैं अमेरिका का अगला राष्ट्रपति डेमोक्रेट और कांग्रेस डेमोक्रेटिक होगी।

यदि ऐसा होता है तो भारत फिर से अपने खिलाफ माहौल की उम्मीद कर सकता है। परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी), विखंडन सामग्री कटौती संधि (एफएमसीटी) और परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव इनमें शामिल हैं।

हम जहां से शुरू हुए थे वापस उसी मुकाम पर और भी बुरी स्थिति में पहुंच जाएंगे। हो सकता है इससे भारत में वामदल खुश हो जाएं, मगर उनकी यह खुशफहमी जारी नहीं रह सकेगी, क्योंकि दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यावसायिक रिश्ते तथा नागरिकों के आपसी संबंध मजबूत होने ही हैं।

परमाणु ऊर्जा के लिए विश्व बाजार खुलने से व्यावसायिक रूप से लाभ में आने वाले रूस और फ्रांस जैसे अन्य बड़े मुल्कों में निश्चित तौर पर भारत के लिए आदर में कमी आएगी। चीन का रुख जानना शायद सबसे दिलचस्प होगा, जो हमें चीन-भारत-रूस बैठक के दौरान देखने को मिलेगा। जैसी कि वामदल बेसब्री से उम्मीद करते नजर आते हैं, क्या गुट निरपेक्ष देश भारत को अपना नेता स्वीकार करेंगे?

इन नकारात्मक पहलुओं और समझौता लागू होने में लगने वाली देर के बावजूद, कुछ कदम जो उठाए जा चुके हैं वापस नहीं लिए जा सकते। अमेरिका के साथ सहयोग का एक व्यापक आधार आकार ले रहा है और 123 समझौते की पहल हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय ताप नाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र (आईटीईआर ) का भारत एक सदस्य है।

मगर परमाणु ऊर्जा रेजीम में पूरी तरह भागीदारी के बिना यह सदस्यता जारी रहेगी या नहीं यह एक बहस के योग्य मुद्दा है। भारत को छूट देने वाला अमेरिकी कानून पास हो चुका है और परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) के कई मुल्क भारत के साथ असैन्य परमाणु सहयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास करने में दिलचस्पी रखते हैं। मगर वैश्विक स्तर पर अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी नकारी जाती रहेगी और भारत के लिए अवसरों की खिड़की दिखलाई पड़ रहे भविष्य तक बंद हो चुकी होगी।

-लेखक संयुक्त राष्ट्र में भारत की राजदूत रह चुकी हैं।

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