ैसंजय कुमार
जो हो रहा है, वह ठीक नहÈ हैण् आज आतंकवाद जैसे कई समस्याओं से हम जूझ रहे हैंण् विघटनकारी शक्तियां सक्रिय हैण् ऐसे में राज्य स्तरीय राजनीति के कारण ऐसा लगने लगा है कि हम एक देश नहÈ, अपितु कई देशों में रह रहे हैंण् ारतीय संविधान में स्पष्ट उल्लेख है कि कोई ी कहÈ ी रहने, आजीविका पाने का अधिकार रखता हैण् कई कारणों से लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं, केवल गरीबी ही नहÈ है, शिक्षा के लिए लोग बाहर जाते हैंण् अपने को बेहतर साबित करने के लिए लोग दूसरे राज्य जाते हैंण् कोटा में अधिकतर उत्तर ारत के छात्र कोÇचग के लिए जाते हैं, तो क्या राजस्थान कहेगा, यहां केवल राजस्थानी ही पढ़ सकत हैंण् ऐसे में तो देश की अवधारणा ही खत्म हो जायेगीण् दूसरी ओर इसके प्रतिक्रियास्वरूप जो Çहसात्मक विरोध का तरीका अपनाया गया, उसे ी जायज नहÈ ठहराया जा सकताण् अपना विरोध राजनीतिक नेतृत्व के सामने रखिएण् राज्य का नेतृत्व इस मुद्दे पर अपनी चिंताएं प्रकट करेगाण्
बिहार में 15 सालों से विकास का अवरुद्ध रहा है, इसके कारण अधिकतर लोग इस क्षेत्र से दूसरे राज्य में जाते हैंण् ऐसा नहÈ है कि सिर्फ गरीब ही पलायन करतेे हैं, अमीरों में एक खूबी है कि वह जहां जाते हैं वहां के माहौल में घुल जाते हैंण् उनके खिलाफ गरीबों जैसा उपद्रव नहÈ होता हैण् उन्हें कोई कुछ नहीं कहताण् मजदूर बड़ी संख्या में जाते हैंण् वहां उनकी जरूरत ी हैण् चुनावी ला हासिल करने के राजनेता ी क्षेत्रवाद को बढ़ावा देते हैं, वे तोड़ने की राजनीति अधिक करते हैं बजाय जोड़ने केण् महाराष्ट सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक सी फायदे की राजनीति कर रहे हैंण् महाराष्ट में जो पुलिस राज ठाकरे पर अंकुश लगा सकती थी, उस पर राज्य सरकार का दबाव होने की वजह से वह ी मूक बनकर रह जाती हैण्
एक सवाल यह ी उठता है कि केंद्र की सत्ता में उत्तर ारतीय नेताओं की संख्या अधिक होने के बावजूद आखिर इन क्षेत्रों में विकास अवरूद्ध क्यों रहाण् आखिर क्यों यहां के लोग दूसरे राज्यों में आजीविका के लिए जाने को मजबूर हैण् इसका ऐतिहासिक पहलू हैण् उत्तर ारत खासकर बिहार, झारखंड और यूपी की बात करें, तो वहां सामंतवादी समाज हमेशा से व्याप्त रहीण् जमीन के रिश्ते नहÈ बदलेण् ूमि सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी रहीण् शिक्षा को लेकर ी प्रयास बहुत निम्न स्तर की रहीण् साथ जनसंख्या पर नियंत्रण को लेकर गंीर प्रयास नहÈ हुएण् दूसरी वहां आजीविका के रूप में जमीन ही थीण् एक ही पेशा था, जमीन से उपजाओ और खाओण् दूसरी ओर पंजाब जैसे राज्यों ने हरित क्रांति कर सामजिक तानेबाने को ध्वस्त कियाण् दक्षिण के राज्यों में गुजरात आदि की बात करें हर शिक्षा, रोजगार के स्तर पर काफी तरôी कीण् समुद्र तटीय इलाका होने के कारण कई राज्यों में व्यापारिक माहौल पैदा हुएण् लोगों को रोजगार मिलाण् दूसरी ओर उत्तर ारत में लैंड लॉक्ड होने के कारण इस तरह के विकास नहÈ हुएण् तीसरी, स्वतंत्रता के बाद जिन दलों ने इस क्षेत्र का नेतृत्व किया, पहले कांग्रेस और बाद में लालू जैसे नेताओं ने राजनीतिक फायदे के लिए गरीबी-अमीरी के बीच विेद को और बढ़ाने का काम कियाण् गरीब और निरक्षर व्यक्ति राजनीतिक ाषा कम जाति व सांप्रदायिक ाषा को अधिक समझते हैंण् उनमें व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहÈ होतीण् जबकि अमीर व संपé व्यक्ति आवाज उठाने में नहÈ हिचकते, इसको ध्यान में रखते हुए वहां के राजनेताओं ने राजनीति कीण् अमत्र्य सेन जैसे आर्थशािóयों ने ी अमीरी-गरीबी के विेद को लेकर ऐसी ही बातों उठायी हैंण् बदलाव के लिए आवाज उठाने के लिए आम आदमी में उतनी क्षमता नहÈ रह जाती हैण् व्यक्तिगत स्तर पर कोई प्रयास उतना कारगर हो ी नहÈ सकताण् राजनैतिक इच्छाशक्ति ही बदलाव ला सकती हैण् दरअसल, इस देश में आइडिया ऑफ नेशन और आइडिया ऑफ सिटीजनशिप की अवधारणा स्पष्ट नहÈ हो पायी हैण्
यह सवाल उठना जायज है कि जब की विदेशों में ारतीयों के खिलाफ उपद्रव होती है, तो यहां राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो जाती है, लेकिन अपने देश में जब ऐसी घटना होती है, तो केंद्र गंीरता से नहÈ लेताण् दरअसल, वह विदेश की बात है, वहां के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहÈ किया जा सकताण् एंबेसी के माध्यम से अपनी Çचताए व्यक्त की जाती हैण् जब यह हमारा अपना मसला हैण् इसमें नेताओं का सीधा हस्क्षेप हैण् यहां वह गलत है या सही है, यह नहÈ देखते, बल्कि इसमें फायदा है या नहÈ, इसे देखकर कोई कदम उठाते हैंण् महाराष्ट में जो कुछ हुआ, जिस तरह से वहां की पुलिस व्यवस्था ने कदम उठाये, महाराष्ट सरकार की ओर से कदम उठाये गये, केंद्र का नरम रुख रहा, बिहार के नेता एक मंच पर आये या फिर यूपी के नेताओं की बयानबाजी को ले, सबको एक ही नजर से देखा जाना चाहिएण्
इस पूरे प्रकरण पर मैं यह कहूंगी कि महाराष्ट सरकार को राजठाकरे को रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन को सपोर्ट करनी चाहिएण् सिटी से सिटीजनशिप की अवधारणा को समझेण् आप यह समझे कि निम्न स्तर के काम के लिए आप इन्हÈ पर निZर हैण् उनके बिना आपका काम नहÈ चल सकताण्
साथ ही उत्तरारतीय निवासियों के लिए ी यह समझ लेना चाहिए कि Çहसात्मक प्रतिरोध समस्या का हल नहÈ हैण् इससे विरोध के तरीके को जायज कहलाने का हक मिल जाता है और वास्तविक समस्या जस की तस रह जाती हैण् साथ ही उत्तर ारतीय नेताओं के लिए सुझाव के तौर पर मैं यह कहना चाहूंगी कि वे दक्षिण ारत से सबक लेण् वहां के नेता ी राजनीति करते हैं, लेकिन साथ ही विकास के लिए काम करते हैंण् आप आरोप-प्रत्यारोप की जगह अपने क्षेत्र में विकास को आगे बढ़ाये, अपने प्रदेश की जनता को अपमानित न होना पड़े, इसके लिए सोचे-विचारेण्
रवÈद कौर, प्रोफेसर, समाजशाó, आइआइटी, दिल्ली, से बातचीत पर आधारित
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