संजय कुमार
नेता-अिनेता. अिनेता-नेता. दोनों ही इनदिनों एक-दूसरे के पूरक हो गये हैं. वह नेता ही क्या, जो अिनेताओं की तरह खड़े मंच पर शब्दों के जाल न फेकें, विलेन को पछाड़ने के लिए हुंकार न रे. वह अिनेता ही क्या, जो कलाकारी के दावं पेंच न सीखें. झूठ फरेब को परदे से निकालकर जनता के बीच न परोसें. पिछले दिनों बागपत के बसपा विधायक गुडूड पंडित को ही लीजिये. विपक्ष को ही नहीं, जनता को ही ललकार बैठे. जनता की कौन पूछे प्रशासन को ही अपनी जेब में रखने का संकेत दे बैठे. कहा बसपा की सरकार है और अी तीन साल चलेगी, अगर किसी ने वोट नहीं दिया, तो उसे मंदिर में बैठा गवान ी नहीं बचा सकता. कड़े लहजों में बता दिया कि ई किसमें हिम्मत है उनसे टकराने की. जनता ने टीवी पर फुटेज देखा.
राजनीति में पांव जमाने और चुनाव के समय वोट जुटाने के लिए क्या-क्या नहीं करने पड़ते. अब अिनेता संजय दŸा को ही लीजिये. टीवी में अपराधियों के नेतागिरी अपनाने के कई करतब देखें. चल पड़े जनता दरबार. लेकिन कोर्ट का निर्णय, बेचारे अयोग्य ठहरा दिये गये. बात नहीं बनी, अमर सिंह ने चुटकी काट ली. पैंतरा बदला. धमकी की स्टिंग करवा दी. पर नाम नहीं खोले. साथ ही कांग्रेस को अपने पिता की मौत के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया. कांग्रेस की ओर से बयान आया.
संजय ने कांग्रेस के अहसानों को ुला दिया. जनता ने इसे ी टीवी पर देखा. सवाल, क्या जनता मुद्दों से नहीं बयानों के आधार पर वोट देगी? सवाल सीधा है, लेकिन नेताओं को इसकी अच्छी समझ है. वे अच्छी तरह जानते हैं कि खिचड़ी मंे घी न हो तो खाने का मजा नहीं आता. बात यहां ी कुछ वैसी ही है. मुद्दे जनता के जेहन में हैं, लेकिन ऐसे बयानबाजी उनका दिल जरूर बहलाते हैं. थोड़ी देर बहस कर ली. अच्छा बुरा का फैसला चाहे किसी के हक में, हो कर दिया. अब कांग्रेस प्रत्याशी मुंबई में बिहारी नेता संजय निरुपम को ही लीजिए. पलटवार करते हुए संजय दŸा को मूर्ख कह दिया. अमर सिंह की दावं पेेंच में न फंसने की सलाह दे डाली. बयान की बानगी सिर्फ ये लोग ही नहीं दिखा रहे. छोटे से बड़ा दल और नेता इसी का तो ढोल पीट रहे हैं. वरुण गांधी के बयान ने बवाल खड़ा किया ही, साथ-साथ ही उनके बयान के जवाब में पक्ष-विपक्ष में ी कई बयान खड़े हो गये. इसी तरह कर्नाटक मंें ाजपा प्रत्याशी अनंत कुमार हेगड़े ी बयान से विवाद में आये. एक सा को संबोधित करने के दौरान अंत में उन्होंने कहा कि मेरे खिलाफ 63 आपराधिक मामले दर्ज है, लेकिन मुझे कोई डर नहीं है. मुझे चुनाव जीतने के लिए अल्पसंख्यकों का वोट नहीं चाहिए, न ही अपने क्षेत्र में अल्पसंख्यकों को मजहबी जुलूस निकालने की आजादी दूंगा.
की-की ध्यान आकर्षण के लिए दिया गया बयान अपने लिए ही मुसीबत पैदा कर देता है. अब सुषमा स्वराज को ही लीजिए. सुषमा ने अपने बयान में कहा कि मैं नहीं कह सकती कि एनडीए अपने बूते पर बहुमत प्राप्त करेगा, लेकिन यदि वह सबसे बड़े गंठबंधन के रूप में उरा तो चुनाव बाद सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होगा. बात तेजी से फैली. अब ाजपा के बड़े नेता इसकी सफाई देते फिर रहे हैं. चुनाव का मौसम है. पता नहीं कौन सा बयान उन्हें ला दिला जाये. काम कर गया तो ठीक, नहीं तो फिर बदल देगें. यह कोई नहीं बात नहीं है. उमा ारती को ही लीजिये, पिछले साल उनका बयान आया, वह देश के प्रधानमंत्री के रूप में लालकृष्ण आडवाणी की तुलना में बीएसपी सुप्रीमो और उŸारप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को पसंद करेगी. इस साल उनका बयान कुछ इस तरह आया, मैंने आडवाणी जी को हमेशा अपने पितातुल्य माना है और उनके खिलाफ की ी कोई निजी टिप्पणी नहीं की है. इसी तरह लाल प्रसाद यादवके बारे मंे मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 2004 में कुछ इस तरह के बयान दिये, मुझे तो समझ में नहीं आता कि बिहार की जनता इस जोकर को बर्दाश्त कैसे कर रही है. इस साल उनका बयान आया, लालू प्रसाद यादव कांग्रेस की तरह षडयंत्रकारी और धोखेबाज नहीं है. बयानों में वोट बटोरने की कितनी ताकत है, यह जनादेश ही बतायेगा, लेकिन यह तय है कि नेता मुद्दों के अलावा विवादस्पद बयानों में ी संावना देखने लगे हैं.
1 comment:
सबके मार्केटिंग के अपने अपने फंडे हैं.
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