अपनी तकदीर हम खुद ही संवार लेंगे, तेरे सहारे का एक इशारा ही काफी है। प्राकृतिक छटाओं व धरोहरों से परिपूर्ण शहर में वह सबकुछ है, जो किसी की आंखों को सुकून दे सकता है। आंखों को अगर चुभता है, तो गांवों की गरीबी, उनकी लाचारी, जो सबकुछ होते हुए भी उन्हें दूर करता है अपने गांव से। अपने शहर से। रोजगार की तलाश में अन्य प्रदेशों में चक्कर काटते हैं। बहु-बेटियां इस उम्मीद के साथ कि बेहतर रोजी-रोटी का जरिया मिलेगा, दलालों के चंगुल में फंस बेच दी जाती है। ऐसे में अपने पुराने पेशे खेतीबाड़ी व जंगल की सुरक्षा को अपनाते हुए आय का जरिया मिल जाए तो उनके भविष्य को संवरने से भला कौन रोक सकता है। एक रिपोर्ट रिपोर्ट।
रांची से 16 किलोमीटर द र तुपुदाना-नामकुम मार्ग पर घने जंगल के बीच बन रहा है बायो-डायवर्सिटी पार्क। यहां पहुंचने के लिए शहर से पहले तुपुदाना चौक पहुंचना होगा। इस रास्ते नामकूम की ओर जानेवाली सड़क पर करीब चार किमी की दूरी के बाद आता है लाल खटंगा गांव। बाइक से जाने पर तकरीबन 20 मिनट। हालांकि, फोर लेन सड़क पूरी तरह बन जाने पर यह समय और कम हो जाएगा। लाल खटंगा पंचायत सचिवालय भवन के पास से एक छोटी कच्ची सड़क। भवन के पास खड़े एक व्यक्ति से पूछा, बायोडायर्विटी पार्क यहां से कितनी दूर पड़ेगा। सीधे चले जाएं। थोड़ी दूर पर गेट दिखाई पड़ेगा। उबड़-खाबड़ रास्ते। पार्क बनाने से पहले सड़क बनानी चाहिए थी। तभी बड़ा सुंदर सा गेट दिखाई पड़ता है। अंदर जाने का रास्ता किधर से है। पास के खेत में काम कर रहे मजदूर ने बताया, साइड से चले जाए। अंदर पहुंचे। कहां से आए हैं? दैनिक जागरण से है। अच्छा बैठिए। आपका नाम। अजय। आप यहां क्या करते हैं? देखरेख करता हूं। हमें जरा पार्क घूमना है। ठीक है देख लीजिए।
आगे बढ़ते ही खूबसूरत झरना दिखता है। कुछ मजदूर झरने के करीब पार्क के चारों ओर लोहे का जालीदार घेरा बना रहे हैं। कुछ तेज धूप के बीच सुस्ता रहे हैं।
आपका नाम? बिरसा लिंडा। कहां के रहनेवाले हैं? जी, हुडवा के। यहां कब से काम कर रहे हैं? पांच महीने हो गए। पहले क्या करते थे? कुछ भी कर लेते थे। खेतीबाड़ी करते थे। इससे कमाई कितनी होती थी? कमाई क्या होगी। खाने भर अनाज निकल जाता था। अन्य खर्च के लिए? डोरंडा व बिरसा चौक पर जाते थे। ठेकेदारी में काम मिल जाता था। यहां कितना मिलता है? प्रतिदिन 111 रुपये के हिसाब से मिलता है। यहां काम करने से कुछ फायदा है? फायदा तो है ही। पहले बाहर भटकना पड़ता था। अब यही नौकरी मिल गई है। पत्नी भी काम करती है। पांच बच्चे हैं। बड़ा लड़का है। योग्दा कॉलेज में पढ़ता है। बाकी स्कूल में पढ़ते हैं।
आपका नाम? काली कल्याण लकड़ा। पास के गांव में रहता हूं। घर में कौन-कौन है? पत्नी है। बड़ी बेटी नमिता है। उससे छोटा दो लड़का है। बेटी पढ़ती है? हां पढ़ती है। दसवीं में पढ़ रही है। कितने दिन से मजदूरी कर रहे हैं यहां? चार महीने हो गए। समय पर पैसा देता है न? हां, पैसा तो समय पर ही मिल जाता था। लेकिन, इस बार लेट हो गया है। पता नहीं कब देंगे। 111 रुपये कम नहीं है? बोले तो हैं कि 134 रुपये मिलेंगे। कब से मिलेंगे यह नही बताया। यहां काम करने से कुछ फायदा नजर आ रहा है? फायदा तो है। घर के नजदीक काम है। जरूरत पड़ता है, तो घर चले जाते हैं। एकमुश्त समय पर पैसा मिलता है।
आगे बढ़ते हैं। पार्क में लगे औषधीय पौधों की घेराबंदी करता युवक। आप यहां क्या काम करते हैं। जी, यहां घेराबंदी कर रहा हूं। क्या नाम है आपका? जी सैमुएल लिंडा। कितने बजे से यहां काम कर रहे हैं? सुबह नौ बजे से। कबतक? पांच बजे तक। इससे पहले क्या करते थे? यहां ठेकेदार के अंदर में मजदूरी का काम कर लेते थे। खेतीबाड़ी के समय में खेत में काम करते थे। दूसरे राज्य में भी गए है काम करने कभी? खेतीबाड़ी के बाद तो कभी पंजाब तो कभी असम चला जाता था। एक बार तो तमिलनाडु भी गया था काम करने। यहां काम करने के बाद कभी गए है बाहर? नहीं। यहां प्रतिदिन काम मिलता है। सरकारी काम है। आगे चल कर फायदा ही होगा। बच्चे हैं? जी, चार बच्चे हैं। बड़ी बेटी है, डोरंडा कॉलेज में पढ़ती है।
आगे करीब आधा किलोमीटर की दूरी सामने बड़ा पहाड़ नजर आता है। चारों तरफ जंगलों से घिरा। इनके बीच से पथरीली सड़क। आप हाथ में लाठी क्यों लिये है? जी, मैं यहां चौकीदारी करता हूं। क्या नाम है आपका? शुक्रा मुंडा। घुमने आए हैं, जवाब के साथ सवाल भी पूछते हैं। जी, हम अखबारवाले हैं। अच्छा।
आपका घर कहां है? यहीं लाल खटंगा गांव में। सुना है आपकी जमीन भी है इस पार्क में? हां। जंगल भी है। पहले क्या करते थे? खेतीबाड़ी करते थे। यही सामने जो खेत दिख रहा है। जंगल से भी लकड़ी का काम कर लेते थे। बाहर कभी नौकरी की है? नहीं। पैसा की जरूरत पड़ी तो? बेटियों की शादी में जरूरत पड़ी थी। कई बार जमीन बेची है। अब खेतीबाड़ी करने देते हैं? हां, अभी तो करने देते हैं। जंगल से लकड़ी भी लेने देते हैं। यहां काम करने से कुछ फायदा है? नौकरी मिली हुई है। लेकिन डर लगता है। कहीं जमीन छीन तो नहीं लेंगे।
करीब आधे किलोमीटर जंगल के बीच रास्ते को पार कर अंदर पहुंचते हैं। बड़े-बड़े पेड़। तभी साइकिल पर सवार एक युवक सामने आता दिखता है। सर पर टोपी, हाथ में पतली सी लकड़ी। इशारा करते ही साइकिल रोक खड़ा हो जाता है। हाथ में क्या है? यह गुगुल है। क्या होता है इससे? स्थानीय भाषा में बताते हैं, नजर नहीं लगती। भूत-प्रेत आसपास नहीं फटकते। मन से डर निकल जाता है। हमें भी देंगे क्या? लीजिए। क्या नाम है आपका? लच्छू मुंडा। यहां क्या करते हैं? मिस्त्री का काम करता हूं। कितना मिलता है? दो सौ रुपये। कहां के रहनेवाले हैं? डुंगरी के। और कितने लोग आते हैं? वहां से सिर्फ मैं ही हूं।
चलते-चलते पार्क के दायरे से कब बाहर आ गए पता ही नहीं चला। सामने बड़ा सा आम का पेड़। करीब दस बच्चे नीचे खेलते हुए। गाड़ी की आवाज सुन एक बच्चा पास आता है। मुस्कुराते हुए कहता है, आगे रास्ता नहीं है। यह कौन सी जगह है? जरा टोली, बच्चा बोला। पार्क कहां तक है? वो देखिए जो लोग काम कर रहे हैं न, वही तक। रास्ते में एक बुजुर्ग मिलता है। हाथ में मोटी सी लाठी लिये हुए। आप यहां क्या कर रहे हैं? बैल घुस गया है, उसी को ढूंढऩे जा रहे हैं। तभी पास खड़े एक युवक ने कहा, यहां अक्सर पशु घुस जाते हैं। अभी घेराबंदी नहीं हुई है न इसलिए। घेराबंदी कब तक हो जाएगी? कुछ कहा नहीं जा सकता। अपना नाम बताएंगे? हुल्ला मुंडा। आपका घर कहां है? घरखटंगा। पार्क बनने से आपलोगों को बहुत फायदा होगा? अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। रोजगार तो मिला है न? हां। हमारे गांव में 95 से भी अधिक घर हैं। करीब 75 लोग यहां काम करते हैं।
पीछे की तरफ लौटते है। पार्क के दूसरे रास्ते से आगे बढ़ते हैं। खाली पड़ी जमीन पर कुछ बच्चे कुदाल से खुदाई कर रहे हैं। आवाज देने पर एक बच्चा पास आता है। क्या नाम है? अनिल तोपनो। कितना उम्र है? 15 साल। पढ़ाई नहीं करते। नहीं। कब से काम कर रहे हो। अभी पांच दिन हुए हैं।
प्रकृति पर टिकी पार्क की पूरी संरचना
बता दें कि लालखटंगा और घरखटंगा के बीच बन रहे इस जैव-विविधता पार्क की संरचना प्रकृति पर ही टिकी है। यहां 105 से अधिक देशज प्रजातियां हैं। इसके अलावा कई दुर्लभ पौधे भी हैं, जो बाहर से लगाए गए हैं। कई छोटे-छोटे पार्क हैं, जहां औषधीय पौधे लगाए जा रहे हैं। इन सबके बीच तकरीबन दो सौ से भी अधिक मजदूर यहां काम कर रहे हैं। लाल खटंगा व घर खटंगा से करीब 90 फीसदी घरों के युवक यहां काम कर रहे हैं। निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे अजय बताते हैं, इन दो गांवों के अलावा बहुपीढी, भुसूर, जराटोली, हुडवा, रायटोली, बेड़टोली, कोचगम आदि गांवों से भी लोग यहां काम कर रहे हैं।
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