Tuesday, May 6, 2008

सायबर अपराध

भारत में पहली इंटरनेट सेवा की शुरुआत वी.एस.एन.एल. द्वारा 14 अगस्त, 1995 को हुई। लेकिन इंटरनेट पर होने वाले अपराधों को रोकने का पहला क़ानून (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000) 17 अक्तूबर, 2000 को लागू हुआ और देश में पहले सायबर पुलिस थाने की स्थापना बंगलोर में 4 सितम्बर, 2001 को हुई और पहले सायबर अपराधी आरिफ़ आज़िम की गिरफ्तारी 24 जुलाई, 2002 को हो पाई।

ज़ुर्म की शुरुआत उससे संबंधित क़ानूनों के बनने से पहले हो जाती है। नए क़ानून बनाने या पुराने क़ानूनों में संशोधन की जरूरत तब महसूस होती है जब किसी ज़ुर्म को पुराने क़ानूनों की मदद से रोकना असंभव हो जाता है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि क़ानून की मौजूदगी भी ज़ुर्म को होने से नहीं रोक पाती। ज़ुर्म करने वाले या तो क़ानूनों से अनजान होते हैं या फिर उनकी परवाह नहीं करते। क़ानून ज़ुर्म करने वाले के पीछे चलता है और अपराधी को पकड़ पाना तभी संभव हो पाता है जब क़ानून के कारिंदे अपराधी से अधिक तेज रफ्तार में उसका पीछा करते हैं। सायबर अपराधों के मामले में स्थिति कुछ और विचित्र है। यहां अपराधी अपने ठिकाने पर बैठे-बैठे ज़ुर्म को अंजाम देते हैं और सफेदपोश बनकर पुलिस की नजरों से ओझल रहते हैं। जब कोई अपराध करके भाग रहा हो तो पुलिस के लिए उसके मूवमेंट पर लगातार नज़र रखते हुए पकड़ लेना अपेक्षाकृत आसान रहता है, लेकिन जब अपराधी भाग नहीं रहा हो तो उसे पकड़ पाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती होती है।

सायबर अपराधियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलाने के मामले में एक बड़ी दिक्कत तो यह है कि न तो पुलिस इंटरनेट टेक्नोलॉजी में पर्याप्त प्रशिक्षित है, न वकील और न ही जज। वे क़ानून तो अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन टेक्नोलॉजी को नहीं। जबकि सायबर अपराधी टेक्नोलॉजी के मामले में अक्सर बेहतर प्रशिक्षित होते हैं। और, टेक्नोलॉजी इतनी तेज रफ्तार से आगे भागती है कि नया से नया क़ानून भी कुछ ही अरसे में अप्रासंगिक लगने लगता है। वर्ष 2000 में जब भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम नामक विशेष क़ानून लागू हुआ था तो इसे क़ानून के क्षेत्र में एक अत्यंत क्रांतिकारी और दूरगामी कदम माना गया, लेकिन कुछ ही वर्ष बाद यह क़ानून अपर्याप्त साबित होने लगा। लिहाजा उक्त क़ानून में संशोधन की जरूरत और मांग को देखते हुए एक विशेषज्ञ समिति के सुझावों के आधार पर काफी विचार-विमर्श के बाद सरकार ने 15 दिसम्बर, 2006 को लोक सभा के शीतकालीन सत्र में उक्त क़ानून में व्यापक संशोधन किए जाने के लिए एक विधेयक पुर:स्थापित किया है। हालांकि प्रस्तावित नए क़ानून के दायरे में सायबर अपराध के विभिन्न रूपों को लाने की कोशिश की गई है, लेकिन कहना मुश्किल है कि उनको लागू करा पाना प्रवर्तन एजेंसियों के लिए कहां तक संभव हो सकेगा। प्रस्तावित संशोधनों के कारगर सिद्ध होने पर अभी से संदेह व्यक्त किए जाने लगे हैं।

इंटरनेट से जुड़े अधिकांश अपराध चूंकि भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं, दूसरी राष्ट्रीयता वाले सायबर अपराधियों को अपने क़ानूनों के दायरे में ला पाना और उनपर मुकदमा चलाना बहुत मुश्किल होता है, भले ही ऐसा करने के लिए क़ानूनी उपबंध मौजूद हों। उदाहरण के लिए, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 75 (1) में कहा गया है -

….the provisions of this Act shall apply also to any offence or contravention committed outside India by any person irrespective of his nationality.

(…इस अधिनियम के उपबंध भारत से बाहर किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अपराध अथवा उल्लंघन पर भी लागू होंगे, चाहे उसकी राष्ट्रीयता कुछ भी हो।)

क़ानून की इस धारा का इस्तेमाल अमेरिका में बसे भारतीय मूल के युवक गौतम प्रसाद द्वारा दिसम्बर, 2006 में यूट्यूब.कॉम की वीडियो शेयरिंग सेवा के जरिए अपनी वेबसाइट पर महात्मा गांधी की वेशभूषा वाले एक व्यक्ति को अश्लील हरकतें करते दिखाए जाने के मामले में किया जा सकता था, लेकिन इस मामले पर देश भर में हुई व्यापक और तीव्र प्रतिक्रिया को सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संज्ञान में लाए जाने के बावजूद उसने इस मामले में कोई कार्रवाई करने की पहल नहीं की। जबकि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत इंडियन कंप्यूटर इमर्जेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी-इन) के पास इस मामले में समुचित कार्रवाई कर सकने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं। अलबत्ता उक्त वीडियो के कुछ अंश ख़बर के रूप में सीएनएन-आईबीएन तथा सहारा टी.वी. द्वारा दिखाए जाने पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उन दोनों न्यूज चैनलों को नोटिस जरूर भेज दिया।

राज्य सभा में प्रश्न काल के दौरान 15 मार्च, 2007 को संसद सदस्य जनेश्वर मिश्र द्वारा इस बारे में प्रश्न किए जाने पर संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री दयानिधि मारन का उत्तर था:

A website by the name http://youtube.com has hosted some objectionable content regarding Mahatma Gandhi. This said website is hosted on servers in United States of America. Information Technology Act, 2000 together with Indian Penal Code provides a legal framework to check misuse of websites and cyber crimes in India.

However, the websites hosted on the servers abroad are subject to the laws of those countries. This poses technological as well as legal issues in taking action against such websites.

(यूट्यूब.कॉम नामक एक वेबसाइट ने महात्मा गांधी के बारे में कुछ आपत्तिजनक सामग्री होस्ट की है। उक्त वेबसाइट संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित सर्वरों पर होस्ट है। भारतीय दंड संहिता के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत भारत में वेबसाइटों के दुरुपयोग और सायबर अपराधों को रोकने के लिए क़ानूनी कार्यढांचे का उपबंध है।

तथापि, विदेश स्थित सर्वरों पर होस्ट किए गए वेबसाइट उन देशों के क़ानूनों के अध्यधीन हैं। इसलिए ऐसी वेबसाइटों के विरुद्ध कार्रवाई कर सकने में प्रौद्योगिकीय तथा विधिक मुद्दों की अड़चनें है।)

इस मामले में बंगलौर स्थित एक गैर-सरकारी संगठन डिजिटल सोसायटी फाउंडेशन द्वारा कर्णाटक उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके भारत सरकार को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिए जाने की मांग की गई। इस मामले में 16 अप्रैल, 2007 को सुनवाई होनी थी, लेकिन फिलहाल यह सुनवाई कुछ और दिनों के लिए टल गई है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में इंटरनेट पर इस तरह की आपत्तिजनक सामग्री को प्रकाशित या प्रचारित करने के दोषी व्यक्तियों के लिए दंड का मौजूदा प्रावधान निम्नानुसार है:

67. Whoever publishes or transmits or causes to be published or transmitted in the electronic form, any material which is lascivious or appeals to the prurient interest or if its effect is such as to tend to deprave and corrupt persons who are likely, having regard to all relevant circumstances, to read, see or hear the matter contained or embodied in it, shall be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to two years and with fine which may extend to five lakh rupees and in the event of second or subsequent conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to five years and also with fine which may extend to ten lakh rupees.

लेकिन, प्रस्तावित नए विधेयक में उक्त उपबंध के साथ एक और उपबंध जोड़ते हुए निम्नानुसार दंड का प्रावधान भी किया गया है:

67A. Whoever publishes or transmits or causes to be published or transmitted in the electronic form any material which contains sexually explicit act or conduct shall be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to five years and with fine which may extend to ten lakh rupees and in the event of second or subsequent conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years and also with fine which may extend to ten lakh rupees.

इन उपबंधों के संदर्भ में निम्न स्पष्टीकरण भी जोड़ा गया है:

This section and section 67 does not extend to any book, pamphlet, paper, writing, drawing, painting, representation or figure in electronic form the publication of which is proved to be justified as being for the public good on the ground that such book, pamphlet, paper, writing, drawing, painting, representation or figure is in the interest of science, literature, art or learning or other objects of general concern; or which is kept or used bona fide for religious purposes.

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