Thursday, May 21, 2009

छोटी उम्र में बड़ी सफलता

सफलता उम्र की मोहताज नहÈ होती. अगर इससे इत्तेफाक नहÈ रखते तो मिलिए ऐसे ही एक शख्सीयत से. इनका नाम है आदिल बंदूकवाला. ानकी उम्र 26 साल है. लेकिन ओहदा सीइओ का है. एक छोटे शहर से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन 26 साल की उम्र में एक नहÈ , बल्कि दो दो कंपनियों के मालिक है. एक वेब कंसल्टेंसी फर्म लीडिंग माइंड्स तथा दूसरा रिक्रूटमेंट एजेंसी टैलेंट ओनियंस. अपनी सफलता के बारे में वे कहते हैं कि एंटरप्रेन्योरशिप के प्रति उनका लगाव शुरू से ही रहा है और यही मेरी सफलता का राज है. मैं बेलगांव का रहनेवाला हूं. जो कि बंगलुरू और मुंबई के मध्य स्थित है. स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद मैं कैट की परीक्षा में बैठा और इसके जरिये मुझे सिंबायोसिस के सेंटर फॉर मैनेजेंट एंड हयूमन रिसोर्स डेवलेपमेंट में दाखिला मिल गया, जहां मैंने एंटरप्रेन्योरशिप की पढ़ाई की. पहले वर्ष के तीन महीने में हम सी जिन्होंने इस विषय का चयन किया था, एक ी कक्षा में शामिल नहÈ हो पाये, क्योंकि इस विषय में कोई पढ़ाई नहÈ होती थी. इस बारे में हमने डीन से शिकायत की, तो हमें डीन ने कहा कि इस विषय में पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक ही मौजूद नहÈ है और सी छात्रों को दूसरे विषय में ट्रांसफर कर दिया जायेगा. उनके जवाब से हम सहमत नहÈ थे. आदिल ने दूसरे संस्थान का चयन कर लिया और वहां का वह टॉपर छात्र निकला. व्यवसाय संघर्ष एंटरप्रेन्योरशिप मेरे रक्त में है. मेरे पिताजी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी चलाते हैं और जब मैंने अपना कोर्स पूरा किया, तो मेरे लिये यह उचित था कि मैं अपना स्वयं का व्यवसाय शुरू करूं. इसलिए 2005 में मैंने अपने पिता से लोन लेकर लीडिंग माइंड नाम की एचआर फर्म की शुरुआत की. उसके बाद एजुकेशन कंसल्टेंसी की शुरुआत की, जिसे वेब एजेंसी में तब्दील कर दिया. इसके लिए मुझे अपने पिता से लोन लेना पडा, क्योंकि सरकारी बैंक ने लोन देने से इनकार कर दिया था. इस मामले में मैं ाग्यशाली हूं कि मेरा परिवार मुझे हमेशा सहयोग देता रहा. हालांकि मेरे पिताजी मुझे अपने व्यवसाय में शामिल होने को कहते रहे, लेकिन मैं उन्हें कुछ नया करने के लिए पांच साल का वक्त मांगता रहा. मेरा एक छोटा ाई जो कि पारिवारिक व्यवसाय से जुडा था, इसलिए मैं उसे पिता के व्यवसाय में लगाने का इच्छुक था. जब लीडिंग माइंड की शुरुआत हुई, तो ऐसा प्रतीत होता था कि यह एमबीए का कोचिंग इंस्टीट्यूट है. इसमें छात्रों को काउंसलिंग कोर्स की ट्रेनिंग और टेस्ट की सुविधा प्रदान की जाती थी. मैं तुरंत ही इस बात को समझ गया कि कंपनी की आमदनी वेबसाइट के निर्माण से अधिक हो रही है और धीरे-धीरे हमने इसे वेब कंसल्टेंसी फर्म में तब्दील कर दिया. दो साल बाद 2007 में बीपीओ जेनपैक्ट के वाइस प्रेसिडेंट से मेरी मुलाकात हुई और मैंने उनसे निवेदन किया कि वे अपनी कंपनी में कर्मचारियों के चयन के लिए हमारी कंसल्टेंसी फर्म की मदद करें. मैंने इसके बाद रिकू्रटमेंट एजेंसी में अवसरों को देखते हुए इस ओर ी ध्यान देना शुरू किया. एक साल में ही हमारे जरिये लगग दो सौ लोगों को नौकरी मिल गयी. हमारी कंपनी का एक ही क्लाइंट जेनपैक्ट था. शुरुआत काफी कठिन था, लोग हमें उतनी गंीरता से नहÈ लेते थे, क्योंकि हमारी कंपनी बेलगाम में थी, न कि मुंबई या दिल्ली में. मेरी उम्र ी केवल 22 साल थी. इसलिए अधिकांश व्यक्तियों को हमारे ऊपर विश्वास नहÈ होता था. इसके बाद हम अंबुजा सीमेंट और सीमैंस को ी अपनी सेवा देने लगे. और आज लगग 13 कंपनियां हमारी सेवाएं ले रही हैं. कुछ लोगों ने मुझमें विश्वास जताया, जबकि कुछ ने आलोचना की. लेकिन मैं सी का श्ुाक्रिया अदा करता हूं , क्योंकि इन बातों से मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला, जो मेरी कामयाबी में मददगार बना. आज लगग 13 कंपनियां हमारी सेवाएं ले रही हैं. कुछ लोगों ने मुझमें विश्वास जताया, जबकि कुछ ने आलोचना की. लेकिन मैं सी का श्ुाकि`या अदा करता हूं , क्योंकि इन बातों से मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला, जो मेरी कामयाबी में मददगार बना. दो कंपनियों को सीइओ बनने के बाद ी मैं रूका नहÈ. मैं किताबें पढने लगा और पीएचडी में दाखिला ी ले लिया. इस कोर्स के दौरान ी मुझे काफी कुछ सीखने का मौका मिला. मैं लिखने का शौकीन हूं, लेकिन आपको पहचान तब तक नहÈ मिल सकती,जबतक आपके पास पीएचडी की डिग`ी नहÈ हो. विष्य में मेरी इच्छा मैकिंटॉस कंपनी के लिए सॉफ्टवेयर बनाने की है. ारत में बहुत कम ही लोगों को इस कंपनी के बारे में मालूम हैं. विष्य में मेरी योजना टैलेंट ओनियंस को देश के वििé शहरों में स्थापित करने की है. अधिकांश युवा बिजनेसमैन की तरह मैं मुंबई और दिल्ली में रहने के बजाय अपने शहर में ही रहना पसंद करता हूं. मैं अपने छोटे शहर को बहुत प्यार करता हूं. जो सफल बिजनेस मैन बनना चाहते हैं, उनके बारे में मैं यही कहना चाहूंगा कि स्कूल में हमें सिखाया जाता है कि हारना कोई बुरी बात नहÈ, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि हर कोई जीतने के लिए खेलता है और सी को केवल जीतने के ही उद्देश्य से काम करना चाहिए. अधिकांश लोग छह महीने में ही व्यापार से मुनाफा कमाने की सोचने लगते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि कोई ी व्यापार शुरुआती दौर में मुनाफा नहÈ दे सकता है. इसके लिए धैर्य रखने की जरूरत है. अपने सपने में विश्वास कीजिए, काम करते रहिए, सफलता जरूर मिलेगी.

1 comment:

Unknown said...

dusra ka tap karke likh diya hai