sanjay kumar
मुजफरपुर से दिल्ली आने के बाद विष्य को लेकर कई उम्मीदें-आशंकाएं थÈ. मेरे लिए वे संघर्ष के दिन थे. यह संयोग ही था कि दिल्ली आते ही, जिसके यहां मैं ठहरा, उसने अगले दिन ही मुझे टîूशन दिलवा दिया. मैंने ी खर्चे निकालने के लिए टîूशन करना जरूरी समझा. टîूशन की मामूली अनियमित आय के बीच मैं अपनी ावी Çजदगी के छोटे-छोटे सपने बुनने लग गया. चूंकि मैं पहली बार अपने छोटे शहर से रोजगार की तलाश में बाहर निकला था, इसलिए छोटी-छोटी तकलीफें, छोटे-छोटे अाव मुझे काफी दुख पहुंचाते थे. सोचा था एक अच्छे संस्थान में कोई अच्छा सा पाठîक्रम में दाखिला लूं. घर से चलने पर कुछ पैसे थे, मेरे पास. वह ी धीरे-धीरे खर्च हो गये. मैंने पास के स्टॉल से रोजगार समाचार लिया. उसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में Çहदी पत्रकारिता पाठîक्रम के लिए विज्ञापन निकला था. जिसके यहां मैं ठहरा था, मैंने उससे रिक्वेस्ट किया, तो उसने मेरे लिये फार्म ला दिया. फॉर्म के साथ 150 रुपये का डाट ी जमा करना था. मेरे पास कुल 200 रुपये बचे थे. मैंने पास के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ब्रांच में जाकर डाट बना लिया. आवेदन का वह आखिरी दिन था. 2 बजे का समय ी निर्धारित था. मेरे पास कुल 50 रुपये थे. शालीमार बाग से धौला कुंआ तक जाने का बस किराया 10 रुपया बैठता था. मैंने हिसाब लगाया, 20 रुपये में काम निपट जायेगा. आखिरकार मैं पत्रकारिता विाग में पहुंच गया. पहली बार इस रास्ते से जाने के कारण मैं लेट हो चुका था. मैं एक बजे वहां पहुंचा था. विाग में जैसे ही मैंने अपने सारे डॉक्यूमेंट निकाले, मैं दंग रह गया. डॉक्यूमेंट के साथ 150 रुपये का डाट नहÈ था. मैंने याद किया. कहÈ गिर तो नहÈ गया. फिर याद आया, अरे मैं तो घर पर ही ूल गया. मेरे पास एक घंटे ही शेष थे. स्टाफ ने कहा डाट नहÈ लाये, जाओ जल्दी से डाट बनाकर ले आओ. मैंने बैंक का लोकेशन पूछा. बैंक कैंपस के अंदर ही था. मैं ागा-ागा बैंक के अंदर गया. एक बार फिर निराश हो गया. मेरे जेब में तो मात्र 40 रुपये ही थे. बैंक के अंदर ही सोफे पर मैं बैठ गया. अपने नसीब को कोसने लगा. क्या करूं? कैसे घर लौटूं? एडमिशन तो हो नहीं पाया. घरवाले सुनेंगे, तो कितना खराब लगेगा. कितना कोसेंगे वे? लगग 20 मिनट मैं सोचता रहा. ती सिर पर किसी ने हाथ फेरा. मैंने सामने देखा. क्या हुआ? ऐसे क्यों बैठे हो? उस अनजान व्यक्ति ने मुझसे पूछा. मैंने उससे एक ही सांस में सबकुछ बता दिया. उसने झट 200 रुपये निकाले और अपने हाथों से फॉर्म ी र कर जमा करा दिया. 50 रुपये देते हुए कहा, तुम ी किसी और की मदद कर देना. मेरा हिसाब चुकता हो जायेगा. मैं उससे पता और फोन नंबर मांगते रहा, लेकिन उसने नहÈ दिया. उसे जल्दी थी, वह चला गया. बाद में उससे की मुलाकात नहÈ हुई. प्रवेश परीक्षा के बाद साक्षात्कार में ी मैं सफल हो गया. संघर्ष तो आज ी है, लेकिन पीछे मुड़कर देखता हूं, तो आज ी उस आदमी का चेहरा याद आता है.
4 comments:
बहुत ही अच्छा लगा पढ़कर --- सचमुच कभी कभी फरिश्ते खुद चल कर हमारे पास आc जाते हैं, आप के साथ भी ऐसा ही हुआ।
ब्लागिंग के मैदान में उतरने की बहुत बहुत बधाईयां एवं ढ़ेरों शुभकामनायें।
बहुत ही अच्छा संस्मरण .....ऐसी ही कुछ घटनाएं आश्वस्त करती है कि मानवता जीवित है और सही समय पर लोगों का भला करने के लिए ऐसे लोग सामने आ ही जाते हैं।
संजयजी
बहुत मर्मस्पर्शी और प्रेरनादायी प्रसंग आपने सुनाया.
ऐसे प्रेरक प्रसंग बुनियादी मानवीय मूल्यों men विश्वास की पुनर्स्थापना करता है.
आपके ब्लॉग से ये लगा की आपने में सिखने की लगन है . लगे रहें.हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य उज्जवल है. ज्ञान के साहित्य की अक्सरहां उपेक्षा हो जाती है.
हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं.
एक निवेदन: कृप्या वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें तो टिप्पणी देने में सहूलियत होगी.
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