Tuesday, May 6, 2008

क्या है सबप्राइम संकट?

भारत सहित दुनिया भर के शेयर बाजार धड़ाधड़ गिरे जा रहे है। दलाल स्ट्रीट एक तरह से हलाल स्ट्रीट बन गया है, जहाँ निवेशक मुर्गों की तरह काटे जा रहे है। दुनिया भर के शेयर मार्कॆट आजकल एक ही गाना गा रहे है, "डूबा डूबा रहता हूँ……….. " , |इन सबकी वजहे तो कई है, लेकिन सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है अमरीका मे आया सबप्राइम संकट। इस शब्द का बहुत ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। कई कई लोग तो इसके बारे मे जानते तक नही कि ये है क्या चीज और ऐसा हुआ क्यो और दुनिया भर के बाजार इससे क्यों प्रभावित हुए। आइए कुछ जानते है सबप्राइम के बारे में।

सबप्राइम क्या है?

इसकी परिभाषा (अंग्रेजी की विकिपीडिया से उठाया गया) कुछ इस प्रकार है:

Subprime lending (also known as B-paper, near-prime, or second chance lending) is the practice of making loans to borrowers who do not qualify for the best market interest rates because of their deficient credit history. The phrase also refers to banknotes taken on property that cannot be sold on the primary market, including loans on certain types of investment properties and certain types of self-employed individuals.

जैसा कि हम सभी जानते है कि एक बैंकर का काम होता है अपने ग्राहकों की जमाराशि पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमाना ताकि ग्राहकों को अच्छा ब्याज और सेवाएं देकर बांधकर रखा जाए। बैंक जमाराशि को कई योजनाओ मे निवेशित करते है और कई व्यक्तियों/संस्थाओं को ब्याज पर पैसा भी देते है। अमरीका मे आपको कोई भी बैंक तभी पैसा देता है जब आपकी क्रेडिट हिस्ट्री अच्छी हो, यानि आप पैसा चुका पाने की क्षमता मे हो। लेकिन यदि आपकी क्षमता अच्छी नही होती तो भी आपको पैसा मिल सकता है कि लेकिन ब्याजदर काफी ऊंची होगी, क्योंकि यह उधारी काफी जोखिम भरी होगी। ज्यादा मुनाफ़ा कमाने के चक्कर मे अक्सर बैंक सबप्राइम लैंडिग यानि ऐसी उधारी बाँट देते है, जो काफी जोखिम भरी होती है। ये देनदारिया हाउसलोन्स,रिफ़ाइनेंसिंग, कार लोन्स और क्रेडिट कार्ड लोन्स के रुप मे दी गयी थी। अमरीका मे ऐसा ही हुआ, सिटीबैंक ने ऐसी ढेर सारी उधारी बाँट दी, जो देनदार वापस नही चुका सके। फिर? जेल मे डालों उनको…..का बात करते हो बबुआ, अमरीका है, इंडिया थोड़े ही है, कि आप उधार के पैसे नही चुकाओगे तो सिटी बैंक अपने गुंडे सॉरी कलैक्शन एजेन्ट भेज देगा।

अमरीका के कानून के हिसाब से भी आप देनदार को ज्यादा परेशान नही कर सकते, ऊपर से अमरीका मे चुनाव का वर्ष चल रहा है, इसलिए सरकार बीच मे कूद पड़ी और सिटीबैंक को सबप्राइम की वजह से घाटा सहना पड़ा और उसके चीफ़ एक्जीक्यूटिव को इस्तीफ़ा भी देना पड़ गया। हालात तो यहाँ तक बिगड़ गए थे कि सिटीबैंक दिवालिया होने की कगार पर आ गया था, अब मध्यपूर्व एशिया के कुछ शेखों ने वहाँ पर करोड़ो डालर लगाएं है, ताकि अमरीकी आका को खुश किया जा सके और इस चुनावी वर्ष में अमरीका को इस सबप्राइम संकट से बचाया जा सके। इस तरह से अमरीकी अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ़ जा रही है। लेकिन वहाँ पर अभी एक और संकट आने वाला है, वो है क्रेडिट कार्ड डिफ़ाल्टर संकट, अब इस बारे मे अगली तिमाही तक ही कुछ सही पता चल सकेगा। खैर…..आगे पढिए।


तो ये अमरीका का निजी संकट हुआ ना, वो झेले, हम काहे भरें?

आपका सवाल और खीझ वाजिब है, ये अमरीका की निजी समस्या है, कल्लू धोबी की जिन्दगी भर की कमाई काहे डूबे शेयरमार्केट मे वो भी इस अंकल सैम या उन टुच्चे अमरीकियों के चक्कर में, जो पैसा डकार गए। देखा भैया, दुनिया एक गाँव है, हर देश की अर्थव्यवस्था दूसरे की अर्थव्यवस्था से प्रभावित होती है। फिर अमरीका दुनिया का दादा है। दुनिया भर के अमीरों के पैसे अमरीका मे जमा पड़े है। अमरीका दुनिया मे से सबसे ज्यादा माल मंगाता है। फिर क्या है ना अमरीका दादागिरी करता है, मोहल्ले के दादा के घर मे बत्ती ना आए, तो दूसरे के घर मे रोशनी हो सकती है क्या भला? अब शेखों को ही देखो, मरते क्या ना करते, बेचारो ने भरा है ना अमरीकियों का कर्ज, सिटीबैंक मे पैसा लगाया है कि नही।


लेकिन दुनिया भर के शेयर बाजार क्यों गिरे?

दुनिया भर के शेयर बाजारों मे अमरीकी संस्थागत निवेशकों के पैसे लगे हुए है। सिटी बैंक भी एक संस्थागत निवेशक है। अब अगर अमरीकी अर्थव्यवस्था धीमी या मंदी होगी तो दुनिया भर के बाजारों पर असर तो पडेगा ही ना। अब भारत के शेयर मार्केट मे संस्थागत निवेशको का बहुत पैसा लगा हुआ है, एक तरह से देखा जाए तो लगाम उन्ही के हाथों मे है। इन्होने यहाँ अच्छा पैसा भी कमाया है। इन्ही एफ़आईआई द्वारा चवन्नी अठन्नी (अमरीकी चवन्नी की बात हो रही है) मे खरीदे हुए शेयरों को लोग आज सौ दो सौ रुपए पर भी खरीद कर गर्व महसूस करते है। तो खुद ही समझ लो, कि इन संस्थागत निवेशकों का मुनाफ़ा कितना ज्यादा होगा। अब इन्होने कमाया कि नही पैसा भारतीय बजार से। अब अगर अमरीकी अर्थव्यवस्था मे मंदी के संकेत है तो अमेरिकी बैंकों को भारी नुकसान हुआ और वहां के बाजार टूटते गए। नुकसान पूरा करने के लिए अमेरिका के बड़े फंड और बैंक दूसरे बाजारों में मुनाफावसूली कर रहे हैं। विश्वव्यापी बाजारों मे मंदी के डर की वजह से सभी संस्थागत निवेशक अपना पैसा गिरते बाजारों से निकालकर अपने हाथ मे रखना चाहते है, ताकि सही समय पर सही जगह पैसा लगाया जा सके। सिटीबैंक ने भी अपनी ढेर सारी होल्डिंग्स को बाजार मे बेचा है। अब शेयर ट्रेडिंग मे क्या होता है कि ये खुजली की बीमारी है, जब जब संस्थागत निवेशक बेचते है, बाकी सभी भी बेचने लगते है और देखादेखी मे बाजार भड़भड़ाकर नीचे आ जाते है। अब अगर एक देश का बाजार नीचे आता है तो पूरे क्षेत्र के बाजार दहशत मे आ जाते है। शराफ़त की भाषा मे इसे दूसरे बाजार से क्लू लेना बोलते है। जापान अमरीका से क्लू लेकर, सिंगापुर, चीन, मलेशिया, भारत और यूरोप बाजार को देता है, और ये बाजार ऐसे ही क्लू लेते हुए, अमरीका बाजार को टिका देते है, जो फिर उस दिन गिरकर, जापान को अगले दिन का क्लू दे देता है, और ये सिलसिला तब तक जारी रहता जब तक निवेशकों का डर समाप्त नही होता।


भारतीय अर्थव्यवस्था का क्या?…….उसके बारे मे अगली पोस्ट मे, सारा इसी मे लिखवा लोगे क्या? अर्थव्यवस्था पर ये मेरा पहला लेख है, आपको कैसा लगा, जरुर बताइएगा। जाते जाते एक डिसक्लेमर : इस बाजार मे लेखक के भी पैसे डूबे है, अगर अमरीकी अंकल डूबते हुए लोगों को पैसे बाँटे तो हमको भी बता देना।किसी ने निकले तो हमारे भी निकलवा देना।

1 comment:

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