Thursday, July 31, 2008

घट रही है समझौता करने की प्रवृित्त

संजय कुमार
byline
परिवार में बढ़ रहे बिखराव को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय की टिप्पणी उल्लेखनीय हैण् यह समाज में बढ़ रहे नैतिक मूल्यों में हृास को इंगित करता हैण् दरअसल, सर्वाेच्च न्यायालय ने 1955 में बने Çहदू विवाह अधिनियम के संदZ में यह कहा है कि तलाक और दांपत्य जीवन बहाल करने का यह कानून अंग्रेजों के समय में बनाया गया है जबकि आज की परिस्थितियां काफी कुछ बदल चुकी हैंण् इस कानून में समय के साथ कई बार फेरबदल किये गयेण् लेकिन यह कानून परिवारों को जोड़ने की बजाय उन्हें विखंडित व पति-पत्नी के बीच अलगाव बढ़ाने का कारण बन रहा हैण् यह बच्चों के दीघZकालिक स्वस्थ विष्य के लिहाज से सही नहÈ हैण् समाज के बदलते माहौल पर Çचता जताते हुए न्यायालय ने पूर्वजों के रीति-रिवाजों और पारिवारिक कायदों की याद दिलाते हुए कहा कि पुराने जमाने में हमारे पूर्वज आपस में ऐसे मामले स्वयं की पहल से बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया करते थे, लेकिन आज के समय में कानूनी आड़ लेकर तलाक जैसे मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखने को मिल रही हैण्
दरसअल, सर्वाेच्च न्यायालय किसी ी मसले पर दो तरह से अपनी राय या निर्णय रखती हैण् पहला किसी मुद्दे पर और दूसरा विचारो की अिव्यक्ति परण् सर्वाेच्च न्यायालय ने तलाक के मामले और परिवार के बिखराव को लेकर जो विचार रखे हैं, वह एक अच्छा कदम हैण् सर्वाेच्च न्यायालय ऐसे मामलों पर गहन छानबीन कर ही कोई निर्णय देती हैण् पारिवारिक कलह जब अदालत में पहुंचता है, तब न्यायालय परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेती हैण् पारिवारिक कलह से तंग आकर अदालत में तलाक की अजÊ देनेवाले मामले ी कई प्रकार के होते हैंण् मसलन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका उद्देश्य ही तलाक लेना होता हैण् जबकि कई मामलों में इसकी वजह संपित्त, जाति, नौकरी, कैरियर आदि होता हैण् न्यायालय ी पहले दोनों पक्षों को मामले को खुद निपटाने के लिए समय देती हैण् तलाक का कोई ी मामला सामने आने पर जज की पहली कोशिश उस रिश्ते को बचाने की होती हैण् इसके लिए दोनों पक्षों की काउंसÇलग ी करवाई जाती हैण् इस प्रक्रिया के असफल होने के बाद न्यायालय पति-पत्नी के आरोप-प्रत्यारोपों को सुनती है और सारे सबूतों पर विचार करने के बाद दंपति को अलग होने की अनुमति देती हैण् किसी ी निर्णय को लेते समय न्यायालय बच्चे की इच्छा और विष्य को केंद्र में रखती हैण् वह उन सी पहलुओं पर गौर करती है, जिससे कि बच्चे का विष्य खराब न होण् हां, कानून की आड़ में कुछ लोग इसका दुरुपयोग जरूर कर रहे हैं, जो Çचताजनक हैण्
ारतीय परिवारों में बिखराव की कई वजहें हैंण् जैसे- जैसे नगरीकरण और शहरीकरण की गति बढ़ रही है लोगों में गांव से शहर की ओर रुख करने की प्रवृित्त बढ़ी हैण् स्थान परिवर्तन होने से संयुक्त परिवार एक साथ नहÈ रह पाते हैंण् उनपर एक तरह का दबाव होता हैण् आर्थिक दबाव मुख्य वजह है स्थान परिवर्तन के लिएण् एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने से पति और पत्नी के बीच दूरी बढ़ती हैण् बढ़ते खर्च और आर्थिक तंगी की वजह से पति-पत्नी दोनों रोजगार करने पर मजबूर होते हैंण् इसके अलावा प्रतिस्पद्धाZत्मक मनोवृित्त ी बढ़ रही हैण् यह एक दुविधाजनक स्थिति होती हैण् इससे पारिवारिक स्तर पर कई तरह के बदलाव आता हैण् स्थान परिवर्तन से परिवेश बदलता हैण् परिवेश व्यक्ति की मनोवृित्त को बदलती हैण् जिस कारण दोनों पक्षों में समझौता करने की प्रवृित्त का हृास हो रहा है, सहनशीलता और सहिष्णुता की ावना घटी हैण् ऐसे में दो व्यक्तिगत अहं के बीच टकराव बढ़ता हैण् एक-दूसरे के साथ बंधे रहने की प्रवृित्त में कमी आती हैण् सहनशीलता की कमी अलगाव को प्रेरित करता हैण् पारिवारिक मूल्यो में परिवर्तन व क्षरण की प्रवृित्त ने ी अलगाव को प्रेरित किया हैण् आर्थिक निZरता, शिक्षा स्वािमान, कामयाबी महत्वाकांक्षा ी इसमें प्रमुख कारक है, जो बिखराव के लिए जिम्मेवार हैण् आज परिवार का दायरा सिमटता जा रहा हैण् यह ी देखने को मिल रहा है कि आर्थिक मजबूरी के कारण वृद्धों को अकेलेपन की Çजदगी जीना पड़ता हैण् इसका एक पक्ष यह ी है कि समाज की परिाषा बदल रही हैण् बिरादरी का दबाव अब मायने नहÈ रख पा रहा हैण् पहले शादी-ब्याह जैसे रिश्तो पर बिरादरी का दबाव होता थाण् दूसरी जाति या धर्म में शादी करने पर बिरादरी से निकाले जाने का डर रहता थाण् हालांकि हम यूं नहÈ कह सकते कि हमारे समाज में बिरादरी प्रथा समाप्ति की कगार पर हैण् आज ी देश के बड़े हिस्से में बिरादरी का अस्तित्व हैण् स्थान परिवर्तन होने के बावजूद युुवा अपनी जाति बिरादरी और समाज से जुड़े हुए हैण् वह बहुत स्वतंत्र होकर अपना निर्णय शायद ही ले पाते हैंण् यह सही है कि उदारीकरण के कारण पाश्चात्य संस्—ति का प्राव हमारे समाज पर पड़ा है, लेकिन पश्चिम के देशों की तुलना में हमारे यहां अी ी परिवार का बिखराव कम हैण् परिवार के बिखराव में कई आर्थिक और सामाजिक मानसिक दबाव अहम ूमिका निाते हैंण् पश्चिम के बनिस्बत हमारे देश में ग्रामीण आबादी अधिक है, जो परंपरागत व्यवसाय से जुड़े हैंण् यही कारण है कि हमारे देश में सहनशीलता, अपने माता-पिता और समाज के प्रति युवाओं में श्रद्धााव अधिक है, जबकि पश्चिम में व्यक्तिवादी सोच और ौतिकतावादी प्रवृित्त के चलते युवाओं में परिवार और समाज की बजाय व्यक्तिगत उपलब्धि अधिक महत्वपूर्ण होता हैण् सामूहिकता से व्यक्तिवादी सोच के नजरिये ने समाज और परिवार को अलग कर दिया हैण् परिवार के बिखराव को रोकने के लिए मूल्य आधारित सोच व शिक्षा को आधार बनाया जा सकता हैण् स्वार्थपरकता को मूल्यपरकता में बदलना होगाण् इस समस्या के समूल निदान के लिए कानून की बजाय समाज की समग्रतावादी समन्वय की ावना कहÈ अधिक महत्वपूर्ण हैण्
आज युवाओं को समाज और परिवार के अस्तित्व में ही खुद के अस्तित्व को तलाशने की जरूरत हैण् किसी ी समाज की उéति उस समाज में रह रहे लोगों के बीच परस्पर रिश्ते और सम्मान ावना से ही होती हैण् वर्तमान आर्थिक बाजारवादी परिवेश ने रिश्तों का ी बाजारीकरण कर दिया हैण् आज लोग लम्हों की खुशी को अधिक महत्व दे रहे हैंण् आने वाली पीढ़ी के समाजीकरण की दिशा में सोचने के लिए आज माता-पिता के पास समय नहÈ हैण् सब के सब आपाधापी के बीच अलग-थलग जीवन जी रहे हैंण् इस कारण आज समूह में रहने की प्रवृित्त घटी हैण् इसी का नतीजा है जो परिवार और व्यक्ति के बिखराव के रूप में सामने आ रहा हैण्
यागेंद्र सिंह से बातचीत से बातचीत पर आघारितण्

No comments: