संजय कुमार
वर्तमान में जिस तरह का राजनीतिक समीकरण उरकर सामने आया है, उससे यह कहना कि वाम समर्थित और अचानक मुख्य केंद्र में आयी मायावती की अगुवाइवाली नवगठित तीसरा मोर्चा किसी कामयाब मंजिल को तय कर पायेगी, संदेहास्पद हैण् दरअसल, इस नये तीसरे मोर्चे का गठन बुलबुले और हताशा से अधिक प्रेरित हैण् यह तीसरा मोर्चा किसी ठोस बुनियाद पर नहÈ खड़ा हैण् इसमें शामिल क्षेत्रीय दल ी मौकापरस्त राजनीति के मातहत एक झंडे के तहत शामिल हुए हैंण्
इस नवगठित तीसरे मोर्चे के विष्य की बात करें, तो कोई सार्थक उपलब्धि मुझे नहÈ दिखायी देताण् तेलगू देशम पार्टी जो कल तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गंठबंधन का अंग थीण् इस मोर्चे में शामिल जरूर हुई है, पर उसके अपने राजनैतिक सैद्धांतिक बाध्यताएं हैंण् वह कबतक इस मोर्चे को सहयोग करेगी, यह देखनेवाली बात होगीण् जहां तक वामपंथियों का सवाल है, जिस तरह के समीकरण अी दिख रहे हैं, उनका आधार आनेवाले चुनाव में खिसकेगाण् केरल व पश्चिम बंगाल के पिछले परि.श्य पर नजर डाले, तो यह स्पष्ट दिखता हैण् वैसे ी कांग्रेस ने वामपंथियों के लिए दरवाजे अी बंद नहÈ किये हैंण् कोई वजह नहÈ मौकापरस्त सत्ता संस्—ति आनेवाले दिनों में वामदलों को कांग्रेस के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित न करेंण्
यह कहना कि तीसरा मोर्चा केंद्र की राजनीति में ती स्थायित्व पा सकता है, जब तक कि बड़ी पार्टियां कांग्रेस या ाजपा कोई एक समर्थन न करेंण् चंद्रशेखर की सरकार जिस तरह के समीकरण के साथ सत्ता में आयी, वैसे हालात अी तो नहÈ दिखतेण् सवाल यह है कि क्या कांग्रेस चार-साढ़े चार वर्ष केंद्र की सत्ता पर काबिज रहकर 6-8 महीने बाद आगामी चुनाव में तीसरे मोर्चे से सहयोग करने के तैयार होगीण् आखिर वह जनता के बीच क्या लेकर जायेगीण् ाजपा ी अी अपने आपको कमतर नहÈ मान रही हैण् वह ी फिलवक्त अपने आप को बेहतर मान रही हैण् ऐसे में तीसरे मोर्चे को कोई सपोर्ट मिलेगा, सवाल ही नहÈ उठताण् तीसरे मोर्चे के अभ्युदय तथा इसकी मजबूती को लेकर चर्चाएं हो रही हैं, वह हवाई किला बनाकर अखबारों की सुिर्खयों में बनाने का एक कुप्रबंध हैण् हालांकि इसकी वजह से बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती को थोड़ा ला जरूर मिला हैण् एक सशक्त नेतृत्व बताकर अपने को प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करने का ला मायावती को दूसरे राज्यों तक विस्तार करने के लिए मौके जरूर प्रदान किये हैंण् लेकिन आनेवाले चुनाव में मायावती को यह कितना ला पहुंचायेगी, इस पर संदेह हैण् वंचितों के बीच दलितों का सवाल उठाकर वह सहानुूति व ावनात्मक जुड़ाव लाने के लिए वह हमेशा से इस तरह की बातें करती रही हैंण् लेकिन प्रधानमंत्री का ख्वाब उसके लिए एक हसीन सपने जैसा हैण् दूसरे वामदलों के साथ सबसे मुश्किल यह है कि वह सिद्धांवादी होने का दं तो रते हैं, लेकिन अपने को केंद्र में नहÈ लातेण् वरना मायावती की तरह प्रकाश करात ी अपने आप को प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार के रूप में पेश करते नजर आतेण् वामदलों का जनाधार काफी नपा तुला और फिक्स हैण् इस बात की पूरी संावना है कि आनेवाले चुनाव में उसका जनाधार खिसकेगाण् इसके अलावा जो ी दल है, वह बरसात के पानी की तरह हैण्
इतिहास में जायें, तो की ी चुनाव में विदेश नीति बड़ा मुद्दा बनकर नहÈ आया हैण् किसी ी दल को इसका ला नहÈ मिला हैण् हां, युद्ध जैसी बात हो, शांति-सद्ाववाली बात हो, पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश से जुड़ा कोई मसला हो तो इसका ला मिलता हैण् जैसा कि 1973 तथा 1998-99 के कारगिल प्रकरण के समय हम देख चुके हैंण् चुनाव में वामदल आखिर क्या मुद्दा लेकर जायेंगे? बसपा को पिछले चुनाव में ला मिला, तो इसके पीछे चारकोणीय प्रतिद्वंद्विता (बसपा, सपा, ाजपा तथा कांग्रेस) थीण् यदि आगामी चुनाव में सपा कांग्रेस के साथ गंठजोड़ कर लेती है, तो उसे कितना ला मिल पायेगा, यह देखनेवाली बात होगीण् यह ी एक तथ्य है कि न तो बसपा साम्यवादियों को ला पहुंचा सकती है, न ही साम्यवादी उसेण्
इनकी एकजुटता कितने समय तक बनी रहती है, इस पर ी संदेह हैण् हालिया राजनीतिक घटनाक्रम से वामपंथियों ने ी अपने मौकापरस्त चरित्र को सामने ला दिया हैण् दूसरी तरफ बसपा तो पहले से ही कहती रही है कि जो हमे सत्ता में हिस्सेदारी देगा, हम उसके साथ हो लेंगेण् उसकी अपनी कोई आइडियोलॉजी या सिद्धांत नहÈ हैण् उत्तर प्रदेश या हरियाणा के अन्य छोटे दल कितना हद तक सहयोग कर पायेंगे, इस पर शक ही हैण्
दरअसल, तीसरा मोर्चा एक ऐसा बास्केट बन गया है, जहां हर कोई की ी आ सकता है, की ी बाहर हो सकता हैण् छोटे दलों या निर्दलियों की पूछ दशक में की कार ही आता हैण् नरसिंह राव के जमाने में झामुमो ने सरकार बचाने के लिए अपनी बोली लगायी थीण् दूसरा वाकया हमने इस बार देखा हैण्
विगत में तीसरा मोचा± यदि कामयाब नहÈ हुआ है, तो इसके पीछे सबसे बड़ी सिद्धांतविहीन राजनीति हैण् वििé धारा व सोचवालों के लिए यह अंदर-बाहर होते रहने का एक जरिया बनकर रह गया हैण् इसमें अधिकतर शोषित तबके ही आते हैंण् जिनका उद्देश्य मौकापरस्त राजनीति का ला उठाना होता हैण् एक सशक्त नेतृत्व का अाव ी इसके विघटन का कारण बनता रहा हैण्
पुष्कर राज, राजनीतिक विश्लेषक से बातचीत पर आधारितण्
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