Thursday, July 31, 2008

खेती, किसान और खाद्य संकट

संजय कुमार
byline
जीडीपी में —षि की हिस्सेदारी मात्र 18 फीसदी
ारतीय अर्थव्यवस्था पिछले पांच सालों से 8ण्5 फीसदी औसत की गति से तेजी से विकसित हो रही हैण् लेकिन यह विकास दर निर्माण उद्योग और बढ़ते सेवा क्षेत्र तक ही सीमित हैण् दूसरी ओर पिछले पांच सालों में —षि क्षेत्र में मुश्किल से मात्र 2ण्6 फीसदी विकास हुआ है और पिछले डेढ़ दशक में इसकी विकास दर की प्रवृित्त देखी जाये, तो यह दर गिरी ही हैण् परिणामस्वरूप, अनाज (गेहूं और चावल) की प्रति व्यक्ति पैदावार वर्तमान में ी लगग उसी स्तर पर है, जितनी कि 1970 में हुआ करती थीण् इस समस्या ने गंीर रुख ले लिया है, क्योंकि ारत के 1ण्1 अरब लोगों के 60 फीसदी की जीविका खेती से ही चलती हैण् देश के सकल घरेलू उत्पाद में —षि की हिस्सेदारी 1982-83 में 36ण्4 प्रतिशत से घटकर 2006-07 में 18ण्5 प्रतिशत रह गयी हैण्
नाजुक स्थिति में अनाज ंडार
केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के अनुसार ी देश में गेहूंं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर से नीचे जा पहुंचा हैण् ताजा आंकड़ों के अनुसार सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का ंडार न्यूनतम स्तर दो करोड़ टन से कम हैण्
अनाज का सुरक्षित ंडार न्यूनतम 20 मिलियन टन होना चाहिए, लेकिन जनवरी माह में यह सिर्फ 19ण्2 मिलियन टन ही थाण् वहÈ जनवरी 2004 में यह स्टॉक 24ण्4 मिलियन टन थाण् हालांकि ारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के अनुसार ारत में अनाज की कमी नहÈ हैण् निगम के पास गेहूं का 55 लाख टन का ंडार हैण् —षि उत्पादों में कमी को देश में अनाज के ंडारों की स्थिति से समझा जा सकता हैण्
छह साल पहले हमारा अनाज ंडारण रिकॉर्ड स्तर का थाण् तब नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमत्र्य सेन ने कहा था कि अगर सरकारी संस्था ारतीय खाद्य निगम के गेहूं और चावल के सी बोरों को एकसाथ रख दिया जाये, तो यह ढेर चांद तक पहुंच जायेगाण् पिछले तीन सालों में कम उत्पादन और निर्यात की वजह से अनाज ंडारों में काफी कमी आई हैण्
—षि के प्रति उदासीन रवैया
ारतीय किसान खासतौर पर असुरक्षित है, क्योंकि देश में कुल —षि योग्य ूमि के 60 फीसदी हिस्से को Çसचाई के लिए पानी नहÈ मिलताण् इसके लिए उन्हें चार महीने के मानसून पर ी निZर रहना पड़ता है, जिस दौरान पूरे साल की 80 फीसदी वषाZ होती हैण् इससे पहले ारत में की अनाज की इतनी कमी नहÈ रहीण् तब ी नहÈ जब 1943 में बंगाल में 15 लाख से ी ज्यादा लोगों के ूख से मर जाने का अनुमान लगाया गया थाण् दाल और चावल बहुत से ारतीयों का मूल ोजन है, तब और आज की समस्या एक ही है - उचित मूल्य पर ोजनण्
ारतीय —षि का वर्तमान संकट बहुत से कारकों की वजह से है जैसे- खेती के उत्पादन में कम विकास, पैदावार का उचित मूल्य न मिलना, अनाज संग्रह और रखरखाव की उचित सुविधाओं की कमी और उसके कारण खराब हुए अनाज से होने वाला नुकसानण् जमीन का विाजन और ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर सिंचाई सुविधाओं में निवेश की कमी को ी दोषी ठहराया जा सकता हैण्
पूरे विश्व में है खाद्याé संकट
विश्व के कई देशों में गंीर सूखे की स्थिति और अनाज से जैव इ±धन के निर्माण पर जोर देने के कारण दुनिया में खाद्याé की आपूर्ति कम हो गयी हैण् इससे पूरा विश्व खाद्याé संकट की गिरत में हैण् गल्फ टुडे समाचार पत्र के अनुसार अनाजों की बढ़ती हुई कीमतों का प्राव अब सड़कों पर लोगों के प्रदर्शनों से दिखाई देने लगा हैण् पूरी दुनिया में सरकारें कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए आयात और अन्य उपायों का सहारा ले रही हैण् विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार करीब 33 देश बढ़ती हुई अनाज और तेल की कीमतों के कारण सामाजिक अशांति का सामना कर सकते हैंण् सूखे के कारण ऑस्ट्रेलिया को अपना गेहूं निर्यात कम करना पड़ा हैण् विश्व में गेहूं का ंडार 1979 के बाद से इस साल सबसे कम हैण् ारत, चीन और वियतनाम ने ी अपने चावल निर्यात में कमी की हैण् खाद्याéों की महंगाई से निपटने के लिए इंडोनेशिया ने आयात शुल्क में ारी कमी की हैण्
बढ़ाई जा सकती है पैदावार
ारतीय —षि अनुसंधान परिषद की वािर्षक रिपोर्ट (2007-08) तथा मई 2007 में —षि पर गठित नेशनल डेवलेपमेंट काउंसिल की सब-कमेटी द्वारा योजना आयोग को सौंपी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में पैदावार हालिया क्षमता को 40फीसदी बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते कि खेती के लिए पर्याप्त सुविधाएं व प्रोत्साहन दी जायेण् हाल के वर्ष में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के हिस्सों में गेहूं की पैदावार 3ण्5 से 4ण्5 टन प्रति हेक्टेयर हुई, जो कि चीन के 4ण्25 टन के बराबर है तथा अमेरिका(2ण्9 टन) तथा ऑस्ट्रेलिया(1ण्64 टन) के मुकाबले बेहतर हैण् रिपोर्ट में पैदावार क्षमता के संदZ में कहा गया है कि अकेले उत्तर प्रदेश में 9 मिलियन हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है, यह देश के कुल गेहूं में 12 मिलियन टन की हिस्सेदारी कर सकने में सक्षम हैण् वहÈ हरियाणा में 20 फीसदी तथा राजस्थान में वर्तमान क्षमता से 40 फीसदी अधिक उत्पादन किया जा सकता हैण्
बिहार के बारे में कहा गया है कि यह 3ण्8 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम है, वहÈ महाराष्ट्र 1ण्5 मिलियन टन तथा मध्यप्रदेश 6 मिलियन टन उत्पादन करने में सक्षम हैण् झारखंड में संावित उत्पादन और प्राप्त उत्पादन में काफी अंतर हैण् ारत के कुल धान उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा अकेले बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से संव हैण् इसी तरह 25 से 30 मिलियन टन चावल का उत्पादन अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश से संव हैण् —षि के पिछड़े क्षेत्रों में उत्पादकता की निम्न दर एक बड़ी समस्या हैण् कम उत्पादकता के लिए कई बाधाएं जिम्मेवार हैंण् इन कारणों में राज्य की —षि एजेंसियों द्वारा तकनीक के वितरण में कमजोरी, फसलों का गलत चयन, विविध किस्म की बीजों का समुचित उपयोग न होना, खाद का अपर्याप्त इस्तेमाल और खराब जल-प्रबंधन मुख्य समस्याएं हैंण् इनमें से कई समस्याओं पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाये, तो —षि पैदावार बढ़ाया जा सकता हैण्
संजय कुमार

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