Saturday, May 31, 2008

महंगाई के नाम पर

 राजेंद्र शर्मा
बेलगाम हुई महंगाई से यूपीए सरकार के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें पड़ गई हैं। बेशक ऐसा न होता तो हैरानी की बात होती। खुद प्रधानमंत्री ने फिक्की की सालाना बैठक के अपने उद्घाटन भाषण में यह स्वीकार किया था कि गरीबी की मार आम आदमी पर ही ज्यादा पड़ती है, जिसकी कोई भी अनदेखी नहीं कर सकता। इलेक्शन के साल में तो हर्गिज नहीं। याद रहे कि प्रधानमंत्री की यह चेतावनी यूपीए सरकार का अंतिम मुकम्मल बजट पेश करने के फौरन बाद महंगाई के खतरनाक तरीके से तेजी पकड़ना शुरू करने से पहले ही आ चुकी थी। इसके बावजूद पी. चिदंबरम के बजट प्रस्तावों से महंगाई की आग पर ठंडे पानी के छींटे पड़ने के बजाय कीमतें उछलती चली गईं। मौजूदा महंगाई के राजनीतिक मतलबों को अगर हम कुछ देर के लिए एक तरफ रख दें, तब भी कोई पूछ सकता है कि क्या यह वित्त मंत्री की विफलता का भी मामला नहीं है? असल में पूछा यह भी जा सकता है कि क्या यह पूरी सरकार की भी विफलता का मामला नहीं है?

कथित खुलेपन की नीतियों के दौर में जिम्मेदारी का सवाल उठाया जाना ही सबसे पहले नापसंद किया जाता है! यह सवाल उठाना तो जैसे अपराध ही हो गया है कि आखिरकार यह किन या किस तरह की नीतियों की नाकामी है! जाहिर है, जब जिम्मेदार नीतियों की पहचान नहीं की जा सकती है, तो उस नाकामी की खाई से बाहर निकलने के लिए कुछ करना ही कहां संभव है! इसीलिए हम यह अनोखा तमाशा देख रहे हैं कि यह जानते हुए भी कि इसकी बहुत भारी सियासी कीमत चुकानी पड़ सकती है, पूरी की पूरी सरकार लाचार बनकर महंगाई का तमाशा देख रही है। उसने अगर कोई कोशिश की है तो महंगाई पर अंकुश लगाने की नहीं बल्कि पब्लिक को सिर्फ यह समझाने की कि महंगाई चूंकि बाहर से आई है, इसलिए सरकार उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वित्त मंत्री ने पिछले ही दिनों केरल में कांग्रेस की एक चिंतन बैठक में ऐलान किया कि 'हम महंगाई इम्पोर्ट कर रहे हैं।' आप जानते हैं कि इम्पोर्टेड चीज का आदर करना हमारी परंपरा है।

लेकिन यह किस्सा सिर्फ इतना नहीं है कि महंगाई हो या खाद्य सुरक्षा, पब्लिक पर सीधे मार करने वाले बुनियादी आर्थिक मसलों को भी बाढ़, सूखे या भूकंप की तरह प्राकृतिक आपदा बनाया जा रहा है, जिसके आने-जाने में सरकार का कोई दखल नहीं होता। इससे आगे बढ़कर संकट के असली कारणों पर पर्दा डालने की हड़बड़ी में ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो संकट को और गहरा ही कर सकते हैं। एक छोटी सी मिसाल पेश है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि महंगाई के मौजूदा चक्र को सबसे बढ़कर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल ने भड़काया है। लेकिन चूंकि पिछले दो साल में हमारे देश में खाद्यान्न पैदावार में किसी तरह की गिरावट न होकर बढ़ोतरी ही हुई है, कीमतों में इस उछाल के कारण संकटग्रस्त खेती से बाहर ही होने चाहिए। अब तो सरकार भी न चाहते हुए यह मानने पर मजबूर है कि खेती की पैदावार में फॉरवर्ड ट्रेडिंग के नाम पर सट्टेबाजी ही कीमतों में इस उछाल के पीछे है। और यह सट्टेबाजी मुमकिन हुई है खेती की पैदावारों की खरीद का मैदान देशी-विदेशी बड़े व्यापारियों के लिए खोल दिए जाने से। इसने पीडीएस यानी आम आदमी की इकलौती रक्षा छतरी को जिस तरह तबाह किया है, वह जगजाहिर है। इसने पिछले दो वर्षों में लगातार बढ़ते दाम पर गेहूं का आयात करने, यानी महंगाई के आयात की जो मजबूरी पैदा की थी, वह भी किसी से छुपी नहीं है।

इस समस्या से निपटने के लिए यूपीए सरकार क्या कर रही है? क्या वह कृषि उत्पादों में सट्टेबाजी पर रोक लगा रही है, जिसकी मांग वामपंथी पार्टियों ने ही नहीं, बल्कि संसदीय समिति ने भी की है? जी नहीं। क्या वह उपजों की खरीद में निजी क्षेत्र के दखल पर अंकुश लगा रही है, ताकि भारतीय खाद्य निगम के जरिए सरकार के हाथों में ज्यादा पैदावार पहुंचे और वह पीडीएस के रास्ते आम लोगों को महंगाई से बचा सके? नहीं। वह तो इस मामले में सारी जिम्मेदारी से अपनी जान छुड़ाने की ही कोशिश कर रही है। तभी तो कृषि राज्य मंत्री ने लोकसभा को यह जानकारी दी कि चार राज्यों को मार्च से मई तक अपनी मर्जी के मुताबिक गेहूं के आयात की इजाजत दे दी गई है। ये चार राज्य हैं- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल। मंत्री महोदय ने बताया कि आंध्र और केरल से भी आयात पर विचार करने के लिए कहा गया है। यूपीए सरकार के हिसाब से इन आयातों के जरिए ये राज्य, पीडीएस और दूसरे कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए खाद्यान्न की अपनी जरूरत के करीब आधे की भरपाई करेंगे। मंत्री महोदय ने माना कि 2007 में केंद्रीय पूल में कम गेहूं पहुंचने और ज्यादा मांग आने के चलते यह कदम उठाना जरूरी हो गया था।

यह तो साफ ही है कि इस तरह यूपीए सरकार आम आदमी को न्यूनतम भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी और जवाबदेही, दोनों से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन असल में इस उलटी चाल के नतीजे दूर तक जाते हैं। राज्यों को अपनी जरूरत के लिए खाद्यान्न का आयात करने के भरोसे छोड़े जाने का मतलब यह भी है कि इन राज्यों को इंटरनैशनल मंडी में आपस में ही होड़ के लिए धकेला जा रहा होगा। इससे आयात तो अपेक्षाकृत महंगे पड़ ही रहे होंगे, केंद्र के साथ और आपस में भी राज्यों के संबंधों पर इसका जो असर पड़ेगा, उसका आसानी से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बड़े निवेश और ऋणों के मामले में राज्यों के बीच होड़ ने उन्हें जिस तरह ज्यादा से ज्यादा रियायतें देने पर मजबूर किया है, वह सबके सामने है। जाहिर है, यह रास्ता सिस्टम को ही कमजोर किए जाने की ओर जाता है। इसके जरिए खाद्य सुरक्षा तक के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी नियोजित प्रयास को नामुमकिन बनाया जा रहा होगा। लेकिन आम आदमी के हितों के मामले में शासन को ज्यादा से ज्यादा लाचार बनाया जाना तो उदारीकरण की बुनियादी विशेषता ही है। किसने सोचा होगा कि राज्य के धीरे-धीरे खत्म हो जाने का मार्क्सवादी विचार इस तरह सच होगा!

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