Saturday, May 31, 2008

संसाधनों के पर्याप्त दोहन की जरूरत

शेलोम सिमखोन

पिछले दिनों मुझे भारत को देखने का मौका मिला। मैं यहां पहली बार आया था। यह एक सद्भाव यात्रा थी, जो कृषि मंत्री शरद पवार की इस्त्राइल यात्रा के जवाब में आयोजित की गई थी। अपनी इस यात्रा के दौरान मैंने यहां के कुछ राज्यों और वहां हो रही खेती को देखा। यहां पुल प्राकृतिक संसाधन देख कर मैं मुग्ध रह गया। यह देश विश्व की एक बहुत बड़ी ताकत बन सकता है, लेकिन यहां के संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। अपनी इस यात्रा के दौरान हमने महसूस किया कि दोनों देशों की अनेक समस्याएं समान हैं। हम मिल कर बहुत कुछ कर सकते हैं। हमने इस्त्राइल में तकनीक पर काफी काम किया है।

वर्ष 1948 में इस्त्राइल की राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। यह लगभग वही समय है जब भारत भी आजाद हुआ था। तब इसाइल की अर्थव्यवस्था का वास्तविक आधार भी खेती ही थी। वहां पारंपरिक ढंग की खेती हुआ करती थी और कुछ पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं। उस समय हम नींबू प्रजाति के कुछ फल निर्यात किया करते थे। लेकिन बाद के सालों में हमने इसमें बहुत सारे बदलाव किए हैं। आज हमारे सामने पूरा विश्व एक खुला बाजार है और हम अनेक प्रकार के खाद्य उत्पादों की विश्व भर में बिक्री करते हैं। अब हम सेब और केले जैसे फलों का भी भरपूर उत्पादन करने लगे हैं जिन्हें पानी और सर्द मौसम वाले इलाकों की फसल माना जाता है।

हालांकि इस्त्राइल एक छोटा सा देश है, लेकिन भारत की ही तरह यहां भी कई तरह के मौसम हैं और खेती के लिहाज से अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और मिजाज भी अलग-अलग है। हमने उन्हें ध्यान में रख कर नई कृषि तकनीक और उसके उपकरण विकसित किए हैं। इसका हमें प्रत्यक्ष लाभ मिला है। इसे एक उदाहरण से समझाया जा सकता है। जैसे इसाइल ने ऐसी ग्रीनहाउस तकनीकों का विकास किया है, जो खासतौर से गर्म मौसम वाले इलाकों के लिए हैं। इस ग्रीनहाउस सिस्टम में कुछ विशेष प्रकार की प्लास्टिक फिल्में, हीटिंग और वेंटिलेशन की तरकीबें इस्तेमाल की जाती हैं। इनसे इसाइली किसानों को हर सीजन में 35-40 लाख गुलाब प्रति हेक्टेयर उगाने में मदद मिलती है। इससे औसतन प्रति हेक्टेयर 400 टन टमाटर उगाया जाता है। खुले खेतों में होने वाली फसल के मुकाबले यह पैदावार चार गुनी है।

भारत के पश्चिमी राज्यों में पानी की भारी कमी है। राजस्थान का एक बड़ा इलाका रेगिस्तानी है। गुजरात और महाराष्ट्र के भी कुछ इलाके सूखे हैं। हमारे इस्त्राइल की भी यही स्थिति है। रेगिस्तान से सटे होने के अलावा हमारा देश बेहद छोटा भी है। इसाइल की कुल भूमि का क्षेत्रफल 21 हजार वर्ग किलोमीटर है। इसमें सिर्फ 4.4 लाख हेक्टेयर यानी 20 फीसदी भूमि ही कृषि योग्य है। असल में तो खेती लायक जमीन 3.6 लाख हेक्टेयर भूमि ही है, शेष 1.8 लाख हेक्टेयर भूमि को हमने सिंचाई द्वारा खेती के लायक बनाया है। यह सिंचाई पद्धति सिर्फ जमीन पर पानी डाल देने की पारंपरिक पद्धति नहीं है। इसमें पानी में ही घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है और खाद तथा पानी दोनों की मात्रा मौसम, मिट्टी और पौधे की जरूरत के मुताबिक नियंत्रित की जाती है।

इस्त्राइल की आधी से ज्यादा भूमि बंजर है। इस देश में मौसम की कठिन परिस्थतियों और जल की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए सिंचाई की तकनीक पर यहां काफी काम किया गया है। यह देखा गया कि भूतल पर सिंचाई के बजाय दबावीकृत सिंचाई में जल का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी है। फिर सिंचाई तरह-तरह की तकनीकें और उपकरण विकसित किए गए-जैसे ड्रिप इरिगेशन ऑटोमैटिक वॉल्व्स और कंट्रोलर्स, लो डिस्चार्ज स्प्रेयर्स और मिनी स्प्रिंक्लर्स आदि। फर्टिगेशन (सिंचाई के साथ खाद का इस्तेमाल) आम है। खाद उत्पादकों ने अत्यंत घुलनशील और दव रूप वाली खाद का विकास किया है, जो इस तकनीक के लिए काम आती हैं।

देश भर में कृषि मौसम स्टेशनों का नेटवर्क है, जो मौसम के बारे में किसानों को तात्कालिक आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। इन आंकड़ों के जरिए सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह विकसित कम्प्यूटर नियंत्रित ड्रिप्स सिंचाई प्रणाली बड़ी मात्रा में पानी बचाती है और सिंचाई के जरिए ही खाद की सप्लाई को संभव बनाती है। सोचिए, इस तकनीक और अनुभव का लाभ उठा कर हम भारत के पश्चिमी प्रदेश को कितना हराभरा और उपजाऊ बना सकते हैं। यह खुशी की बात है कि दोनों देशों की सरकारों का ध्यान इस ओर गया है और वे गंभीरता से इस पर काम कर रही हैं। अगले 5 सालों में शायद राजस्थान खुद जैतून के तेल का उत्पादन करने लगेगा।

अपने मौसम की प्रतिकूलता को देखते हुए हमने 50 के दशक से ही खेती और सिंचाई पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया था। इसके अंतर्गत गैर-अनुभवी किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे कृषि की आधुनिक विधियों का इस्तेमाल सीमित संसाधनों के बीच अपनी क्षमता के अनुसार कर सकें। साल बीतते गए और कृषि का तेजी से विकास हुआ, क्योंकि शोध में मिली जरूरी सूचनाएं तेजी से खेतों और किसानों तक पहुंचीं। देश में इस दिशा में काम करने वाले टीमों की स्थापना की गई, जिन्होंने देश भर में कुशल और सक्षम प्रशिक्षण दिया। बाजार में प्रतियोगिता का दौर होने के बावजूद कृषि के पेशेवर विकास में प्रशिक्षण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही और इससे गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा मिला। यह अनुभव और शोध का एक ऐसा मिलाजुला क्षेत्र है जिसमें भारत और इस्त्राइल काफी कुछ एक-दूसरे के साथ बांट सकते हैं।

पशुओं और बीजों की उन्नत प्रजातियां विकसित करने के अलावा कंट्रोल्ड रिलीज फर्टिलाइजर्स जैसी तकनीक के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। इनसे भूमिगत जल का प्रदूषण भी कम होता है। जिन नए तरीकों का आविष्कार किया गया है उनमें सिंचाई की क्रांतिकारी तकनीक, भूमि को उपजाऊ बनाना और रेगिस्तान के उपयोग के लिए खारे पानी का इस्तेमाल बढ़ाना शामिल है। शोधकर्ताओं, किसानों और कृषि पर आधारित उद्योगों के बीच करीबी सहयोग से बाजारोन्मुखी कृषि व्यापार को मजबूती मिली है, जो अपनी कृषि तकनीक का निर्यात पूरे विश्व को कर रहा है।

कृषि बाजारों में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे उत्पाद जो कीटों, रोगाणुओं और कीटनाशकों से मुक्त हों। इसाइल में फसल कटाई के बाद की स्थितियों पर भी काफी काम हुआ है, ताकि इस प्रकार के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मार्केटिंग हो सके। कैसे भंडारण किया जाए, किस तरह की पैकेजिंग की जाए, दुकानों की शेल्फ पर किस तरह से अपने कृषि उत्पादों को ज्यादा से ज्यादा समय तक ताजा रखा जा सके -इस पर भी इस्त्राइल में काफी काम हुआ है। भारत में कृषि उत्पाद की अकूत क्षमता है, वह विश्व बाजार में अपनी धाक जमा सकता है। हम भारत के साथ अपने अनुभव बांटने के लिए बहुत ही उत्सुक हैं।
( लेखक इस्त्राइल के कृषि मंत्री हैं)

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