Saturday, May 31, 2008

महंगाई

धर्मकीर्ति जोशी
प्रिसिंपल इकनॉमिस्ट क्रिसिल


22 मार्च का सप्ताह बीतते-बीतते महंगाई के स्तर में आए 7 फीसदी के तेज उछाल ने सबको चौंका दिया है। भारत और विश्व में तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर महंगाई में बढ़ोतरी तो संभावित थी लेकिन 3 ही हफ्तों में यह 5 से बढ़कर 7 फीसदी तक आ जाएगी, किसी ने नहीं सोचा था। सूरजमुखी और सरसों के तेल जैसी बेसिक जरूरत की चीजों में 21 से 33 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। इंपोर्टेड ऑयल की महंगाई तो 47 फीसदी के आंकड़े को छू रही है। ज्यादा महंगाई का मतलब यह है कि रिजर्व बैंक फिलहाल तो इंटरेस्ट रेट घटाने से रहा।

महंगाई इस समय एक ग्लोबल समस्या है। चीन में महंगाई दर अपने ग्यारह सालों के उच्चतम स्तर 8.7 फीसदी पर है। वियतनाम में यह आंकड़ा 16 फीसदी है। एशिया के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अनाज की कीमतों में आई तेजी से निपटना ही फिलहाल एशियाई देशों के लिए बड़ी चुनौती है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी एशिया की सरकारों के लिए खाद्यान्न और ईधन की कीमतों का सामना करना अमेरिका की आर्थिक तंगी और ग्लोबल मंदी जैसी चुनौतियों से कहीं अधिक भारी पड़ रहा है।

भारत अब तक खुद को ग्लोबल महंगाई के असर से अलग रखने में लगभग कामयाब रहा है। तेल की कीमतों में हुई ग्लोबल बढ़त का असर यहां कंस्यूमर तक नहीं पहुंचने दिया गया। अनाज की कीमतों में भी यहां दुनिया की औसत दर के मुकाबले कहीं कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। रुपये के मूल्य में सुधार ने भी हमें वैश्विक मुद्रास्फीति से बचाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन अब यहां भी हालात चिंताजनक हो गए हैं। इस तरह की अचानक बढ़ी महंगाई का सबब क्या है और आगे हालात का रुख क्या होगा, किसी को नहीं मालूम।

महंगाई के मौजूदा दौर के लिए 3 चीजें सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, पहला तेल (पेट्रोलियम) की कीमतों में उछाल, दूसरा स्टील और अन्य मेटल के मूल्यों में तेजी और तीसरा कृषि क्षेत्र में उत्पादन और कीमतों के बदतर हालात। दुनिया के स्तर पर तेल की कीमत पिछले कुछ महीनों में बहुत बढ़ी हैं। दूसरी ओर बढ़ती मांग के दबाव में कोयले और आयरन ओर की कीमत में इजाफे के कारण मेटल और खास तौर से स्टील का मूल्य भी चढ़ता रहा। वर्तमान में मुद्रास्फीति की भागती रफ्तार में सबसे अहम भूमिका भारत और विश्व की खस्ताहाल कृषि के कारण अनाज की कीमतों पर लगातार बढ़ते दबाव की है। यह खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया, चीन और यूरोप के देशों में अनाज से बायो फ्यूल बनाने और खराब मौसम की वजह से हो रहा है। नतीजतन दुनिया का फूड स्टॉक आज 2 दशकों के न्यूनतम स्तर पर है, जिसके कारण दूसरे कृषि उत्पादों के मूल्य भी आसमान छूने लगे हैं। हमारी घरेलू खेती भी इस लिहाज से कुछ अच्छा नहीं कर सकी है। जिसकी वजह से इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ गई है।

खाने की चीजों में आई तेजी की वजह से अनेक देशों के अलग-अलग वर्गों के लोग विभिन्न तरीकों से आहत हुए हैं। अमेरिका जैसे आधुनिक अर्थतंत्र में कुल व्यय का 10 फीसदी हिस्सा खाने की चीजों पर जाता है। जैसे-जैसे हम आर्थिक रूप से कमजोर देशों की ओर जाएंगे, यह बढ़ता जाएगा। चीनी व्यक्ति की कुल आय का 30 फीसदी और भारतीय का 40 फीसदी खाने की चीजों में जाता है। अगर खाद्यान्न के मूल्यों में इजाफे का सिलसिला रोका न गया तो गरीब देशों के हालात क्या होंगे, सोचा जा सकता है। यदि किसी देश में अनाज के लिए मारामारी और हिंसा की खबरें आने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दूसरी सरकारों की ही तरह भारत ने भी मुद्रास्फीति कम करने के लिए कई नीतियां घोषित की हैं। इसमें खाद्य तेलों पर शुल्क में कटौती और निर्यात पर लगाम लगाना अहम बातें हैं। सरकार सीमेंट और स्टील कंपनियों से भी कीमत घटाने को कह चुकी है। लेकिन महंगाई पर लगाम कसने के लिए इतना ही काफी नहीं है। कंपनियों पर कीमत घटाने का दबाव भविष्य में मूल्य नियंत्रण के लिहाज से बुरा ही साबित होगा क्योंकि यह आर्थिक विकास के अहम जरिए को हतोत्साहित करने जैसा है। खाद्यान्न मूल्यों में तेजी की स्थिति आगे भी बनी रहने वाली है, इसलिए सिर्फ इंपोर्ट पर निर्भरता अच्छी नहीं है। इस समस्या से निजात का स्थाई तरीका यही हो सकता है कि घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके इस लिहाज से आत्मनिर्भरता पाई जाए। खेती में उत्पादकता बढ़ाने की नीतियां लागू की जानी चाहिए। जब तक आत्म निर्भरता हासिल नहीं होती, हमें खाद्यान्न के लोकल और ग्लोबल सिनेरियो पर करीबी निगाह रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर संकट से काफी पहले आयात कर लेना होगा।

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