Saturday, May 31, 2008
महंगाई और चुनाव
महेश रंगराजन
राजनीतिक विश्लेषक
सत्तारूढ़ यूपीए सरकार को महंगाई के प्रेत ने परेशान कर डाला है। महंगाई की दर ने 22 मार्च के सप्ताह के बीतते बीतते 7 फीसदी का आंकड़ा पार कर लिया और अब वह 7.41 फीसदी तक पहुंच गई है, जो कि पिछले तीन सालों में महंगाई का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इस तरह सत्तारूढ़ गठबंधन और खासतौर पर कांग्रेस के लिए जो चीज मुश्किल का सबसे बड़ा सबब बनने जा रही है, वह इस साल देश के कई राज्यों में होने वाले चुनाव हैं, जहां मतदाता महंगाई को लेकर बेहद संवेदनशील हैं।
कोई हैरत की बात नहीं कि कांग्रेस पर इस वक्त राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दोनों छोरों से हमले हो रहे हैं। एल. के. आडवाणी ने साफ तौर पर यह जाहिर कर दिया कि इस बार चुनाव का मुख्य मुद्दा महंगाई ही होगी। कोयंबटूर में हुए हालिया कॉन्फ्रेंस के बाद से सीपीएम भी इस मुद्दे को लेकर सड़क पर आने को उतारू है। बीजेपी का रुख मनमोहन सरकार के गठन के बाद से अब तक लगातार आक्रामक ही रहा है।
व्यापक स्तर पर चीजें सचमुच बहुत खराब दिख रही हैं। महंगाई बढ़ने और चुनावी नतीजे के इतिहास पर नजर यह समझने में मदद कर सकती है कि क्यों आशंकाएं वास्तविक दिखाई दे रही हैं। 1971 में इंदिरा गांधी ने बहुत बड़ी जीत हासिल की। लेकिन 1974 तक सारी चीजें उलट-पुलट हो गईं। इसकी एक बड़ी वजह महंगाई थी। 1971-73 का सूखा और बांग्लादेश के युद्ध ने कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया था। 1973-74 के दौरान औद्योगिक श्रम के लिए कमोडिटी प्राइस इंडेक्स में 21 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई थी और जैसे ही तेल की कीमत में इजाफा हुआ, उसके बाद अगले ही वर्ष महंगाई में भी काफी बढ़ोतरी हो गई।
हम कहेंगे कि ये सब बीते सालों की बातें हैं। 1965-73 के दौरान भारत की विकास दर 3 फीसदी से भी कम थी। लेकिन 2003 के बाद से अब तक भारत अभूतपूर्व रफ्तार से विकास यात्रा कर रहा है। भारत पहले की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा अमीर मुल्क है।
लेकिन एक परेशान करने वाली बात है। पी.बी. नरसिंह राव का नेताओं, व्यवसायियों और उद्योगपतियों के बीच एक समय काफी अच्छा प्रभाव था। लेकिन 1994 के वर्षांत तक आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के एसेंबली चुनावों के नतीजे पार्टी के फिर से उठने की किसी भी संभावना पर भारी पड़ गए। इसका भी अहम कारण चावल की कीमत में आया उछाल ही था। 1998 से लगातार कांग्रेस नरसिंह राव का नाम लेने से बचती रही है। 2006 की गर्मियों में केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के राज्य में, करुणानिधि के नेतृत्व वाले गठबंधन ने गरीब परिवारों को प्रतिमाह 10 किलो चावल मुफ्त देकर अपने लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। मार्च 2007 में अकाली दल के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शहरी गरीबों के वोट की बदौलत मैदान मार लिया। यहां भी सस्ती दाल और आटे के वादे ने ही असर दिखाया।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 1991 से लेकर आज तक प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता में 13 फीसदी की कमी आई है और दालों के संदर्भ में यह आंकड़ा 33 फीसदी का है। आज खाद्य चीजों की कीमत पिछले छह महीने के स्तर से भी काफी अधिक है। दाल और खाद्य तेलों के मूल्य देखकर तो यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है।
भारत के विकास की रफ्तार भले ही बहुत तेज हो, लेकिन इस विकास में हर किसी की हिस्सेदारी बराबर नहीं है। भूमिहीन मजदूरों और गरीब किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक के अनेक तबके फिर भी संघर्ष करने को बाध्य हैं। मंडी में खाद्य चीजों की कीमत में जारी लगातार इजाफा आय के नजरिए से भी किसानों को कोई खास फायदा नहीं दे पा रहा। हमारी श्रम शक्ति का आधा हिस्सा आज भी कृषि कामों में लगा हुआ है। इसलिए सिंचाई की पम्पिंग मशीनों के लिए डीजल और कृषि उत्पादों को नजदीकी सड़क अथवा रेल तक पहुंचाना भी महंगा और इसलिए काफी भारी साबित हो रहा है।
किसानों और गरीबों पर शिकंजे की तरह कसती महंगाई ने सत्तारूढ़ गठबंधन की रातों की नींद हराम कर रखी है। प्याज की कीमत को लेकर पार्टी द्वारा कभी मचाया गया हो हल्ला भी कौन भूल सकता है? पहले इसने 1980 की लोकसभा में इंदिरा गांधी की मदद की, फिर 1998 में सोनिया गांधी ने इसका सहारा लिया।
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