भरत झुनझुनवाला
इस वक्त महंगाई का जो आलम है, उसकी पहली वजह यह है कि खाद्य पदार्थों का भारी मात्रा में उपयोग बायोडीजल बनाने के लिए हो रहा है, खास तौर से अमेरिका में मक्के और ब्राजील में गन्ने का। दुनिया के खाद्य उत्पादन में से यह मात्रा निकल जाने के कारण दूसरे खाद्य पदार्थों पर दबाव पड़ रहा है। महंगाई की दूसरी वजह भारत और चीन में तेज आर्थिक विकास है। ये देश बुनियादी ढांचे में भारी मात्रा में निवेश कर रहे हैं। जिससे स्टील आदि की मांग और दाम बढ़ रहे हैं। पिछले दिनों तेल के दाम में हुई भारी बढ़ोतरी भी इसी क्रम में है। भारत में बायोडीजल के उत्पादन के लिए खाद्यान्नों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। लेकिन विश्व स्तर पर ऐसे उपयोग का असर हम पर पड़ रहा है।
सामान्य हालात में अमेरिकी इकॉनमी में गहराती मंदी को महंगाई रोकने में मददगार होना चाहिए था। अगर चीन में तेजी के कारण स्टील की मांग ज्यादा है तो अमेरिका में मंदी के कारण मांग कम है। लेकिन अमेरिकी मंदी के बावजूद स्टील और गेहूं के वैश्विक मूल्यों के बढ़ने से पता लगता है कि अमेरिकी मांग में हो रही कटौती की तुलना में भारत और चीन में मांग में बढ़ोतरी ज्यादा हो रही है। यह इस बात का सबूत है कि भारत-चीन तथा अमेरिका की इकॉनमी में अलगाव हो चुका है।
इसके अलावा चीजों की भी भिन्नता है। अमेरिकी मांग में कपड़े, खिलौने, कार आदि का हिस्सा ज्यादा था। अमेरिका के मंद पड़ने से इन माल के दाम घट रहे हैं। खबर है कि भारतीय कपड़ा मिलों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उनके ऑर्डर कैंसल हो रहे हैं और गारर्मेन्ट्स के दाम घट रहे हैं। लेकिन भारत के बाजार में इन वस्तुओं का महत्व कम है इसलिए इस मूल्य कटौती का असर नहीं दिख रहा है। हमारी इकॉनमी में स्टील, सीमेंट और दूसरे कन्स्ट्रक्शन मटीरियल का हिस्सा ज्यादा है। इनके दाम बढ़ रहे हैं।
लेकिन शेयर बाजारों में पिछले दो माह में आई गिरावट इस अलगाव पर सवालिया निशान खड़ा करती है। अमेरिकी मंदी के गहराने के साथ-साथ भारत के शेयर बाजार टूट रहे हैं। मेंरा मानना है कि यह अल्पकालीन असर है। अमेरिकी संकट के हमारे शेयर बाजार पर दो असर पड़ते हैं। तत्काल हमारे यहां बिकवाली होती है। अमेरिकी बैकों को अमेरिका में हुए घाटे की भरपाई के लिए यहां पर अपनी होल्डिंग की बिक्री करनी पड़ रही है। लेकिन दूसरा असर उल्टी दिशा में होता है। दुनिया के निवेशकों को सदा निवेश के अवसरों की खोज रहती है। मसलन सऊदी अरब के राजघराने को तेल के ऊंचे दामों से भारी फायदा हो रहा है।
पहले वह इस आय के बड़े हिस्से का निवेश अमेरिका में कर रहा था, लेकिन अब वहां निवेश करना आकर्षक नहीं रह गया है। अमेरिका में मंदी के गहराने के साथ अमेरिकी डॉलर का मूल्य गिर रहा है जिससे निवेशकों को भारी घाटा लगता है। लिहाजा दुनिया के तमाम निवेशकों को खोज है ऐसी मुद्रा की जिसके मूल्य में बढ़ोतरी होने की गुंजाइश हो। हमारा रुपया ऐसी स्थिति में है। इसलिए दुनिया भर के निवेशकों का रुख भारत की तरफ हो रहा है। पिछले चार माह में सीधा विदेशी निवेश रेकॉर्ड 10 अरब डॉलर के स्तर पर रहा है, जो कि इस प्रवाह का संकेत देता है। इस प्रवाह से भारत और चीन में महंगाई की दर भी बढ़ रही है। इसलिए अमेरिकी मंदी का महंगाई पर असर नहीं दिख रहा।
इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार द्वारा महंगाई पर नियंत्रण करने की कोशिशों का मूल्यांकन करना चाहिए। सरकार ने कई वस्तुओं पर आयात शुल्क घटा दिया है, जैसे स्टील और खाद्य तेल पर। दूसरी वस्तुओं के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, जैसे चावल। यह कदम सही दिशा में होने के बावजूद ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है। मूल समस्या विश्व बाजार में स्टील और सीमेंट की ज्यादा मांग होने से इनके वैश्विक मूल्यों में तेजी है। जब रूस, हांगकांग और दुबई में स्टील का दाम बढ़ रहा है तो इस पर आयात कर घटाने से मामूली अंतर ही पड़ेगा। इसके अलावा आयात शुल्क शून्य कर देने के बाद यह नुस्खा फेल हो जाता है। यही स्थिति चावल के निर्यात पर पाबंदी की है।
मान लिया कि पाबंदी लगाने से चावल के बाहरी मूल्यों से हमारा बाजार प्रभावित नहीं होगा। लेकिन हम दूसरे खाद्य पदार्थों का आयात कर रहे हैं जैसे गेहूं का। गेहूं का वैश्विक मूल्य बढ़ने से गेहूं के घरेलू मूल्य बढ़ेंगे और सहानुभूति में चावल के दाम भी बढ़ जाएंगे। आयातित पाम ऑयल के महंगा होने के कारण घरेलू मूंगफली और नारियल के तेल भी महंगे हो जाएंगे। सरकार द्वारा दूसरा कदम कैश रिजर्व रेशो को बढ़ाना है। इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए रकम कम बचेगी। कर्ज कम मिलने से फैक्ट्रियां कम लगेंगी और स्टील तथा सीमेंट की मांग कम होगी। यह कदम सही दिशा में होते हुए भी बेअसर होगा, क्योंकि मांग में बढ़ोतरी के दूसरे दरवाजे खुले हैं।
सरकार को दूसरी स्ट्रैटिजी अपनानी चाहिए। महंगाई का मूल कारण विदेशी निवेश का भारी मात्रा में आगमन है। सीधे इस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। जब विदेशी पूंजी कम आएगी तो महंगाई अपने आप काबू में आएगी। खाद्य पदार्थों का मामला ज्यादा पेचीदा है। गेहूं, चावल और तेल के दाम बढ़ने से हमारे किसान फायदे में रहते हैं। इनकी मूल्य बढ़ोतरी से किसानों को आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की भी प्रेरणा मिलती है। खाद्य पदार्थों के मूल्य पिछले 20 बरसों में औद्योगिक माल की तुलना में कम ही बढ़े हैं।
इनमें मूल्य बढ़ोतरी देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी हितकारी है। इसलिए खाद्य पदार्थों की मूल्य बढ़ोतरी रोकने के स्थान पर आम आदमी को महंगे खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए सक्षम बनाना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि श्रम की मांग बढ़े और श्रमिक की दिहाड़ी वर्तमान 120 रुपये से बढ़कर 200 रुपये हो जाए। तब गरीब के लिए महंगे खाद्यान्न खरीदना मुमकिन होगा। खाद्य सुरक्षा हासिल होगी, किसान खुशहाल होगा और गरीब भी महंगाई की मार से बच जाएगा।
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