अलग-अलग स्तरों पर चीजों के दाम अलग-अलग होते हैं। सब्जियों के दाम होलसेलर के लिए अलग होते हैं। होलसेलर से खरीदने वाले रिटेलर के लिए दाम अलग होते हैं और रिटेलर से आप जिस कीमत पर सब्जी खरीदते हैं उसमें रिटेलर का मुनाफा भी जुड़ा रहता है। चढ़ती-उतरती कीमतों को नापने के लिए एक निश्चित इंडेक्स की जरूरत होती है। भारत में महंगाई को मापने के लिए वैसे तो कई इंडेक्स हैं मगर सरकारी तौर पर इसका आकलन थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआई) से किया जाता है। यानी जिस दाम पर चीजें थोक में बिकती हैं, उसके आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है।
महंगाई दर हर हफ्ते नापी जाती है। डब्लूपीआई, कमोडिटी इंडेक्स है जिसमें 5 बड़े ग्रुप होते हैं- प्राइमरी आर्टिकल, फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स और मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट। इन्हें फिर छोटे सब-ग्रुप में बांटा जाता है। मसलन, प्राइमरी आर्टिकल ग्रुप में फूड आर्टिकल, नॉन फूड आर्टिकल और मिनरल्स शामिल हैं। सभी सब-ग्रुप में कई कमोडिटी होती हैं।
अभी डब्लूपीआई में 435 कमोडिटी हैं जिनके थोक मूल्यों के आधार पर ही महंगाई की दर तय होती है। इनमें 98 प्राइमरी आर्टिकल हैं, 19 फ्यूल, पावर, लाइट एंड लुबरिकेंट्स ग्रुप में आते हैं जबकि 318 मैन्युफैक्चर्ड प्रॉडक्ट्स ग्रुप के अंतर्गत हैं।
डब्लूपीआई मुख्य शहरों और राज्यों की राजधानियों से जमा किए डेटा के आधार पर केलकुलेट करते हैं। रिस्पॉन्डेंट का इंटरव्यू लेकर सीधे डेटा लिया जाता है। ये रिस्पॉन्डेंट ऐसी कंपनियों के होते हैं जो कमर्शल कमोडिटी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी तरह सभी कमोडिटी का प्राइस लिया जाता है।
अगर हम कहें कि 22 मार्च को खत्म हुए हफ्ते में महंगाई दर 7 फीसदी रही तो इसका मतलब हुआ कि उससे पिछले साल इसी हफ्ते की तुलना में इस अवधि में चीजें इतनी महंगी हुईं।
डब्ल्यूपीआई के आधार पर महंगाई नापने की कोशिश की आलोचना होती रही है। वजह यह है कि आम कंस्यूमर को जिस महंगाई का सामना करना पड़ता है, वह थोक नहीं, रिटेल मूल्यों की है। इसी लिए कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स ज्यादा सटीक माना जाता है, जो आम तौर पर थोक मूल्य सूचकांक से कई फीसदी ज्यादा रहता है। भारत में सीपीआई है, लेकिन वह सही तरीके से विकसित नहीं हो सका है।
महंगाई को डिमांड और सप्लाई में गड़बड़ी के तौर पर देखा जाता है और इसकी कई वजहें हो सकती हैं। सरकार इसके खिलाफ वित्तीय और प्रशासकीय कदम उठाती है। लेकिन इसे देखने का एक नजरिया मौद्रिक भी है। इसके तहत महंगाई को इनफ्लेशन यानी पैसे का फैलाव कहा जाता है। यानी जब लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आता है, तो डिमांड बढ़ती है और इससे चीजें महंगी होने लगती हैं। रिजर्व बैंक यही नजरिया अपनाता है और इसलिए पैसे का फैलाव रोकने के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ा देता है। इस कदम का नुकसान यह है कि पैसा महंगा हो जाता है, जिसका असर इकनॉमिक ग्रोथ पर पड़ता है। यानी महंगाई पर काबू पाने की कोशिश में सरकार को यह भी देखना होता है कि वह ग्रोथ से कितनी छेड़छाड़ करे। जाहिर है, यह एक मुश्किल चुनाव है, इसलिए ज्यादातर लोग चाहते हैं कि वित्तीय और प्रशासकीय कदमों से ही महंगाई पर काबू पाया जाए।
No comments:
Post a Comment